विज्ञान

(11/Jan/2017)

कुपोषण की काली छाया  


विजन कुमार पाण्डेय

 

कुपोषण आज देश की एक बड़ी समस्या बनकर उभर रही है। जिसका असर शिक्षा जगत पर भी पड़ रहा है। कुपोषित बच्चों का दिमाग कभी भी विकसित नहीं हो पाता जिसके कारण वे उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते। अभी पिछले सप्ताह ही सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में कुपोषण से 600 बच्चों की मौत पर संज्ञान लेते हुए सरकार को फटकार लगाई थी। यह एक ऐसा चक्र है जिसके चंगुल में बच्चे अपनी मां के गर्भ में ही फंस जाते हैं। उनके जीवन की रूपरेखा दुनिया में जन्म लेने के पहले ही तय हो जाती है। गरीबी और भुखमरी की स्याही से उनकी यह जीवन लीला लिखी जाती है। इसका रंग स्याह उदास होता है। इसमें जीवन की सभी आशा खत्म हो जाती हैं। कुपोषण शरीर का पर्याप्त विकास रोक देता है। एक स्तर के बाद यह मानसिक विकास की प्रक्रिया को भी अवरूद्ध करने लगता है। बहुत छोटे बच्चों खासतौर पर जन्म से लेकर 5 वर्ष की आयु तक के बच्चों को भोजन के जरिये पर्याप्त पोषण आहार न मिलने के कारण उनमें कुपोषण की समस्या जन्म ले लेती है। इसके परिणाम स्वरूप बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता का ह्रास होता है और छोटी-छोटी बीमारियाँ उनकी मृत्यु का कारण बन जाती हैं। स्कूल में कदम रखते ही उन्हें बीमारिया घेरने लगती हैं। फिर वे पढ़ाई से भागने लगते हैं। आंखों में चश्मा बचपन में ही लग जाता जो जिंदगी भर नहीं उतरता।
कुपोषण आज अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिये चिंता का विषय बन गया है। विश्व बैंक ने इसकी तुलना ब्लेकडेथ नामक महामारी से की है। जिसने 18वीं सदीं में यूरोप की जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को निगल लिया था। सामान्य रूप में कुपोषण को चिकित्सीय मामला माना जाता है। हममें से अधिकतर लोग सोचते हैं कि यह चिकित्सा का विषय है। दरअसल कुपोषण बहुत सारे सामाजिक-राजनैतिक कारणों का परिणाम है। जब राजनीतिक एजेंडे में भूख और गरीबी नहीं होती तो बड़ी तादाद में कुपोषण पसरता है। हमारे देश में कुपोषण बांग्लादेश और नेपाल से भी अधिक है। बांग्लादेश में शिशु मृत्यु दर 48 प्रति हजार है जबकि इसकी तुलना में भारत में यह 67 प्रति हजार है। यहाँ तक की यह उप सहारा अफ्रीकी देशों से भी अधिक है। भारत में कुपोषण का दर लगभग 55 प्रतिशत है जबकि उप सहारीय अफ्रीका में यह 27 प्रतिशत के आसपास है।
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि भारत में हर साल कुपोषण के कारण मरने वाले पांच साल से कम उम्र वाले बच्चों की संख्या दस लाख से भी ज्यादा है। दक्षिण एशिया में भारत कुपोषण के मामले में सबसे बुरी हालत में है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में किए गए सर्वेक्षणों में देखा गया कि देश के सबसे गरीब इलाकों में आज भी बच्चे भुखमरी के कारण अपनी जान गंवा रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो स्थिति और भयावह होगी। संयुक्त राष्ट्र ने भारत में जो आंकड़े पाए हैं, वे अंतरराष्ट्रीय स्तर से कई गुना ज्यादा हैं। संयुक्त राष्ट्र ने स्थिति को चिंताजनक बताया है। इसके बावजूद भी राजनीतिक दल इसमें केवल अपना राजनीतिक लाभ देख रहे हैं। वे शायद यह भूल जाते हैं कि यही बच्चे उनके भविष्य के वोट बैंक हैं।

कुपोषण से बच्चे प्रभावित 

कुपोषण बच्चों को सबसे अधिक प्रभावित करता हैं। यह जन्म या उससे भी पहले शुरू होता है और 6 महीने से 3 वर्ष की अवधि में तीव्रता से बढ़ता है। इसके परिणाम स्वरूप वृध्दि बाधिता, मृत्यु, कम दक्षता और 15 पाइंट तक आईक्यू का नुकसान होता है। सबसे भयंकर परिणाम इसके द्वारा जनित आर्थिक नुकसान होता है। कुपोषण के कारण मानव उत्पादकता 10-15 प्रतिशत तक कम हो जाती है जो सकल घरेलू उत्पाद को 5-10 प्रतिशत तक कम कर सकता है। कुपोषण के कारण बड़ी तादाद में बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं। कुपोषित बच्चों की सीखने की क्षमता कम हो जाती है। ऐसे बच्चे स्कूल नहीं जाना चाहते। उनकी याददाश्त कम हो जाती है जिससे वे हीन भावना से ग्रस्त हो जाते हैं। वे खुद को स्कूल में रोक नहीं पाते क्योंकि टीचर उनकी परेशानियों को नहीं सुनते। स्कूल से बाहर वे सामाजिक उपेक्षा के शिकार होते हैं। गरीबी के कारण वे जीवन पर्यंत शोषण के शिकार होते रहते है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में बच्चे बाल श्रमिक या बाल वैश्यावृत्ति के लिए मजबूर हो जाते हैं। बड़े होने पर वे अकुशल मजदूरों की लम्बी कतार में जुड़ जाते हैं जो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ बनता है। जहाँ तक मध्यप्रदेश का संदर्भ है यहाँ कुपोषण की स्थिति काफी चिंताजनक है। यूनिसेफ और महिला एवं बाल विकास विभाग के प्रकाशन-बाल संजीवनी के अनुसार वहाँ 55 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं और इतने ही बच्चों की मौते कुपोषण के कारण होती है। इस समय मध्यप्रदेश में देश में सर्वाधिक कम वजन के बच्चे हैं और यह स्थिति 1990 से यथावत है। महिला एवं बाल विकास महिला एवं बाल विकास विभाग म.प्र./युनिसेफ भोपाल के अनुसार यहाँ कुपोषण की दर 64 प्रतिशत से बढ़कर 76 प्रतिशत हो गयी है। 3 वर्ष की आयु के बच्चों में 4 में से 3 बच्चे एनीमिया से ग्रसित हैं। 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में 1000 में से 4 बच्चे रतौंधी से ग्रसित है। आज मध्यप्रदेश में कुपोषण एक गंभीर जन समस्या बन गई है। सारे राज्यों में से सर्वाधिक कम वजन के बच्चे यहाँ पर हैं। सर्वाधिक कम वजन के बच्चों की संख्या सन 1990 से बदली नहीं है।
कुपोषण विकास और सीखने की क्षमता के लिए एक गंभीर खतरा है। बच्चों में कुपोषण की स्थिति राज्य की अर्थ व्यवस्था पर भारी बोझ है। जिस पर राज्य सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए। कुपोषण इस प्रकार देश की एक जटिल समस्या है। इसके लिए घरेलू खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है और यह तभी संभव है जब गरीब समर्थक नीतियाँ बनाई जाए जो कुपोषण और भूख को समाप्त करने के प्रति लक्षित हों। हमें ब्राजील से सीखना चाहिए जहाँ भूख और कुपोषण को राष्ट्रीय लज्जा माना जाता है। कुपोषण कार्यक्रमों और गतिविधियों से नहीं रूक सकता है। इसके लिए एक मजबूत जन समर्पण और पहल जरूरी है। जब तक खाद्य सुरक्षा के लिये दूरगामी नीतियाँ निर्धारित नहीं होंगी और बच्चों को नीति निर्धारण तथा बजट आवंटन में प्राथमिकता नहीं दी जाएगी तब तक कुपोषण के निवारण में अधिक प्रगति संभव नहीं है।

कुपोषण कोई बीमारी नहीं

दरअसल कुपोषण कोई बीमारी नहीं, लेकिन कुपोषण के कारण होने वाली बीमारियों की सूचि बहुत लम्बी है। शरीर को पर्याप्त पोषण ना मिल पाने से कुपोषण की सिथति पैदा होती है। इससे शरीर के ज़रूरी आर्गन ठीक तरीके से काम नहीं करते और बीमारियां होने लगती है। बच्चों का पेट भरा होने का मतलब यह नहीं कि उन्हें पूरा पोषण मिल रहा है। बच्चों के खाने में प्रोटीन, कार्बाेहाइड्रेटस, विटामिन्स, मिनरल्स जैसे पोषक तत्व होने चाहिए क्योंकि इन पोषक तत्वों की कमी से ही कुपोषण होता है। कुपोषण जैसी समस्या का सबसे बड़ा कारण गरीबी और अज्ञानता है। बच्चे को चाकलेट, बिस्किट आदि देकर आप उसका मन बहला सकते हैं, लेकिन उन्हें सही पोषक आहार देना भी जरुरी है। खासतौर पर बच्चे के लंचबाक्स में तो ऐसी चीजें बिलकुल नहीं देनी चाहिये, जो उनके स्वस्थ्य के लिए हानिकारक हो। जिन बच्चों को समय पर खाना नहीं मिलता, उनमें कुपोषण होने की सम्भावना सबसे अधिक रहती है। लेकिन जिन बच्चों को समय पर खाना मिलता है उन्हें भी कुपोषण हो सकता है। ऐसा भी ज़रूरी नहीं कि किसी एक बच्चे में सभी प्रकार के पोषक तत्वों की कमी पाई जाये। किसी एक प्रकार के पोषण तत्व की कमी से भी कुपोषण होता है। इसलिए बच्चों को अनाज, दालें, हरी सब्जियाँ, सलाद, दूध और मौसमी फल ज़रूर दें। कुपोषण एक ऐसी स्थिति है जो लम्बे समय तक पोषणयुक्त आहार ना मिल पाने के कारण पैदा होती है। कुपोषित बच्चों की रोग प्रतिरोधी क्षमता कमज़ोर होती है और ऐसे बच्चे अकसर बीमार रहते है। कुपोषण के कारण बच्चों की त्वचा और बाल रूखे-बेजान दिखते हैं और वज़न कम होने लगता है। केवल इतना ही नहीं कुपोषण के कारण बच्चे का विकास भी रूक जाता है और अगर समय रहते कुपोषण का इलाज ना कराया जाये तो यह समस्या जानलेवा भी हो सकती है। आपका बच्चा अगर स्वस्थ है, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप उसके पोषण पर ध्यान ही ना दे। चाहे यह बात नवजात शिशु की हो या स्कूल जाने वाले बच्चों की, बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए पोषणयुक्त आहार बेहद आवश्यक है। इसके बिना उनका सारा जीवन रोगयुक्त हो जाता है। वो बच्चे जिनकी देखभाल जन्म से ही ठीक प्रकार से नहीं होती है, उनमें हमेशा कुपोषण होने की सम्भावना बनी रहती है। अगर अपने बच्चे को बीमारियों से दूर रखना चाहते हैं, तो उसके सम्पूर्ण पोषण पर ध्यान दे। आप चाहे तो घर पर ही कम खर्चे में पोषण युक्त आहार बना सकते हैं। ध्यान रखें अपने शिशु को दिन में चार बार ठोस आहार जरुर दें और तीन बार दूध और दूध से बने उत्पाद दे।


कुपोषण के कारण 

वो बच्चे जिनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होता, भूख के कारण उनकी आहार आपूर्ति नहीं हो पाती। यह जरूरी नहीं कि हम जो भी खा रहे हैं, उसमें हमें पोषण मिले। फास्ट फूड, जंक फूड खाने में तो अच्छे लगते हैं, लेकिन इनमें पोषण ना के बराबर होता है। समय से पहले पैदा हुए बच्चे जन्म से ही कमज़ोर होते हैं क्योंकि उनका पूरा विकास नहीं हो पाता है। ऐसे बच्चों को शुरूआती सालों में सामान्य बच्चों से ज्यादा देखभाल की आवश्यकता होती है। कुछ अभिभावक अज्ञानवश बच्चों को उनकी पसंद का आहार देते रहते है। स्वादानुसार तो ऐसे आहार अच्छे होते हैं, लेकिन सेहत की दृष्टि से लाभदायक नहीं होते। इसलिए बच्चों को हमेशा पौष्टिक आहार ही देना चाहिए।

कुपोषण से एकाग्रता में कमी 

जो बच्चें कुपोषण के शिकार होते हैं, वे शारीरिक और मानसिक दोनों ही तरह से कमज़ोर होते हैं। यदि बचपन से ही बच्चे कुपोषण के शिकार हो जाएं तो उनकी यह कमी जीवन भर उनके साथ रह जाती है। ऐसे में, बच्चे जीवन, करियर हर तरह से पिछड़ सकते हैं। कुपोषण के शिकार बच्चों के शारीरिक विकास के साथ-साथ मासिक विकास पर भी बहुत बुरा असर पड़ता है और ऐसे बच्चों में एकाग्रता की भी कमी होती है। भारत में ज़्यादातर बच्चों में विटामिन । और आयोडीन की कमी देखने को मिलती है। जिन बच्चों में विटामिन । की कमी होती है, वह बीमार भी अधिक पड़ते है, साथ ही उनमें डायरिया और अन्य संक्रमण होने की भी संभावनाएं अधिक रहती हैं। आयोडीन की कमी से होने से बच्चों के मानसिक विकास पर बहुत बुरा असर पड़ता है।
कुपोषण उन लोगों को भी हो सकता है जिनको पौष्टिक भोजन तो मिलता है लेकिन उनकी आहार शैली सही नहीं होती है। उदाहरण के लिये जैसे कि दूध तो मिलता है पीने के लिये लेकिन उस दूध को सही तरह से रखा और उबाला नहीं गया हो और सेवन भी दूध के खराब होने की शुरुआत में किया गया हो तो ऐसे इंसान दूध तो पी रहे हैं किंतु दूध का पोषण उनको नहीं मिल पा रहा है। इसी तरह खाने-पीने की सभी चीजों के पोषक तत्व नष्ट होने पर उनका सेवन किया जाये तो ऐसा व्यक्ति कुपोषण का शिकार हो सकता है। बड़ों की तुलना में बच्चों को और पुरूषों की तुलना में महिलाओं को कुपोषण की शिकायत अधिक होती है। होने को यह किसी भी आयु में हो सकता है। वैसे लड़कियों के साथ हर दिशा में भेदभाव होने के बावजूद पोषण के मामले में लड़कियों की स्थिति लड़कों के मुकाबले बेहतर पाई गई है। आरएसओसी के आंकड़ों के मुताबिक पाँच साल से कम उम्र के लड़के, जिनका विकास, विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों से नीचे पाया गया है उनकी संख्या 39ण्5 फीसदी दर्ज की गई है। जबकि पाँच साल से कम उम्र की लड़कियों के लिए यही आंकड़े 37ण्5 फीसदी दर्ज किए गए हैं। सामान्य से कम वज़न के मामले में भी कुछ ऐसे ही आंकड़े सामने आए हैं। इसमें 30 फीसदी लड़के एवं 28.7 फीसदी कम वज़न वाली लड़कियों की संख्या दर्ज की गई है। अनुसूचित जातियों में सबसे अधिक, 42.4 फीसदी अविकसित बच्चे देखे गए हैं। वहीं अनुसूचित जनजाति के लिए यह आंकड़े 42.3 फीसदी देखे गए हैं। दर असल कुपोषण यदि गंभीर स्थिति में पहुंच जाए तो उसके लक्षण कुछ इस तरह होते हैं-

  • जोड़ों में दर्द और कमजोर हड्डियां 
  • हड्डियों का दिखाई देना 
  • पेट का फूल जाना 
  • त्वचा का सामान्य से ज्यादा सांवला पड़ जाना 
  • मांस पेशियों का कमज़ोर होना 
  • नाखूनों का टूटना 
  • बालों का झड़ना या बालों का रंग बदलना 
  • भूखना लगना 
  • बच्चों का बिना वजह रोना 
  • शरीर का बहुत पतला व कमज़ोर होना

शरीर को पोषण मिलने का प्रमुख माध्यम भोजन ही होता है। हर आयु-वर्ग में अपनी-अपनी कार्य शैली के अनुसार पोषण की अलग अलग मात्रा में जरूरत होती है। यदि भोजन में पोषण की मात्रा जरूरी स्तर से कम होती है और लगातार काफी समय तक ऐसा ही कम पोषक तत्वों वाला भोजन किया जाये तो कुपोषण रोग होने की सम्भावना बढ़ जाती है। विश्व के अलग-अलग भागों में मौजूद आर्थिक और सामाजिक कारण भी कुपोषण की समस्या का एक विशेष कारण हैं। अधिक पोषक तत्वों की सामान्यतः कीमत कुछ ज्यादा ही होती है और आर्थिक रूप से कमजोर लोग बस पेट भर जाये इस चिंता में कम पोषण वाला भोजन खाकर कुछ पैसे दूसरी जरूरतों के लिये बचा लेने की कोशिश में रहते हैं। इसके अतिरिक्त विभिन्न सामाजिक बंधन भी कुपोषण होने में विशेष भूमिका निभाते हैं।
अस्वच्छ वातावरण कुपोषण की समस्या पैदा करने में पीछे नहीं है। किसी जगह पर ऐसा भी होता है कि पोषण के बारे में बहुत जागरूक इन्सान उपरोक्त सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुये बहुत अच्छी और पोषक वस्तुऐ सेवन के लिये लाता है किंतु उसके आस-पास का वातावरण इतना प्रदूषित होता है कि सेवन करने से पहले ही भोज्य पदार्थों के पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। ऐसे पदार्थों का लम्बे समय तक सेवन करते रहने से पोषण की प्राप्ति नहीं हो पाती और शरीर में कुपोषण की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
नींद की कमी भी निश्चित ही कुपोषण को पैदा करती है। सामान्य एक व्यक्ति को एक दिन-रात में आठ घण्टे की नींद चाहिये होती है और नींद पूरी ना होने से शरीर में वायुदोष की वृद्धि होती है और शरीर का मेटाबॉलिजम गड़बड़ होकर कुपोषण पैदा करता है। कई बार कार्यस्थल पर ज्यादा काम करने के कारण व्यक्ति लम्बे समय तक पर्याप्त नींद नहीं ले पाता है और कार्य की हड़बड़ी में भोजन भी समुचित रूप से नहीं करता है। ऐसे लोग सब कुछ बहुत अच्छा होने के बावजूद खुद को कुपोषण का रोगी बना सकते हैं।

कुपोषण को दूर करने के सामान्य नुस्खे 

अगर आप कुपोषण से बचना चाहते हैं तो 50 ग्राम किशमिश रात को पानी में भिगो दें सुबह भली प्रकार चबा-चबा कर खाएं। 2.3 माह के प्रयोग से कुपोषण दूर होगा और वजन भी बढेगा। किशमिश में प्रचुर मात्रा में कैलोरी पायी जाती है और फाइबर भी बहुत अच्छी मात्रा में पाया जाता है। ये शरीर में से कमजोरी को हटा के स्वस्थ शरीर में परिवर्तित करता है। 
भोजन में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने से कुपोषण नहीं होता। दालों में प्रोटीन की मात्रा ज्यादा होती है। यह कुपोषण को दूर करने के लिये बहुत जरूरी है। दूध और दूध से बने उत्पादों में सभी तरह के जरूरी पोषक तत्व पाये जाते हैं। अतः यदि किसी का कुपोषण की समस्या हो तो उसको रोज 300.500 मि.ली. दूध जरूर देना चाहिये। रोज एक कटोरी बीन्स खायें, इसमें पौष्टिकता के साथ 300 कैलोरी होती है, यह कुपोषण केरोगी के लिये बहुत ही लाभकारी सिद्ध हो सकता है। और कुछ नहीं तो काला देशी चना सभी के बजट और पहुँच में फिट बैठता है। यह पोषक तत्वों का बहुत ही प्रचुर और सस्ता भण्डार है। कुपोषण के रोगी को रोजाना लगभग 100.200 ग्राम भुने हुये चने जरूर खिलवायें।
यदि स्वास्थ्य के नजरिये से देखा जाये तो कुछ भोज्य पदार्थ खाने में तो स्वादिष्ट होते हैं किंतु स्वास्थ्य केलिये बहुत हानिकारक होते हैं। इन भोज्य पदार्थों के सेवन से पेट तो अच्छे से भर जाता है किंतु इनमें पोषण की मात्रा बहुत कम होती है साथ ही ये पाचन तंत्र की क्रियाशीलता को भी खराब करतेहैं। आजकल बहुतायत में सेवन किये जाने वाले जंक-फूड़, फास्ट-फूड़ और इसी तरह के अन्य अटरम-शटरम पदार्थ खानें पर सिर्फ पेट को ही भरते हैं किंतु पोषण के नाम पर ये शून्य होते हैं। जिस कारण से इनको खाने वाला धीरे-धीरे से कुपोषण का रोगी बनता जाता है। इसलिए अगर हम सादा भोजन और उच्च विचार रखेंगे तो कभी भी कुपोषण के शिकार नहीं होंगे।

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