विज्ञान

(07/Feb/2018)

जैवविविधता : संरक्षण और जैव प्रौद्योगिकी

विनीता सिंघल

 

संयुक्त राष्ट्र की पहल पर वर्ष 2010 से हर वर्ष 22 मई का दिन अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस के रूप में मनाया जाता है। सच तो यह है कि जैवविविधता का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। इसके बिना पृथ्वी पर जीवन असंभव है। जैवविविधता पारिस्थितिक तंत्र को स्थिरता प्रदान कर पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखती है। पौधे तथा जन्तु एक दूसरे से खाद्य शृंखला द्वारा जुड़े होते हैं। यही कारण है कि एक प्रजाति की विलुप्ति दूसरे के जीवन को प्रभावित करती है। इस प्रकार पारिस्थितिक तंत्र कमजोर हो जाता है। आज जो स्थिति उत्पन्न हुई है और जिसके फलस्वरूप जैवविविधता पर जो खतरा मंडरा रहा है उसके लिए मुख्य रूप से मानव ही उत्तरदायी है। मानव ने न केवल धरती पर अपना अधिकार जमा लिया बल्कि धरती पर मौजूद सभी प्रकार के संसाधनों का भी अंधाधुंध प्रयोग करने लगा। इसका सबसे अधिक नुकसान जिसे उठाना पड़ा, वह था पर्यावरण।
    धरती पर उपस्थित जैवविविधता का अध्ययन तीन स्तरों पर किया जाता है। पहला स्तर है पारिस्थितिक तंत्र जिसमें जीवित और निर्जीव दोनों तत्व उपस्थित होते हैं और जो वहाँ पाए जाने वाले संसाधनों के बल पर चलता है। इस तंत्र में तीन प्रकार के घटकों का होना आवश्यक होता है। पहला घटक है पेड़ पौधे जिन्हें उत्पादक का नाम दिया गया है। दूसरा घटक है जीव जंतु जिन्हें उपभोक्ता कहा जाता है। तीसरा घटक ऐसे जीव होते हैं जो अपघटन कर पौष्टिक तत्वों को वापस ला सकें। पारिस्थितिक तंत्र कई प्रकार के हो सकते हैं जैसे कोई नदी, तालाब या वन। दूसरे स्तर या जाति स्तर पर जैवविविधता किसी स्थान पर जीवों की विभिन्न जातियों को दर्शाती है। यदि एक क्षेत्र की तुलना दूसरे क्षेत्र से या एक पारिस्थितिक तंत्र की तुलना दूसरे पारिस्थितिक तंत्र से की जाए तो जाति स्तर पर इनमें विभिन्नता पाई जाती है।
तीसरे स्तर की जैव विविधता होती है आनुवंशिकी के स्तर पर अर्थात एक ही जाति के विभिन्न जीवों में पाई जाने वाली विविधता। किसी भी जीव में पाए जाने वाले गुण उसकी आनुवंशिकी पर निर्भर करते हैं।
    जहाँ वानस्पतिक जैवविविधता भोजन, कपड़ा, लकड़ी, ईंधन तथा चारे की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है, वहीं औषधीय आवश्यकताओं की पूर्ति भी करती है। विभिन्न प्रकार की फसलें जैसे गेहूँ, धान, जौ, मक्का, ज्वार, बाजरा, रागी, अरहर, चना, तोरिया, आदि से हमारी भोजन की आवश्यकताओं की पूर्ति होती है जबकि कपास जैसी फसल हमारी कपड़ां की जरूरत को पूरा करती है। सागौन, शाखू, शीशम आदि जैसे वृक्षों की प्रजातियाँ निर्माण कार्यों के लिए लकड़ी उपलब्ध कराती हैं। काष्ठीय प्रजाति के पौधों की लकड़ी ईंधन की जरूरत को पूरा करती है। पौधे शाकभक्षी जानवरों के भोजन के स्रोत होते हैं जबकि जानवरों का मांस मनुष्य के लिए प्रोटीन का महत्वपूर्ण स्रोत होता है। समुद्र के किनारे खड़े मैनग्रोव वन प्राकृतिक आपदाओं जैसे सुनामी जैसे समुद्री तूफानों के खिलाफ ढाल का काम करते हैं।
    अंधाधुंध शिकार के कारण जानवरों की बहुत सी प्रजातियाँ विलुप्ति की कगार पर पहुँच चुकी हैं। जानवरों का शिकार आमतौर से दाँत, सींग, खाल, हड्डी, कस्तूरी आदि के लिए किया जाता है। भारत के असम राज्य में शिकार के कारण एक सींग वाले गैंडों की संख्या में अभूतपूर्व गिरावट दर्ज की गयी है। इसी प्रकार पूर्वोत्तर राज्यों, विशेषकर मणिपुर में चीरू नामक जानवर का शिकार उसकी खाल के लिए किया जाता है जिसका उपयोग शाहतूस शाल के निर्माण में होता है। इसके अतिरिक्त, बाघ, तेंदुआ, मगरमच्छ, चिंकारा जैसे जन्तुओं का शिकार खाल के लिए किया जाता है जिससे ये प्रजातियाँ संकटग्रस्त श्रेणी में पहुँच गई हैं। दाँत के लिए हाथियों के शिकार ने उन्हें भारत सहित अन्य देशों में विलुप्ति की कगार पर पहुँचा दिया है।
    फसलों तथा पशुओं को नाशकजीवों तथा परभक्षियों से सुरक्षा ने भी बहुत सी प्रजातियों को विलुप्ति की कगार पर पहुँचा दिया है। विष के इस्तेमाल से एक विशेष प्रजाति को नष्ट करने के प्रयास में कभी-कभी उस प्रजाति के परभक्षी भी विष के शिकार हो जाते हैं जिससे पारिस्थितिक तंत्र में खाद्य शृंखला अव्यवस्थित हो जाती है और नियंत्रित प्रजाति नाशीजीव का रूप धारण कर जैवविविधता को क्षति पहुँचाती है। कभी-कभी जानबूझ कर प्रवेश कराई गयी कोई प्रजाति, दूसरी प्रजातियों को उनके शिकार, भोजन के लिए प्रतियोगिता, आवास को नष्ट कर अथवा पारिस्थितिक संतुलन को अव्यवस्थित कर उन्हें प्रभावित कर सकती है। उदाहरण स्वरूप हवाई द्वीप में 1883 में गन्ने की फसल को बर्बाद कर रहे चूहों के नियंत्रण हेतु नेवलों को जान-बूझकर प्रवेश कराया गया था जिसके फलस्वरूप बहुत सी अन्य स्थानीय प्रजातियाँ भी प्रभावित हुई थीं।
    विश्व की एक तिहाई पशु आबादी तेजी से लुप्तप्रायः स्थि्ित में पहुँच रही है, अतः जैवविविधता का संरक्षण विशेष तौर पर महत्वपूर्ण है। जैवविविधता के महत्व को स्पष्ट करते हुए सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एवं सांसद डॉ.एम.एस.स्वामीनाथन ने एक बार एक संगोष्ठी में बोलते हुए कहा था कि ‘जैवविविधता एक तरह से टिकाऊ खाद्य व्यवस्था, स्वास्थ्य और जीवन से जुड़ी संपूर्ण सुरक्षा पद्धतियों का आधार है।’ यही कारण है कि आज जैवविविधता के संरक्षण के लिए जैवप्रौद्योगिकी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
अब होंगे परखनली वन
किसी ने ठीक ही कहा है ‘वृक्ष हमें अमृत भी देते हैं और विष भी, वृक्ष हमें भोजन भी देते हैं और औषधियां भी, पुष्पों की सुगंध भी देते हैं और कांटों की चुभन भी, हमारी वैज्ञानिक पद्धतियां हमें इस विष को अमृत में परिवर्तित करना सिखाती हैं’। वन किसी भी क्षेत्र के पर्यावरण का एक प्रमुख अंग होता है जिस पर न केवल हमारा पर्यावरण निर्भर है, बल्कि इससे विभिन्न उद्योगों के लिए कच्चा माल एवं अनेक संसाधन भी उपलब्ध होते हैं। वन जलवायु रक्षक भी होते हैं। इसके बावजूद भी कभी अज्ञानतावश तो कभी जानबूझ कर अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए मानव द्वारा वनों का विनाश किया जाता रहा है। प्रारंभ में जहाँ पृथ्वी के 70 प्रतिशत भूभाग पर वन थे वहीं आज मात्र 16 प्रतिशत क्षेत्र पर ही वनों का विस्तार है। वन विनाश के प्रमुख कारण सरकार की दोषपूर्ण वन नीति, अनियंत्रित पशु चारण, वनों में आग लगना, बढ़ता शहरीकरण, बांध एवं सड़क निर्माण, वनों की अंधाधुंध कटाई, औद्योगिक उत्पादन, कीटों और बीमारियों का प्रकोप आदि हैं।
    वन विनाश के अनेक दुष्परिणाम हमारे सामने हैं, जिनमें इमारती एवं जलाने वाली लकड़ी का अभाव, अनेक वृक्ष जातियों का विनाश, भूमि अपरदन में वृद्धि, बाढ़ में वृद्धि, सूखा एवं मरूस्थलीकरण में वृद्धि, भू-स्वखलन एवं जलवायु परिवर्तन प्रमुख हैं। जहाँ तक वन विनाश से जलवायु परिवर्तन की बात है तो इस तथ्य से सभी परिचित हैं कि वन पारिस्थितिक तंत्रों को संचालित करने वाले जैव भू-रसायन चक्रों के नियामक होते हैं। इनमें जलचक्र और कार्बन चक्र मुख्य हैं। वन विनाश के कारण कार्बन चक्र में गड़बड़ी पैदा हो जाती है और यही जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण है। वायुमंडल में तापमान वृद्धि से जल चक्र प्रभावित होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि वनों के नष्ट होने से जल नष्ट होता है, जल के न रहने से जीव जगत प्रभावित होता है, भूमि की उर्वरता नष्ट होती है, फलस्वरूप फसलों का उत्पादन कम होता है। जिस देश की संस्कृति ही वनों से जानी जाती थी वहीं पर वनों की दुर्दशा को सुधारने के लिए भरसक प्रयास करने के बावजूद भी कुछ खास नहीं हो पा रहा है। इस विडंबना को जैवप्रौद्योगिकी द्वारा अवश्य दूर करने के प्रयास किए जा सकते हैं। वनों के वृक्षों की जो भी जातियाँ हमारे यहाँ पाई जाती हैं, आमतौर से उनकी बढ़त धीमी गति से होती है। इतना ही नहीं कुछ वन प्रजातियां तो ऐसी हैं जो या तो विलुप्त हो चुकी हैं या फिर विलुप्त होने की कगार पर हैं। अब ऊतक संवर्धन और सूक्ष्मप्रवर्धन जैसी तकनीकों के जरिए कई लाख पौधे वन विभाग को उपलब्घ कराए जा सकते हैं। ऊतक संवर्धित पौधों की बढ़त बहुत तेजी से होती है। इतना ही नहीं बीमारियों से अपनी रक्षा करने की क्षमता भी इनमें होती है। ये पौधे वनों के पुनर्जन्म के लिए वरदान सिद्ध हो रहे हैं। विलुप्त होती पादप प्रजातियों को अब जैवप्रौद्योगिक तकनीकां से बचाना और उगाना संभव होगा।
ऊतक संवर्धन
एक अत्यंत उपयोगी और क्रांतिकारी तकनीक होने के बावजूद ऊतक संवर्धन एक बेहद सरल तकनीक है। इसके लिए बहुत कम उपकरणों की जरूरत होती है। संवर्ध माध्यम में पनप रहे ऊतकों का भविष्य माध्यम पर निर्भर करता है। विभिन्न पौधों के ऊतकों को अलग-अलग प्रकृति के माध्यमों की जरूरत पड़ती है। यह पोषक माध्यम प्रयोगशाला में ऑटोक्लेव में तैयार किया जाता है। ऑटोक्लेव में उच्च दाब पर बनने वाली वाष्प से बनाए जा रहे माध्यम में मौजूद सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं। संवर्ध में मौजूद पौधे के ऊतकों को संतुलित मात्रा और उचित अनुपात में पोषक तत्व भी उपलब्ध कराए जाते हैं। इसके अलावा आवश्यक पादप हार्मोन जैसे कि विटामिन, कार्बोहाइड्रेट आदि भी उपलब्ध कराए जाते हैं क्योंकि प्रारंभिक अवस्था में कोशिकाओं में न तो जड़ होती है और न पत्तियों के ऊतक जो वे अपना भोजन स्वयं बना लें। वैज्ञानिकों ने इसीलिए कुछ खास पौधों के लिए विशेष माध्यम तैयार किए हैं। संवर्ध माध्यम को विटामिन प्रदान करने के लिए यीस्ट की गोलियां डाली जाती हैं। इसके अलावा शर्करा और पादप हार्मोन भी डाले जाते हैं। साइटोकाइनिन वर्ग के सभी हार्मोन कोशिका विभाजन और वृद्धि को तेज करते हैं। माध्यम को समृद्ध करने के लिए हार्मोनों के अलावा कई अन्य रसायन और लवण भी मिलाए जाते हैं।
    संवर्धन माध्यम में पानी की मात्रा ही सबसे अधिक होती है इसलिए इसकी गुणवत्ता और शुद्धता पर ध्यान देना भी जरूरी होता है। इसलिए इसमें घुलनशील अशुद्धियों से मुक्त आसुत जल ही मिलाया जाता है। संवर्धित किए जाने वाले पौधे के ऊतक को भी सूक्ष्म जीव रहित करना जरूरी होता है। कई बार पौधे के ऊतकों में प्राकृतिक रूप से सूक्ष्मजीव मौजूद होते हैं। इनके कारण माध्यम में फैलने वाले संक्रमण को रोकने के लिए इन्हें नष्ट करना जरूरी होता है। इसके लिए ऑटोक्लेव का उपयोग न करके एंटीबायोटिक या अन्य विसंक्रमण रसायनों का प्रयोग किया जाता है। पौधे के ऊतकों को संवर्धन माध्यम में डालने के बाद, परखनलियों को एक विशेष प्रकार के कक्ष में रखा जाता है। मनुष्य की तरह पौधों को भी बढ़ने के लिए सही तापमान और उपयुक्त पर्यावरण की जरूरत होती है। इसलिए इस कक्ष का तापमान 25 डिग्री सेल्सियस के आस पास रखा जाता है और यहां प्राकृतिक प्रकाश जैसी रोशनी की व्यवस्था भी रखी जाती है। संवर्ध की वृद्धि को कई रूपों में देखा जा सकता है जैसे कि विभाजित होती कोशिकाओं का समूह जिसे कैलस कहते हैं या फिर जड़, तना और पूरा पौधा।
सूक्ष्म प्रवर्धन
यह एक अन्य प्रमुख तकनीक है। मूल रूप से सूक्ष्म प्रवर्धन और कलम की रोपाई एक जैसी तकनीकें हैं। इसमें प्रत्येक पौधे के लिए अलग रासायनिक संघटन वाले माध्यम की आवश्यकता होती है। वानिकी के विकास के लिए सूक्ष्म प्रवर्धन की तकनीक का व्यापक उपयोग किया जाता है। यह तकनीक प्रयोगशाला में विकसित जैव प्रौद्योगिकी तकनीकों के व्यावहारिक उपयोग का अच्छा उदाहरण है। यूकेलिप्टस के प्रवर्धन में सूक्ष्म प्रवर्धन की तकनीक विशेष रूप से सफल सिद्ध हुई है। इस तकनीक की सभी प्रक्रियाएं सरल और आसान हैं, इसलिए इसे आसानी से अपनाया जा सकता है।
    अगार माध्यम में पोषित पौधे के ऊतकों में कोशिकाओं का एक समूह विकसित हो जाता है जिसे कैलस कहते हैं। शुरू में कैलस में एक जैसी अनेक छोटी कोशिकाएं होती हैं जिन्हें वृक्ष के अलग अलग भागों जैसे जड़, पत्ती और तना आदि की कोशिकाओं के रूप में नहीं पहचाना जा सकता। कोशिकाओं को विभाजन के लिए प्रेरित करने के लिए माध्यम में पादप वृद्धि हार्मोन या ऑक्सिन और साइटोकाइनिन जैसे हार्मोन मिलाए जाते हैं। जड़ बनने की प्रक्रिया ऑक्सिन और तना बनने की प्रक्रिया साइटोकाइनिन हार्मोनों द्वारा प्रेरित होती है। धीरे-धीरे माध्यम में रखे पौधे के टुकड़े में वृद्धि होने लगती है। साधारण पौधों में आमतौर से शीर्षस्थ कलिका के जरिए शीर्ष से वृद्धि होती है या पत्तियों के कक्ष में मौजूद कलिकाओं के जरिए वृद्धि होती है।
    वृक्षों की बढ़ती मांग को पूरा करने के प्रयासों के फलस्वरूप ट्रापिकल वन अनुसंधान संस्थान तथा टिश्यू कल्चर पायलट प्रोजेक्ट के वैज्ञानिकों द्वारा यूकेलिप्टस टेरेटिकार्निस और पाप्युलस डेल्टायडिस के 9 लाख से अधिक पौधे उत्पन्न किए गए हैं। ऊतक संवर्धन से उगाई गई जातियों का प्रायोगिक क्षेत्रों में परीक्षण किया गया जिसमें 90ः से अधिक पौधे जीवित रहे। परखनली वनों में काष्ठीय एवं बांस जैसे वृक्षों को भी उगाए जाने की कही गई है। इन्हें भी ऊतक संवर्धन द्वारा बहुगुणित किया जा सकता है।
    राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला, पुणे में कार्यरत वैज्ञानिकों ने बांस की सुधरी किस्मों के विकास कार्य को तेजी से बढ़ाने के लिए बांस की दो प्रजातियों डेन्डोकैलेमस ब्रैन्डिसाई और बैम्बूसा अरून्डिनेसिया को चुना और अब बांस में शीघ्र पुष्पन प्रक्रिया एक वास्तविकता बन गई है जिससे बांस के व्यवसाय के रास्ते खुल गए हैं। इस खोज के कारण बांस की मांग और आर्थिक महत्व दोनों ही बढ़ गए हैं। हिमालय जैवसम्पदा प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएचबीटी), पालमपुर, के वैज्ञानिकों ने बांस के ऊतक संवर्धन की तकनीक का मानकीकरण किया है। इसके आलावा, डे.हेमिल्टोनी, डे.एस्पर, डे.गिगैन्टीअस, बैम्बूसा बैम्बूस और बै.न्यूटैन्स के बड़े पैमाने पर जर्महीन संवर्ध उगाए हैं। ऊतक संवर्धित वृक्ष मोटाई और ऊँचाई दोनों में ही बीजों से उत्पन्न वृक्षों की तुलना में अच्छे परिणाम दे रहे हैं जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति भी सुधर रही है। इस प्रौद्योगिकी का आशातीत परिणाम सजावटी पौधों के क्षेत्र में सारे विश्व को चमत्कृत कर रहा है। हमारे देश से भी ऊतक संवर्धित गुलाब, गुलदाउदी, ग्लेडिओलस आदि को आयात किया जा रहा है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इसके द्वारा वृक्षों की विलुप्त होती प्रजातियों को बचा कर और पुनः वन रोपण करके पर्यावरण को बचाने की मुहिम को तेज किया जा सकेगा।
लैकोन्सः जीवों के संरक्षण के लिए
वनों के लगातार हो रहे विनाश के कारण अनेक वन्य जीवों जैसे सिंह, बाघ एवं तेंदुआ आदि के लिए प्राकृतिक आवास की विकट समस्या उत्पन्न हो गई है तथा वे अपनी जाति के सदस्यों से अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं। स्वयं को बनाए रखने के लिए इन्हें सहज एवं बड़े क्षेत्रफल वाले वनों की आवश्यकता होती है। इन वन्य जीवों के बिखराव से इनमें प्रजनन की समस्या उत्पन्न हो गई है जिसके कारण इनमें पाई जाने वाली आनुवंशिक विविधता की क्षति होती जा रही है और ये बंध्य एवं लुप्त होने की कगार पर पहुँच चुके हैं। इस समस्या से निपटने के लिए सभी विकल्पों पर विचार करते हुए, जैवप्रौद्योगिकी का उपयोग कर एक अनुसंधान परियोजना प्रारंभ करने पर विचार किया गया।
    आनुवंशिक विविधता के राष्ट्रीय महत्व को पहचानते हुए सीसीएमबी ने वर्ष 1998 में भारत सरकार के जैवप्रौद्योगिकी विभाग तथा केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण, नई दिल्ली के सम्मुख जैवप्रौद्योगिकी के उपयोग द्वारा लुप्तप्राय प्रजातियों (जैसे शेर व बाघ आदि) को संरक्षित करने से संबंधित एक परियोजना, लुप्तप्राय प्रजाति संरक्षण प्रयोगशाला यानी लैबोरेट्री फॉर द कन्जरवेशन ऑफ एन्डेंजर्ड स्पीशीज (लैकोन्स), का प्रस्ताव रखा। जिसके लिए अंततः मंजूरी मिल गयी। लैकोन्स नामक इस लुप्तप्राय प्रजाति संरक्षण प्रयोगशाला को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति महामहिम डॉ.ए.पी.जे अब्दुल कलाम ने 1 फरवरी 2007 को देश के नाम समर्पित किया। लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण के कार्य में उपयुक्त तकनीकों का विकास करने के लिए निम्न रूप से प्रस्तावित लक्ष्यों की प्राप्ति के उद्देश्य को लेकर लैकोन्स का कार्य आरंभ हुआ।
स    डीएनए फिंगर पिं्रटिंग जैसी आधुनिक तकनीकों की मदद से आनुवंशिक परिवर्तन को मॉनिटर करना।
स    जीन बैंक की स्थापना से लुप्तप्राय प्रजातियों का वीर्य, अंडे तथा भ्रूणों का हिमीभूत संरक्षण।
स    वीर्य विश्लेषण प्रजनन के लिए चयन करने के आशय से वीर्य की गुणवत्ता का अध्ययन।
स    डिम्बोत्सर्ग का समय निर्धारण, ताकि गर्भाशय में डिम्ब सफलतापूर्वक प्रवेश कर सके।
स    कृत्रिम वीर्य सेचन : पालतू पशुओं के संदर्भ में कृत्रिम वीर्य सेचन तकनीक को पहले से ही सफलतापूर्वक अपनाया जा चुका है, लेकिन वन्य प्राणियों के संदर्भ में इस तकनीक के मानकीकरण के प्रयास अपेक्षित हैं।
स    अंतः पात्रे निषेचन तथा भ्रूण स्थानांतरण शुक्राणु के साथ डिम्ब का इन विट्रो संलयन करना तथा इस तरह उत्पन्न भ्रूण को वास्तविक या ‘सेरोगेट मां’ में प्रतिरोपित करना।
स    कोशिका बैंक की स्थापना क्लोनिंग जैसे अनेक भावी प्रयोजनों के लिए अनुकूल परिस्थितियों को उपयोग में लाने के लिए कोशिकाओं को संरक्षित करना।
स    क्लोनिंग इस तकनीक को मात्र अत्यंत दुर्लभ प्रजातियों के संदर्भ में उपयोग करने के लिए विकसित करना।
     क्लोनिंग प्रौद्योगिकी का उन्हीं प्रजातियों के मामलों में उपयोग किया जाएगा जिनकी जीवित संख्या अपेक्षाकृत काफी कम हो। इस तरह वैज्ञानिक रूप से जन्मे जानवरों को, उनके वन्य प्राणी लक्षणों को बनाए रखने के उद्देश्य से वन सीमांत क्षेत्रों में रखा जा सकता है जहाँ मानव का कम से कम हस्तक्षेप हो। जब भी इन प्रजातियों की संख्या अपेक्षित संख्या से कम हो जाएगी, तब इन जानवरों को जंगलों में छोड़ा जा सकेगा। इसी तरह वीर्य, डिम्ब तथा कोशिका बैंकों की मदद से आवश्यकता के अनुसार जानवर विशेष को पैदा किया जा सकता है। लुप्तप्राय जानवरों की प्रजातियों को इस दुनिया से मिटने से रोकने के लिए यह अंतिम प्रयास होगा। यदि इन प्रजातियों का नाश हो गया तो भावी पीढ़ियां प्रकृति की अद्भुत देन माने जाने वाले इन जानवरों को जीवित रूप में देखने से वंचित रह जाएंगी।


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