विज्ञान

(17/Oct/2018)

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस, 10 अक्टूबर

मानसिक स्वास्थ्य : जानकारी तथा जागरुकता की जरूरत 

डॉ.कृष्ण कुमार मिश्र
 
   
 
मानसिक स्वास्थ्य वर्तमान समय की एक बड़ी चुनौती है। इसीलिए मानसिक स्वास्थ्य के विषय में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से हर वर्ष 10 अक्टूबर को ‘विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इक्कीसवीं सदी में जीवन भाग-दौड़ वाला हो गया है। खास करके शहरों में जीवन की आपाधापी के साथ कदमताल मिलाना कठिन होता जा रहा है। महानगरों में स्थिति और कठिन है। उदारीकरण, बाजारवाद तथा उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते मानव जीवन तरह तरह के दबावों में घिर गया है। भौतिकतावादी दृष्टिकोण के चलते संसाधनों पर अधिकार की अंधीदौड़ ने मनुष्य को मानसिक तनाव में डाल दिया है। जीवन में सरलता, सहजता तथा प्रकृति के साथ तादात्म्य कम होते जा रहे हैं। तनावपूर्ण जीवन-शैली के कारण अधिकांश लोग मानसिक रोगों का शिकार होते जा रहे हैं। इसमें अवसाद (डिप्रेशन) प्रमुख है। मानसिक स्वास्थ्य ठीक न होने पर व्यक्ति की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। दुनिया में लगभग 30 करोड़ लोग अवसादग्रस्त हैं। भारत में इनकी संख्या करीब 5 करोड़ है। अवसाद को आत्महत्या की एक बड़ी वजह माना जाता है। दुनिया में हर 40 सेकेण्ड में एक व्यक्ति खुदकुशी कर लेता है। चिन्ता एवं अवसाद की स्थिति में व्यक्ति नकारात्मकता का शिकार हो जाता है। इसकी वजह से वह आत्महत्या जैसा कायरतापूर्ण कदम उठा लेता है। 
 
सर्वव्यापी है मनोरोग
मनोरोग किसी को भी हो सकता है। इसमें कोई आम या खास नहीं होता। अवसाद की बीमारी समाज के हर वर्ग में पायी जाती है। उन्नीसवीं सदी के विश्व के महान सार्वकालिक डच चित्रकार विंसेन्ट वैन गौ के बारे में कहा जाता है कि वे गंभीर मनोरोग से ग्रस्थ थे। इसी बीमारी के चलते एक बार उन्होंने अपना कान स्वयं काट लिया था। महज 37 साल की उम्र में उन्होंने खुद को गोली मार आत्महत्या कर ली। उनकी पेंटिंग्स, ‘सनफ्लॉवर्स’ तथा ‘ह्वीटफील्ड विथ क्रोज’, दुनिया में श्रेष्ठतम कृतियाँ मानी जाती हैं। उनकी पेंटिंग्स में ब्रश की रेखाओं के कोणीय झुकाव का अध्ययन करके मनोविज्ञानियों ने निष्कर्ष निकाला है कि वे संभवतः बाईपोलर डिसआर्डर से पीड़ित थे। ऐसा माना जाता है कि बहुत सृजनशील तथा रचानधर्मी व्यक्तियों के मनोरोगी होने की संभावना दूसरों की अपेक्षा ज्यादा होती है। 
मानसिक रुग्णता का हालिया उदाहरण मध्य प्रदेश के आध्यात्मिक गुरु भय्यूजी महाराज तथा महाराष्ट्र पुलिस के ‘सुपर कॉप’ के नाम से मशहूर पुलिस अधिकारी हिमांशु रॉय हैं, जिन्होंने अलग-अलग कारणों से उपजे मानसिक तनाव के चलते स्वयं को गोली मारकर खुदकुशी कर ली। अवसाद हर उम्र तथा हर समुदाय को प्रभावित करता है। चाहे कोई किसान हो या मजदूर, पढ़ा लिखा हो या अनपढ़। कारोबारी हो या बेरोजगार, नौकरीपेशा हो या फिर कोई विद्यार्थी, हर किसी को तनाव तथा अवसाद हो सकता है। यह बात ध्यान रखने की है कि तनाव किसी भी समस्या का समाधान नहीं होता। अलबत्ता यह कई समस्याओं का जन्मदाता जरूर होता है। तनाव से सिरदर्द, उच्चरक्तचाप, माइग्रेन तथा हृदय से जुड़ी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। 
विश्व मानसिक स्वास्थ्य संघ की स्थापना सन् 1948 में की गई थी। इस संस्था का उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देना है। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पहली बार 10 अक्टूबर सन् 1992 को मनाया गया था। इसकी शुरुआत विश्व मानसिक स्वास्थ्य संघ के डिप्टी सेक्रेटरी जनरल रिचर्ड हन्टर द्वारा की गई थी। भारत सरकार ने भी मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल तथा सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सन् 1982 से राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू किया है। 
 
मानसिक रोग
व्यक्ति के मस्तिष्क से जुड़े रोगों को मानसिक रोग या मानसिक विकार कहा जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट अनुसार दुनिया में हर चार में से एक व्यक्ति अपने जीवन काल में कभी न कभी मानसिक विकार से पीड़ित होता है। भारत की लगभग छह-सात फीसदी मौजूदा आबादी मानसिक रोगों से पीड़ित है। किसी भी व्यक्ति में मानसिक रोग के कई कारण हो सकते हैं, जैसे कि-
  • · आनुवांशिक या जन्मजात 
  • · मस्तिष्क से जुड़े हार्मोन्स में उम्र के साथ होने वाले बदलाव 
  • · दुर्घटना के कारण मस्तिष्क में होने वाली क्षति
हमारे मानसिक स्वास्थ्य को कई रसायन प्रभावित करते हैं। उन्हें न्यूरोट्रांसमिटर कहा जाता है। उनमें सबसे प्रमुख है सिरोटोनिन। इसे अच्छे मूड का न्यूरोट्रांसमीटर कहा जाता है। शरीर में इनका अच्छा स्राव हमें खुशमिजाज रखता है। रसायन की भाषा में इसे 5-हाइड्रॉक्सी ट्रिप्टामीन कहा जाता है। यह ट्रिप्टोफेन कहे जाने वाले ऐमीनो अम्ल से संश्लेषित होता है। सिरोटोनिन रसायन, भूख, नींद, सीखने की प्रवृत्ति और याददाश्त संबंधी कार्यों को नियंत्रित करता है। जिन खाद्य पदार्थो में ऐमीनो अम्ल ट्रिप्टोफेन होता है, वे दिमाग में सेरोटोटिन के स्तर को बढ़ाते हैं। सिरोटोनिन को बढ़ाने के लिए कीवी, केले, आम, मौसमी फल और अनानास खाने की सलाह दी जाती है। रोजाना कुछ देर धूप में बैठने से भी सिरोटोनिन का स्तर ठीक रहता है तथा हमारा मिजाज अच्छा रहता है।  
 
मानसिक अस्वस्थता के लक्षण
मानसिक अस्वस्थता से शारीरिक लक्षणों में कोई खास बदलाव दृष्टिगोचर नहीं होता। फिर भी कुछ बातों पर गौर किया जा सकता है 
  • · वजन का अचानक बढ़ना या घटना 
  • · चेहरा बुझा-बुझा सा नजर आना स बेचैनी महसूस करना स किसी काम में मन न लगना 
  • · मन में अकसर आत्महत्या का ख्याल आना
कुछ प्रमुख मानसिक रोग
दुशि्ंचता ;एंग्जायटी डिसऑर्डरद्ध एक प्रकार का मानसिक रोग है। जिन लोगों में यह विकार पाया जाता है, उनमें यह देखा गया है कि वे किसी सामान्य-सी परिस्थिति में भी बहुत ज्यादा घबरा जाते हैं। उनकी दिल की धड़कन बहुत बढ़ जाती है। उन्हें पसीना आने लगता है। इस समस्या से ग्रसित व्यक्ति अपनी बात को अभिव्यक्त नहीं कर पाता है। हमेशा अपने साथ कुछ गलत होने की आशंका से ग्रस्त रहता है। छोटी-छोटी बातों को लेकर बेवजह घबराहट और चिंता में घिरे रहना दुश्चिन्ता का लक्षण है। सब गड़बड़ हो गया, अब क्या होगा, कुछ समझ नहीं आ रहा, क्या करें ...। हमेशा मेरे ही साथ ऐसा क्यों होता है? हममें से ज्यादातर लोगों के मन में कभी न कभी ऐसी बातें देखने में आ सकती हैं। जीवन की कुछ परिस्थितियां ऐसी होती हैं, जब साहसी तथा धीरज रखने वाला इंसान भी चिंतित हो जाता है। मुश्किल हालात में कुछ समय के लिए ऐसा होना स्वाभाविक भी है। लेकिन जब किसी व्यक्ति को हमेशा चिंता या डर में जीने की आदत पड़ जाए तो आगे चलकर यही मनोदशा दुश्चिन्ता जैसी गंभीर मानसिक व्याधि का रूप ले लेती है। इससे व्यक्ति की दिनचर्या प्रभावित होने लगती है। 
 
अवसाद ;डिप्रेशन
अवसाद ऐसी मानसिक अवस्था है जिसके लक्षणों में उदासी, रुचि का अभाव, प्रतिदिन की क्रियाओं में प्रसन्नता का अभाव, अशांत निद्रा, कम भूख लगना अथवा ज्यादा भूख लगना, वजन कम होना या वजन बढ़ना, आलस, दोषी महसूस करना, अयोग्यता, असहायता, निराशा, एकाग्रता स्थापित करने में परेशानी और अपने तथा  दूसरों के प्रति नकारात्मक विचार, शामिल हैं। यदि किसी व्यक्ति के अन्दर इस तरह के मनोभाव दो सप्ताह तक लगातार कायम रहे तो उसे अवसादग्रस्त कहा जा सकता है। ऐसी स्थिति में उसके उपचार के लिए मरीज को शीघ्र नैदानिक चिकित्सा प्रदान करवाना आवश्यक हो जाता है।
अवसाद के लक्षण- अवसाद एक ऐसी मानसिक बीमारी है जिसके कारण बहुत से हो सकते हैं। यह कभी भी किसी एक कारण से नहीं होता है बल्कि कई कारणों से मिलकर होता है, जैसे कि मानसिक, शारीरिक तथा रासायनिक (हार्मोनल)। लेकिन यह बहुत ही खतरनाक होता है। इसके कुछ प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं-
  • · हमेशा थकान महसूस करना 
  • · उत्साह कम हो जाना 
  • · किसी भी काम का निर्णय न ले पाना 
  • · किसी भी काम में मन न लगना 
  • · जिन्दगी के लिए एक उलझा हुआ नजरिया होना 
  • · बिना कारण वजन का बढ़ना या घटना 
  • · खानपान की आदतों में बदलाव 
  • · आत्महत्या का विचार आना 
  • · मन एकाग्र न हो पाना 
  • · स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाना 
  • · नींद न आना 
  • · हमेशा नकारात्मक खयाल आना।
 
मनोविदलता (स्किजोफ्रेनिया)
स्किज़ोफ्रेनिया एक मानसिक रोग है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व भर में करीब एक प्रतिशत लोगों में इस तरह का मानसिक रोग पाया जाता है। जहाँ तक भारत का प्रश्न है, तो प्रति हजार में से लगभग तीन लोगों में इस बीमारी के लक्षण देखे जाते हैं। यह संख्या आंकड़ों के हिसाब से कम जरूर है लेकिन असल में यह तेजी से बढ़ता हुआ मानसिक रोग है। इस मानसिक रोग से पीड़ित व्यक्ति खुद को समाज और परिवार से अलग कर लेता है और अपना समय अकेले में बिताना ज्यादा पसंद करता है। इसकी वजह से यह विकार और ज्यादा घातक होने लगता है। स्किजोफ्रेनिया से ग्रस्त व्यक्ति श्रवण सम्बन्धी विभ्रम, मिथ्याभ्रम और असंगठित तथा अस्वाभाविक सोच प्रदर्शित करता है। स्किज़ोफ्रेनिया उन मानसिक विकारों में से एक है जिनका उपचार संभव है लेकिन समय रहते इसकी जानकारी हो जाए तब। यह बीमारी प्रायः उम्रदराज लोगों में देखने में आती है।  
 
बाईपोलर डिसऑर्डर
बाईपोलर डिसऑर्डर का शिकार व्यक्ति का मूड जल्दी-जल्दी बदलता है। वह कभी खुद को एकदम से खुश महसूस करता है तो एकाएक अवसाद की अवस्था में भी पहुँच जाता है। खुशी और दुःख दोनों ही अवस्थाएँ सामान्य नहीं होती हैं। खुशी की इस अवस्था को ‘मैनिक’ कहा जाता है। बाईपोलर डिसऑर्डर पुरुषों और महिलाओं दोनों को प्रभावित करता है। चूंकि यह मस्तिष्क के क्रियाकलापों को प्रभावित करता है जिससे इसका असर लोगों के सोचने, व्यवहार और महसूस करने में दिखता है। इसकी वजह से अन्य लोगों को इस रोग से ग्रस्त रोगी की मनोदशा को समझ पाना मुश्किल हो जाता है। सामान्यतः वयस्कों में ये स्थिति एक हफ्ते से लेकर, एक महीने तक रहती है। हालांकि यह इससे कम भी हो सकती है। मैनिक और डिप्रेशन की स्थिति अनियमित होती है और इसका पैटर्न भी समान नहीं होता। इसके लक्षण हमेशा एक समान नहीं होते। हर व्यक्ति के व्यक्त्वि के अनुसार ये अलग-अलग प्रकट होते हैं।
 
आहारचर्या संबंधी विकार (ईंटिंग डिसऑर्डर)
जब कोई इंसान बहुत ज्यादा मात्रा में या फिर बहुत कम मात्रा में भोजन लेना शुरू कर देता है तो इसे ईटिंग डिसऑर्डर कहा जाता है। ईटिंग डिसऑर्डर भी एक तरह का मानसिक रोग है जिसके बारे मे जानना सभी के लिए बहुत आवश्यक है। इससे प्रभावित लोग अपने वजन तथा शारीरिक बनावट के बारे मे बहुत अधिक सोचते हैं। वे अवसाद का शिकार हो जाते हैं और दूसरों की उपस्थिति में भोजन करना पसंद नहीं करते। इस तरह की बीमारी विशेषकर महिलाओं और युवाओं में सबसे अधिक देखी जाती है। ये समस्या मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं- एनोरेक्सिया नर्वोसा- इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति अपने खाने पर गंभीर प्रतिबन्ध लगाते हैं। ऐसा वे स्लिम तथा चुस्त दुरुस्त दिखने के लिए करते हैं। समुचित आहार ने लेने से वे निहायत दुबले-पहले हो जाते हैं। उनके तंत्रिकातंत्र (नर्वस सिस्टम) में इस तरह के बदलाव हो जाते हैं कि उनकी भूख ही मर जाती है। बाद में वे चाह कर भी खाना नहीं खा सकते। रोगी इस स्थिति में पहुँच जाता है कि मानो किसी अकालग्रस्त इलाके से आया हो। बुलिमिया नर्वोसा- इस तरह के विकार से पीड़ित व्यक्ति तनाव, घबराहट या अन्य भावनात्मक मुद्दों से निपटने के एक तरीके के रूप में खाने का इस्तेमाल करने लगता है अर्थात् आवश्यकता से अधिक खाना खाने लगते हैं। इससे रोगी का शरीर अतिशय मोटा या थुलथुल हो जाता है। दोनों स्थितियाँ शरीर में हार्मोन की गड़बड़ी से पैदा होती हैं। ऐसे विकारों से छुटकारा पाने के लिए दीर्घकालिक इलाज की जरूरत होती है। 
 
मनोग्रसित बाध्यता विकार (ओब्सेसिव-कम्पल्सिव डिसऑर्डर)
मनोग्रसित बाध्यता विकार एक तरह का चिन्ता विकार है। इस विकार से ग्रसित व्यक्ति एक ही चीज की बार-बार जाँच करता है। कुछ विशेष कामों को बार-बार करता है जैसे कि बार-बार हाथ धोना, बार-बार वस्तुओं को गिनना, बार-बार जाकर देखना कि दरवाजा बन्द है कि नहीं। ये क्रियाएँ वह इतनी बार करता है कि उसका दैनिक जीवन ही प्रभावित होने लगता है। प्रायः दिन भर में इन कामों में वह काफी समय खपा देता है। कुछ अन्तर्वेधी विचार उसके मन में बार-बार आते हैं जिनके कारण बेचैनी, डर, चिन्ता पैदा होती है। उस व्यक्ति में बाध्यताओं (कम्पल्शन्स) के लक्षण पाए जाते हैं। इसका मुख्य कारण मस्तिष्क में कुछ खास किस्म के रसायनों के स्तर में गड़बड़ी होना है, जैसे कि सिरोटोनिन आदि। यह गड़बड़ी आनुवांशिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारणों से हो सकती है, या फिर इनके मिलेजुले प्रभावों से भी ऐसा हो सकता है।  
 
स्मृतिभ्रंश (डिमेंशिया)
डिमेंशिया मानव मस्तिष्क को प्रभावित करने वाली गंभीर बीमारी होती है। यह मुख्यतः दो प्रकार की होती है अल्जाइमर्स और वैस्क्युलर डिमेंशिया। दिमाग की कोशिकाओं को ‘न्यूरॉन्स’ कहते हैं जो दिमाग को संचालित करते हैं। डिमेंशिया के शिकार लोगों के दिमाग में प्रोटीन का जमाव होने लगता है। यह दिमाग के स्मरणशक्ति वाले क्षेत्र में फैल जाता है जिससे दिमाग के कुछ हिस्सों के न्यूरॉन मरने लगते हैं। इससे याददाश्त के लिए जरूरी महत्वपूर्ण न्यूरोट्रांसमिटर एसीटिलकोलीन का स्तर कम हो जाता है। इस बीमारी के कारण रोगी की याददाश्त और सोचने की शक्ति धीरे-धीरे कम होती जाती है। यह व्यक्ति के दैनिक क्रियाकलापों को भी कठिन बना देती है। डिमेंशिया के रोगी धीरे-धीरे पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर होते जाते हैं।
 
मानसिक रोगो से बचने के उपाय
आज भाग-दौड़ भरी जीवन-शैली के कारण मन मस्तिष्क पर दबाव बढ़ता जा रहा है। इसी वजह से तनाव तथा मानसिक रोग हर व्यक्ति के जीवन का एक अभिन्न अंग बनता जा रहा है। चाहे बच्चे हों या बुजुर्ग, मानसिक रोग किसी को नहीं छोड़ता। जहाँ बच्चों को अपनी परीक्षा और भविष्य की चिंता हर व़क्त सताती रहती है वहीं बड़ों के सामने अनेक ऐसे लक्ष्य होते है जिन्हें पूरा करने के लिए वे दिन-रात परिश्रम करते हैं। इसका मस्तिष्क पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। ये स्मरण शक्ति को कम करता है तथा व्यक्ति को अवसाद की ओर ले जाता है और धीरे-धीरे आत्मविश्वास को कम करते हुए हानि पहुँचता है। वर्तमान जीवन-शैली में थोड़ी जागरूकता तथ‌ा सतर्कता से इन रोगों से बचा जा सकता है। इनसे बचने के कुछ प्रमुख उपाय इस प्रकार हैं-
  • · यदि आपको किसी बात को लेकर ज्यादा तनाव रहता है तो आपको उसे अपने दोस्त या अपने माता-पिता से साझा करना चाहिए। इससे आपका तनाव कम होगा और समस्या के समाधान में मदद मिलेगी।
  • · यदि आपके सिर में कभी चोट लगी हो तो उसका डॉक्टर से इलाज करवाएँ और इसमें लापरवाही बिल्कुल न करें क्योंकि इसकी वजह से आपको मानसिक कमजोरी हो सकती है जो मानसिक रोग की तरफ ले जाती है।
  • · यदि आपको शराब या अन्य किसी नशीली चीज की बुरी लत लग गई है तो इसे जितने जल्दी हो सके छोड़ने का प्रयास करें।
  • · किसी दूसरे से अपनी तुलना न करें। हर व्यक्ति की क्षमताएँ अलग होती हैं। 
  • · योगासन तथा प्राणायाम नियमित रूप से करें। ये मानसिक रोगों से बचाव में काफी मददगार होते हैं।
  • · संतुलित आहार लें। 
  • · मानसिक समस्या के बारे में बिना डॉक्टरी परामर्श के कोई भी दवा न लें।
 
मानसिक रोगों से जुड़ी कुछ मिथ्या धारणाएँ
अक्सर देखा गया है कि मानसिक रोग से ग्रसित व्यक्ति के बारे में लोग मिथ्या धारणाएँ बना लेते हैं। कोई कहता है कि प्रेतात्मा का साया है, तो कोई देवी का प्रकोप बताता है। ऐसे अन्धविश्वासों से बचना चाहिए और मानसिक रोग से पीड़ित व्यक्ति का किसी अच्छे मनोरोग विशेषज्ञ से इलाज करवाना चाहिए। मानसिक रोगों से जुड़ी कुछ मिथ्या धारणाएँ इस प्रकार हैं-
  • · मानसिक विकार कोई रोग नहीं हैं बल्कि दुष्टात्माओं की वजह से पैदा होते हैं।
  • · मनोरोग में दवाएँ नुकसानदायक होती हैं।
  • · आपको यह रोग अपनी कमजोरी से हुआ है।
  • · ज्यादातर मानसिक रोग लाइलाज होते हैं।
  • · बच्चों को दवाएँ नहीं दी जानी चाहिए।
  • · इलाज के लिए नींद की गोलियाँ देनी चाहिए। 
  • · अवसाद अपने आप ठीक हो जाता है। 
    
मानसिक रोगों से बचाव आज के समाज की एक बड़ी चुनौती हैं। इनसे समाज तथा समूचे राष्ट्र की सेहत जुड़ी है। इनसे बचने का सबसे आसान तरीका यही है कि हमें इन रोगों के बारे में सही जानकारी हो। मानसिक समस्या उत्पन्न होने पर हमें अन्धविश्वास के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। अच्छे चिकित्सक से उचित सलाह लेकर इलाज कराना चाहिए। यह सही है कि तनाव हमें परिस्थितियों से निबटने में मदद करता है। वह हमें चुनौतियों के लिए शारीरिक तथा मानसिक तौर पर तैयार करता है। इसलिए मानसिक तनाव को हमेशा हानिकारक मान लेना भी शायद सही नहीं होगा। एक पुरानी कहावत है कि ”स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन रहता है।“ इसलिए हमें अपने शारीरिक स्वास्थ्य पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए। हमारा खानपान संतुलित होना चाहिए। हमें नियमित व्यायाम करना चाहिए। योग तथा प्राणायाम भी तनाव कम करने अत्यधिक उपयोगी होते हैं। इनसे भी बहुत फर्क पड़ता है। स्वस्थ मन होगा तो स्वस्थ तन होने में सहूलियत होगी। तन-मन के स्वास्थ्य से समाज स्वस्थ होगा तथा हमारा राष्ट्र भी स्वस्थ होगा। 
 
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