विज्ञान

(29/Aug/2017)

अंतर्मन एवं स्वप्न से मार्गदर्शित खोजें 

डॉ.कपूरमल जैन

‘वैज्ञानिक इतिहास में गोता लगाने पर हम देखते हैं कि खोजें ध्यान से देखने, तर्क से समझने के कारण होती हैं। खोजें वैज्ञानिकों को असीम आनन्द देने वाला परिणाम होती हैं। लेकिन आनन्द पाने की इस तरह की अनुभूति सबको नहीं होती। इस रास्ते पर चलते हुए भी सभी नयी और क्रांतिकारी खोजें, सिद्धांत या मशीन नहीं बना पाते। इस संदर्भ में लुइस पास्चर (स्वनपे च्ंेजमनत) का कथन अत्यंत प्रासंगिक है। वे कहते हैं कि ‘भाग्य और अवसर पहले से तैयार मस्तिष्क के साथ जाते हैं’। ‘तैयार-मस्तिष्क’ का मतलब उस व्यक्ति के जुनूनी होने समस्याओं के समाधान खोजने के लिए व्यग्र रहने से है। ऐसे व्यक्ति में कभी भी ‘अंतर्ज्ञान’ प्रकट हो सकता है। समस्या के समाधान हेतु आवश्यक मार्गदर्शन के लिए उसे ‘स्वप्न’ आ सकते हैं। अचानक उसके सामने प्रकृति में छिपा कोई रहस्य और अंतर्संबंध प्रकट हो सकता है। ऐसे व्यक्ति को अपने रूटिन काम को निपटाते समय भी अचानक रोशनी मिल सकती है और ‘यूरेका क्षण’ (आनन्द देने वाला क्षण) मिल सकता है।
‘यूरेका क्षणों’ को हम अक्सर ‘सौभाग्य’ से मिले क्षण कहते हैं। लेकिन, ये कैसे आते हैं, किन रास्तों पर चल कर आते हैं, हमें नहीं मालूम होता है। कोई इनका श्रेय अपने ‘सपनों’ या ‘दैविक शक्ति’ को देता है तो कोई किसी घटना को देख कर मिले ‘अंतर्ज्ञान’ (इंट्यूशन) को। लेकिन एक बात साफ है कि इस दौरान मस्तिष्क की अवस्था में अचानक, असतत और तीव्र परिवर्तन होता है। जब हम इतिहास पर नजर डालते है तो पाते हैं कि ऐसे क्षणों को पाने वाले वैज्ञानिकों में ‘ध्यान’ लगाने और समस्या के साथ गहरे ‘जुड़ाव’ को स्थापित करने की अद्भूत क्षमता रही है। इसतरह उनके ‘चेतन’ तथा ‘अवचेतन’ मन में समाधान पाने की तीव्र ‘ललक’ सदैव उपस्थित रहती है। उनकी ये विशेषताएं ही उनको ‘यूरेका क्षणों’ को दिलाने में बहुत मददगार साबित होती हैं। आइये, अब हम खोजों के स्पेक्ट्रम के उस भाग पर नज़र डालते हैं जो ‘अंतर्मन के अचानक प्रकाशित होने अथवा ‘स्वप्न से मिले मार्गदर्शन से बनता है।

अचानक मिली रोशनी और हो गई खोजें

  • आर्किमिडिज अपने देश के राजा के मुकुट में प्रयुक्त सोने की शुद्धता को जाँचने की चुनौती से जूझ रहे थे। कोई रास्ता सुझायी नहीं दे रहा था। एक बार वे कुण्ड पर नहाने को पहुँचे। उन्होंने देखा कि जैसे ही वे कुण्ड में उतरे, पानी का तल उठने लगा। अचानक उनके दिमाग में बिजली कौंधी। उन्हें सोने की शुद्धता को जाँचने का आइडिया मिल गया। वे यूरेका, यूरेका चिल्लाते हुए शहर की ओर दौड़ने लगे। इस समय वे यह भी भूल गये कि वे नहा रहे हैं। इसतरह उन्होंने न सिर्फ पदार्थों की शुद्धता को जानने का तरीका खोज लिया वरन् ‘उत्प्लावन के नियमों’ को खोज कर प्रकृति के एक रहस्य को भी उजागर कर दिया। 
  • अलफ्रेड नोबेल को अचानक हुए एक धमाके से प्रेरणा मिली। एक बार वे नाइट्रोग्लिसरीन का ट्रांसपोर्ट कर रहे थे। इस दौरान एक केन टूटी और इसमें से यह रसायन लीक होने लगा जिसे वहाँ रखे ‘रॉक मिक्सर’ द्वारा सोख लिया गया। इस मिक्सर में अचानक धमाका हुआ। इसी से नोबेल को विस्फोटक बनाने का आयडिया मिल गया।

स्वप्न से मार्गदर्शित खोजें

  • फ्रेडरिक आगस्ट केकुले (थ्तपमकतपबी ।नहनेज ज्ञमानसम) बेंजीन की संरचना को लेकर परेशान थे। इसके अणु में कार्बन और हाइड्रोजन की संख्या 6.6 थी। अणु में कार्बन और हाइड्रोजन का अनुपात समझ से परे था और यह अविश्वसनीय भी प्रतीत हो रहा था। लेकिन, यह एक प्रायोगिक परिणाम था। अतः, अविश्वास का कोई कारण नहीं था। हालांकि किसी समाधान का न मिलना उन्हें परेशान कर रहा था। आखिर, इस अणु में इसको बनाने वाले परमाणु किसतरह जमें होंगे जिससे इस अणु में स्थायित्व आता है? वे एक बहुत ठंडी रात में देर तक इस पर सोचते रहे। सोचते-सोचते उन्होंने कुर्सी को गरमाहट के लिए आग की ओर मोड़ा। कुछ ही देर में उनको झपकी लग गई। और, वे अपनी समस्या से जुड़ा एक सपना देखने लगे। सपने में वे देखते हैं कि सभी परमाणु नृत्य कर रहे हैं और नृत्य करते-करते एक साँप के आकार में जमते जा रहे हैं और फिर वे आश्चर्य से देखते हैं कि वह साँप इस तरह मुड़ा कि उसने अपनी ही पूँछ को मुँह में ले लिया। उनकी झपकी टूटी लेकिन उनकी आँखों के सामने साँप और साँप के मुँह में पूँछ वाला दृश्य लगातार घूमने लगा। उन्हें लगा कि उनका सपना उनकी समस्या को सुलझा रहा है। उनकी आँखों में चमक आई। सच में यह बेंजीन का अणु तो वलयाकार है। कार्बन के परमाणु वलय बनाते हैं और, इन कार्बन वलयों ने रासायनिक बंधों को समझने के लिए एक सर्वथा नयी प्रणाली सुझा दी। 
  • गोडार्ड जब मात्र 16 वर्ष के थे तब उन्होंने चेरी के पेड़ पर चढ़ते हुए एक दिवा-स्वप्न देखा। यह स्वप्न अंतरिक्ष की यात्रा के लिए एक विशेष वाहन का था। उन्होंने देखा कि यह उड़नखटोले की तरह एक मशीन है जो एक गुप्त तकनीक से अंतरिक्ष में जाती है। स्वप्न के दौरान उन्हें महसूस हो रहा था कि यह गुप्त तकनीक ही मशीन को पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण से बाहर ले जा रही है। वे पेड़ पर ही बैठे रहे और स्वप्न को देखते रहे। उनका स्वप्न कब टूटा, उन्हें नहीं मालूम। लेकिन अब वह मशीन एक्सरे के चित्र की तरह उन्हें साफ-साफ दिखाई दे रही थी। इसे देखते हुए वे सोचने लगे कि निश्चित ही ‘रॉकेट’ ही वह उपकरण है जो अंतरिक्ष की सैर करा सकता है। इसके बाद उन्होंने रॉकेट के विकास को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। आज ‘नासा’ का अंतरिक्ष यान नियंत्रण केंद्र उन्हीं के नाम से जाना जाता है।        
  • आईंस्टीन ने अपनी किशोरवय् में एक सपना देखा कि वे अपने दोस्तों के साथ स्लेड (ैसमक) पर फिसल रहे हैं। और, वह भी खड़ी और बर्फिली ढ़लान पर। उसकी रफ्तार लगातार बढ़ती जा रही है। वे देखते हैं कि जब स्लेज की रफ्तार प्रकाश के वेग के करीब पहुँचती है तो वे देखते हैं तारों को। ऐसा लग रहा था मानों सभी अपवर्तित हो रहे हैं रंगों में और फिर सभी रंग एकसार होते जा रहेे हैं। उन्होंने ऐसा दृष्य इससे पहले कभी नहीं देखा था। वे आत्मविभोर हो गए। उन्होंने महसूस किया कि इसका उनके जीवन के साथ गहरा संबंध है। इस सपने ने उनके लिए प्रेरणा का कार्य किया। उनका सापेक्षता का सिद्धांत भी इसी का परिणाम है। वे कहते हैं कि उनका सम्पूर्ण वैज्ञानिक कैरियर इसी सपने पर ध्यान का नतीजा है। इसतरह इस सपने से प्रेरित हो कर ही उन्होंने अपनी सारी जिंदगी काम किया कि प्रकाश की गति होने पर क्या होगा? उन्हें प्रकृति का रहस्योद्घाटन करने में महति सफलता पाई तथा सोच में क्रांतिकारी परिवर्तन ला कर न सिर्फ बीसवीं सदी को प्रभावित किया वरन् 21वीं सदी भी अछूती नहीं रह सकी। उनका अपने अंतर-ज्ञान से मिलने वाले संकेत पर इतना अधिक भरोसा था कि उन्होंने एक बार कहा कि The intuitive mind is a secred gift and the rational mind is a faithful servant. We have created a society that honours the servant and has forgotton the gift.
  • अमरीकी आणविक जीव, जेनेटिक और प्राणी वैज्ञानिक जेम्स डी.वाटसन अपने साथियों फ्रांसिस क्रिक तथा विल्कििंस मारिस के साथ डी.एन.ए. की संरचना जानने के लिए बेचैन थे। लेकिन, कोई रास्ता नहीं मिल रहा था। एक रात को उन्हें एक स्वप्न आया। स्वप्न में दो साँप विपरीत छोरों से अपने सिरों के साथ एक दूसरे से लिपटे हुए हैं। इस स्वप्न के संकेत से उन्हें द्विकुंडलित वक्रता (डबल हेलिक्स) की प्रेरणा मिली। इस खोज के लिए ये अपने साथियों के साथ 1962 के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हुए।
  • नील्स बोहर टॉमसन के निर्देशन में शोध कार्य करने के लिए इंग्लैण्ड आये। वहाँ वे परमाणु मॉडल पर कार्य कर रहे थे। टॉमसन का मॉडल परमाणु की स्थिरता को प्रमाणित नहीं कर पा रहा था। कोई रास्ता भी सुझाई नहीं दे रहा था। एक दिन सपने में उन्होंने पाया कि सूर्य के चारों ओर छोटी तनी हुई डोरी पर बने रहते हुए ग्रह कोलाहल करते हुए घूम रहे हैं। बस उन्हें समझ में आ गया कि ग्रहों की तरह इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर घूमते हुए हल्ला करते रहेंगे पर नाभिक में गिरेंगे नहीं। और, इस तरह परमाणु मॉडल की खोज हो गई।  
  • मस्तिष्क में न्यूरॉन कोशिकाओं का एक बहुत ही क्लिष्ट जाल होता है। इनके संधि-स्थल  बहुत ही छोटे होते हैं जिन्हें तत्कालीन प्रचलित माइक्रोस्कोप से देखना संभव नहीं था। इसलिए वैज्ञानिकों का मत था कि इससे शरीर के विभिन्न भागों में संकेतों का संचरण विद्युतीय होना चाहिए। परंतु ऐसा मानने में कुछ समस्याओं के उत्तर नहीं मिल पा रहे थे। उदाहरण के लिए शरीर में मिलने वाले दो प्रकार के ‘सिनाप्सेस’ उत्तेजित करने वाले और प्रक्रियाओं को रोकने वाले को एक ही विद्युतीय संकेत कैसे पहुँचा सकता है क्योंकि ये नियत ‘एक्शन पोटेंशियल’ पर काम करते हैं। दूसरी समस्या शरीर में संकेतों के एक स्थान से दूसरी तक पहुँचने में विलम्ब का मिलना है जिसे विद्युतीय संकेतों की तेज गति के कारण समझा नहीं जा सकता है। न्यूरल चेन में सूचना का प्रवाह एक दिशा में ही होता है। इस तरह वैज्ञानिक ओटो लोएवी के मन में विचार आया कि ‘नर्व आवेग’ का प्रेषण विद्युत की बजाय रासायनों के द्वारा होना चाहिए। लेकिन अपनी इस रासायनिक संकल्पना को वे प्रमाणित नहीं कर पा रहे थे। इस तरह करीब 17 वर्ष बीत गये और वे अन्य कार्य में लग गये। इसके बाद अचानक ईस्टर रविवार के पहले वाली रात में उन्हें स्वप्न आया। वे उठे, बत्तियाँ जलाई तथा कागज में कुछ लिखा और फिर सो गये। सुबह जागे तो लगा कि रात में उन्होंने कुछ महत्त्वपूर्ण बातें तो लिखी है। लेकिन, नींद में जो लिखा था, उसे ठीक से पढ़ नहीं पाये। वैसे तो बात आई गई हो गई होती। लेकिन, अगली रात 3 बजे उन्हे फिर वही स्वप्न आया। उसमें एक परीक्षण की डिजाइन थी। विचार करने पर उन्हें लगा कि अरे! यह तो 17 साल पहले छोड़ी उनकी रासायनिक संकल्पना को प्रमाणित करने के लिए प्रयोग की डिजाइन है। वे उठे और प्रयोगशाला पहुँचे। उन्होंने दो मेंढ़कों को लिया। एक के हृदय में ‘वेगस नर्व’ को जुड़ा रखा और दूसरे के हृदय से जुड़ी उस नर्व को अलग कर दिया। अब विद्युत आवेश से वेगस नर्व को उत्तेजित किया जिससे उस मेंढ़क के हृदय की पम्पिंग दर कम हो गई। फिर उन्होंने मेंढ़क को जिस कल्चर में रखा था, उसमें से कुछ द्रव को ले कर दूसरे मेंढ़क के हृदय पर लगाया। उन्होंने देखा कि इस मेंढ़क की पम्ंिपंग दर कम हो गई। इससे यह प्रमाणित हो गया कि नर्व से कुछ ऐसा रसायन अवश्य निकला है जो पम्ंिपंग को नियंत्रित कर रहा है। परीक्षण के बाद पता चला कि यह न्यूरो ट्रांसमीटर एसीटाइलकोलीन है। इसके बाद उन्होंने सिम्पेथेटिक नर्व को उत्तेजित किया जिसे पम्पिंग दर बढ़ती है। फिर प्रयोग दोहराया। वे अपेक्षित परिणाम देख कर चकित रह गये। परीक्षण के बाद पता चला कि यह पदार्थ एड्रेनलिन है। इसतरह उनकी संकल्पना की पुष्टि हो गई। इस खोज के लिए उन्हें 1936 के चिकित्सा के नोबेल संे सम्मानित किया गया।  
  • श्रीनिवास रामानुजन को ‘नामगिरी नामक देवी’ सपने में आती थी जो उन्हें समस्याओं के समाधान बताती और उनका मार्गदर्शन करती थी। सपने में मिले समाधानों को वे उठने पर लिख लेते थे। एक सपने का जिक्र करते हुए वे कहते हैं कि एक रात सोते समय उनको एक अजीब अनुभव हुआ। बहते खून से बना पर्दा उनके सामने आता है। फिर एक हाथ प्रकट हुआ और इस पर कुछ लिखने लगा। उसे उन्होंने लिख लिया। वह एक समाकलन था। इस तरह देवी उनकी मदद करती थी। स्मरणीय है कि रामानुजन को शुद्ध गणित में काम करने का कोई प्रशिक्षण नहीं था। लेकिन उन्होंने गणितीय विश्लेषण, अंक संकल्पना, अनंत शृंखला और अनवरत भिन्नों/अंशों के क्षेत्र में जबर्दस्त कार्य कर गणित के क्षेत्र में कार्यरत विद्वानों को चमत्कृत कर दिया। 
  • द-कार्त बचपन में बहुत बीमार रहते थे और देर रात तक जागते रहते थे। आगे चल कर यही उनकी आदत बन गई। वे देर रात तक सोते और दोपहर तक बिस्तर में पड़े रहते। इस दौरान वे अक्सर जाग कर भी बिस्तर पर पड़े रहते लेकिन वे इस दौरान कुछ न कुछ सोचा करते। एक बार इनके सिर के आसपास एक मक्खी मंडराने लगी। वे इसकी हलचल को देखते रहे। अचानक उन्हें आयडिया आया कि वे इस मक्खी की स्थिति को मापी जा सकने वाली दूरियों के रूप में दर्शा सकते हैं। इस तरह किसी भी क्षण पर उसकी स्थिति को जाना जा सकता है कि वह दीवार अथवा छत से कितनी दूर है। इसी ने ‘कार्टिशियन कोआर्डिनेट सिस्टम’ को जन्म दिया। एक रात गहरे ध्यान में उन्हें अचानक ‘नई दृष्टियाँ’ मिली। वे कहते हें कि रात के उन क्षणों में एक दैविक शक्ति ने उन्हें मार्गदर्शित किया जिसके कारण वे दर्शन और गणित को एक-साथ ला कर ‘एनालिटिक ज्यॉमिट्री’ के रूप में एक बहुत ही शक्तिशाली गणितीय औजार की खोज करने में सफल हुए। यह गणित की वह शाखा है जिसमें ‘बीजगणित’ का उपयोग कर ‘ज्यॉमितीय ऑब्जेक्ट्स’ का मॉडलिंग कर समस्याओं का समाधान प्राप्त किया जाता है। 
  • मेंडलीव उस समय तक खोजे गए 65 रासायनिक तत्त्वों को एक सारिणी में जमाना चाहते थे। वे इनके गुणों के आधार पर यह तो जानते थे कि इनका एक पैटर्न उभरना चाहिए और उसका आधार परमाणु भार होना चाहिए। लेकिन उनके प्रयत्न सफल नहीं हो पा रहे थे। एक दिन उन्होंने एक सपना देखा। सपने में उन्हें एक सारिणी दिखी जहाँ सभी तत्त्व उन जगहों पर फैले हुए हैं जहाँ उन्हें होना चाहिए या जिनकी रासायनिक गुणों के आधार पर जरूरत थी। वे नींद से उठे और तत्काल उन्हें एक पेपर पर नोट कर लिया। सपने में उन्होंने जो जमावट देखी वह इतनी सटिक और परिशुद्ध थी कि वे चकित रह गये।  उससे उन्हें पता चला कि परमाणु भार के मापन में भी गलतियाँ हुई हैं। सपने की सारिणी में सभी तत्व सही जगहों पर थे। 
  • कनाड़ा के चिकित्सा वैज्ञानिक, चिकित्सक और पेंटर फ्रेडरिक बेंटिंग को 32 वर्ष की उम्र में नोबेल मिला। उनके जीवन का लक्ष्य ‘डायबिटिज’ का इलाज खोजना था क्योंकि उनकी माँ की मृत्यु इसी बीमारी से हुई थी। कारण पता लगाने के दौर में उन्होंने एक सपना देखा जिसमें शल्य चिकित्सा से एक कुत्ते की पेंक्रियाज को इस तरह बांधा जिससे इसमें होने वाला भोजन का प्रवाह रूक गया। अब उन्होंने वैसा ही प्रयोग करने का निश्चय किया। इस प्रयोग के परिणाम से उन्हें शर्करा और इंसुलिन के बीच एक संतुलन की जानकारी मिली। इसके बाद उन्हें एक और सपना आया। इससे उनको आइडिया मिला कि एक औषधि के रूप में इंसुलिन का कैसे विकास किया जाए जिससे डायबिटिज के मरीजों का ईलाज किया जा सके। इस सपने के बाद उन्होंने दो कुत्तों पर प्रयोग किया। एक में उन्होंने पैनक्रियाज को अलग किया। इससे उसमें रक्त शर्करा बढ़ीं उसकी प्यास भी बढ़ी। उसने खूब पानी भी पीया। उसे खूब पैशाब होने लगी और वह कमजोर होते चला गया। दूसरे कुत्ते में पैनक्रियाज को सर्जरी कर बांध दिया ताकि उसमें पौष्टिक तत्त्वों का प्रवाह रूक जाए। ऐसा होने से पैनक्रियाज का क्षय होना आरंभ हो गया। फिर इसे अलग किया तथा इसे अलग किया। फिर पानी और नमक के घोल में इसके टुकड़ों को फ्रीज में रखा। इन टुकड़ों को निकाल कर बारीक पीसा और फिर इसे फिल्टर किया। इससे जो पदार्थ मिला, वह इंसुलिन था।  
  • इलियास होवे आज की प्रचलित सिलाई मशीन के आविष्कारक हैं। इस सिलाई मशीन को उन्होंने पहले से बनी मशीन में कई सुधार कर आविष्कृत किया। इसमें सुधार का आइडिया उन्हें एक सपने में मिला। तत्कालीन मशीनों में समस्या थी कि सुई में नौका कहाँ रखी जाय? सामान्य सुई में सुई की नोक के दूसरे सिरे पर नौका होती है। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि नौका को नोक की ओर ही होना चाहिए। वे असफल ही रहते अगर उन्हें एक सपने से मदद न मिली होती। सपने में उन्होंने देखा कि वे एक अनोखे देश में वहाँ के निर्दयी राजा के लिए सिलाई की मशीन बना रहे हैं। मशीन बनाने के लिए 24 घंटे का समय दिया गया है। अगर इसमें मशीन नहीं बनी तो मौत की सजा मिलना तय। होवे काम में उलझे रहे पर निर्दिष्ट समय-सीमा में मशीन नहीं बना पा रहे थे। अब सजा की बारी आई। वे देखते हैं कि भालों के साथ राजा के सैनिक आ रहे हैं और उन्होंने उनके सिर के चारों ओर भालों की नोकें रख दी हैं। अचानक उनकी नींद खुली। सपने में उन्हें रास्ता मिल गया। नौका को नोक के पास होना चाहिए। रात के 4 बजे थे। लेकिन वे उसी क्षण अपनी वर्कशॉप में गये और सुबह 9 बजे तक सुई बना ली। इस तरह आज की प्रचलित सिलाई मशीन का आविष्कार हो गया। 

सोचा क्या और मिल क्या गयाः अनअपेक्षित खोजें

  • रदरफोर्ड अपने गुरू द्वारा प्रस्तावित परमाणु मॉडल के पक्ष में ठोस सबूत जुटाना चाहते थे। उसके लिए उन्होंने गीगर तथा मार्डसन के सहयोग से एक प्रयोग करने का निश्चय किया। इसमें अल्फा-कणों को एक पतली स्वर्ण-पन्नी की ओर आपतित किया गया तथा उससे प्रकिर्णित होने वाले प्रकीर्णन अल्फा-कणों का अध्ययन किया गया। उन्होंने देखा कि अपेक्षानुसार इनमें से अधिकतर अल्फा-कण तो बिना किसी विचलन के पन्नी की दूसरी तरफ पहुँच गये लेकिन वे यह देख कर हैरान रह गये कि कुछ अल्फा-कणों का विचलन इतना अधिक हुआ कि वे पलट कर पन्नी की दूसरी तरफ पहुँचने की बजाय वापस लौट आये। ये परिणाम टॉमसन द्वारा प्रस्तावित मॉडल से मेल नहीं खाते थे। रदरफोर्ड सोचने लगे कि इतना अधिक विचलन तभी मिल सकता है जबकि धन आवेशित भाग फैले होने की बजाय किसी स्थान पर केन्द्रित रहे। इस तरह बहुत सोच-विचार के पश्चात् रदरफोर्ड ने टॉमसन-मॉडल के स्थान पर एक नये परमाणु-मॉडल को प्रस्तुत किया। 
  • भौतिकविद् वर्नर हैजनबर्ग की यह पुख्ता धारणा थी कि किसी भी सिद्धांत को ‘यथार्थ’ पर आधारित होना चाहिये न कि कल्पनाओं पर आधारित सत्यापित न किये जा सकने वाले किसी मॉडल पर। क्वांटम जगत से मिल रही चुनौतियों को समझने के लिए भी इसी धारणा के आधार पर आगे बढ़ना चाह रहे थे। इसके पूर्व काल्पनिक मॉडल के आधारों पर ही वैज्ञानिक कार्य कर रहे थे। हैजनबर्ग की सोच नई दिशा की ओर आगे बढ़ने का संकेत दे रही थी। लेकिन, सूक्ष्म दुनिया को समझने के लिए आवश्यक विचारों का बीजारोपण नहीं हो पा रहा था। इस जुनूनी दौर में उन्हें हे-फीवर हो गया और वे हवा परिवर्तन के लिये कुछ दिनों के लिए हेलीगोलैण्ड गये। एक रात को करीब तीन बजे अचानक बिस्तर में पड़े-पड़े ही उन्हें एक नयी दृष्टि मिली। वे परमाणविक घटनाओं के नीचे एक अनोखे खूबसूरत संसार को देखते हैं। इससे हैजनबर्ग के सामने सब कुछ साफ हो गया। उन्हें महसूस होने लगा कि परमाणविक घटनाओं के नीचे छिपी इस गणितीय संरचना में परमाणु में इलेक्ट्रॉन की स्थिति, वेग, संवेग आदि साधारण संख्याओं के रूप में उपस्थित नहीं रहते बल्कि वे‘पंक्ति’ और ‘कॉलम’  में जमे संख्याओं के टेबिल के रूप में होते हैं। हैजनबर्ग ने इसके बाद मैक्स बॉर्न, पॉस्कल जॉर्डन के साथ मिल कर मात्र 6 महिनों में ही ‘क्वांटम मेकेनिक्स’ का पहला संस्करण ‘मैट्रिक्स मेकेनिक्स’ के रूप में गढ़ कर दुनिया के सामने रख दिया। 
  • स्विस रसायनज्ञ और टेक्सटाइल इंजीनियर जैक्स एडविन ब्रेंडेंबर्गर एक रेस्टोरेंट में बैठे थे। उनके सामने बैठे एक ग्राहक ने शराब की बॉटल गिरा दी। इससे टेबिल क्लाथ खराब हो गया। यहीं उनके मन में विचार उठा कि उन्हें कपड़े पर एक साफ फिल्म लगाने का कोई तरीका खोजना है जिससे कपड़ा वाटर प्रूफ बन जाए और वह खराब होने से बच जाए। वे अपनी प्रयोगशाला गये और प्रयोग करने लगे। एक प्रयोग में उन्होंने विस्कोस नामक द्रव कपड़े पर लगाया। लेकिन प्रयोग असफल रहा। हालांकि कपड़ा सख्त और खस्ता हो गया। पर ध्यान से देखने पर उन्हें पता चला कि उस कपड़े पर बनी पारदर्शी परत को आसानी से निकाला जा सकता है। उनकी आँखों में चमक आई क्योंकि इस फिल्म के कई दूसरे उपयोग हो सकते हैं। उन्होंने इसकी 1908 में मशीन विकसित कर शीट्स तैयार की। इसे सेलोफेन के नाम से पुकारा गया। इस तरह खोजने क्या निकले थे और खोज क्या लिया!
  • 1990 की दशक के आरंभिक वर्षों में एक बड़ी दवा कम्पनी फायजर के वैज्ञानिकों का दल वैज्ञानिक इयान ओस्टरलोह (प्ंद व्ेजमतसवी) के नेतृत्व में एक दवा यूके92480 का परीक्षण कर रहा था। उद्देश्य था एंजाइना के रोगियों का इलाज करना। एंजाइना में सीने का असह्य दर्द होता है। इसमें रक्त वाहिनी सिकुड़ने लगती है जो बाद में दिल के दौरे का कारण बनती है। इस पर कार्य कर रहे वैज्ञानिकों को उम्मीद थी कि यह दवा रक्त वाहिनियों को शिथिल करेगी। लेकिन उन्हें जो प्रभाव मिला, वह अत्यंत औसत दर्जे का था अतः व्यावसायिक दृष्टि से फायदा देने वाला नहीं था। अचानक वैज्ञानिकों का ध्यान इसके एक साइड-इफेक्ट पर गया। इसने वियाग्रा नामक औषधि को जन्म दिया।
  • 1945 में रेथिऑन कम्पनी के इंजीनियर पर्सी स्पेंसर रडार उपकरण के लिए आवश्यक माइक्रोवेव के स्रोत मैग्नेट्रॉन के सामने से इधर से उधर घूम रहे थे। अचानक उन्होंने महसूस किया कि उनकी जेब में रखी चाकलेट गरम हो कर पिघल रही है। उन्होंने उस पिघली चाकलेट में ब्रेड को डुबो कर खाया और अपनी इस अचानक हुई खोज को सेलिब्रेट किया। इसने माइक्रोवेव ओवन को जन्म दिया।
  • 1938 में डूपोंट कम्पनी के रसायनज्ञ रॉय प्लंकेट फ्रीज में प्रयुक्त होने वाले नाइट्रोजन डायऑक्साइड तथा प्रोपेन के विकल्प बेहतर और सस्ते रेफ्रीजरेंट ‘सी.एफ.सी.’ की खोज की। जब वे और अधिक होम-फ्रेंडली रेफ्रीजरेंट प्राप्त करने के उद्देश्य से विभिन्न रासायनिक क्रियाओं पर प्रयोग कर रहे थे तभी अचानक उन्हें एक नया पॉलीमर मिला जिसे आज हम ‘टेफ्लॉन’ के नाम से जानते हैं। यह उन्हें तब मिला जब उन्होंने एक कंटेनर में गैस को रखा और कुछ देर बाद खोला तो तो उन्हें इसमें गैस तो नहीं मिली लेकिन उसके बदले में एक अजीब चिकना ‘रेजीन’ मिला जो कड़ी गरमी तथा विभिन्न तीव्र-क्रियाशील रसायनों से अप्रभावित रहने वाला निकला। बाद में इसका प्रयोग मनहट्टन प्रोजेक्ट में हुआ। और, फिर स्वचालित उद्योगों और बिना चिपकने वाले बरतनों के निर्माण में हुआ।
  • 1930 की दशक में एनरिको फर्मी युरेनियम पर न्यूट्रॉनों की बमबारी कर, यूरेनियम से भारी तत्त्वों को प्राप्त करने के प्रयोगों में लगे थे। कम ऊर्जा वाले न्यूट्रानों की सहायता से बमबारी करने के दौरान उन्होंने देखा कि भारी तत्त्व तो मिले नहीं, लेकिन हल्के तत्त्व मिले। फर्मी इनको पहचान नहीं सके। बाद में पता चला कि ये उन तत्वों के हैं जिनके परमाणु द्रव्यमान 95 तथा 137 के आसपास हैं। यह यूरेनियम के नाभिक का टूटना था। इसतरह अनजाने में ही ‘नाभिकीय विखंडन’ की खोज हो गई। बाद में ऊर्जा की गणना से पता चला कि इस दौरान मिलने वाली ऊर्जा आईंस्टीन के ऊर्जा-द्रव्यमान समीकरण के हिसाब मेल खाती है। इस तरह नाभिकीय ऊर्जा के रूप में एक नया स्रोत वैज्ञानिकों के हाथ लग गया।   
  • 1899 में बेल्जियम के एक रसायनशास्त्री लिओ बैकेलैण्ड चपड़े के रूप में मिलने वाली राल (रेजिन) के विकल्प पर कार्य कर रहे थे। उन्हें विकल्प तो नहीं मिल पाया लेकिन वे दुनिया के पहले ‘प्लास्टिक’ को प्राप्त करने में सफल हो गये। अपने प्रयोग में वे कोलटार यानि डामर से प्राप्त फिनॉल को फार्मेडिहाइड के साथ मिला कर प्रयोग कर रहे थे। इसीतरह के कुछ और पदार्थों के साथ उनका प्रयोग जारी था कि अचानक एक प्रयोग में उन्हें कुचालक और ऊष्मारोधी पॉलीमर ‘पॉली-ऑक्सी बैंजाइल मिथाइल एनग्लाकोलन हाइड्राइड’ मिल गया जो आज ‘बेकेलाइट’ के नाम से जाना जोता है। इसके बाद 1907 में इससे बिलियर्ड बॉल बनाई जाने लगी। इसके पूर्व जो बॉल बनाई जाती थी वह कृत्रिम चपड़े सेलूलाइड से बनाई जाती थी जो बहुत ज्वलनशील होती थी। और अगर सही कोण पर मारी जाती थी तो उसमें विस्फोट तक हो जाता था।
  • 1895 में जर्मन भौतिकशास्त्री विलहेल्म रोंजन विसर्जन नलिका में उत्पन्न होने वाली कैथोड किरणों के गुणों का अध्ययन कर रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि नलिका से कुछ किरणें निकल रही हैं जो दूर एक कौने में रखे प्रतिदिप्ति परदे पर अचानक चमक पैदा कर रही है। विसर्जन नलिका से बाहर निकलने वाली किरणें अज्ञात किस्म की थी। अतः इसका नाम ‘एक्स किरण’ रख गया। फिर अध्ययन से पता चला कि से किरणें कागज, चमड़ी, मांस लकड़ी आदि जैसे पदार्थों से गुजरने में सक्षम है लेकिन हड्डियों से नहीं। इसे जानने के लिए उन्होंने अपनी पत्नी के हाथ का पहला एक्स-रे फोटो लिया। शीघ्र ही इसका चिकित्सीय अनुप्रयोग सामने आ गया। 
  • 1827 में अंग्रेज औषधज्ञ जॉन वाकरएंटीमॅनी सल्फाइड तथा पोटाशियम क्लोरेट से मिले हुए रसायन भरे बर्तन को एक डंडी से हिला रहे थे। तभी उन्होंने नोट किया कि जिस डंडी से वे हिला रहे थे उसके सिरे पर डल्ली के रूप में कुछ पदार्थ चिपक गया है जो कुछ समय के पश्चात सूख गया है। जब उन्होंने इसे हटाने का प्रयास करते हुए खुरचना आरंभ किया तो कुछ ही क्षणों में वह आग की लपटों में बदल गया। इस तरह घर्षण दियासलाई का आविष्कार हुआ। 
  • 18 वर्षीय रसायन के विद्यार्थी विलियम पर्किन अपने घर की प्रयोगशाला में मलेरिया से पीडि़त लोगों के इलाज के लिए कृत्रिम कुनेन बनाना चाहते थे। लेकिन वे सफल नहीं हो पारहे थे। लेकिन पेड़ की छाल पर डामर (कोल टार) से प्राप्त ‘एनीलीन’ को ले कर प्रयोगों के दौरान उन्हें हल्के बैंगनी रंग का एक अवशिष्ट मिला। पर्किन ने इस रंग को अलग किया। मजेदार बात यह कि इससे रेशम को आसानी से रंगा जा सकता है। यह अपेक्षाकृत प्राकृतिक रंग की तुलना में पक्का तथा धूप में भी हल्का नहीं पड़ने वाला था। अनसोची इस खोज का महत्त्व सबके सामने आ गया। और, इसतरह विश्व का पहला ‘कृत्रिम हल्का बैंगनी रंग’ मिल गया। 
  • एक्सरे की खोज के बाद 1896 में फ्रांस के हेनरी बैक्वेरल ने अनुमान लगाया कि सौर प्रकाश एक्स-किरणों को उत्पन्न कर सकता है। इसके लिए उन्होंने प्रयोगों की एक शृंखला आरंभ करने के लिए विभिन्न्न अयस्कों को एकत्रित किया। कई प्रयोग किए लेकिन उन्हें कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिल पा रहा था। एक दिन वे प्रयोग कर रहे थे कि अचानक मौसम बिगड़ गया और आसमान में बादल छा गये। उन्हें अपने काम को कई दिनों तक रोकना पड़़ा। अब उन्होंने प्रयोगाधीन अयस्क को अपनी टेबिल के ड्राअर में रख दिया जिसमें अध्ययन के लिए फोटोग्राफिक प्लेट्स के डिब्बे भी रखे थे। कुछ दिनों के उपरांत मौसम ठीक होने पर उन्होंने जब काम आरंभ किया तब उन्हें पता चला कि बिना सौर प्रकाश के भी यूरेनियम से विकिरणों का स्वतः उत्सर्जन हो रहा है। इस तरह अनजाने में ही रेडियो एक्टिविटि की खोज हो गई। आगे चल कर यह इतनी क्रांतिकारी साबित हुई कि इसके गुणों का अध्ययन कर न सिर्फ वैज्ञानिकों ने परमाणु में बसी अत्यंत सूक्ष्म नाभिकीय दुनिया का पता लगाया, वरन् नाभिकीय स्तर पर सक्रिय प्रकृति के दो और प्रकार के मूलभूत बलों को भी खोज डाला।
  • बिगबैंग सिद्धान्त के अनुसार आरंभ में ब्रह्माण्ड अत्यंत उच्च ताप पर एक बिंदु के समान था। फिर इसमें एक महाविस्फोट हुआ। इसके बाद से यह लगातार रूद्धोष्म तरीके से फैल रहा है। रूद्धोष्म प्रसार के कारण इसका ताप लगातार कम हो रहा है। जॉर्ज गैमो ने गणना करके बताया कि उस महाविस्फोट के चिन्ह आज भी मौजूद होना चाहिए। लेकिन अत्यधिक विस्तार के कारण उन विकिरणों के स्पेक्ट्रम को बहुत अधिक रेड शिफ्टेड (यानि स्पेक्ट्रम के लाल भाग की ओर विस्थापित) मिलना चाहिए। इस तरह उनके अनुसार इसे माईक्रोवेव बैकग्राउंड (आदिकाल में हुए महाविस्फोट यानि बिगबैंग के बाद पैदा हुए प्रखर विकिरण का अवश्®षात्मक प्रतीक) के रूप में आज सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैला हुआ मिलना चाहिए। गैमो की सोच की सत्यता को जांचने के लिये डिकी और पेबल गंभीरता से कार्य कर रहे थे। लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल पा रही थी। इधर अर्नो पेन्जियास और राबर्ट विल्सन बेहतर माईक्रोवेव एंटेना बनाने में जुटे थे। एक एंटेना से प्रयोग के दौरान उन्हें एक अनअपेक्षित रेडियो-शोर मिल रहा था जो किसी भी तरह समाप्त नहीं हो रहा था। वे सोचने लगे कि क्या यह शहरी क्षेत्र से मिलने वाले रेडियो संकेतों के व्यतिकरण का नतीजा है? क्या यह नाभिकीय परीक्षणों के कारण है? क्या यह एंटेना पर निवास कर रहे कबूतरों के कारण है, लेकिन अवलोकन इनमें से किसी की भी पुष्टि नहीं कर रहे थे। मजेदार बात यह थी कि प्रत्येक दिशा से मिलने वाला यह रेडियो-शोर एक समान तीव्रता का था। यह उन्हें हैरान कर रहा था। फिर उन्हें राबर्ट डिकी के बारे में पता चला जो माइक्रोवेव के रूप में महाविस्फोट के चिन्ह को मापने के प्रयास कर रहे थे। उनको समझने में देर नहीं लगी कि यह तो वही है जिसे डिकी मापने के प्रयास कर रहे हैं। इस तरह अचानक अनजाने में बिना किसी योजना के पेन्जिऑस और विल्सन ने आदिकाल के प्रखर विकिरण के अवशेषात्मक प्रतीक को पहचान लिया। उनके इस अचानक मिले प्रायोगिक प्रेक्षण ने बिग-बैंग सिद्धान्त के पक्ष में एक मज़बूत सबूत जुटा दिया। 
  • 1968 में वैज्ञानिक स्पेंसर सिल्वर बहुत अच्छा चिपकने वाला आसंजक बनाने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन इसके विपरीत उन्हें एक बहुत हल्के से चिपकने वाला तथा उससे चिपके कागज को हटा कर कहीं और लगा सकने में समर्थ आसंजक मिला। उन्हें उस समय तो समझ ही नहीं आया कि इसका क्या करे। लेकिन, 1974 में इसका बुकमार्क के रूप में पहला उपयोग आर्ट फ्राय नामक वैज्ञानिक के माध्यम से सामने आया। आज यह ‘पोस्ट-इट-नोट’ के रूप में प्रचलन में है।

इस तरह हम वैज्ञानिक यात्रा के दौरान घटने वाली घटनाओं और खोजों से बनने वाले व्यापक स्पेक्ट्रम से परिचित होते हैं। वैज्ञानिक यात्रा के दौरान जब भी कभी हमें नयी समझ या दृष्टि मिलती है या किसी अंतर्संबंध का पता चलता है, तब हमें बेहद खुशी मिलती है। ठीक उसीतरह की खुशी जो हमें किसी चुटकुले को सुनने के बाद तब मिलती है जब हमें उसका अर्थ समझ में आता है अथवा हमें उसमें छिपे अंतर्संबंध का पता चलता है। 

 
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