विज्ञान

(19/Apr/2017)

हरित क्रांति और मृदा स्वास्थ्य


डॉ. दिनेश मणि

इस तथ्य में कोई सन्देह नहीं कि हरित-क्रान्ति के दौरान देश में खाद्यान्न उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई तथा अन्न की कमी से उबरने में सहायता मिली। परन्तु यह भी सच है कि निरन्तर सघन खेती अपनाने रासायनिक उर्वरकों पर अति निर्भरता तथा कार्बनिक खादों की सतत उपेक्षा के कारण मृदा की उर्वरा शक्ति व कार्बनिक अंश में कमी आ गई तथा मृदा की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के बावजूद फसल की उत्पादकता में कमी देखी जा रही है। अतः हमें अपनी वर्तमान कृषि प्रणाली में परिवर्तन की आवश्यकता है। कृषि उत्पादन की एक टिकाऊ व्यवस्था बनाए रखने के लिए रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करते हुए पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की आपूर्ति के अन्य विकल्पों को पोषक तत्व प्रबंधन में सम्मिलित करने की आवश्यकता है। अतः रासायनिक उर्वरकों के अतिरिक्त कार्बनिक स्रोत के माध्यम से पोषक तत्व आपूर्ति एक उचित विकल्प है। पोषक तत्वों के संतुलित प्रयोग के अलावा रासायनिक व कार्बनिक/जैविक स्रोतों का समन्वित प्रयोग व उनकी उपयोग क्षमता में वृद्धि द्वारा ही हम टिकाऊ कृषि की ओर अग्रसर हो सकते हैं। इस समय देश में 14.20 करोड़ हेक्टेअर क्षेत्र में खेती की जा रही है। यह भूमि भी धीरे-धीरे कम होती जा रही है। अनुमान है कि वर्ष 2025 में भारत की आबादी 150 करोड़ हो जाएगी, तब वर्तमान उत्पादकता के आधार पर खाद्यान्न की जरूरतें पूरी करनी है, तो उसे 2025 तक कम से कम 3 करोड़ टन नाइट्रोजन, फॉस्फोरस तथा पोटाश की जरूरत पड़ेगी। यह उर्वरक भी तभी पर्याप्त होगा जब जैव-उर्वरक और गोबर की खाद का पर्याप्त उपयोग किया जाए और यह सर्वत्र सामान्य रूप से उपलब्ध हो। अभी रासायनिक उर्वरकों के मामले में भारी असंतुलन है। जहाँ पंजाब में 167 किलोग्राम उर्वरक प्रति हेक्टेअर इस्तेमाल किया जाता है, वहीं असम में इसका सिर्फ 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेअर ही है।
    सघन खेती वाले क्षेत्रों में मृदा की उर्वरा शक्ति में कमी परिलक्षित हो रही है। एक अनुमान के अनुसार मृदा के 340 लाख टन प्रतिवर्ष प्रमुख पोषक तत्वों- नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटाश का दोहन होता है और उर्वरकों के माध्यम से केवल 260 लाख टन की आपूर्ति हो पाती है। इस प्रकार 80 लाख टन पोषक तत्वों की कमी प्रतिवर्ष हो रही है। इस कारण मृदा की उर्वरता लगातार घट रही है। मृदा से पोषक तत्वों के लगातार दोहन के साथ-साथ अपर्याप्त व असंतुलित उर्वरक उपयोग के परिणामस्वरूप गौण व सूक्ष्मपोषक तत्वों की कमी आई है। वर्तमान में भारतीय मृदाओं में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, सल्फर, जिंक और बोरॉन की कमी क्रमशः 79ए 80ए 50ए 40ए 48 और 33 प्रतिशत है जिसके कारण मृदा स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। अधिक उपज देने वाली फसलों और संकरों के प्रचलन के बाद अधिक पैदावार लेने के लिए प्रतिस्पर्धा ऐसी बढ़ी कि हमारा ध्यान इस बात की ओर गया ही नहीं कि यह प्रणाली कब तक चल पायेगी। इसी का नतीजा है कि ये सारी प्रणालियाँ जवाब दे चुकी हैं और उत्पादकता के स्तर को घटाने वाली नई-नई समस्याएं उभरने लगी हैं। इस तरह की कुछ समस्याएँ हैं- पोषक तत्वों की दक्षता में कमी, मिट्टी में अनेक पोषक तत्वों का असंतुलन, मिट्टी के भौतिक, रासायनिक गुणों में प्रतिकूल परिवर्तन, पानी का दुरूपयोग, मिट्टी और पानी का प्रदूषण और कीटव्याधिक रोगों व खरपतवारों की सांठगांठ। इन समस्याओं से निपटने के लिए जहाँ हम एक ओर फसलों की सघनता का ध्यान रख रहे हैं, वहीं देश के विभिन्न भागों के लिए फलदार फसलों को शामिल करते हुए ऐसी फसल प्रणालियाँ विकसित करने लगे हैं जो हर हाल में टिकाऊ साबित हो। अधिक मूल्य वाली फसलों में चुने गये फसल-चक्रों में मुख्य रूप से सूरजमुखी, सोयाबीन, मूँगफली, सरसों और बासमती धान इत्यादि शामिल किए गये हैं। इसी तरह कृषि की उत्पादकता और टिकाऊपन को ध्यान में रखते हुए समेकित पोषक प्रबंध और समेकित कीट प्रबंध की तकनीकों का अधिकाधिक प्रचलन किया जा रहा है। पानी की बचत के लिए कृषि में प्लास्टिक के उपयोग द्वारा छिड़काव एवं रिसाव सिंचाई प्रणाली के उपयोग की संभावनाओं पर भी हम विशेष ध्यान दे रहे हैं।
    सघन कृषि प्रणालियों के कारण मौलिक संसाधनों का अंधाधुंध इस्तेमाल हुआ है और मिट्टी में फसल के अवशेष शायद ही छोड़े जाते हैं। इस तरह मिट्टी में जीवांश की कमी होने से उसकी उपजाऊ शक्ति दिनोंदिन घटती जा रही है। इसी का नतीजा है कि गेहूँ-धान, धान-धान इत्यादि मुख्य फसल आधारित चक्रों में उपज का स्तर एक सीमा तक बढ़ने के बाद अब ठहराव पर पहुँच गया है। दीर्घकालीन उर्वरता परीक्षणों से भी यह सिद्ध हुआ है कि अकार्बनिक खादों के साथ-साथ कार्बनिक खादों का उपयोग करने पर भी मिट्टी की उर्वरता को टिकाऊ स्तर पर बनाए रखा जा सकता है। चीन में गेहूँ-धान फसल चक्र में पिछले एक सौ साल से ज्यादा समय से उत्पादकता का ऊँचा स्तर बनाए रखने में इसीलिए सफलता मिल पाई, क्योंकि वहाँ नाइट्रोजन की आवश्यकता की पूर्ति के लिए 50 प्रतिशत से अधिक नाइट्रोजन कार्बनिक स्रोत से प्राप्त की गई। इसी फसल प्रणाली में हमारे यहाँ रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग ने तीन दशकों में ही ठहराव की स्थिति उत्पन्न कर दी। इससे समेकित पोषक तत्व प्रबंध के महत्व का पता लगता है।
    अधिक उपज देने वाली फसलों और संकरों के प्रचलन के बाद अधिक पैदावार लेने के लिए प्रतिस्पर्धा ऐसी बढ़ी कि हमारा ध्यान इस बात की ओर गया ही नहीं कि यह प्रणाली कब तक चल पायेगी। इसी का नतीजा है कि ये सारी प्रणालियाँ जवाब दे चुकी हैं और उत्पादकता के स्तर को घटाने वाली नई-नई समस्याएँ उभरने लगी हैं। इस तरह की कुछ समस्याएँ हैं- पोषक तत्वों की दक्षता में कमी, मिट्टी में अनेक पोषक तत्वों का असंतुलन, मिट्टी के भौतिक, रासायनिक गुणों में प्रतिकूल परिवर्तन, पानी का दुरूपयोग, मिट्टी और पानी का प्रदूषण और कीटव्याधिक रोगों व खरपतवारों की सांठगांठ। इन समस्याओं से निपटने के लिए जहाँ हम एक ओर फसलों की सघनता का ध्यान रख रहे हैं, वहीं देश के विभिन्न भागों के लिए फलदार फसलों को शामिल करते हुए ऐसी फसल प्रणालियाँ विकसित करने लगे हैं जो हर हाल में टिकाऊ साबित हो। अधिक मूल्य वाली फसलों में चुने गये फसल-चक्रों में मुख्य रूप से सूरजमुखी, सोयाबीन, मूँगफली, सरसों और बासमती धान इत्यादि शामिल किए गये हैं। इसी तरह कृषि की उत्पादकता और टिकाऊपन को ध्यान में रखते हुए समेकित पोषक प्रबंध और समेकित कीट प्रबंध की तकनीकों का अधिकाधिक प्रचलन किया जा रहा है। पानी की बचत के लिए कृषि में प्लास्टिक के उपयोग द्वारा छिड़काव एवं रिसाव सिंचाई प्रणाली के उपयोग की संभावनाओं पर भी हम विशेष ध्यान दे रहे हैं।
    मानव समाज की जरूरत केवल अनाज तक ही सीमित नहीं है। हमें आवास के लिए भूमि चाहिए, पशुओं के लिए चारा चाहिए, ईधन आदि की जरूरत भी है। इमारती लकड़ी आदि की जरूरत भी है और इसी प्रकार विविध कृषि कार्यों के लिए लकड़ी चाहिए। कहने का मतलब यह है कि कृषि क्षेत्रफल में और वृद्धि करना असम्भव है। इससे एकमात्र दो हल हो सकते हैं। पहला, खाद्यान्न फसलों की उत्पादकता बढ़ाकर अधिक पैदावार लेना और दूसरा हल है, विभिन्न राज्यों में लाखों हेक्टेअर बेकार बंजर/ऊसर भूमि को उपजाऊ बनाकर अनाज पैदा करना।
    साधनों की उपयोग की दृष्टि से हमारी यह शताब्दी एक अपव्ययी शताब्दी रही हैं जनसंख्या की तीव्रवृद्धि के साथ-साथ पृथ्वी के साधन स्रोतों का उपयोग, जिस तीव्रगति से हुआ है, विश्व के ज्ञात इतिहास में उसका कोई मुकाबला नहीं है। मृदा इसका अपवाद नहीं है। इसका भी भरपूर दोहन किया गया है। आहार की खोज में पृष्ठ मृदा, (जिसमें मानव आहार हेतु अन्न, पशु आहार हेतु चारे और वस्त्र हेतु रेशों के उत्पादन के लिये सारी आवश्यक उर्वरता निहित होती है) का उपयोग पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसे ढंग से किया जाता रहा है, जो पोषक संरक्षण या अनिवार्य उर्वरता के अनुरक्षण की दृष्टि से अत्यन्त हानिकारक है। इससे मानव के समक्ष विशेषकर विश्व के घनी आबादी वाले इलाकों जैसे भारत के सामने एक कठिन स्थिति पैदा हो गयी है, क्योंकि ऐसे इलाकों में खाद्य अभाव और बढ़ती हुयी जनसंख्या की समस्याओं से हर आदमी विचलित है। जहाँ तक उर्वरता का प्रश्न है, मृदा एक ऐसा प्राकृतिक साधन स्रोत है, जिसका नवीनीकरण स्वतः होता रहता है। लेकिन मृदा के अत्यधिक उपयोग और दृरूपयोग से मानव ने इस प्राकृतिक सन्तुलन को बिगाड़ दिया है। मानव ने जितना कुछ मृदा से प्राप्त किया है उतना निष्ठापूर्वक पोषक तत्वों के रूप में मृदा को लौटाया नहीं है। मृदा के बारे में हमारी मूलभूत या बुनियादी जानकारी तीव्र दर से बढ़ी है, लेकिन मृदा प्रबन्ध की कुशलता किसानों में बहुत मन्द गति से आ रही है जिसके कारण मृदा उर्वरता में तीव्र गिरावट आयी है एवं प्रति एकड़ उपज में कमी हो गयी है और भारत में विशेषकर पिछले कुछ दशकों में कृषि उत्पादन पर्याप्त नहीं हो पाया है।
    तेजी से पैदावार बढ़ाने के चक्कर में भूमि से जितना पोषक तत्व लिया गया है, उतना वापस नहीं लौटाया गया है। यही वजह है कि आज हमारे देश के खेत की मिट्टी में करीब 5 लाख टन सल्फर की कमी है, जो 2025 तक 20 लाख टन हो जाएगी। उस समय मिट्टी को पर्याप्त उपजाऊ कहलाने के लिए 324 हजार टन जिंक, 30 हजार टन लोहा, 11 हजार टन ताँबा, 22 हजार टन मैंगनीज और 4 हजार बोरोन की जरूरत होगी। जैव उर्वरक, कम्पोस्ट गोबर की खाद तथा फसलों के क्रम के सही चुनाव कुछ ऐसे तरीके हैं, जिनसे रासायनिक उर्वरकों की मात्रा को नियंत्रित किया जा सकता है।
    एक अनुमान के अनुसार 2035 तक कृषि योग्य भूमि की उपलब्धता 0.80 हेक्टेअर प्रति व्यक्ति रह जाने की संभावना है। अतः बढ़ती हुई जनसंख्या की माँगों को पूरा करने के लिए यह आवश्यक है कि मृदा क्षरण को रोका जाए तथा बेकार बंजर, ऊसर, क्षारीय अम्लीय तथा निम्नीकृत मृदाओं को सुधारा जाए। मृदा वैज्ञानिकों के अनुसार देश की आधी से ज्यादा खेती योग्य जमीन किसी न किसी समस्या से ग्रस्त है। यह अनुमान नागपुर में स्थित राष्ट्रीय भूमि उपयोग और नियोजन ब्यूरो ने लगाया है। इस केन्द्र में उपग्रह चित्रों की मदद से भारत के सभी राज्यों की मिट्टियों के नक्शे बनाए गए हैं। अनुमान है कि देश की कोई 013 करोड़ हेक्टेअर जमीन बंजर हो चुकी है। इन जमीनों को उपजाऊ बनाकर खेती लायक बनाने की तकनीकें मौजूद हैं, पर मुश्किल से 40 लाख हेक्टेअर जमीन ही सुधारी गई हैं।
    मृदा उर्वरता, मुख्य और गौण आवश्यक-पोषक तत्वों की पृष्ठ मृदा के अन्तर्गत पर्याप्त मात्रा और सुलभ रूप में उपस्थिति का परिणाम होती है। इसके अलावा मृदा में जैव पदार्थों का भी बड़ा महत्व है, इससे मृदा को भौतिक और सूक्ष्म जैविक लाभ मिलते हैं, क्योंकि जैव पदार्थ की पर्याप्त मात्रा मृदा को एक जीवित या सक्रिय पिंड बनाये रखती है। इस लिये इन मृदा उर्वरता तत्वों की मृदा में मौजूदा स्थिति क्या है, ये मृदा में कैसे घटते बढ़ते हैं और इनको किन रूपों और स्तरों पर किन साधनों से अनुरक्षित किया जाता है जिससे इनके दीर्घकालीन उपयोग से फसलोत्पादन अधिक हो सके, मृदा उर्वरता से संबंधित किसी भी चर्चा से पूर्व इन सभी पक्षों पर विचार करना आवश्यक होगा और इन सब पक्षों की सामान्य जानकारी से यह बुनियादी जानकारी हो जायेगी कि व्यावहारिक रूप से मृदा उर्वरता का अनुरक्षण कैसे किया जाये या जहाँ इसकी क्षति हुयी है वहाँ इसको कैसे बढ़ाया जाये। इस समस्याओं पर विशेष रूप से भारतीय दशाओं और स्थितियों के परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाना है।
    मृदा जीवन का मूल आधार है, इससे लोगों को भोजन, वस्त्र और आश्रय तथा पशुओं के लिए चारा प्राप्त होता है। मानव को सारे खाद्य पदार्थ-सब्जियाँ, अनाज, दूध, अंडा, माँस या फल आदि, पहनने के लिये ऊनी सूती और रेशमी वस्त्र तथा पशुओं को खिलाने के लिए सभी प्रकार के चारे मृदा द्वारा दी गयी उर्वरता से प्राप्त होते हैं। इस प्रकार मृदा उर्वरता सम्पूर्ण मानव अस्तित्व का आधार है। वस्तुतः मृदा उर्वरता पृथ्वी के संपूर्ण प्राणियों का और पूरे विश्व की सभ्यता का आधार है। गाँव और नगरों के रहने वाले लोग अर्थात् सम्पूर्ण राष्ट्रजन अपनी मृदा और उसकी उर्वरता के साझीदार होते हैं। मृदा की उर्वरता को उच्चस्तर पर एवं उत्पादक बनाये रखना आवश्यक है। अन्यथा जीवन का आधार समाप्त हो जायेगा और हमारी सभ्यता नष्ट हो जाएगी। अनुर्वर भूमियों पर रहने वाले लोग प्रायः अस्वस्थ और अभावग्रस्त होते हैं, जबकि उर्वर और उपजाऊ भूमियों पर रहने वाले लोग प्रायः स्वस्थ और समृद्ध होते हैं। इस तरह मानव जाति का निर्माण भूमि से ही हुआ है। मानव का जितना विकास हुआ है, वह उसकी भूमि की उर्वरता और उत्पादकता बनाये रखने के प्रयासों पर निर्भर करता है। मानव की हर विशिष्ट जाति का उद्भव किसी न किसी विशिष्ट मृदा पर ही हुआ है। फसलोत्पादन के प्रमुख माध्यम के रूप में मृदा मानव जाति के कल्याण की बुनियाद है। किसी देश की कृषि सम्बन्धी जटिल समस्याओं के अध्ययन में निःसन्देह मृदा उर्वरता के अध्ययन का सबसे अधिक महत्व है।
    मृदा उर्वरता से हमारा आशय मृदा की उस क्षमता से है, जिससे आर्थिक महत्व की फसलों का उत्पादन होता है। मृदा उर्वरता को मृदा उत्पादकता नहीं समझना चाहिए। मृदा उर्वरता मृदा की वह क्षमता है, जिससे फसलों की एक निश्चित पैदावार होती है और मृदा की उक्त क्षमता मृदा में निहित उन कारकों पर निर्भर करती है जो उसकी फसलोत्पादन क्षमता का निर्धारण करते हैं। ये कारक हैं- मृदा में आवश्यक पोषक तत्वों का संतुलित और सुलभ रूप में मौजूद रहना, पोषक तत्वों की निर्मुक्ति के लिये स्वस्थ वातावरण निर्माण हेतु मृदा का उचित सूक्ष्म जैविक स्तर बनाये रखना तथा मृदा की किसी विषैली या हानिकारक दशा या तत्वों से मुक्ति। इस प्रकार यह आवश्यक नहीं है कि कोई उर्वर मृदा उत्पादक भी हो, जैसे कोई जलाक्रान्ति या जलमग्न मृदा अधिक उपजाऊ होते हुए भी प्राकृतिक स्थिति प्रतिकूल रहने के कारण, अधिक उपज नहीं दे सकती है। इसी प्रकार उर्वर मृदा में लवण, क्षार या बोरोन लवण अधिक हो सकते हैं जो पादप वृद्धि के लिये विषैले होते हैं और मृदा की फसलोत्पादन क्षमता को सीमित करते हैं। इसके विपरीत किसी कम उर्वर रेतीली मृदा में आवश्यक मात्रा में उर्वरक और सिंचाई की व्यवस्था करके अधिक उपज ली जा सकती है। मृदा की फसलोत्पादन की उच्च क्षमता कुछ क्षेत्रों में किसी हानिकारक या विषैले तत्वों की अधिक मात्रा में उपस्थिति से घट सकती है। इन कारणों के अलावा कुछ ऐसे कारक भी हैं, जो एक प्रकार की दशाओं के अंतर्गत बहुत कुछ स्थिर अवस्था में रहते हैं, इन कारकों को मानव प्रयास द्वारा भी नहीं बदला जा सकता है। जहाँ इस प्रकार की मृदा विद्यमान है वहाँ उसके कारण मृदा प्रकार, प्रकृति और जलवायु है। मानव द्वारा नियंत्रित न किये जा सकने वाले मृदा कारकों में स्थलाकृति, मृदा गठन और मृदा परिच्छेदिका की गहराई आदि उल्लेखनीय है। इसी तरह तापमान, प्रकाश, तीव्रता, वाष्पन, पाला आदि जलवायु कारकों को भी मानवीय प्रयत्नों द्वारा नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। स्पष्टतया मृदा उर्वरता के अध्ययन में वही कारक महत्व के हैं जिनको मानवीय प्रयासों द्वारा नियन्त्रित किया जा सकता है और किसी विशिष्ट जलवायु दशा के अंतर्गत पायी जाने वाली किसी प्रदत्त मृदा में इन कारकों का उपयुक्त और अनुकूल नियन्त्रण फसलोत्पादन में अधिकतम उपज का निर्धारण करता है। मृदा में विद्यमान उर्वरता का सबसे अधिक लाभ उठाने के लिये इन कारकों का यथोचित अनुकूलन करने पर ही उत्तम मृदा प्रबंध की सफलता निर्भर करती है। संक्षेप में मृदा उर्वरता किसी मृदा की ऐसी संभावित क्षमता है, जिससे फसलोत्पादन होता है, जबकि मृदा उत्पादकता-मृदा प्रबंध को प्रभावित करने वाले कई कारणों का सामूहिक परिणाम होता है।
    किसी राष्ट्र की मृदा उर्वरता ही उस राष्ट्र की सबसे बहुमूल्य सम्पत्ति है, जिस भूमि में उर्वरता का स्तर ऊँचा हो वहाँ इसका अनुरक्षण किया जाना चाहिए, जहाँ मृदा उर्वरता कम हो वहाँ इसे बढ़ाया जाना चाहिए। मृदा उर्वरता दो प्रकार की होती है : स्थायी उर्वरता मृदा में स्वयं अंतर्निहित होती है और लगभग जन्मजात होती है जबकि अस्थायी उर्वरता उपयुक्त मृदा प्रबंध से उत्थान की जाती है, लेकिन मृदा में निहित स्थायी उर्वरता की मात्रा पर ही निर्भर करते हैं फिर भी हम यह जानते हैं कि स्थायी उर्वरता को मृदा प्रबन्ध की विधियों से बढ़ाया, बनाया या नष्ट किया जा सकता है, इस प्रकार मृदा के स्थायी उर्वरता स्तर की जानकारी और अस्थायी उर्वरता स्तर को अनुकूल बनाने के उपायों का ज्ञान ही उत्तम मृदा प्रबन्ध के लिये आवश्यक मूलभूत प्रौद्योगिकी है।
मृदा उर्वरता, मुख्य और गौण आवश्यक-पोषक तत्वों की पृष्ठ मृदा के अन्तर्गत पर्याप्त मात्रा और सुलभ रूप में उपस्थिति का परिणाम होती है। इसके अलावा मृदा में जैव पदार्थों का भी बड़ा महत्व है, इससे मृदा को भौतिक और सूक्ष्म जैविक लाभ मिलते हैं, क्योंकि जैव पदार्थ की पर्याप्त मात्रा मृदा को एक जीवित या सक्रिय पिंड बनाये रखती है। इस लिये इन मृदा उर्वरता तत्वों की मृदा में मौजूदा स्थिति कया है, ये मृदा में कैसे घटते बढ़ते हैं और इनको किन रूपों और स्तरों पर किन साधनों से अनुरक्षित किया जाता है जिससे इनके दीर्घकालीन उपयोग से फसलोत्पादन अधिक हो सके, मृदा उर्वरता से संबंधित किसी भी चर्चा से पूर्व इन सभी पक्षों पर विचार करना आवश्यक होगा और इन सब पक्षों की सामान्य जानकारी से यह बुनियादी जानकारी हो जायेगी कि व्यावहारिक रूप से मृदा उर्वरता का अनुरक्षण कैसे किया जाये या जहाँ इसकी क्षति हुयी है वहाँ इसको कैसे बढ़ाया जाये। इस समस्याओं पर विशेष रूप से भारतीय दशाओं और स्थितियों के परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाना है।
    मृदा जीवन का मूल आधार है, इससे लोगों को भोजन, वस्त्र और आश्रय तथा पशुओं के लिए चारा प्राप्त होता है। मानव को सारे खाद्य पदार्थ-सब्जियाँ, अनाज, दूध, अंडा, माँस या फल आदि, पहनने के लिये ऊनी सूती और रेशमी वस्त्र तथा पशुओं को खिलाने के लिए सभी प्रकार के चारे मृदा द्वारा दी गयी उर्वरता से प्राप्त होते हैं। इस प्रकार मृदा उर्वरता सम्पूर्ण मानव अस्तित्व का आधार है। वस्तुतः मृदा उर्वरता पृथ्वी के संपूर्ण प्राणियों का और पूरे विश्व की सभ्यता का आधार है। गाँव और नगरों के रहने वाले लोग अर्थात् सम्पूर्ण राष्ट्रजन अपनी मृदा और उसकी उर्वरता के साझीदार होते हैं। मृदा की उर्वरता को उच्चस्तर पर एवं उत्पादक बनाये रखना आवश्यक है। अन्यथा जीवन का आधार समाप्त हो जायेगा और हमारी सभ्यता नष्ट हो जाएगी। अनुर्वर भूमियों पर रहने वाले लोग प्रायः अस्वस्थ और अभावग्रस्त होते हैं, जबकि उर्वर और उपजाऊ भूमियों पर रहने वाले लोग प्रायः स्वस्थ और समृद्ध होते हैं। इस तरह मानव जाति का निर्माण भूमि से ही हुआ है। मानव का जितना विकास हुआ है, वह उसकी भूमि की उर्वरता और उत्पादकता बनाये रखने के प्रयासों पर निर्भर करता है। मानव की हर विशिष्ट जाति का उद्भव किसी न किसी विशिष्ट मृदा पर ही हुआ है। फसलोत्पादन के प्रमुख माध्यम के रूप में मृदा मानव जाति के कल्याण की बुनियाद है। किसी देश की कृषि सम्बन्धी जटिल समस्याओं के अध्ययन में निःसन्देह मृदा उर्वरता के अध्ययन का सबसे अधिक महत्व है।
    किसी राष्ट्र की मृदा उर्वरता ही उस राष्ट्र की सबसे बहुमूल्य सम्पत्ति है, जिस भूमि में उर्वरता का स्तर ऊँचा हो वहाँ इसका अनुरक्षण किया जाना चाहिए, जहाँ मृदा उर्वरता कम हो वहाँ इसे बढ़ाया जाना चाहिए। मृदा उर्वरता दो प्रकार की होती है : स्थायी उर्वरता मृदा में स्वयं अंतर्निहित होती है और लगभग जन्मजात होती है जबकि अस्थायी उर्वरता उपयुक्त मृदा प्रबंध से उत्थान की जाती है, लेकिन मृदा में निहित स्थायी उर्वरता की मात्रा पर ही निर्भर करते हैं फिर भी हम यह जानते हैं कि स्थायी उर्वरता को मृदा प्रबन्ध की विधियों से बढ़ाया, बनाया या नष्ट किया जा सकता है, इस प्रकार मृदा के स्थायी उर्वरता स्तर की जानकारी और अस्थायी उर्वरता स्तर को अनुकूल बनाने के उपायों का ज्ञान ही उत्तम मृदा प्रबन्ध के लिये आवश्यक मूलभूत प्रौद्योगिकी है।
    फसलों के उत्पादन-स्तर में आ रही गिरावट के तथा अन्य कृषिगत चुनौतियों में अप्रत्याशित वृद्धि के कारण टिकाऊ खेती की अवधारणा में प्रायः तीन लक्ष्य सम्मिलित किये जाते हैं। पर्यावरण स्वास्थ्य, आर्थिक लाभदेयता तथा सामाजिक समरसता। ये तीनों लक्ष्य तभी हासिल किये जा सकते हैं जब हम कृषि संसाधनों का प्रयोग तथा प्रबन्धन इस प्रकार करें जो हमारी वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भावी पीढ़ी को बिना किसी व्यवधान के सतत प्राप्त होती रहें। भारतीय कृषि में काफी परिवर्तन आये हैं। हरित-क्रांति की सफलता नई तकनीकों, मशीनीकरण, रासायनिक उर्वरक तथा उन्नतशील बीजों की देन है जिनकी महत्वपूर्ण भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। आज हम फसल उत्पादन में रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के योगदान से फसलों की पैदावार में महत्वपूर्ण वृद्धि के साथ खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भर हो पाये हैं। एक तरफ, इस प्रकार के परिवर्तनों से खेती में अनेक कृषिगत जोखिमों में कमी तथा सामाजिक एवं आर्थिक स्तर पर धनात्मक प्रभाव पड़ा है वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक संसाधनों का अविवेकपूर्ण एवं अनैतिक दोहन, खाद्यान्न उत्पादन में अत्यधिक उर्वरक एवं पीड़कनाशी रासायनिकों के उपयोग से प्राकृतिक असंतुलन तथा कृषि पारिस्थितिक-तन्त्र में परिवर्तन आया है।
    फसल सुरक्षा हेतु भारी मात्रा में कीट, रोग एवं खरपतवार नाशकों के उपयोग से कृषि उत्पादों, खाद्य पदार्थों, सब्जियों, दुग्ध एवं पेयजल में विषैले रसायनों की मात्रा सहनीय सीमा से कई गुना बढ़ी है। कृषि पारिस्थितिक-तन्त्र में भौतिक, जैविक सस्य परिवर्तनों के कारण तरह-तरह के कीड़ों तथा बीमारियों के प्रकोप में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। मृदा की बिगड़ती हालत, जल उपलब्धता में कमी, खाद्य-उत्पादों की गिरती गुणवत्ता, पर्यावरणीय प्रदूषण एवं स्वास्थ्य संबंधी समस्यायें तथा पारिस्थितिकी घटकों में क्षरण इत्यादि के कारण कृषिगत चुनौतियों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है।
    परंपरागत कृषि के साथ साथ हमें उच्च तकनीक की सहायता से कृषि से प्राप्त होने वाले उत्पादन को बढ़ाने के प्रयास करने की आवश्यकता है क्योंकि हमारे पास भूमि का क्षेत्रफल निरंतर घट रहा है तथा जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में बढ़ते मुँह और घटते भोजन की खाई को पाटना आसान काम नहीं है। इसके लिए हमें नियोजित विकास के रूप में टिकाऊ खेती करने की आवश्यकता है। टिकाऊ खेती का आशय है- आधारभूत पारिस्थितिक प्रणालियों की जीवन धारण क्षमता की सीमा में रहते हुए व्यवहार्य कृषि अपनाना। इसमें खेती-बाड़ी, पशुपालन, मधुमक्खी पालन, केंचुआ पालन इत्यादि इस तरह से किए जाते हैं कि विकास तो हो पर विनाश न हो। टिकाऊ खेती का तात्पर्य मुख्यतः खाद्य-उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार, प्राकृतिक संसाधनों एवं पर्यावरणीय पारिस्थितिकी घटकों का संरक्षण तथा खेती का स्तर टिकाऊ रखते हुए खाद्य-सुरक्षा का लक्ष्य हासिल करने से है जिसके अन्तर्गत जल संसाधनों का समुचित उपयोग एवं प्रबन्धन, मृदा उर्वरता का समुचित उपयोग एवं संरक्षण, फसल सुरक्षा एवं भारी धातुओं का जैविक समाधान, खाद्य पोषण सुरक्षा हेतु जैव विविधता का संरक्षण, फसल खेती प्रणाली तथा उत्पादों में विविधीकरण तथा ऊर्जा सुरक्षा एवं प्रदूषण में कमी हेतु वैकल्पिक ऊर्जा का प्रयोग इत्यादि का समावेश आवश्यक है। अनुसंधान रिपोर्टों व समाचारों में भूमि की जैविक कार्बन मात्रा में कमी, उर्वराशक्ति क्षीणता एवं उत्पादन में ठहराव होने की बातें आती रहती हैं जो स्पष्ट संकेत देते हैं कि हमें उत्पादन प्रणाली में स्थायित्व के साथ-साथ भूमि की उर्वराशक्ति को बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास किये जाने आवश्यक हैं। इसके लिए भूमि में जैविक कार्बन मात्रा की वृद्धि के लिए आनुपातिक तथा संस्तुत मात्रा में उर्वरकों के साथ कार्बनिक खादों जैसे कम्पोस्ट, हरी खाद, वर्मी कम्पोस्टिंग के नवीनतम ज्ञान के साथ उपयोगी तकनीकी प्रसार व उसके प्रयोग के लिए प्रोत्साहित करना होगा। आज बाजारों में जैव उर्वरकों के संशोधित कल्चर जैसे दलहनी फसलों के लिए राइजोबियम, एजोटोबैक्टर एवं धान की फसलों के लिए नील-हरित शैवाल, एजोला-एनाबीना इत्यादि आसानी से उपलब्ध हैं जिनके प्रयोग से लगभग 20-60 कि। ग्रा। तक नाइट्रोजन की पूर्ति वायुमण्डल से हो जाती है। अधिक उपज देने वाली फसलों और संकरों के प्रचलन के बाद अधिक पैदावार लेने के लिए प्रतिस्पर्धा ऐसी बढ़ी कि हमारा ध्यान इस बात की ओर गया ही नहीं कि यह प्रणाली कब तक चल पायेगी। इसी का नतीजा है कि ये सारी प्रणालियाँ जवाब दे चुकी हैं और उत्पादकता के स्तर को घटाने वाली नई-नई समस्याएं उभरने लगी हैं। इस तरह की कुछ समस्याएँ हैं- पोषक तत्वों की दक्षता में कमी, मिट्टी में अने पोषक तत्वों का असंतुलन, मिट्टी के भौतिक, रासायनिक गुणों में प्रतिकूल परिवर्तन, पानी का दुरूपयोग, मिट्टी और पानी का प्रदूषण और कीटव्याधिक रोगों व खरपतवारों की सांठगांठ। इन समस्याओं से निपटने के लिए जहाँ हम एक ओर फसलों की सघनता का ध्यान रख रहे हैं, वहीं देश के विभिन्न भागों के लिए फलदार फसलों को शामिल करते हुए ऐसी फसल प्रणालियाँ विकसित करने लगे हैं जो हर हाल में टिकाऊ साबित हो। अधिक मूल्य वाली फसलों में चुने गये फसल-चक्रों में मुख्य रूप से सूरजमुखी, सोयाबीन, मूँगफली, सरसों और बासमती धान इत्यादि शामिल किए गये हैं। इसी तरह कृषि की उत्पादकता और टिकाऊपन को ध्यान में रखते हुए समेकित पोषक प्रबंध और समेकित कीट प्रबंध की तकनीकों का अधिकाधिक प्रचलन किया जा रहा है। पानी की बचत के लिए कृषि में प्लास्टिक के उपयोग द्वारा छिड़काव एवं रिसाव सिंचाई प्रणाली के उपयोग की संभावनाओं पर भी हम विशेष ध्यान दे रहे हैं।
    फसल सुरक्षा में रसायनों के असंतुलित प्रयोग से विषैले घातक रसायनों एवं भारी धातुओं जैसे- आसैनिक, कैडमियम, मरकरी, लेड, कॉपर तथा क्रोमियम की मात्रा में मानक सीमा से कई गुना अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। भारी धातुओं पर एकीकृत पर्यावरण परियोजना वर्ष 1991 व 1996 में प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार खाद्य-शृंखला में समाहित होकर इन विषैली धातुओं का सांद्रण मानव शरीर में बढ़ रहा है। इनके घातक प्रभावों के कारण कई प्रकार की बीमारियां पैदा हो रही हैं जिनका इलाज भी संभव नहीं है। इतना ही नहीं, मिट्टी में ये रसायन तथा उनके अवशेष कई वर्षों तक बने रहते हैं। जल के साथ बहकर ये घातक रसायन तालाबों, झीलों में जलीय-जीवों को भी प्रभावित करते हैं। यहां तक कि इन कीटनाशक रसायनों का प्रभाव मिट्टी से पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराने वाले सूक्ष्म जीवों व प्राकृतिक मित्र कीटों पर भी पड़ता है।
    धातु प्रदूषण की प्रकृति तथा उनके स्रोत से धातुओं के पर्यावरण में पहुँचने के बाद उनका निस्तारण मशीनी अथवा रासायनिक विधियों से करना बड़ा जटिल तथा काफी खर्चीला होने के साथ पर्यावरण संगत नहीं है। पर्यावरण वैज्ञानिकों व वनस्पति-शास्त्रियों ने बहुत से ऐसे पौधों का विकास कर लिया है जो संदूषित क्षेत्रों से भारी धातुओं के साथ-साथ अन्य कार्बनिक तथा अकार्बनिक प्रदूषकों को अपने उतकों में 10 से 100 गुना तक संचयन की क्षमता रखते हैं। जैसे- स्थलीय पौधों में ब्रेसिका, जुंसिया, थेलेस्पी केरूयोसेन्स, कारमिनीप्सिस हैलरी, डयूनेलिला, सनफ्लावर एवं मैकेडेगिया, न्यूरोपिया तथा जलीय पौधों में हाइड्रिला वर्टीसिलेटा, पिस्टिया स्ट्रेटिओटस, वैलेसनेरिया स्पाइसरेलिस, ब्रेसिका मोनेराई, पोटेमोजोटोन क्रिस्पस निलम्बो न्यूसिपेया इत्यादि प्रमुख हैं। इनका प्रयोग पानी, मिट्टी व वायु से संदूषणकारी तत्वों की सफाई एवं प्रदूषण नियन्त्रण के लिए पर्यावरण संगत व अति महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में वरदान सिद्ध हो सकता है।
    पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी संतुलन बनाये रखने के लिये एकीकृत नाशीजीव प्रबन्धन एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर सामने आया है। एकीकृत नाशीजीव प्रबन्धन में कीट नियन्त्रण की सभी विधियों को सम्मिलित रूप में उपयोग करके नाशीजीवों की संख्या को आर्थिक हानि स्तर के नीचे रखा जाता है। इसमें प्राकृतिक शत्रुओं (मित्र कीटों) को प्रयोग में लाया जाता है। इनमें से अधिकाधिक कीटों, फफँूदों, जीवाणुओं, विषाणुओं तथा वनस्पतियों पर आधारित उत्पाद है जो भूमि व जल के साथ व्यवस्थित होकर जैविक क्रिया का अंग बन जाते हैं। इसमें ट्राईकोग्रामा अण्ड-परजीवी ट्राईकोकार्ड, न्यूक्लियर पाली हाइड्रोसिस वायरस सुण्डी-परजीवी तरल वायरस कण, वैसिलस थुरेजिंएसिस बैक्टीरिया जनित कीटनाशक तरल व पाउडर, ट्राईकोडरमा बिरिडी फंफूद जनित रोग परजीवी, व्यूवेरिया वैसियाना इत्यादि को प्रयोग में लाया जाता है। यह कम खर्च वाली आर्थिक रूप से युक्तिसंगत ढंग से फसल सुरक्षा प्रणाली है। इनका प्रयोग पर्यावरण, मानव तथा पशुओं के लिये काफी सुरक्षित है क्योंकि ये मिट्टी के साथ मिलकर 20-30 दिन में पूर्णतः अपघटित हो जाते हैं।
    कृषि को ‘‘विज्ञान पर आधारित उद्योग’’ मानकर चलने की आवश्यकता है। कृषि को भी वे सभी सहायता मिलनी चाहिए जो उद्योगों को मिलते हैं। तभी कृषि का सर्वागीण विकास संभव है। विकसित देशों की भांति एक ही स्थान पर सभी निवेशों की उपलब्धि के साथ वैज्ञानिकों सलाहों पर आधारित कृषि के दिन अब निकट हैं। मानव स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के लिए ‘‘नर्सिंग होम’’ की भांति कृषि क्लीनिक ‘‘कृषि निवेश केन्द्र’’, ‘‘कृषि व्यापार केन्द्र’’ तथा ’’फूड पार्क’’ जैसे प्रतिष्ठानों का प्रचलन अब दूर नहीं है। यह प्रणाली कम भूमि वाले लघु तथा सीमांत कृषकों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। कृषि के बुनियादी साधन के रूप में भूमि का महत्व सभी को विदित है। भूमि के सही उपयोग के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाने की आवश्यकता है। भूमि का अकृष्य उपयोग, बंजर-परती भूमि के सही विकास, भूमि एवं जल संसाधनों के दोहन आदि से संबंधित कोई नीति नहीं है। यह मानवता के लिए भावी संकट उत्पन्न कर सकता है। विकसित देशों में भूमि संरक्षण सम्बन्धी कानून बने हैं और उनका भलीभांति अनुपालन किया जाता है। हमारे यहाँ इस तरह के कोई कानून/नीति नहीं है। हमें भी विकसित देशों की भांति मृदा संरक्षण संबंधी कानून/नीति बनाकर उनका अनुपालन सुनिश्चित कराने की आवश्यकता है।

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