विज्ञान

(12/Jan/2016)

भारत का प्रथम खगोलिकी उपग्रह आस्ट्रोसैट

कालीषंकर

28 सितम्बर, 2015 का दिन भारत के लिए एक गौरवषाली दिन सिद्ध हुआ जब सुबह 10 बजे इसरो ने अपना प्रथम खगोलिकी उपग्रह ’आस्ट्रोसैट’ सतीष धवन अन्तरिक्ष केन्द्र, श्री हरिकोटा से 6 अन्य विदेषी उपग्रहों के साथ पी.एस.एल.वी-सी 30 उड़ान से प्रमोचित किया। प्रमोचन के 25 सेकेन्ड के बाद पी.एस.एल.वी.-सी. 30 राकेट ने आस्ट्रोसैट और अन्य उपग्रहों-अमरीका के चार नैनो उपग्रह, इन्डोनेषिया का एक उपग्रह तथा कनाडा के एक नैनो उपग्रह को अन्तरिक्ष की कक्षा में पहुँचाया। यह पहला मौका है जब भारत ने अमरीका के उपग्रहों का प्रमोचन किया है। प्रमोचन के बाद आस्ट्रोसैट पूर्व निर्धारण के अनुसार पृथ्वी से 644ण्651 कि.मी. की ऊँचाई वाली कक्षा में स्थापित किया गया जिसका पृथ्वी की भूमध्य रेखा में झुकाव 6ण्002 डिग्री था। इस मौके पर प्रमोचन के बाद सतीष धवन अन्तरिक्ष केन्द्र के निदेषक श्री कून्हीकृष्णन ने कहा, ‘‘यह मिषन सफल रहा। ये अत्यन्त सहयोगिता पूर्ण प्रयास थे। यह बड़ी मुष्किल से प्राप्त भेंट है।’’
आस्ट्रोसैट भारत का प्रथम खगोलिकी उपग्रह है जो पूर्ण रूपेण खगोलिकी के लिए समर्पित है तथा इसका प्रमोचन 28 सितम्बर, 2015 को किया गया। उपग्रह आधारित भारतीय एक्स-किरण खगोलिकी परीक्षण ’आई.एक्स.ए. ई.’ की सफलता के बाद (जिसका प्रमोचन 1996 में किया गया था), भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन ने वर्ष 2004 में एक खगोलिकी उपग्रह ‘आस्ट्रोसैट’ के विकास की अनुमति दी जो पूर्णतया खगोलिकी विज्ञान के लिए था। इस उपग्रह के विभिन्न उपकरणों, तंत्रों एवं उपतंत्रों का निर्माण भारत की महान खगोलिकी अनुसंधान संस्थाओं और कुछ अन्य देषों के खगोलिकी प्रतिष्ठानों के द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है। इस उपग्रह के द्वारा जिन महत्वपूर्ण क्षेत्रों को कवर किया गया है वे हैं कास्मिक श्रोतों की विस्तृत सीमाओं में एक साथ बहुत तरंग दैर्ध्यों की तीव्रता में होने वाले परिवर्तनों का मापन, क्षणिक स्पंदन के लिए आकाष में एक्स किरणों का मानीटरन, हार्ड एक्स किरण और अल्ट्रा वायलेट बैन्डों में आकाषीय सर्वेक्षण, एक्स किरण द्वि-आधारी (बाइनेरी) सक्रिय गैलेक्टिक नाभिकों, सुपरनोवा अवषेषों, आकाष गंगाओं के समूहों एवं तारकीय कोरोना का विस्तृत बैन्ड स्पेक्ट्रोस्कोपिक अध्ययन तथा विभिन्न एक्स किरण श्रोतों का आवर्तकालीन और गैर आवर्तकालीन अध्ययन। इसके साथ ही साथ इस मिशन के द्वारा वॉंतरिक्ष पिन्डों का अध्ययन भी षामिल है जिसमें सौर तंत्र के समीप पिन्डों से लेकर दूरस्थ तारे षामिल हैं, ब्रम्हान्डीय (कास्मोलोजिकल) दूरी वाले पिन्ड भी षामिल हैं। इन अध्ययनों में अनेक परिवर्तनीय गणकों का टाइमिंग अध्ययन भी षामिल है जिसमें गर्म ह्नाइट ड्वार्फ से लेकर सक्रिय गैलेक्टिक नाभिक षामिल है। यह उपग्रह एक बहु तरंग-दैर्ध्य (खगोलिकी) मिषन के रूप में प्रमोचित किया गया है तथा इसके 5 उपकरण आवृत्ति स्पेक्ट्रम के दृष्टि गोचर (320-530 नैनोमीटर), अल्ट्रावायलेट समीप (180-300 नैनोमीटर), सुदूर अल्ट्रावायलेट (130-180 नैनोमीटर), साफ्ट एक्स किरण (0ण्3 से 0ण्8 किलो इलेक्ट्रान वोल्ट) एवं हार्ड एक्स किरण (3.10 कि. इलेक्ट्रान वोल्ट और 10.150 कि. इलेक्ट्रान वोल्ट में काम करंेगे। इस लेख में भारत के इस प्रथम खगोलिकी उपग्रह आस्ट्रोसैट के विभिन्न पहलुओं की चर्चा की जायेगी। 

आस्ट्रोसैट उपग्रह के तकनीकी विवरण

  • सम्बद्ध संस्था: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन
  • प्रमोचन तिथि: 28 सितम्बर, 2015 
  • प्रमोचन स्थल: सतीष धवन अन्तरिक्ष केन्द्र, श्री हरिकोटा 
  • प्रमोचन राकेटः पी एस एल वी-एक्स एल 
  • मिषन का जीवन काल: 5 वर्ष स उपग्रह का भार: 1513 कि.ग्रा. 
  • अन्तरिक्ष कक्षा: लगभग भू मध्यरेखीय स कक्षीय ऊँचाई: 650 कि.मी. 
  • तरंग दैर्ध्य: बहुत तरंग दैर्ध्य स उपकरण: 
  1. अल्ट्रावायलेट प्रतिबिम्बन दूरबीन 
  2. सॉफ्ट एक्स किरण दूरबीन 
  • एक्स किरण टाइमिंग एवं निम्न विभेदन स्पेक्ट्रमी अध्ययन उपकरण घ) कैडमियम जिंक टेलूराइड प्रतिबिम्बक सआस्ट्रोसैट के साथ प्रमोचित होने वाले अन्य उपकरण: इन्डोनेषिया का लपान-ए 2, कनाडा का इक्जैक्ट व्यू-9 तथा
  • अमेरिका के 4 नैनो उपग्रह स पी एस एल वी की: पी.एस.एल.वी.-सी 30 उड़ान संख्या।         

मिषन के विभिन्न चरण

आस्ट्रोसैट उपग्रह के नियोजन प्रक्रिया से लेकर प्रमोचन प्रक्रिया के निम्न चरण हैंः- 

  • 13 नवम्बर, 2014 : यू.वी.आई.टी. उपकरण इन्टीग्रेषन के लिए टीम को दिया गया।
  • मार्च, 2015 : सभी वैज्ञानिक नीतभार टीम को दे दिये गये तथा उनका अन्तरिक्ष यान के साथ इन्टीग्रेषन प्रारंभ कर दिया गया। अन्य ग्राउन्ड परीक्षण भी प्रारंभ हो गये।
  • 12 मई, 2015 : अन्तरिक्ष यान आस्ट्रोसैट का असेम्बली कार्य पूरा हो गया। असेम्बली के बाद के टेस्ट प्रारंभ किये गये।
  • 24 जुलाई, 2015 : थर्मोवैक चैम्बर में जांॅच पूरी। अन्तरिक्ष यान के साथ सौर पैनेल लगा दिये गये। आखिरी कम्पन टेस्ट प्रारंभ।
  • 10 अगस्त, 2015ः सभी जांॅचें ठीक निकलीं। स्थानान्तरण के पहले रिव्यू सफलतापूर्वक पूर्ण।
  • 22 अगस्त, 2015 : आस्ट्रोसैट उपग्रह 18 अगस्त को श्री हरिकोटा प्रमोचन स्थल पर पहुँच गया। पी.एस.एल.वी. के साथ     इसके इन्टीग्रेषन की तैयारी प्रारंभ हो गई।
  • 21 सितम्बर, 2015 :  आस्टोस्ट्रैट की पी.एस.एल.वी. के साथ इन्टीग्रेषन की प्रक्रिया पूर्ण। प्रमोचन की तिथि 28 सितम्बर, 2015 तय हुई।
  • 28 सितम्बर, 2015 : आस्ट्रोसैट का सुबह 10 बजे प्रमोचन।

आने वाले दिनों में आस्ट्रोसैट आखिरी प्रचालन विन्यास (कानफिगुरेषन) पर पहुँच जायेगी तथा इसके सभी वैज्ञानिक नीतभार नियमित प्रचालन के पहले जाँच लिए जायेंगे।

आस्ट्रोसैट उपग्रह के नीतभार

इस उपग्रह के निम्न 6 नीतभार उपकरण हैंः-

  • अल्ट्रावायलेट प्रतिविम्बन दूरबीन (यू वी आई टी)ः यह दूरबीन एक साथ तीन चैनलों 130.180 नैनोमीटर, 180.300 नैनोमीटर और 320.530 नैनोमीटर में प्रतिविम्बन प्रक्रिया सम्पन्न करेगी। इसकी दृष्टिगोचर फील्ड एक वृत्त है जिसका व्यास 28 आर्क मिनट और कोणीय विभेदन 1ण्8 सेकन्ड (अल्ट्रावायलेट चैनल के लिए) एवं 2ण्5 सेकन्ड (दृष्टिगोचर आवृत्ति स्पेक्ट्रम के लिए) है।
  • सॉफ्ट एक्स किरण प्रतिविम्बन दूरबीन (एस एक्स टी)ः 0ण्3 से 8 कि.मी. इलेक्ट्रान वोल्ट में एक्स किरण प्रतिवम्बन के लिए यह दूरबीन फोकल प्लेन में ध्यान केन्द्रित (फोकषिंग) और डीप रिक्तिकरण (डिप्लीषन) सी.सी.डी. कैमरे का प्रयोग करेगी।
  • विषाल क्षेत्रफल एक्स किरण समानुपाती काउन्टर (एल.ए.एक्स.पी.सी.) उपकरणः विस्तृत ऊर्जा बैन्ड (3ण्80 कि. इलेक्ट्रान वोल्ट) में एक्स किरण टाइमिंग और निम्न विभेदन स्पेक्ट्रमी अध्ययन के लिए आस्ट्रोसैट उपग्रह 3 एक समान एक रैखिक काउन्टरों का प्रयोग करेगा।
  • कैडमियम जिंक टेलूराइड प्रतिविम्बक (सी जे़ड टी आई)ः यह एक हार्ड एक्स किरण प्रतिविम्बक है।
  • क्रमवीक्षण आकाषीय मानीटर (एस.एस.एम)ः इसमें तीन स्थिति संवेदी समानुपाती काउन्टर लगे हैं। यह उपकरण नासा के एक उपग्रह आर.एक्स.टी.ई. में लगे उपकरण से मिलता जुलता है।
  • चार्ज कण मानीटर (सी.पी.एम.)ः आस्ट्रोसैट उपग्रह में यह उपकरण एल.ए.एक्स.पी.सी., एस.एक्स.टी. और एस.एस.एम. को नियंत्रित करने के लिए लगाया गया है। इस उपकरण का नियंत्रण विचित्र होगा। यद्यपि आस्ट्रोसैट का कक्षीय झुकाव 8 डिग्री या उससे भी कम होगा लेकिन इस उपकरण के नियंत्रण में उपग्रह साउथ अटलान्टिक एनोमैली के खतरों से बचा रहेगा। यह एनोमेली वह क्षेत्र होता है जिसमें उपग्रह उच्च ऊर्जा विकिरणों से प्रभावित होता है।   

प्रमोचित किये गये उपग्रहों का विवरण 

इस मिषन में 7 उपग्रहों का प्रमोचन किया गया। 1513 कि.ग्रा. के भारतीय उपग्रह आस्ट्रोसैट का जीवन काल 5 वर्ष का है तथा यह प्रकाषिकी, अल्ट्रावायलेट, निम्न और उच्च ऊर्जा एक्स किरण के द्वारा ब्रम्हान्ड का प्रेक्षण करेगा जब कि अधिकांष वैज्ञानिक उपग्रह ब्रह्मांड का प्रेक्षण संकीर्ण तरंग दैर्ध्य बैन्ड में करते हैं। इन्डोनेषिया का 76 कि.ग्रा. का लपान-ए2 उपग्रह उस देष की राष्ट्रीय एरोनाटिक्स और अन्तरिक्ष संस्था का उपग्रह है जिसका प्रमुख उद्देष्य स्वचालित पहचान तंत्र (ए.आई.एस.) के प्रयोग से समुद्री छानबीन सेवा प्रदान करना है तथा वीडियो और डिजिटल कैमरों के प्रयोग से तूफानों की गतिविधियों पर नजर रखना है। 14 कि.ग्रा. का एन.एल.एस.-14 (ई वी 9) उपग्रह टोरन्टो इंस्टीट्यूट ऑफ एडवान्स्ड स्टडीज का समुद्री मानीटरन नैनो उपग्रह है जिसमें अगली पीढ़ी के ए.आई.एस. तंत्र का प्रयोग किया गया है। बाकी चार लेम्यूर नैनो उपग्रह सानफ्रान्सिस्को स्थित स्पायर ग्लोबल इनकार्पोरेषन के उपग्रह हैं जो समुद्री सेवा के अन्तर्गत जलपोतों का अनुवर्तन करेंगे।

पी एस एल वी-सी30 उड़ान

आस्ट्रोसैट उपग्रह का प्रमोचन पी.एस.एल.वी. राकेट के द्वारा किया गया जिसकी उड़ान संख्या थी पी.एस.एल.वी.-सी 30। यह पी.एस.एल.वी. राकेट की 31वीं उड़ान थी। इस उड़ान की एक अन्य खास बात यह थी इसमें पी एस एल वी राकेट के ‘एक्स एल’ स्वरूप का प्रयोग किया तथा एक्स एल स्वरूप का प्रयोग करने वाली यह 10वीं उड़ान थी। 

प्रमोचन के लिए आस्ट्रोसैट उपग्रह का श्री हरिकोटा प्रमोचन केन्द्र में स्थानान्तरण

20 अगस्त, 2015 को भारत के प्रथम खगोलिकी उपग्रह आस्ट्रोसैट का स्थानान्तरण श्री हरिकोटा प्रमोचन केन्द्र में किया गया जिसका 28 सितम्बर 2015 को प्रमोचन होना था। इसरो के अनुसार इस उपग्रह का स्थानान्तरण इसरो उपग्रह केन्द्र (आईजैक) से विषिष्ट प्रकार के डिजाइन किए गये उपग्रह परिवहन तंत्र के द्वारा किया गया। आइजैक ने 16 अगस्त को इसको हरी झंडी दिखाई। सितम्बर, 2015 में आस्ट्रोसैट के प्रमोचन की पुश्टि इसरो के चेयरमैन श्री किरन कुमार ने की। उपग्रह परिवहन तंत्र (एस टी एस) उपग्रहों के स्थानान्तरण में अहम भूमिका निभाता है। आइजै़क केन्द्र के पास इस तंत्र के डिजाइन की असीम क्षमता है। वर्तमान में जी सैट-11 जैसे उपग्रहों के लिए एस टी एस तंत्रों का डिजाइन आइज़ैक में चल रहा है।

अन्तरिक्ष खगोलिकी प्रेक्षणषाला आस्ट्रोसैट के विशय में 6 खास बातें

आस्ट्रोसैट के विषय में 6 खास बातें निम्न हैं-

  • अन्तरिक्ष में खगोलिकी प्रेक्षणषाला के स्थापन का यह प्रथम भारतीय प्रयास है जिसके द्वारा ब्रम्हान्डीय परिघटनाओं का अध्ययन किया जा सकेगा।
  • मिषन का लक्ष्य उन आंकड़ों को प्राप्त करना है जिनसे ब्रम्हान्ड को ठीक से समझा जा सकेगा।
  • आस्ट्रोसैट को सामान्यतया भारत की हब्बल अंतरिक्ष दूरबीन कहा जा रहा है। हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन विष्व की सबसे प्रसिद्ध अन्तरिक्ष दूरबीन माना जाता है। यह दूसरी बात है कि हब्बल दूरबीन आस्ट्रोसैट उपग्रह से 10 गुना भारी है तथा इसकी (हब्बल) कीमत 2.5 बिलियन डालर थी जबकि भारत के आस्ट्रोसैट उपग्रह की कीमत 180 करोड़ रुपये है।
  • आस्ट्रोसैट उपग्रह भारत को उन देषों की श्रेणी मेें स्थापित करेगा जिनकी अपनी अन्तरिक्ष प्रेक्षणषालाएंॅ हैं जैसे अमरीका, जापान, रूस और योरोपीय अंतरिक्ष संस्था।
  • यह तीसरा मौका है जब एक भारतीय प्रमोचन राकेट ने एक मिषन के द्वारा 7 उपग्रहों का प्रमोचन किया है। वर्श 2008 में इसरो ने एक प्रमोचन के द्वारा 10 उपग्रहों का प्रमोचन किया था जिनमें भारत का कार्टोसैट-2 ए उपग्रह भी था।
  • भारत ने 10 जुलाई, 2015 तक 45 विदेषी उपग्रहों का प्रमोचन किया था। आस्ट्रोसैट उपग्रह के साथ 6 अन्य विदेशी उपग्रहों के प्रमोचन से भारत के द्वारा प्रमोचित विदेषी उपग्रहों की संख्या 51 हो गयी है।

आस्ट्रोसैट के प्रमोचन का काउन्ट डाउन

इस उपग्रह के प्रमोचन का 50 घन्टे का काउन्ट डाउन 26 सितम्बर 2015 को भारतीय समय 12रू53 बजे प्रारंभ हुआ। सोमवार को भारत ने अर्द्धषतक का माइलस्टोन प्राप्त कर लिया जब इसने 6 विदेषी उपग्रहों को उनकी निर्धारित कक्षा में पहुँचा दिया। इसके पहले तक भारत ने 45 विदेषी उपग्रहों का प्रमोचन किया था। सात उपग्रहों के साथ पी एस एल वी राकेट सोमवार को 10 बजे सुबह प्रमोचित किया गया तथा यह प्रमोचन आन्ध्र प्रदेष के श्री हरिकोटा केन्द्र से हुआ। वर्ष 2008 में इसरो ने एक साथ 10 उपग्रहों का प्रमोचन किया था जिसमें भारत का कार्टोसैट-2 ए उपग्रह भी षामिल था। अब इसरो ने अन्तरिक्ष इतिहास में तीसरी बार 7 उपग्रह एक साथ प्रमोचित किया है। बृहस्पतिवार को इसरो की मिषन तैयारी रिव्यू समिति तथा प्रमोचन अधिकृत करने वाले बोर्ड ने 50 घन्टे के काउन्ट डाउन को मंजूरी दी थी।
44ण्4 मीटर लम्बा, 320 टन भार वाला पी.एस.एल.वी.-एस.एल. स्वरूप राकेट एक 4 स्टेज वाला राकेट है जिसमें 6 स्ट्रैप आन मोटर लगे थे। ये स्ट्रैप आन मोटर प्रारंभिक चरण में अतिरिक्त प्रणोद प्रदान करने के लिए लगाये गये। प्रथम तथा तीसरी स्टेज ठोस नोदन तथा दूसरी और चौथी स्टेज द्रव नोदन से पावरित की गई। ठोस और द्रव नोदन के भरने की प्रक्रिया काउन्ट डाउन के दौरान की गई। नोदन भरने की प्रक्रिया के अलावा काउन्ट डाउन के दौरान भी सभी तंत्रों एवं उपतंत्रों की जाँच की गई। 
सोमवार को राकेट ने 1513 कि.ग्रा. के भारत के आस्ट्रोसैट उपग्रह, 4 उपग्रह अमरीका के तथा एक इन्डोनेषिया एवं एक कनाडा के उपग्रह का प्रमोचन किया। पी.एस.एल.वी. के कुल नीत भार का वजन 1631 कि.ग्रा. था। मात्र 22 मिनट की उड़ान में राकेट ने 650 कि.मी. की ऊँचाई पर आस्ट्रोसैट को कक्षा में छोड़ा। इसके बाद 6 अन्य उपग्रह कक्षा में स्थापित किये गये तथा सम्पूर्ण मिषन मात्र 25 मिनट में समाप्त हो गया।


आस्ट्रोसैट उपग्रह के निर्माण के भागीदार

ये भागीदार निम्न हैं-

  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो)
  • टाटा इंस्टीट्यूट आफ फन्डमेन्टल रिसर्च, मुम्बई
  • इन्डियन रिसर्च इंस्टीट्यूट, बंगलौर
  • रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट, बंगलौर
  • पुणे का खगोलिकी एवं वांॅतरिक्ष भौतिकी का अन्तर्विष्वविद्यालय केन्द्र
  • भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, मुम्बई
  • एस.एन. बोस नेषनल सेन्टर फॉर बेसिक साइंस, कोलकाता
  • कनाडा की अन्तरिक्ष संस्था
  • स लेसेस्टर विष्वविद्यालय

आस्ट्रोसैट उपग्रह के लिए ग्राउन्ड सपोर्ट

आस्ट्रोसैट उपग्रह के नियंत्रण के लिए ग्राउन्ड कमान्ड एवं नियंत्रण केन्द्र, इसरो उपग्रह केन्द्र बंगलौर में है। जब भी यह बंगलौर के ऊपर से गुजरेगा तो प्रत्येक पासिंग फेज में डाटा का डाउनलोड किया जायेगा। इस ग्राउन्ड नियंत्रण केन्द्र के ऊपर आस्ट्रोसैट उपग्रह 14 कक्षाओं में 10 कक्षाओं के दौरान गुजरेगा और दृष्टिगोचर होगा। आस्ट्रोसैट उपग्रह प्रत्येक दिन 420 गीगा बिट डाटा इकट्ठा करेगा जिसे इसरो के अनुवर्तन एवं डाटा अभिग्रहण केन्द्र में 10-11 कक्षाओं के दौरान डाउनलोड कर लिया जायेगा। आस्ट्रोसैट उपग्रह का नियंत्रण भारतीय डीप स्पेस नेटवर्क (आई.एस.डी.एन.) के 11 मीटर व्यास वाले एन्टेना से भी किया जायेगा जो बंॅगलौर से 40 कि.मी. दूर ब्यालालू गांॅव में स्थित है। डीप स्पेस अनुवर्तन के लिए यहाँ 32 मीटर, 18 मीटर और 11 मीटर व्यास वाले तीन एन्टेना हैं।

प्रमोचन तैयारी पूरी

इसरो ने 21 सितम्बर को यह घोषित कर दिया था कि आस्ट्रोसैट का प्रमोचन 28 सितम्बर को शार केन्द्र से सुबह 10 बजे किया जायेगा। यह पी.एस.एल.वी.-सी30 के द्वारा प्रमोचित होगा जो उपग्रह को 650 कि.मी. की कक्षा में स्थापित करेगा। इसरो के जन सम्पर्क निदेषक देवी प्रसाद कार्निक के अनुसार सभी प्रमोचन तैयारियांॅ पूरी हो चुकी थी। इसरो की बेव साइट के अनुसार, ‘आस्ट्रोसैट भारत का पहला खगोलिकी के प्रति समर्पित मिषन है जो दूरस्थ ब्रह्मान्डीय पिन्डों का अध्ययन करेगा। इस मिषन के द्वारा अल्ट्रावायलेट, प्रकाषिकी, निम्न और उच्च ऊर्जा एक्स-किरण तरंग बैन्डों पर एक साथ प्रेक्षण सम्भव होगा।’

निष्कर्ष

निसन्देह आस्ट्रोसैट उपग्रह का प्रमोचन भारत को बुलन्दियों पर पहुँचायेगा। अभी एक वर्ष ही बीता है जब भारत का प्रथम अन्तराग्रहीय मिषन मंगलयान ने अन्तरिक्ष की कक्षा में प्रवेष किया है। आस्ट्रोसैट भारत का दूसरा महत्वपूर्ण माइलस्टोन है जिसके अन्तर्गत भारत ने अपने प्रथम प्रयास में एक अन्तरिक्ष प्रेक्षणषाला अंतरिक्ष में स्थापित किया है। 6 नीतभारों से लैस आस्ट्रोसैट उपग्रह को नासा की हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन के समतुल्य माना जा रहा है जिसका (हब्बल का) प्रमोचन 1990 में किया गया था तथा जो आज भी प्रचालित है। आस्ट्रोसैट के सभी नीतभार और उपकरण ब्रह्मान्डीय प्रक्रियाओं को समझने के लिए हैं तथा मिषन का प्रमुख लक्ष्य उन आंकड़ों को प्राप्त करना है जो मानव के द्वारा ब्रम्हान्ड की समझ को बढ़ायेंगे। कुछ मामलों में आस्ट्रोसैट इसरों के लिए बहुत भिन्न मिषन है तथा यह इसरो की क्षमताओं को एक नया आयाम देगा। चन्द्र और मंगल मिषन-चन्द्रयान-1 और मंगलयान मूल रूप से तकनीकी प्रदर्षन मिषन थे जब उनकी योजना बनाई गई थी। ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि इनमें वैज्ञानिक अवयव नहीं था अथवा इन्होंने हमारे वैज्ञानिक ज्ञान को नहीं बढ़ाया। चन्द्रयान-1 ने चन्द्र सतह पर पानी होने की पुष्टि की। लेकिन आस्ट्रोसैट के साथ ये सारे मिषन भारत की अन्तरिक्ष अन्वेषण की तीव्र और प्रबल नींव की आधार षिला रखने में सक्षम हुए हैं।
पिछले तीन दसकों में इसरो ने जो उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित किये हैं वे मूल रूप से विभिन्न उपयोगों- सुदूर संवेदन, संचार, मानचित्रण, नेविगेषन और अन्य क्षेत्रों के लिए थे। लेकिन आस्स्ट्रोसैट मिषन उस लक्ष्य की पूर्ति के लिए है जो अन्तरिक्ष संस्था (इसरो) का कोर लक्ष्य है- खगोलिकी परिघटनाओं का अध्ययन। वैसे तो खगोलिकी प्रेक्षण पृथ्वी से भी किया जा सकता है तथा इसके लिए पृथ्वी में अनेक षक्तिषाली दूरबीनें स्थापित की गयी हैं लेकिन अन्तरिक्ष में स्थित खगोलिकी प्रेक्षणषाला की अपनी अलग खूबियांॅ हैं। पृथ्वी के चारों ओर का वायुमंडल अन्तरिक्ष से आने वाले सिग्नल को बाधित (इन्टरफीयर) करता है तथा उसके गुणों में परिवर्तन करता है। इसीलिए पृथ्वी स्थित प्रेक्षणषालाओं में अभिग्रहित संग्नल संषोधित सिग्नल होते हैं। परिषुद्धता लाने के लिए इन्हें एडजस्ट किया जाता है। इसके विपरीत अन्तरिक्ष में स्थित कोई प्रेक्षणषाला षुद्ध सिग्नल प्राप्त करती है। आषा है कि अनेक प्रकार की अन्तरिक्ष क्षमताओं के साथ 1500 कि.ग्रा. की आस्ट्रोसैट प्रेक्षणषाला, जिसका जीवनकाल 5 वर्ष है, इसरो को उन देषों के विषिष्ट क्लब में खड़ा कर देगी जिनके पास अपनी अन्तरिक्ष आधारित प्रेक्षणषालाएंॅ हैं। इस प्रकार की प्रेक्षणषालाएँ अब तक केवल अमरीका, योरोपीय अन्तरिक्ष संस्था, जापान और रूस के पास हैं।

आस्ट्रोसैट मिषन के ऊपर विभिन्न वैज्ञानिकों की टिप्पणियाँ

आस्ट्रोसैट मिषन के लिए इसरो के भूतपूर्व चेयरमैन प्रो. यू.आर. राव के नेतृत्व में एक टीम ने उन पाँच नीतभारों का चयन किया था जो आस्ट्रोसैट उपग्रह में लगाये गये। एक इसरो पदाधिकारी के अनुसार, ‘यह मिषन एक पृथ्वी परिक्रमण उपग्रह का प्रतिनिधित्व करता है जो एक साथ ब्रम्हान्ड का दृष्टिगोचर, अल्ट्रावायलेट और एक्स किरण स्पेक्ट्रम में प्रेक्षण कर सकता है।’ टाटा इंस्टीट्यूट आफ फन्डामेन्टल रिसर्च (टी आई एफ आर) के भूतपूर्व वैज्ञानिक डॉ. पी.सी. अग्रवाल के अनुसार (जो आस्ट्रोसैट उपग्रह के एक प्रमुख उपकरण के डिजाइनर थे) प्रथम एक्स किरण खगोलिकी उपग्रह परीक्षण (जिसका नाम आई.ए.एक्स.ई. था) के बाद अनेक लोगों ने, जिनमें भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम के प्रमुख प्रणेता थे, सोचा कि यह सही समय है जब इसरो को बड़े अन्तरिक्ष खगोलिकी परीक्षणों पर चिन्तन करना चाहिए। इसरो के अन्य भूतपूर्व चेयरमैन डॉ. के कस्तूरीरंगन के अनुसार, ‘एक महान खगोलिकी मिषन के रूप में आस्ट्रोसैट का विचार आईजै़क/इसरो, टी आई एफ आर और अन्य संस्थाओं के वैज्ञानिकों के सामूहिक चिन्तन का परिणाम है।’
अन्य टिप्पणियों के अनुसार भारत की प्रथम अन्तरिक्ष प्रेक्षणषाला ‘आस्ट्रोसैट’ जो कि खगोलिकी के लिए पूर्ण रूपेण समर्पित है, हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन का लघु रूप है। यह हब्बल अंतरिक्ष दूरबीन, रूस की स्पेक्टर आर तथा जापान की सुजाकू के बाद चौथी अन्तरिक्ष प्रेक्षणषाला है। इसरो के वर्तमान चेयरमैन श्री ए.एस. किरन कुमार के अनुसार, ‘बहु तरंग दैर्ध्यों-यू वी, दृष्टिगोचर और एक्स किरण में काम करने वाले उपकरणों के चयन के कारण ‘आस्ट्रोसैट’ उपग्रह अति विषिष्ट है। इसके उपकरण एक साथ कास्मिक श्रोतों का विभिन्न तरंग दैर्ध्यों पर प्रेक्षण कर सकेंगें। यह एक ऐसा क्षेत्र है जिनमें वर्तमान की प्रेक्षणषालाओं की अपनी सीमायें हैं।’ आस्ट्रोसैट के सफल प्रमोचन पर इसरो चेयरमैन ने कहा, ‘मैं सम्पूर्ण इसरो समुदाय को इतने अच्छे कार्य के लिए बधाई देता हॅूं।’ यह बात उन्होंने मिषन नियंत्रण केन्द्र में कहीं।
आस्ट्रोसैट के सफल प्रमोचन पर विज्ञान और तकनीकी कैबिनेट मंत्री डॉ. हर्ष वर्द्धन ने वैज्ञानिकों को बधाई दी। पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘मैं अपने देषवासियोें के साथ यह खुषी बांॅटना चाहता हँू क्योंकि भारत खगोलिकी विज्ञान में महत्वपूर्ण अनुसंधान करना चाहता हैै।’ आस्ट्रोसैट तैयार करने वाले संस्थाओं में षामिल टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फन्डामेन्टल रिसर्च के प्रोफेसर एन. आर. राव ने कहा, ‘हमने इसके लिए एक समर्पित टीम का गठन किया जो पिछले 14 वर्षों से इस महत्वाकांक्षी योजना को सफल बनाने के लिए कड़ी मेहनत कर रही थी।’

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