विज्ञान

(19/Aug/2017)

इसरो की वैज्ञानिक महिलाएँ

कालीशंकर

नारी एक पत्नी भी है, एक माँ भी है, एक बहन भी है तथा उसने समाज में अनेक रूपों में अपनी भूमिकाएँ निभाया है। एक समय था जब महिलाएँ घर की चारदीवारी तक सीमित हुआ करती थी लेकिन आज के युग में महिलाएँ पुरूषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर समाज के हर क्षेत्र में काम कर रही हैं तथा राष्ट्र विकास में अपना योगदान दे रही हैं। आज महिला चिन्तनशील हो गई है तथा एक कवि की विचारधारा में वह यही सोचती है, ‘‘इसमें कुछ जोडूँगी अपने से कुछ पिरोऊँगी, चाह को राहत तब मिलती है जब श्रम तप से जुड़ता है।’’ प्रस्तुत लेख में भारतीय अन्तरिक्ष संस्था इसरो की महिला वैज्ञानिकों का वर्णन किया गया है जिन्होंने भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम को आगे बढ़ाने तथा उसे एक नया स्वरूप देने में एक महान भूमिका निभाई है। 
मिनाल सम्पथ
मिनाल सम्पथ भारत के मंगल ग्रह मिशन ‘मंगलयान’ की सिस्टम अभियन्ता थी। इस मिशन के लिए उन्होंने एक कमरे में १८ घन्टे प्रतिदिन के हिसाब से काम किया। इस कमरे में खिड़की भी नहीं थी। बिना खिड़की वाला कमरा इसलिए चुना गया जिससे बाहर से कोई डिस्टर्ब न कर सके। वे कहती हैं, ‘‘हमारे पास इस काम के लिए एक अच्छी टीम थी तथा हम में आपस में एक अच्छी समझदारी का मेल-जोल था। प्रमोचन तिथि निर्धारित थी तथा हर हाल में इस तिथि तक काम पूरा करना था। ‘‘मिनाल सम्पथ के लिए इस मिशन में काम करना एक सपना पूरा होने के समान था। अपने प्रायमरी स्कूल के दिनों को याद करते हुए वे कहती हैं कि उन्होंने एक बार टेलीविजन में एक प्रमोचन होते हुए देखा था तथा उसे देखने के बाद उनके मस्तिष्क में यह विचार आया कि कितना अच्छा होता यदि मैं भी एक दिन इस मिशन पर काम करती। वे कहती हैं कि वह सपना शायद साकार हो गया कि मैं आज उसी स्थान पर हूँ। मिस सम्पथ और उनकी टीम ने मंगलयान मिशन के लिए तीन उपकरण विकसित किये जिनके द्वारा मिशन के प्रमुख परीक्षण सम्पन्न किये गये। दो वर्ष लिए इस मिशन के पूरा करने में उन्होने शनिवार तथा छुट्टियों को तिलांजलि दे दी और १८-१८ घं। प्रति दिन काम किया। मिस सम्पथ उन कुछ महिलाओं में से एक हैं जिन्होंने नासा के समकक्ष एक भारतीय मिशन ‘मंगलयान’ में काम किया। वे कहती हैं, ‘‘इस प्रकार की महान संस्था में काम करते हुए मैं भूल गई कि मैं एक महिला हूँ।’’ अपने परिवार के विषय में वे कहती हैं कि बिना उसके सहयोग के मैं अपना कार्य पूरा नहीं कर सकती थी। कई बार जब उनका बेटा बीमार हुआ तो वे उस समय बैंगलूर में कुछ तंत्रो का रिपेयर कर रही होती थी। वे कहती हैं कि बिना परिवार के सहयोग के मैं ये काम नही कर सकती थी जिनमें ५ परियोजनाएँ तथा ११ नीतभार शामिल थे।

रितु कारिढाल

रितु कारिढाल का जन्म उत्तर प्रदेश के लखनऊ मंे हुआ था तथा अपने बचपन से ही उन्हें आकाश की चीजों के प्रति बेहद लगाव रहा है। उन्हें इनके विषय में हर समय कौतूहल बना रहता था कि चन्द्रमा का आकार ऐसा क्यों है, यह क्यों बढ़ता घटता रहता है। वे कहती हैं कि उन्हें हर समय यह जानने की जिज्ञासा बनी रहती थी कि गहरे अंतरिक्ष के पीछे क्या है? एक विज्ञान के विद्यार्थी के रूप में वे समाचार पत्रों और अन्य माध्यमों से नासा तथा इसरो परियोजनाओं की जानकारी लेती रहती थीं तथा अखबारों से इन सूचनाओं की क्लिपिंग इकट्ठा करती रहती थी। पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री प्राप्त करने के बाद उन्होंने इसरो में नौकरी के लिए आवेदन किया और आज वे इसरो की एक अन्तरिक्ष वैज्ञानिक हैं। वे १८ वर्षाें से इसरो में काम कर रही हैं।
वे एक एरोस्पेस इंजीनियर है तथा मंगल ग्रह मिशन मंगलयान की वे उपनिदेशक थीं। लखनऊ में पैदा हुई और पली बढ़ी कारिढ़ाल की प्रबल इच्छा थी की अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में वे प्रवेश करें। अपनी छत पर खड़े होकर वे घन्टों समय व्यतीत किया करती थीं-कभी कभी अपनी पुस्तकों को पढ़कर तथा कभी आकाश के ओर तारों को देखते हुए। वे कहती हैं, ‘‘उस समय इसरो के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए मेरा एक मात्र विकल्प था, इसलिए मैंने अपने बचपन के दौरान अपना सारा ध्यान समाचार पत्रों के माध्यम से इसरो पर केन्द्रित रखा। ‘‘रितु का लालन पालन मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ जहाँ पर शिक्षा पर भी ध्यान दिया जाता था। रितु बताती हैं, ‘‘हम दो भाई और दो बहनें हैं तथा मेरे पिता रक्षा विभाग के कर्मचारी थे। मेरे माता-पिता मेरी प्रेरणा के स्त्रोत रहे हैं। हमारे पास आय के बहुत सीमित स्रोत थे और निश्चित ही हमारे पास ट्यूशन और कोचिंग लेने की सामर्थ्य नहीं थी। सफलता के लिए हमें अपने ऊपर ही निर्भर रहना था।’’
यह १९९७ का वर्ष था जब अधिक से अधिक महिलाएँ अपने कैरियर के चयन में कैरियर और परिवारिक जीवन के बीच सन्तुलन पर जोर दे रहीं थी। अपने इसरो के अनुभव के बारे में रितु कारिढाल कहती हैं, ‘‘जब मैंने इसरो ज्वाइन किया तो उस समय वहाँ पर बहुत अधिक महिलाएँ नहीं थीं। लेकिन महिला और पुरूष कर्मियों को यहाँ समान रूप से देखा जाता था। वैज्ञानिक समुदाय के अन्तर्गत यहाँ पर केवल एक चीज महत्वपूर्ण होती है कि आप कितना कार्य करते हैं तथा आपके कार्य की गुणवत्ता क्या है।’’ मंगलयान परियोजना एक अचंभे के रूप में आई तथा कारिढा़ल कहती हैं, ‘‘हमने एक परियोजना समाप्त की थी तथा अचानक दूसरी परियोजना सामने आ गई। लेकिन यह अब तक की सबसे रोमाँचक परियोजना थी जिस पर मंैने काम किया।’’ वे मंगलयान मिशन की उप प्रचालन निदेशक भी थीं। इस मिशन के प्रमोचन तक के दस महीनों के विषय में वे कहती हैं कि यह उनका अत्याधिक व्यस्त समय रहा है। वे बताती हैं, ‘‘मैं अपने निर्धारित समय पर घर आती तथा बच्चों के साथ बैठकर उनका होमवर्क पूरा कराती और उसके बाद रात में १२ बजे से ४ बजे तक अपना ऑफिस का काम करती। मेरे इन रूटीन कार्याें में मुझे अपने पति का पूरा सहयोग मिला। मेरे बच्चों ने यह चीज समझने का प्रयास किया कि उनकी माँ अचानक इतनी व्यस्त क्यों हो गई क्योंकि वे बहुत छोटे थे। मेरे दस साल के बेटे को यह बात समझ में आ गई जब मैंंने उसे अपनी परियोजना के विषय में उसे बताया। यद्यपि उस समय मेरी बेटी मात्र पाँच वर्ष की थी लेकिन उसे भी कुछ कुछ समझ में आ गया। प्रत्येक सुबह मैं कुछ समय के लिए पूजा भी करती थी तथा उससे मुझे काफी धनात्मक ऊर्जा प्राप्त हुई।’’ मंगलयान मिशन के प्रमोचन के बाद रितु कारिढाल को अनेक संगोष्ठियों में बुलाया गया जहाँ उन्होेने मिशन और अपने अनुभवों पर व्याख्यान दिया। रितु कहती हैं कि, ‘‘मेरे उन रिश्तेदारों ने, जिन्होंने कभी भी मेरी तरफ या मेरे जॉब की ओर ध्यान नही दिया था, वे अचानक इसके विषय में जानने को उत्सुक हो गये। मेरे बच्चे इतने अधिक उत्साहित थे कि अपने स्कूल के हर एक को यह बताते थे कि मेरी मॉम इस परियोजना (मंगलयान) से जुड़ी थीं। लेकिन मेरे जीवन का सबसे बड़ा क्षण वह आया जब मेरा बेटा मुझसे आकर चिपटकर बोला-मॉम मुझे आप पर गर्व है।’’

नन्दिनी हरिनाथ

‘‘अपने बीस वर्ष के इसरो कॅरियर के दौरान मैंने चौदह अन्तरिक्ष मिशनों में काम किया है’’ तथा ये उद्गार हैं इसरो की महिला वैज्ञानिक नन्दिनी हरिनाथ के, जिन्होंने भारत के मंगलयान मिशन में उप प्रचालन निदेशक की भूमिका निभाई है। उनके अनुसार मंगलयान मिशन विशिष्ट था क्योंकि इसे अनेक लोगों के द्वारा देखा और जाना गया तथा उससे अधिक विशिष्ट बात यह थी कि हमारी कार्य प्रतिभा और विशिष्टता को सराहा गया। मंगल ग्रह मिशन के प्रमोचन के समय ४४ वर्षीय नन्दिनी हरिनाथ एक भौतिकशास्त्री तथा दो बच्चों की माँ हैं। वे मिशन में पृथ्वी और मंगल ग्रह के बीच एक अन्तरिक्षयान (मंगलयान) का प्रचालन कर रहीं थी तथा वे मानती हैं कि मंगलयान को नियंत्रण करने की तुलना में बच्चों का पालन पोषण करना अधिक आसान है। नन्दिनी हरिनाथ बताती हैं कि ‘‘मेरी माँ गणित की अध्यापक हैं तथा पिता एक इंजीनियर हैं जिनकी भौतिकी में बहुत अधिक रूचि है। हमारे परिवार को स्टार टे्रक और साइंस फिक्शन को टेलीविजन पर देखने का बहुत शौक था।’’ नन्दिनी कहती हैं कि प्रारंभ में उन्होंने कभी भी अन्तरिक्ष वैज्ञानिक बनने के विषय में कभी नहीं सोचा था तथा इसरो में उनका प्रवेश मात्र एक संयोग था। यह मेरी प्रथम नौकरी थी जिसके लिए मैंने आवेदन किया था तथा इसमें मैं सफल रही। अब बीस वर्ष हो चुके हैं और मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा है। मंगल ग्रह मिशन का हिस्सा होना मेरे जीवन का एक विशिष्ट और उच्च बिन्दु था। मार्स आरबिटर मिशन की डिप्युटी डायरेक्टर नन्दिनी को उस वक्त काफी खुशी होती है जब मार्स आरबिटर मिशन को २००० रूपये के नोट पर देखती हैं। मंगल मिशन में भरपूर योगदान देने के साथ साथ उन्होंने अपनी बेटी के परीक्षा में उसका ध्यान रखना नहीं भूली। वह सुबह बेटी के साथ चार बजे उठ जाती थी ताकि पढ़ाई के दौरान उसके साथ रह सकें। लेकिन मार्स मिशन और दोनों की कामयाबी ने मेहनत सार्थक कर दिया। नन्दिनी हरिनाथ इसरो-नासा के संयुक्त मिशन ‘निसार’ की मिशन तंत्र लीडर भी हैं।

टी.के.अनुराधा

इसरो की महिला वैज्ञानिक टी.के। अनुराधा अन्य महिला वैज्ञानिकों के लिए एक रोल माडल हैं। उन्होंने १९८२ में इसरो को ज्वाइन किया जब इसरो में बहुत थोड़ी सी महिलाएँ थीं। उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स में बी.ई. डिग्री प्राप्त कर इसरो में अनेक महत्वपूर्ण परियोजनाओं में काम किया। उन्होंने सफलतापूर्वक जी सैट-१२ संचार उपग्रह और इसरो के सबसे भारी संचार उपग्रह जी सैट-१० का काम पूरा किया। वर्तमान में वे जी सैट-९, जी सैट-१७ तथा जी सैट-१८ संचार उपग्रहों पर काम कर रही हैं। तकनीकी ग्रुप में २० इंजीनियरो के साथ ग्रुप हेड के रूप में काम करते हुए उन्होंने अनेक डिजिटल और पॉवर इलेक्ट्रॉनिकी आधारित तंत्रों, उपकरण और आटोमेशन उपकरणों की परियोजनाओं को पूरा किया। इनका सफलतापूर्वक अन्तरिक्षयान ऑकलन तंत्रों में प्रयोग किया गया। भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम में उन्होंने प्रोजेक्ट मैनेजर, उप प्रोजेक्ट निदेशक और असोसियेट प्रोजेक्ट निदेशक के रूप में भारतीय सुदूर संवेदन और भारतीय नेविगेशन कार्यक्रमों में एक सफल नेतृत्व प्रदायक की भूमिका निभाई है। उन्होंने अनेक विख्यात जर्नलांे में शोध पत्र प्रकाशित हुए हैं तथा उन्हे अनेक अवार्डाें से सम्मानित किया जा चुका है जिनमें कुछ प्रमुख हैं अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में महान सेवाएँ प्रदान करने के लिए भारत की खगोलिकी संस्था द्वारा दिया गया ‘स्पेस गोल्ड-२००३’, राष्ट्रीय डिजाइन और अनुसंधान फोरम के द्वारा दिया गया ‘‘सुमन शर्मा अवार्ड-२०११’’ तथा जी सैट-१२ उपग्रह टीम के लीडर के रूप में ‘‘ए.एस.आई. इसरो मेरिट अवार्ड २०१२’’ तथा ‘‘इसरो टीम अवार्ड २०१२’’। अपने संस्मरणों में वे बताती हैं कि जब उन्होंने पहली बार नील आर्मस्ट्रांग को चन्द्र सतह पर चलते हुए देखा तो वे बहुत प्रभावित हुईं तथा उन्होंने एक अन्तरिक्ष वैज्ञानिक बनने का मन बना लिया। उनकी यह यात्रा बताती है कि हमें अपने अन्दर के बच्चे को कभी भी मरने नहीं देना चाहिए तथा इसमें तब तक लगे रहना चाहिए जब तक कि हमारा सपना साकार न हो जाये। अनुराधा इस बात को भी मानती हैं कि मेरे पति और ससुराल वाले हमेशा मददगार बने इसलिए घर और बच्चों के बारे में ज्यादा परवाह किये बिना मैं अपने कार्य पर केन्द्रित हो सकी।

मौमिता दत्ता

मौमिता दत्ता ने एम.टेक। की डिग्री कोलकाता विश्वविद्यालय सेे अप्लाईड फिजिक्स में प्राप्त की तथा उसके बाद उन्होंने इसरो के मंगलयान मिशन में नीत भार परियोजना मैनेजर के रूप में काम किया। अपने संस्मरणों को याद करते हुए वे कहती हैं कि एक दिन अपने शहर कोलकाता में आनन्द बाजार पत्रिका में भारत की प्रथम चन्द्र प्रोब चन्द्रयान-१ के विषय में पढ़ रहीं थी। पढ़ने के बाद उन्होंने सोचा कि, ‘‘कितने भाग्यवान वे लोग है। जो इस मिशन का एक हिस्सा बने।’’ समय गुजरता गया तथा एक दिन दत्ता इसरो की एक उच्च वैज्ञानिक बन गई तथा उस टीम का एक हिस्सा बनी जिसने भारत के विख्यात मंगल ग्रह आरबिटर मिशन में काम किया। वे भारत के द्वितीय चन्द्र मिशन चन्द्रयान-२ में भी काम कर रही हैं।
मौमिता दत्ता ने वर्ष २००६ में इसरो के अन्तरिक्ष उपयोग केन्द्र, अहमदाबाद में ज्वाइन किया तब से वे इसरो की विशिष्ट परियोजनाओं जैसे मार्स आरबिटर मिशन, चन्द्रयान-१, ओसेनसैट, रिसोर्ससैट और हाइसैट में व्यस्त रही हैं। उनका चयन मंगल ग्रह मिशन के मीथेन संवदेक के परियोजना मैनेजर के रूप में किया गया था तथा वे इसमें प्रकाशिकी तंत्र के विकास और संवेदक के निरूपण (कैरेक्टेराइजेशन) और कैलीब्रेशन के लिए उत्तरदायी थीं। वे इसरो की विभिन्न परियोजनाओं-बहु स्पेक्ट्रमी नीतभार और स्पेस्ट्रोमीटर के विकास के लिए उत्तरदायी है। उनके अनुसंधान क्षेत्र में गैस संवेदकों का सूक्ष्मीकरण शामिल हैं जिसमें प्रकाशिकी क्षेत्र की स्टेट-ऑफ-आर्ट तकनीकी शामिल है।

कृति फौज़दार

कृति फौज़दार भी इसरो की एक महिला वैज्ञानिक हैं तथा उनका मानना है कि इसरो महिलाओं के लिए काम करने का एक बहुत अच्छा स्थान है। यह दूसरी बात है कि इनकी संख्या बहुत कम है। वे बिहार के वैशाली स्थान की रहने वाली हैं जहाँ पर उनका लालन पालन हुआ और वे बड़ी हुईं। वे कहती हैं, ‘‘यह बहुत ही अच्छा स्थान है जहाँ पर मैं रही हूँ। यह वास्तव में आश्चर्यजनक है। यह जैन धर्म की जन्म स्थली तथा गौतम बुद्ध की कर्म स्थली है तथा यहाँ आकर मन को शान्ति मिलती है।’’ लेकिन अब कृति फौजदार अपने घर से २५०० कि.मी। दूर प्रधान नियंत्रण सुविधा (एमसीएफ) हासन (कर्नाटक) में पिछले तीन वर्षाें से वैज्ञानिक/इंजीनियर के रूप में काम कर रही हैं। २६ वर्षीय कृति बड़े आत्म विश्वास से कहती हैं कि उन्हें भारत की अन्तरिक्ष संस्था में काम करते हुए बड़ा गर्व महसूस होता है। एम.सी.एफ। हासन, जहाँ पर वे काम कर रही हैं, वह दो सुविधाओं (दूसरी सुविधा भोपाल में है) में से एक है जिसे इसरो ने इन्सैट, जी सैट तथा भारतीय रीजनल नेविगेशन उपग्रह तंत्र (आई.आर.एन.एस.एस.) के मॉनीटरन के लिए बनाया है। इस प्रकार के उपग्रह पृथ्वी से ३६००० कि.मी। की दूरी से पृथ्वी का चक्कर लगाते हैं। वे पृथ्वी के प्रचक्रण के साथ समकालिक रूप से घूमते हैं जिससे वे पृथ्वी के किसी बिन्दु से देखने पर स्थिर दिखाई देते हैं। कीर्ति और उनकी एम.सी.एफ। टीम को यह सुनिश्चित करना होता है कि उपग्रह स्वस्थ रहें तथा सूर्य और चन्द्रमा के गुरूत्व बलों से बाधित न हों। इसके लिए यह टीम उपग्रहों के रात दिन संचित किये गये आंकड़ों का अध्ययन करती है। उन्होंने मंगलयान मिशन में भी काम किया। 
कृति ने वैशाली में अपनी पढ़ाई ५ वीं कक्षा तक की। उसके बाद की पढ़ाई उन्हांेने सरस्वती मंदिर भोपाल में की। उसके बाद कीर्ति ने मध्य प्रदेश के एक स्कूल में कम्प्यूटर विज्ञान की पढ़ाई की तथा एक आई.टी। कम्पनी में उनका चयन हो गया लेकिन ज्वाइनिंग काफी बाद में होनी थी। इसी बीच कृति को अपने एक मित्र के द्वारा इसरो में भर्ती की सूचना प्राप्त हुई। कृति ने आवेदन किया और उनका चयन हो गया। कृति ने ज्वाइन कर लिया तथा देखा कि वहाँ पर उनकी उम्र की एक ही महिला थी लेकिन कृति अपना अनुभव बताती हैं कि ‘‘बाद में मैंने महसूस किया कि वरिष्ठ महिलाएँ बहुत अच्छी थीं तथा दोस्त बनाने के लिए उम्र कोई गणक नहीं था। सभी लोग बहुत अच्छे थे।’’ इसरो में काम करना कोई पार्क में घूमने की तरह नहीं है। यहाँ पर उपग्रहों और मिशनों का मॉनीटरन रात दिन शिफ्टों में किया जाता है। कृति कहती हैं, ‘‘राकेट प्रमोचन को मेरा परिवार टेलीविजन पर लाइव देखता है।’’ वर्तमान में भारतीय नेविगेशन तंत्र के ७ उपग्रहों का मॉनीटरन कृति और उनके सहयोगियों के द्वारा किया जा रहा है।

एन.वालरमथी

एन.वालारमथी इसरो की एक वैज्ञानिक हैं तथा वे भारत के पहले स्वदेश विकसित रेडार प्रतिबिम्बन उपग्रह रिसैट-१ की परियोजना निदेशक हैं। वह पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के सम्मान में तमिलनाडु सरकार द्वारा २०१५ में स्थापित अब्दुल कलाम पुरस्कार प्राप्त करने वाली पहली व्यक्ति हैं। उनका जन्म तमिलनाडु के अलियुर स्थान पर हुआ और निर्मला लड़कियों के उच्चतर माध्यमिक स्कूल से उन्होंने शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री सरकारी तकनीकी कॉलेज कोयम्बटूर से प्राप्त की और परास्नातक (पोस्टग्रेजुएट) डिग्री इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार में अन्ना विश्वविद्यालय से प्राप्त की। वे इसरो के साथ १९८४ से बहुत सी परियोजनाओं में काम कर रही हैं जैसे ईन्सैट-२ए, आई.आर.एस.आई.डी., टी.ई.एस। में शामिल रही हैं। वह भारत के पहले स्वदेश विकसित रेडार प्रतिविम्बन उपग्रह रिसैट-१ की परियोजना निदेशक थी जो सफलतापूर्वक २०१२ में प्रमोचित किया गया था। भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन में वह टी.के.अनुराधा, परियोजना निदेशक जी सैट-१२ के बाद किसी परियोजना का निर्देशन करने वाली दूसरी महिला हैं।

बी.कोडान्यागुई

बी.कोडान्यागुई सतीश धवन अन्तरिक्ष केन्द्र श्रीहरिकोटा में ग्रुप हेड हैं। एक विद्यार्थी के तौर पर उन्होने इसरो के एप्पल उपग्रह और प्रारंभिक राकेट उपग्रह प्रमोचन के विषय में सुना था। बाद में इंजीनियरिंग ग्रेजुएट बनने के बाद १९८४ में उन्होंने इसरो ज्वाइन किया। इसरो के विषय में अनेक चीजें सुनने के बाद उनकी प्रबल इच्छा थी कि वे भारत की प्रमुख अन्तरिक्ष संस्था को ज्वाइन करें। इसलिए कोयम्बटूर के सरकारी तकनीकी कॉलेज से इलेक्ट्रॉनिकी और संचार शाखा में ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद उन्होंने १९८४ में इसरो संस्था को ज्वाइन किया। उन्होंने इसरो में अनेकों जटिल अंतरिक्ष अभियानों में काम किया है जैसे सवंर्द्धित उपग्रह प्रमोचन वेहिकल, जिसमें उन्होंने अनेक उपकरणों का अंशांकन (कैलीब्रेशन) किया जिनके द्वारा जटिल राकेटों में परिशुद्ध तरीके से इंर्धन मात्रा भरी जा सकती है। इसके अलावा वे एक एक्सपैन्डिग प्रयोगशाला का भी हिस्सा थी जिसमें राकेटों के उपकरणों, प्रज्ज्वलकों तथा अन्य उपकरणों की जाँच की जाती है। वे अपने अनुभव के विषय में बताती हैं, ‘‘हमने खतरनाक रसायनों की लघु मात्रा से काम किया जो ठोस राकेट मोटर के लिए ईंधन बनाते हैं लेकिन अब हम इन रसायनों की सैकड़ों टन की मात्रा को हैन्डल करते हैं। हम इन मोटरों पर ग्राउन्ड टेस्ट भी करते हैं तथा अपने उपकरणों के द्वारा यह सुनिश्चित करते हैं राकेटों में बिलकुल सही मात्रा में ईंधन भरा गया है। हम उन उपकरणों का भी अंशांकन करते है जिनके द्वारा पुनः प्रयोज्यीय वेहिकल (आर.एल.वी.) में ईंधन भरा जाता है।’’ कुशल कार्यकर्ता के रूप में जिसने अपना जीवन इसरो को समर्पित कर दिया है, कोन्डान्यागुई का कहना है कि उन्हें इसरो में किसी भी प्रकार की लिंग भेद समस्या कभी नही आई। ‘‘यहाँ पर हम सभी लोगों के साथ एक समान व्यवहार किया जाता है तथा यही कारण है कि हमें यहाँ काम करने में गर्व महसूस होता है। एक और खास बात यह है कि यहाँ पर काम करने का तरीका विशिष्ट है तथा अपने विचारों को प्रकट करने की पूरी स्वतंत्रता है।’’

इसरो की अन्य वैज्ञानिक महिलाएँ

इलेक्ट्रॉनिक्स एवं संचार में बी.टेक। डिग्री प्राप्त मिनाल रोहित ने १९९९ में इसरो के बेंगलूर केन्द्र में कार्यभार ज्वाइन किया तथा २००४ में वे इसरो के अहमदाबाद स्थित अन्तरिक्ष उपयोग केन्द्र (सैक) आ गईं जहाँ पर उन्हें इसरो के वर्तमान चेयरमैन एस। किरन कुमार के साथ कार्य करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यद्यपि वे अपना कैरियर मेडिसिन अथवा इंजीनियरिंग में बनाना चाहती थी लेकिन एक अंक से वे डेन्टल कोर्स में पिछड़ गई थी। वर्तमान में वे इन्सैट-३ डी एस और चन्द्रयान-प्प् मिशनों में काम कर रही हैं। विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र की उपनिदेशक वी.आर। ललिथाम्बिका का एक उज्ज्वल बैकग्राउन्ड है। कन्ट्रोल सिस्टम में मास्टर डिग्री प्राप्त ललिथाम्बिका ने १९८८ में वी.एस.एस.सी। में ज्वाइन किया तथा वर्तमान में वे कन्ट्रोल, गाइडेन्स और एक साथ एन्टिटी तंत्र की प्रधान हैं। उन्हें अनेक अवार्डाें से सम्मानित किया जा चुका है। उनका ग्रुप सभी राकेटों में ईंधन के अनुकूलन (आप्टिमाइजेशन) पर काम करता है। हाल में पी.एस.एल.वी.-सी ३७ राकेट की उड़ान से १०४ उपग्रहों के प्रमोचन का विश्व रिकार्ड उनकी टीम का सबसे अधिक चुनौती पूर्ण कार्य था। एस.सीथा इसरो की महिला वैज्ञानिकों में एक अन्य नाम है। उन्होंने इसरो उपग्रह केन्द्र के तकनीकी भौतिकी विभाग में ज्वाइन किया। उन्होंने आई.आई.टी., चैन्नै से इलेक्ट्रॉनिक्स में मास्टर डिग्री तथा आई.आई.एस.सी। बैंगलूर से खगोलिकी में पी.एचडी डिग्री प्राप्त की। वर्तमान में वे इसरो के मिशनों चन्द्रयान-प्प् और आदित्य पर काम कर रही हैं। उनका मानना है कि विभिन्न उपग्रहों के लिए वैज्ञानिक नीतभारों का इसरो में विकसित करने का कार्य मेरे लिए काफी रोमांचक रहा है।

इसरो की दो महिलाएँ-जयश्री और जी। मंगलन, जिन्होंने हालिया १०४ उपग्रह मिशन को सफल बनाया

१५ फरवरी २०१७ को इसरो ने एक साथ १०४ उपग्रह प्रमोचित किये थे लेकिन प्रमोचन के ६० दिन पहले अमरीका की एक डील के कारण इस मिशन में एक समस्या आ गई थी। लेकिन उस मुश्किल समय में इसरो की दो महिला वैज्ञानिकों की टीम ने इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया तथा उनकी वजह से यह मिशन सफल रहा। 
वास्तव में इसरो के वैज्ञानिक १०४ उपग्रहों के प्रमोचन करने की तैयारी में जुटे थे। इसमें अमरीका के दो बड़े उपग्रह भी थे तथा इन उपग्रहों के आधार पर उपकरण बे बनाई गई थी। दिसम्बर २०१६ में अमरीका ने यह समझौता रद्द कर दिया। अब समस्या यह थी कि उपकरण बे में जो जगह बनाई गई थी, वहाँ पर क्या फिट किया जाये। प्रमोचन में मात्र ६० दिन ही बाकी थे जो एक नये उपग्रह को बनाने में बेहद कम था। दूसरी ओर मिशन टालना भी मुश्किल था। ऐसे समय में इसरो की दो वैज्ञानिक महिलाओं - जी। मंगलन और जयश्री जना भट्टाचार्य ने बताया कि ‘‘हमने नया उपग्रह बनाना ही तय किया। हर दिन २२ घण्टे काम किया। रिकार्ड डेढ़ महीने में टास्क पूरा कर दिखाया। यद्यपि मिशन सफल होने तक डर बना रहा कि जल्दबाजी में कोई चूक न हो गई हो।’’ जी। मंगलन ने बताया, ‘‘उपग्रह तो बन गये लेकिन प्रमोचन में कुछ ही दिन का समय बचा था तथा गुणवत्ता जाँच का काम अभी बाकी था। यह काम मेरे पास था। इतने समय में हर उपग्रह के उपकरण, सॉफ्टवेयर, सेटिंग की जाँच करना काफी मुश्किल काम था। एक चूक इसरो की पूरी कोशिश एक पल में बेकार कर सकती थी। जब आप इतिहास रचने वाले हों, तब कभी नहीं चाहेंगे कि आपके कारण कोई गड़बड़ी हो। ऐसे मौको पर कई दिन तक भूख नहीं लगी। सोते समय भी दिमाग में मिशन ही चलता था। आखिर के ७ दिनों में टीम के कई सदस्य तीन दिन घर नहीं गये। मिशन ऐतिहासिक रहा लेकिन मंगलयान मिशन के प्रमोचन को मैं कभी नहीं भूल सकती थी। उस समय मैं सतीश धवन अन्तरिक्ष केन्द्र में उपग्रह अनुवर्तन टीम की हेड थी।’’
जयश्री बताती हैं कि, ‘‘१५ फरवरी २०१७ को इसरो केन्द्र में सन्नाटा छाया हुआ था। टै्रकिंग-पोजीशन की घोषणा हुई-सभी उपग्रह निर्धारित समय पर। मिशन सफल होते ही मैं रोने लगी। बीते दो महीने बहुत मुश्किल से गुजरे।’’ जयश्री ने आगे बताया, ‘‘जब मंगल यान को सूर्य की कक्षा में डाला गया तो सबसे कठिन चरण था। यान सूर्य की कक्षा की ओर जैसे जैसे बढ़ता, साँसे भी भारी होती जाती थी। २३ मिनट तक यही स्थिति रही। हम यान को कमान्ड भेजते और हर बार जवाब आने में कुछ समय लगता। जब तक जवाब नहीं मिलता, अनहोनी का डर बना रहता। जब परियोजना निदेशक एस.अरूणन ने कहा कि हम सफल हुए, तब हमें राहत मिली। इसरो में महिला होने पर कोई प्रिविलेज नहीं मिलता। सबको एक तरह का ट्रीटमेन्ट।’’ मंगल बताती हैं कि, ‘‘मैं डाक्टर बनना चाहती थी लेकिन अच्छे नम्बर नहीं आये। इसलिए बी.एस.सी। और फिर एम.एससी। और आई.आई.एस.सी., बेंगलूर से एम.टेक। किया। तब तक नहीं सोचा था कि इसरो में वैज्ञानिक बनूँगी। एक दिन पला चला कि इसरो में वैकेन्सी है। मैंने फार्म भर दिया। चयन भी हो गया। जिस समय मैंने इसरो ज्वाइन किया, उस समय इतनी महिलाएँ यहाँ नहीं थी, लेकिन अभी कुल कर्मचारियों में लगभग २५: महिलाएँ हैं।’’ जयश्री कहती हैं, ‘‘मुझे बचपन से ही चाँद-तारे और अन्तरिक्ष के प्रति लगाव था लेकिन इसरो में वैज्ञानिक बनने का सपना नहीं देखा था। सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रही थी। उसी समय इसरो का फार्म भर दिया। नियुक्ति के बाद मेरी पहली ड्यूटी सतीश धवन अन्तरिक्ष केन्द्र के मिशन नियंत्रण केन्द्र में मिली थी।’’ इसरो में वर्तमान में ४००० वैज्ञानिक महिलाएँ हैं। सभी का जीवन बेहद नये तुले समय प्रबन्धन से चलता है-उपग्रह की तरह। दुगुना मेहनत करनी पड़ती है। ये ऐतिहासिक मिशन को सफल बनाती हैं तथा साथ-साथ अपना घर भी संभालती हैं। अन्त में इस लेख का समापन इस कविता के साथ किया जाता है, 


यूँ तो अंतरिक्ष को छूना एक प्रसिद्ध कहावत है।
लेकिन कुछ महिलाओं द्वारा मेहनत द्वारा चाहत है।
कठिन परिश्रम ही जीवन को सुखमय कर देता है।
महिलाओं ने करके दिखाया जीवन सच यह कहता है।

 

ksshukla@hotmail.com