विज्ञान

(20/Jun/2016)

सेल्फी लें मगर जरा सम्हलकर

संतोष शुक्ला

 

‘सेल्फी’ षब्द से हम सभी भली-भांति परिचित हैं। सेल्फी अर्थात खुद को केंद्र में रखते हुए कैमरे से खुद की फोटो खींचना। आपको सेल्फी खींचते हुए लोग हर जगह नज़र आ जाएँगे। आप चाहे मॉल में हों, पार्टी में हों, मेले में हों, किसी जगह घूम रहे हो, सेल्फी लेते लोग दिख ही जायेंगे। सेल्फी लेने में युवा लड़के-लड़कियाँ सबसे आगे होते हैं। सेल्फी अकेले भी ली जाती है तथा समूह में भी ली जाती है। सेल्फी का प्रचलन अत्याधिक बढ़ गया है कुछ सालों पहले तक किसी सेलेब्रेटी से मुलाकात होने पर उसका ऑटोग्राफ लिया जाता था लेकिन अब उसके साथ सेल्फी खींची जाती है। सेल्फी की पापुलेरिटी का अंदाज इस बात से भी लगा सकते हैं कि फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ में एक गाना ‘सेल्फी ले ले रे’ था और वह भी सुपरहिट हुआ।
यदि दुनिया की पहली सेल्फी की बात करें तो हम पाएँगे कि वर्ष 1839 में राबर्ट कार्नेलियस ने सबसे पहले कैमरे से अपनी तस्वीर खींची थी। संयोग से इस तस्वीर को किसी इन्सान की कैमरे से ली गई पहली तस्वीर होने का गौरव भी प्राप्त है। यदि सेल्फी षब्द के उपयोग की बात की जाये तो हम पाते हैं कि वर्ष 2002 में ऑस्ट्रेलिया इंटरनेट फोरम पर सबसे पहले सेल्फी षब्द का उपयोग किया गया था।
वैसे कुछ कैमरों में सेल्फी लेने कि सुविधा पहले से उपलब्ध थी लेकिन सेल्फी सर्वाधिक प्रचलन में तब आई जब 2010 में आईफोन ने अपने आईफोन-4 में फ्रंट कैमरा उपलब्ध कराया। इसके बाद तो लगभग सभी स्मार्टफोन में फ्रंट फेसिंग कैमरा उपलब्ध हो गया और सेल्फी लेना आसान हो गया।
युवाओं में दिखावे की भावना सेल्फी का बड़ा कारण है। अधिकतर मौकों पर सेल्फी लेने के बाद उसे सोषल मीडिया के जरिये अपने सोषल सर्किल तक उसे पहुँचाने की एक परम्परा सी बन गई है। कभी-कभी सेल्फी लेने के चक्कर में लोग अपनी जान जोखिम में डाल देते हैं। यहाँ तक कि कई लोग सेल्फी लेने के चक्कर में अपनी जान भी गवां चुके हैं।
जहाँ कुछ समय पहले तक सेल्फी षब्द का वजूद ही नहीं था वहीं सोषल मीडिया का उपयोग करने वाली पीढ़ी ने इसे ग्लेमराईज कर दिया। इस षब्द के प्रचलन की व्यापकता का अंदाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि सेल्फी को आक्सफोर्ड डिक्षनरी द्वारा 2013 में ‘वर्ड ऑफ द ईयर’ घोषित किया था। सेल्फी का षौक राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर आम नागरिकों को भी है। षहरों में रहने वाले हो या गांवों में, सब सेल्फी का षौक रखते हैं।

हमारे देश में आम चुनावों के बाद जैसे ही मोदी जी ने वोट डाल कर स्याही के निषान के साथ सेल्फी सोषल मीडिया पर डाली वैसे ही वोट डालने के बाद लोगों ने सेल्फी लेना षुरू कर दिया। सेल्फी को लेकर सोषल मीडिया पर अनेक केम्पेन भी चलाये जाते रहे हैं। इनमें से हरियाणा के गांव बीबिपुर के सरपंच सुनील जगलान द्वारा ‘गर्ल चाइल्ड’ को बचाने के उद्देष्य से चलाया गया ‘सेल्फी विथ डॉटर’ केम्पेन काफी चर्चा में रहा। इसके अंतर्गत अपनी बेटी के साथ सेल्फी खींचकर वाट्सएप्प पर भेजनी थी तथा जिस तस्वीर में दिल की बात चेहरे पर नजर आएगी उसे विजेता घोषित किया जाना था। इस केम्पेन व प्रतियोगिता में 500 से अधिक प्रविष्टियां मिली थीं। एक समाचार पत्र ने रक्षाबंधन पर ‘सेल्फी विथ सिस्टर’ नाम से प्रतियोगिता आयोजित की थी। वहीं गौ सेवा परिवार द्वारा ‘सेल्फी विथ काऊ’ नाम से केम्पेन चलाया था। इसी तर्ज पर अनेक केम्पेन व प्रतियोगितायें आयोजित होती रहती हैं।
सेल्फी लेने में सुविधा के लिए सेल्फी स्टिक भी बाजार में उपलब्ध है। सेल्फी स्टिक का अविष्कार मिनोल्टा कैमरा कम्पनी में कार्यरत एक जापानी व्यक्ति द्वारा किया गया था। जब वह यूरोप यात्रा पर अपनी पत्नी के साथ गया तब पत्नी के साथ फोटो खिंचवाने के लिए दूसरों की मदद लेनी पड़ती थी, इसी बात से परेषान हो कर 1980 के दषक में उसने कैमरे के लिये सेल्फी स्टिक बनाई। इस समय इसे एक्सटेन्डर स्टिक नाम दिया गया था लेकिन इसे व्यवसायिक सफलता नहीं मिली। स्मार्टफोन में फ्रंट फेसिंग कैमरा आने के बाद सेल्फी स्टिक भी प्रचलन में आ गई है। सेल्फी का क्रेज इतना अधिक बढ़ गया है कि बड़े शहरों में अच्छी सेल्फी कैसे लें विषय पर वर्कषॉप भी आयोजित होने लगे हैं। हमारे देष में अहमदाबाद में ऐसी पहली वर्कषॉप आयोजित हो चुकी है। सेल्फी लेने में कोई बुराई नहीं है लेकिन कहाँ सेल्फी लेना है और कहाँ नहीं लेना है इसकी समझ होना भी आवष्यक है साथ ही अत्यधिक सेल्फी खींचना भी एक खतरनाक आदत बन कर आपको परेषानी में डाल सकता है। यह आदत मेंटल डिसआर्डर के रूप में भी सामने आती है। इसे सामान्य तौर पर तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है।
स बॉर्डर लाइन सेल्फिट्स: ऐसे लोग जो दिन में कम से कम तीन बार सेल्फी लेते हों लेकिन किसी सोषल मीडिया पर षेयर नहीं करते हैं।
स एक्यूट सेल्फिट्स: ऐसे लोग जो दिन में कम से कम तीन बार सेल्फी खींचते हों तथा सेल्फी सोषल मीडिया पर भेजते हों।
स क्रानिक सेल्फिट्स: दिन में तीन से अधिक बार सेल्फी खींचना और उन्हें सोषल मीडिया पर पोस्ट करने के बाद लाइक व कमेंट के लिये बेचैन रहना।
उपरोक्त तीनों श्रेणियों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है ये प्रतीकात्मक है लेकिन यदि आप इनमें से किसी श्रेणी में आ रहे हैं तो सम्हलने की आवष्यकता है। सेल्फी के कारण परिवारिक रिष्ते खराब हो रहे हैं। पुणे में रहने वाली गरिमा रोज ऑफिस जाने के लिये तैयार होने के बाद सेल्फी खींच कर दिल्ली में अपनी माँ को भेजती थी। षादी के उपरांत भी गरिमा यही काम करती थी जो उसके पति को पसंद नहीं था। कभी-कभी वह अपने पति के साथ सेल्फी लेकर माँ को भेजती थी। गरिमा की माँ द्वारा चेहरे के भावों को पढ़ कर दिये गये कमेंट व सलाहों ने आज गरिमा का पारिवारिक जीवन जटिल बना दिया है। 
सेल्फी खींचने के दौरान भी अनेक बार हादसे हो चुके हैं तथा अनेक लोग अपनी जान गवां चुके हैं। कुछ दिन पहले ही समुद्र के किनारे सेल्फी लेने के चक्कर में मुम्बई में तीन लड़कियाँ समुद्र में बह गईं थीं। चलती ट्रेन के सामने सेल्फी लेने के दौरान भी अनेक हादसे हो चुके हैं। अपनी बहादुरी प्रदर्षित करने के चक्कर में अनेक लोगों की जान ले चुके हैं या गंभीर रूप से घायल कर चुका है। भोपाल में एक युवक बाइक के साथ सेल्फी लेने के चक्कर में अपनी जान गवां चुका है।
खतरनाक जगहों पर सेल्फी लेने से बचना चाहिये क्योंकि हमारा ध्यान अपनी स्थिति से ज्यादा मोबाइल की स्क्रीन पर होता है और यही दुर्घटना का कारण बन जाता है। इसके साथ-साथ ऐसी सेल्फी लेने से भी बचना चाहिये जिससे किसी की भावनायें आहत हों या कोई मुसीबत में हो और आप सेल्फी ले रहे हों। इसी वर्ष नव वर्ष की संध्या पर दुबई की एक होटल में आग लग गई थी, इस जलते हुए होटल के सामने एक दम्पत्ती ने सेल्फी लेकर पोस्ट की थी। उनके इस बर्ताव की काफी भर्त्सना हुई थी। ऐसे ही एक युवक ने जलती चिता के साथ सेल्फी लेकर फेसबुक पर पोस्ट की थी। किसी दुर्घटना स्थल पर भी सेल्फी लेने से बचना चाहिये।
सेल्फी लेते समय बढ़ती दुर्घटनाओं के कारण कुछ जगहों पर चेतावनी के बोर्ड लगा दिये गये हैं। कुछ संकेतक चिन्ह भी बना दिये गये हैं जो कि लोगों को इसके बारे में सचेत करते हैं। सेल्फी फोटो के बाद अब सेल्फी वीडियों का दौर आ रहा है जो कि और भी खतरनाक हो सकता है। सेल्फी लीजिये, मगर जरा सम्हल कर।

santoshshukla.bhopal@gmail.com