विज्ञान

(19/Aug/2017)

दूरबीन की विकास यात्रा

 
प्रदीप
 
सदियों से ब्रह्माण्ड मानव को आकर्षित करता रहा है। इसी आकर्षण ने खगोल वैज्ञानिकों को ब्रह्माण्डीय प्रेक्षण और ब्रह्माण्ड अन्वेषण के लिए प्रेरित किया। रात के समय यदि हम आसमान में दिखाई देने वाले तारों का अवलोकन करते हैं, तो हमें दूरबीन के बिना भी कुछ बातें शीघ्र स्पष्ट होने लगती हैं। मगर, हम तारों के सूक्ष्म रहस्यों तथा ब्रह्माण्ड के विभिन्न पिण्डों के आकार, गति, स्थिति, आकृति इत्यादि के बारे में बिना दूरबीन की सहायता से नहीं जान सकते हैं। दूरबीन द्वारा प्राप्त जानकारी का स्पष्टीकरण करने के लिए हमें गणित और विज्ञान का सहारा लेना पड़ता है। दूरबीनों ने वैज्ञानिकों को ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने तथा इस विराट ब्रह्मांड की जांच-पड़ताल करने में सहायता की है। इसके लिए सर्वप्रथम हम आकाश दर्शन कराने वाली इन दूरबीनों के द्वारा संभव हुए वैज्ञानिक विचारों के क्रमिक विकास की संक्षिप्त चर्चा करेंगे।
 
 

लिपर्शे की दूरबीन

दूरबीन के आविष्कार का श्रेय हालैंड के हैंस लिपर्शे (भ्ंदे स्पचचमतेीमल) नामक एक ऐनकसाज को दिया जाता है। लिपर्शे ने दूरबीन का आविष्कार किसी विशेष वैज्ञानिक उद्देश्य या प्रयास से नहीं किया था, बल्कि यह एक आकस्मिक घटना का परिणाम था। घटना इस प्रकार है कि वर्ष १६०८ में एक दिन हैंस काँच के दो लैंसों की सहायता से सामने सड़क पर जा रही एक लड़की के खूबसूरत चेहरे को देखने का प्रयास कर रहा था। उसने संयोग से दोनों लैंसों को एक-दूसरे के समांतर सही दूरी पर रखने पर यह देखा कि लड़की का खूबसूरत चेहरा और भी अधिक सुंदर दिखाई देता है तथा इससे दूर की वस्तुएँ भी अत्यधिक स्पष्ट दिखाई देती हैं। इस घटना से प्रभावित होकर हैंस ने दो लैंसों के संयोजन से एक खिलौना बनाया, जिसे आजकल दूरबीन कहते हैं।
वास्तविकता में हैंस ने कभी भी इस खिलौने का उपयोग खगोलीय प्रेक्षण एवं अन्वेषण में नहीं किया, बल्कि वह अपने दूरबीन का उपयोग अपने ग्राहकों को चमत्कार करके दिखाने में करता था। हैंस के दूरबीन को सैनिकों एवं नाविकों ने अपने लिए उपयोगी पाया इसलिए दूरबीन का प्रथम उपयोग सैनिकों, जासूसों एवं नाविकों ने किया। एक अन्य प्रतिस्पर्धी रियाश जैन्सन के द्वारा दूरबीन के आविष्कार का दावा करने के कारण सरकार ने हैंस लिपर्शे को कभी भी दूरबीन के आविष्कार का श्रेय यानी पेटेंट नहीं दिया। हैंस द्वारा अविष्कृत दूरबीन अत्यंत साधारण थी, परन्तु इसे विश्व की प्रथम दूरबीन कही जा सकती है।
 

दूरबीन द्वारा खगोलीय प्रेक्षण की शुरुआत

वर्ष १६०९ में इटली के महान वैज्ञानिक गैलीलियो गैलिली ने हैंस लिपर्शे द्वारा दूरबीन के आविष्कार के पश्चात स्वयं इस यंत्र का पुनर्निर्माण किया तथा पहली बार खगोलीय प्रेक्षण में इसका उपयोग किया। जब गैलीलियो ने अपनी दूरबीन को आकाश की ओर निर्दिष्ट किया तो उन्होंने इतनी बड़ी दुनिया देखी जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।
गैलीलियो ने अपनी दूरबीन की सहायता से चन्द्रमा पर उपस्थित क्रेटर, बृहस्पति ग्रह के चार उपग्रहों सहित सूर्य के साथ परिक्रमा करने वाले सौर कलंकों/सौर धब्बों का पता लगाया। गैलीलियो ही वे वैज्ञानिक थे जिन्होंने अपनी दूरबीन से यह पता लगाया कि सूर्य के पश्चात पृथ्वी का निकटवर्ती तारा प्रौक्सिमा-सेंटौरी है। इसके अतिरिक्त गैलीलियो ने ही हमें शुक्र की कलाओं से सम्बन्धित ज्ञान तथा कोपरनिकस के सूर्यकेंद्री सिद्धांत को सत्य प्रमाणित किया। ध्यातव्य है कि गैलीलियो का दूरबीन अपवर्तक दूरबीन था। अपवर्तक दूरबीन में लैंसों का प्रयोग किया जाता है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि जब गैलीलियो ने इटली के वेनिस में अपनी दूरबीन का प्रदर्शन किया था, तभी प्रिंस फेड्रिख सेसी ने ग्रीक शब्द टेली (दूर) + स्कोप (दर्शी) = ‘टेलीस्कोप’ (दूरदर्शी) की रचना की।
वर्ष १६१० में गैलीलियो ने अपनी खोजों पर आधारित एक पुस्तक ‘तारों का संदेशवाहक’ लिखी। कुछ वर्गों द्वारा पुस्तक का भरपूर स्वागत हुआ तो कुछ लोगों, विश्वविद्यालयों और चर्च को दूरबीन से ज्ञात होने वाले नए ज्ञान से आपत्ति थी। इस कारण नए ज्ञान का पुराने ज्ञान से टकराव होना लाजिमी था और आखिरकार इटली के विश्वविद्यालयों एवं चर्च ने गैलीलियो के दूरबीन को काले जादू की तरह नकार दिया। किसी ने ठीक ही कहा है कि धार्मिक तथा प्रजाति विद्वेष विवेक को नष्ट कर देता है। यदि गैलीलियो के वैज्ञानिक खोजों को इटली में उस समय महत्व दिया जाता तो अब वहाँ वैज्ञानिक विकास की स्थिति कुछ और ही होती!
 

न्यूटन की परावर्तक दूरबीन

आज यह सर्वसामान्य जानकारी है कि सर आइज़क न्यूटन ही एकमात्र ऐसे वैज्ञानिक थे जिन्होंने ज्ञान-विज्ञान के विकास में सबसे अधिक महत्वपूर्ण योगदान दिया था। यदि न्यूटन के आरंभिक कृतित्व का अध्ययन किया जाए तो यह मालूम होता है कि न्यूटन ने सर्वप्रथम प्रकाश विज्ञान (ऑप्टिक्स) पर खोजें की तथा उसे पुस्तक रूप में भी प्रकाशित करवाई। न्यूटन ने एक नए अवधारणा को जन्म दिया था कि जब किसी वस्तु के स्वभाविक रंग पर रंगीन प्रकाश डाला जाता है तो एक पारस्परिक क्रिया के कारण उस वस्तु के रंग में परिवर्तन होता है। विभिन्न रंगों के संयोजन से नया रंग प्राप्त होता है, इस सिद्धांत को हम अब ‘न्यूटन का रंग संयोजन सिद्धांत’ के नाम से जानते हैं। अपने इस कार्य को प्रायोगिक रूप से सिद्ध करने के लिए न्यूटन ने एक विशेष प्रकार के परावर्तक दूरबीन का निर्माण किया, जिसे अब न्यूटोनियन टेलीस्कोप के नाम से जाना जाता है।
जैसा कि हम जानते हैं कि न्यूटन से पहले दूरबीन का आविष्कार हो चुका था और पहले के दूरबीनों में लैंसों का प्रयोग होता था। लैंसों के प्रयोग के कारण अत्यधिक अपवर्तन होता था और निर्मित चित्र का प्रतिबिंब धुंधले एवं रंगीन होते थे इस घटना को  ‘वर्ण-विपथन’ कहते हैं। न्यूटन ने अपने दूरबीन में प्रकाश को केंद्रित करने के लिए लैंसों के बजाय दर्पणों का प्रयोग किया तथा वर्ण-विपथन की समस्या को दूर किया। वर्ष १६७१ में न्यूटन ने रॉयल सोसाइटी के समक्ष अपने परावर्तक दूरबीन का प्रदर्शन किया तथा रंग संयोजन सिद्धांत की प्रायोगिक अभिपुष्टि की।
न्यूटन के कुछ समय बाद एक शौकिया खगोलविद एन। कैसीग्रीन ने अति-उन्नत परावर्ती दूरबीनों का आविष्कार किया जो न्यूटोनियन टेलीस्कोपों की तुलना में बहुत अधिक शक्तिशाली थे। कैसीग्रीन ने अपने दूरबीनों में लैंसों के साथ उत्तल और अवतल दर्पणों का भी प्रयोग किया था।
 

दूरबीनों द्वारा दुर्लभ खगोलिकी प्रेक्षण की शुरुआत

दूरबीन के आविष्कार से पहले आकाशीय पिंडों का अध्ययन-अवलोकन करने के लिए हमारे पास एक ही साधन था-हमारी आँखें। आज से सदियों पूर्व जब आज की तरह आधुनिक दूरबीनें नहीं थी, फिर भी हमारे पूर्वजों ने ग्रहों एवं नक्षत्रों से संबंधित अत्यंत उच्चस्तरीय वैज्ञानिक खोजें अपनी आँखों एवं अन्य सीमित साधनों से की। इस तथ्य का एक श्रेष्ठ उदाहरण महान खगोलविद टायको ब्राहे थे, जिन्होंने डेनमार्क स्थित अपनी वेधशाला में अपनी आँखों और विशाल खगोलीय यंत्रों से कोण मापते हुए महत्वपूर्ण आंकड़े प्राप्त किये थे। इन्हीं आंकड़ों का प्रयोग करके जोहांस केप्लर ने ग्रहीय गति के प्रसिद्ध तीन नियमों की खोज की थी।
मगर, मनुष्य की आँखें एक सीमा तक ही देख सकती हैं। दरअसल, अधिकांश खगोलीय पिंड हमसे इतने दूर हैं कि हमें अपनी नंगी आँखों से नहीं दिखाई दे सकते हैं। दूरबीन ने वैज्ञानिकों को आधुनिक नेत्र प्रदान किये हैं जिसकी सहायता से मनुष्य अपनी आँखों से करोड़ों गुना अधिक शक्तिशाली प्रकाश ग्रहण कर सकता है और अनंत आकाश को निहार सकता है, जान सकता है, समझ सकता है।
जर्मन खगोलविद सर विलियम हर्शेल, जो बाद में इंग्लैंड में स्थायी रूप से बस गए, ने वर्ष १७७४ में स्वयं अपनीं दूरबीनें निर्मित की एवं अपने सम्पूर्ण जीवन को खगोलीय शोधकार्यों के लिए समर्पित कर दी। वर्ष १७८१ में हर्शेल ने अपनी दूरबीनों की सहायता से सौरमंडल के सातवें ग्रह यूरेनस की खोज की। इसके अतिरिक्त हर्शेल ने हमारी आकाशगंगा ‘दुग्धमेखला’ का पहली बार दूरबीन की सहायता से विस्तृत अध्ययन किया।
आकाश के सर्वाधिक चमकीले तारे व्याध के अश्य युग्म तारे की खोज एक अमेरिकी खगोलविद अलवान क्लार्क ने दूरबीन की ही सहायता से खोज निकाला। हमारी आकाशगंगा में हजारों-लाखों की संख्या में युग्म तारे मौजूद हैं। कुछ युग्म तारों को नंगी आँखों से देखा जा सकता है, परंतु अधिकांश युग्म तारों को मात्र दूरबीन की ही सहायता से पहचाना जा सकता है।
दूरबीन के आविष्कार के पश्चात अनेक दुर्लभ खगोलिकी खोजें हुई। यह सब खोजें दूरबीनों द्वारा लिए गए प्रेक्षणों से ही संभव हुई, इन सभी खोजों का वर्णन एक लेख में करना संभव नहीं है। आइए, अब हम ब्रह्मांड अन्वेषण में योगदान देने वाले आधुनिक विशालकाय दूरबीनों की चर्चा करते हैं।
 

दूरबीन तकनीक में क्रांति : विशाल भू-आधारित दूरबीनें

गैलीलियो द्वारा दूरबीन से प्रथम खगोलीय प्रेक्षण के लगभग ४०७ वर्ष व्यतीत हो चुके हैं, इन ४०७ वर्षों में बहुत से विशालकाय दूरबीनों को पृथ्वी पर स्थापित किया जा चुका है। पृथ्वी पर स्थापित इन दूरबीनों को ‘भू-स्थिर दूरबीनें’ या ‘भू-आधारित दूरबीनें’ कहा जाता है। आकाश दर्शन एवं ब्रह्मांड अन्वेषण में सहायता करने वाले कुछ प्रसिद्ध विशालकाय भू-आधारित दूरबीनें निम्नलिखित हैं-
स सदर्न अफ्रीकन लार्ज टेलीस्कोप (साल्ट) - साल्ट दूरबीन दक्षिणी अफ्रीका के कारू नामक क्षेत्र के सूदरलैंड कस्बे में अवस्थित है। साल्ट दूरबीन के अंदर कई षट्कोणीय दर्पणों को जोड़कर एक विशाल दर्पण का निर्माण किया गया है। इस दूरबीन का दर्पण ही इसे विश्व का सर्वश्रेष्ठ प्रकाशीय दूरबीन बना देता है। यह दूरबीन आधुनिक तकनीकी दक्षता एवं कम्प्यूटर नियंत्रित युक्ति की पहचान है। साल्ट दूरबीन दूर के आकाशगंगाओं एवं क्वासरों को देखने में सक्षम है।
स केक्क टेलीस्कोप - हवाई द्वीप में निष्क्रिय ज्वालामुखी मोनाकिया की चोटी पर दो विशालकाय केक्क टेलीस्कोप स्थित हैं। इन दोनों दूरबीनों में ९ण्८ मीटर व्यास का मुख्य दर्पण लगा हुआ है। यह समुद्र तल से १४०० फुट की ऊँचाई पर स्थित है। इन जुड़वाँ दूरबीनों ने तारों के जीवन चक्र को समझने में विशेष सहायता की है।
स वेरी लार्ज टेलीस्कोप (वी.एल.टी.) - वी.एल.टी। चार दूरबीनों का एक समूह है, जो एक दूसरे से जुड़कर एक विशाल प्रकाशीय दूरबीन का सृजन करती हैं। प्रत्येक दूरबीन के दर्पण का व्यास ८ण्२ मीटर है।
स ग्रेट केनरी टेलीस्कोप (जी.सी.टी) - यह दूरबीन ग्रेट केनरी द्वीप के लॉपामा नामक स्थान पर स्थित है। यह विश्व की सबसे बड़ी एवं शक्तिशाली प्रकाशीय दूरबीन है। इस दूरबीन के दर्पण का व्यास १०ण्४ मीटर है। यह दूरबीन हमारे सौरमंडल से परे अन्य सौर-परिवारों के अवलोकन में विशेष सहायक सिद्ध हुआ है।
उपरोक्त दूरबीनों के अतिरिक्त अनेक क्षमतावान दूरबीनें ब्रह्मांड प्रेक्षण एवं अन्वेषण में आज उपयोग में लाई जा रही हैं। ऊपर हमनें कुछ ही प्रसिद्ध भू-स्थिर दूरबीनों के बारे में चर्चा की है।
 

खगोलिकी एवं खगोल भौतिकी में नवाचार-विलक्षण अंतरिक्ष दूरबीनें

खगोलीय पिंड दृश्य प्रकाश के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के विद्युत-चुंबकीय विकिरणों का भी उत्सर्जन करते हैं। सुदूरस्थ खगोलीय पिंडों से उत्सर्जित होने वाली विद्युत-चुंबकीय विकिरण का अधिकांश हिस्सा पृथ्वी के वायुमंडल द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है तथा इसी कारणवश पृथ्वी पर स्थित विशाल प्रकाशीय दूरबीनों से उन खगोलीय पिंडों को भलीभांति प्रेक्षित नहीं किया जा सकता है। पृथ्वी के वायुमंडल से होने वाली बाधा के कारण खगोलीय पिंडों के चित्र धुंधलें बनते हैं। पृथ्वी के वायुमंडलीय बाधा को दूर करने एवं दूरस्थ खगोलीय पिंडों के सटीक प्रेक्षण के लिए ‘अंतरिक्ष दूरबीनों’ को निर्मित किया गया है। यहाँ पर हम दो प्रसिद्ध अंतरिक्ष दूरबीनों क्रमशः हब्बल अंतरिक्ष दूरबीन एवं चन्द्रा एक्स-रे दूरबीन के बारे में चर्चा करने जा रहें हैं, जो पृथ्वी के वायुमंडल से पूर्णतया मुक्त, अंतरिक्ष में होने के कारण पृथ्वी पर स्थित विशालकाय दूरबीनों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण साबित हुए हैं।
 

हब्बल अंतरिक्ष दूरबीन

एक अंतरिक्ष आधारित दूरबीन होने के नाते, इसे अंतरिक्ष में कृत्रिम उपग्रह के रूप में स्थापित किया गया है। हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन की महानतम उपलब्धियों ने उसे खगोल भौतिकी एवं खगोलकी के इतिहास ने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण दूरबीन बना दिया हैं। इसका प्रक्षेपण स्पेस शटल डिस्कवरी द्वारा २५ अप्रैल, १९९० में किया गया था। सृष्टि के आरम्भ और आयु के संबंध में खगोलीय प्रेक्षण द्वारा प्रथम परिचय हब्बल अंतरिक्ष दूरबीन ने ही करवाया है। इसी दूरबीन ने ही हमे श्याम ऊर्जा का ज्ञान दिया है। इसकी सहायता से हमें यह ज्ञात हुआ है कि ब्रह्माण्ड न केवल विस्तारमान है, बल्कि़ इसके विस्तार की गति भी समय के साथ त्वरित होती जा रही है। श्याम उर्जा को इस त्वरण का उत्तरदायी माना जा रहा है।
दीर्घवृत्तीय आकाशगंगाओं की खोज, क्वासरों के विशिष्ट गुणों की खोज तथा वर्ष १९९४ में बृहस्पति ग्रह और पुच्छल तारे ‘शूमेकर लेवी-९ के बीच हुए टकराव का चित्रण हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन की विशिष्ट उपलब्धियों में सम्मिलित है। यह पहली अन्तरिक्ष दूरबीन है जो अल्ट्रावायलेट और इन्फ्रा-रेड के समीप कार्य करती है और सुग्राहकता के साथ खूबसूरत, मनमोहक एवं अद्भुत चित्रों को लेती है तथा पृथ्वी पर प्रेषित करती है।
 

चन्द्रा एक्स-रे दूरबीन

जैसाकि हम जानतें हैं कि खगोलीय पिंड विभिन्न प्रकार के विद्युत-चुंबकीय विकिरणों का उत्सर्जन करते हैं। इन विकिरणों में दृश्य प्रकाश के अतिरिक्त पैराबैंगनी किरणें, अवरक्त किरणें, रेडियों तरंगे, गामा किरणें, एक्स-किरणें आदि भी होती हैं। पृथ्वी पर स्थापित रेडियो दूरबीनों एवं हब्बल अंतरिक्ष दूरबीन ने कुछेक विद्युत-चुंबकीय विकिरणों को पकड़ने में सफलता प्राप्त की है। परंतु गामा, एक्स आदि किरणों को पकड़ने के लिए अंतरिक्ष में एक दूरबीन स्थापित करना अत्यंत आवश्यक था।
ब्रह्मांड के एक्स-रे स्रोतों को पकड़ने के लिए ‘चन्द्रा एक्स-रे दूरबीन’ को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया। इस दूरबीन को ‘चन्द्रा’ नाम भारतीय मूल के प्रसिद्ध वैज्ञानिक सुब्रमणियन् चन्द्रशेखर (चन्द्रा) के सम्मान में दिया गया है। यह दूरबीन किसी अन्य एक्स-रे दूरबीन की तुलना में लगभग ३० गुना अधिक सेंसिटिव है। इसका प्रक्षेपण स्पेस शटल कोलम्बिया द्वारा ३ जुलाई, १९९९ किया गया। इसकी लंबाई १४ मीटर है तथा इसके दर्पण का व्यास २ण्७ मीटर है। दिलचस्प बात यह है कि जब इस दूरबीन को प्रक्षेपित किया गया था, तब इसकी आयु पांच वर्ष आंकी गयी थी, परंतु इसने दस वर्षाे से अधिक कार्य किया है और यह अब भी कार्यरत है। वैज्ञानिकों को पूर्ण विश्वास है कि यह लगभग एक दशक तक और ब्रह्मांड में एक्स-रे स्रोतों की छानबीन करता रहेगा।
साधारण प्रकाशीय दूरबीनों से अंतरिक्ष दूरबीनों तक का यह सफर विज्ञान के क्रमिक विकास को इंगित करती है और इससे हमे यह भी पता चलता है कि जब गैलीलियो ने पहली बार दूरबीन द्वारा आकाश का प्रथम प्रेक्षण किया था, उस समय से हम बहुत आगे निकल गये हैं।
 
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