विज्ञान

(18/Nov/2015)

विज्ञान लोकप्रियकरण, वैज्ञानिक सोच का विकास और हिन्दी

डॉ. नरेन्द्र सहगल

विज्ञान लोकप्रियकरण को लेकर इस आलेख में मैं जिस ‘विज्ञान‘ शब्द का प्रयोग करूंगा उसे पारिभाषित करना आवश्यक है। इसलिये कि विभिन्न लोगों के लिये इस शब्द के भिन्न 2 अर्थ हो सकते हैं। ज़रा सोचिये, ‘विज्ञान’ शब्द कहते ही आपके मन में कैसी छवि उभरती है? कैसे चित्र, या चलचित्र बनते हैं? निस्सन्देह, हर व्यक्ति के मन में बनने वाली छवि अलग ही होगी। हां, अलग-अलग  छवियों में कुछ समान और मिलते जुलते पुट हो सकते हैं। 
किसी व्यक्ति के मन में ‘विज्ञान’ की यह छवि कैसे और किस आधार पर बनती है? कारकों की सूची लम्बी हो सकती हैं। इन में सम्मिलित हैं, विज्ञान के साथ वैयक्तिक अनुभव, विद्यार्थी जीवन के अनुभव, रोजमर्रा के जीवन में विज्ञान के विभिन्न पहलुओं से पाला, जन संचार माध्यमों (जैसे समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, रेडियो, टेलीविजन, इन्टरनेट, इत्यादि) द्वारा प्रचारित-प्रसारित विज्ञान के विभिन्न पहलुओं का चित्रांकन ओर रेखांकन। ‘विज्ञान’ शब्द से आपके मन-मस्तिष्क में बनने वाली छवि निर्भर करेगी इस बात पर कि पूर्व उल्लेखित (या तथा अन्य) कारकों में से उसमें किसका कितना योगदान हो पाता है। स्पष्ट है कि, यह हर व्यक्ति के लिये भिन्न होगा, और हर छवि भिन्न होगी। 
अधिक बारीकी में न जाकर, यदि हम केवल जन संचार माध्यमों द्वारा हमारे मन में बैठाई-बसाई जाने वाली विज्ञान की छवि तक सीमित रहें, तो इस छवि में निम्न प्रबल अंश अवश्य दिखाई पड़ेंगेः विज्ञान कठिन है, या आसान नहीं है; यह सभी के लिये भी नहीं है। यह पाया जाता है, बड़ी-बड़ी प्रयोगशालाओं/संस्थानों में जो झिलमिलाती, जलती-बुझती, लाल, पीली और हरी बत्तियांे से सुसज्जित उपकरणों, संयन्त्रों, कम्प्यूटरों, से लैस होती हैं, और जिनमें सफेद कोट, या सूटबूट पहने, सर्वदा व्यस्त दिखने वाले वैज्ञानिक काम करते हैं; विदेशी विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं में जहां से नई-नई विज्ञान की खोजों, आविष्कारों, और नये नये हथियारों के सृजन और अचम्भित कर देने वाली उपयोगिताओं, इत्यादि के समाचार प्रायः प्राप्त होते हैं;े और कि विज्ञान की नई-नई खोजें और आविष्कार विदेशों (यानि, अमेरिका, यूरोप या जापान) ही में होते हैं, और इनके साथ किसी भारतीय या भारतीय मूल के वैज्ञानिक का नाम कभी आ भी जाता है, तो वह किसी विदेशी संस्थान ही में कार्यरत होता है। अन्तरिक्ष क्षेत्र के सिवाय, जन-संचार माध्यमों में प्रचारित और प्रसारित समाचारों और सूचनाओं के आधार पर तो यही परिणाम निकाला जा सकता है, कि भारतीय संस्थानों, विश्वविद्यालयों ओर प्रयोगशालाओं में विज्ञान विषयों पर ऐसा कुछ नहीं हो रहा, जो बताने या दिखाने योग्य हो । 
यहां पर यह उल्लेख करना भी आवश्यक है कि संचार माध्यम जिन वस्तुओं, पदार्थों, घटनाओं, समाचारों इत्यादि का सहारा लेकर आपके/हमारे मन-मस्तिष्क में ‘विज्ञान’ की छवि रचते हैं, उनमें विज्ञान और उस के सि़द्धांत कम, तकनीक, प्रौद्योगिकी, यानि टैक्नॉलोजी, में दक्षता और उनके सृजनात्मक पहलु अधिक दिखाई पड़ते हैं। ‘विज्ञान’ की ऐसी छवि लेकर भारतीयों में विज्ञान को लोकप्रिय बनाना टेढ़ी खीर हो सकता है। यदि भारतीय संचार माध्यमों ने विज्ञान के क्षेत्र में देशवासियों की परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुकूल, अपनी समझ और विवेक का उपयोग करके इस ओर प्रयास किये होते, तो हमारे मन में ‘विज्ञान’ की एक अलग ही छवि उभर कर आती। विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिये, हम भारतीयों और हमारी ज़मीनी परिस्थितियों के अनुकूल और वास्तविकता के कहीं अधिक करीब - विज्ञान की निम्न छवि होतीः
विज्ञान कठिन नहीं है; विज्ञान हर जगह हैः घर में; कार्यस्थल, खेत और खलिहान में, ज़मीन पर, आकाश में, हवा में, जल में, रसोई में, इत्यादि। कोई भी इच्छुक, विज्ञान को जान सकता है, सीख सकता है, और कर सकता है, यानि विज्ञान सब के लिये है। विज्ञान को कहीं भी किया जा सकता है; हमारे आस-पास का पूरा वातावरण एक विशाल प्रयोगशाला है। हमारे दो नेत्र, दो हाथ, और दिमाग, सर्वोत्तम उपकरण हैं, विज्ञान को स्वयं कर के देखने के लिये; और कोई भी पोशाक पहन कर ‘विज्ञान’ किया जा सकता है। कोई भी कहीं कुछ नया कर सकता है, हम भारतीय उस जैसा ही क्यों, उससे बेहतर कर सकते हैं। स्वयं और अपनी कार्यक्षमता में हमे पूर्ण विश्वास होना आवश्यक है। उदाहरणः अन्तरिक्ष विज्ञान में हमने कर दिखाया है।
यदि अधिकतर जन-संचार माध्यम ‘विज्ञान’ की अधिक उपयुक्त और इस अधिक वास्तविक छवि को संचारित एवं प्रचारित करने का प्रयत्न करें, तो विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के प्रयासों को बेहतर सफलता मिल सकती है, और वे अधिक प्रभावी सिद्ध हो सकते हैं।     
इस आलेख के लिये ‘विज्ञान’ को पारिभाषित करने से पूर्व, विज्ञान की छवि पर चर्चा आवश्यक थी। लोकप्रियकरण के संदर्भ में ’विज्ञान’ शब्द का उपयोग, विभिन्न रूपों में इसकी सभी अभिव्यक्तियों, जैसे प्रौद्योगिकी के रूप में इसके उपयोगों, उपलब्धियों, उपकरणों, इत्यादि, तथा इसके सिद्धांतों और काम करने की विधि, को इसमें समाहित मान कर किया जायेगा।

विज्ञान लोकप्रियकरण: क्यों और कैसे ?

आम आदमी समेत हम सभी भारतीयों में विज्ञान को लोकप्रिय बनाना चाहते हैं। इस से देश और नागरिकों को लाभ होगा। अन्य के अलावा, विज्ञान लोकप्रियकरण सेः लोगों में वैज्ञानिक जागरूकता बढ़ेगी। इससे लोग, वैज्ञानिक पहलुओं वाली समस्याओं और मुद्दों के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों का बेहतर विश्लेषण करने की स्थिति में होंगे; विज्ञान (और प्रौद्योगिकी) सम्बन्धी मुद्दों पर विवादों में बेहतर भागीदारी सम्भव हो सकेगी; लगातार अग्रगमण करती हुई प्रौद्योगिकी (यानि, टेक्नॉलॉजी) के महत्व की बेहतर समझ द्वारा उससे लाभ उठा सकेंगे; हर प्रकार के दावों को यूं ही सच मान लेने की प्रवृत्ति कम होगी; जिज्ञासा और कौतूहल बढ़ेंगे और प्रश्न पूछने की आदत प्रबल होती जायेगी, अन्धविश्वासों और चमत्कारों से कम प्रभावित होंगे; तथ्यों और कल्पनाओं में बेहतर भेद कर सकेंगे; किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर अपना पक्ष बेहतर प्रस्तुत कर सकेंगे; चर्चाओं के दौरान, आत्मविश्वास बना रहेगा और अधिक आश्वस्त अनुभव कर सकेंगे, इत्यादि।
वैसे भी, विश्व की विज्ञान पर बढ़ती हुई निर्भरता, और रोज़मर्रा के जीवन में विज्ञान के लगातार बढ़ते हुए प्रभाव और दख़ल को ध्यान में रखते हुए, भारत में ही नहीं, विश्व भर में हर नागरिक के लिये आवश्यक है कि वह वैज्ञानिक रूप से साक्षर हो। ठीक उसी प्रकार जैसे, कहीं भी, किसी स्वाभिमानी नागरिक के लिये पढ़ना, लिखना, और मूल गणना करना, आना - यानि व्यावहारिक ‘साक्षरता’ - आवश्यक है।
मेरा यह मानना है कि कहीं भी पैदा होने वाला, हर स्वस्थ बच्चा जिज्ञासा, कौतुहल और प्रश्न पूछने की प्रवृत्तियों को साथ लेकर ही इस दुनिया में आता है। लेकिन, घर में अनुकूल वातावरण न होने के कारण, बहुत से बच्चों में, स्कूल पहंुचने तक इन प्रवृत्तियों का पचास, प्रतिशत से अधिक ह्रास हो चुका होता है। बाकी की कसर, स्कूल में शिक्षा के दौरान, पूरी हो जाती है। यानि, ये प्रवृत्तियां या तो पूरी तरह लुप्त हो जाती हैं, या उन का लेश मात्र ही बच्चे में बचा रह पाता है।
एक बात और। चूंकि हमारी शिक्षा प्रणाली में, दसवीं श्रेणी तक सभी छात्रों के लिये विज्ञान अनिवार्य है, तर्क तो यही कहता है कि दसवीं तक पढे़ सभी बच्चों में विज्ञान तो पहले ही से लोकप्रिय होना चाहिए। लेकिन, क्या ऐसा होता या हो पाता है? ऐसा लगता तो बिलकुल नहीं है। एक प्रमाण तो यही है कि, स्कूल की पढ़ाई के बाद, कॉलेज में विज्ञान विषयों मंे प्रवेश पाने के इच्छुक विद्यार्थियों की संख्या हर वर्ष घट रही है। तो क्या यह समझा जाये कि बच्चों को विज्ञान विषयों से डराने या दूर करने में स्कूली विज्ञान शिक्षा या शिक्षकों का हाथ है। यानि, यदि किसी विषय में शिक्षा ही छात्रों में रुचि बढ़ा नहीं सकती तो शिक्षा, शिक्षकों पर सवाल उठना स्वभाविक है। एक निष्कर्ष और भी निकलता है: विज्ञान शिक्षा प्राप्त, सभी लोगों को विज्ञान लोकप्रियकरण हेतु लक्षित वर्गों से बाहर नहीं रखा जा सकता। और आगे बढ़ने से पहले वैज्ञानिक सोच और हम सभी के लिये इसकी आवश्यकता पर ध्यान दिया जाये। किसी की  भी सोच, जागृत क्षणों में, सर्वदा सक्रिय रहती है। मन-मस्तिष्क में कुछ न कुछ चलता ही रहता है। कुछ देखने, सुनने, पूछे जाने या कल्पना करने से सोच उसी वस्तु या विषय पर केन्द्रित हो जाती है क्योंकि हमारी सोच भी हमारे स्वयं के कार्य करने के तरीके पर आधारित होती है, इसे वैज्ञानिक बनाने और इसकी आवश्यकता भी उन्हीं लक्ष्यों से प्रेरित है, जो हम विज्ञान लोकप्रियकरण द्वारा प्राप्त करना चाहते हैं। इनका उल्लेख हम पहले ही (ऊपर) कर चुके हैं।

वैज्ञानिक सोच का विकास

वैज्ञानिक सोच के विकास के लिये आवश्यक है कि लोगों द्वारा विज्ञान-विधि को आत्मसात्  किया जाये। बिल्कुल ऐसे ही जैसे दो पहिया सायकल को चलाना सीखने के पश्चात यह आत्मसात् होकर हमारा अभिन्न अंग बन जाता है, और उसे हमसे कोई अलग नहीं कर सकता। ‘विज्ञान-विधि’ का भी हमारे अंदर सायकल चलाने के कौशल की तरह, घर कर जाना, आवश्यक है जिससे वह हमारा स्वयं का काम करने का तरीका बन जाए।
मात्र विज्ञान लोकप्रियकरण हेतु किए जाने वाले प्रयासों द्वारा विज्ञान विधि का लोगों द्वारा आत्मसात् किया जाना संभव नहीं है। ठीक, वैसे ही, जैसे सायकल चलाना सीखने के लिए, इस विषय पर व्याख्यान सुनने, वीडियो फिल्म देखने, या किसी और को ऐसा करते हुए देखने मात्र से, यह कौशल प्राप्त नहीं हो सकता। इसके लिए, आपको स्वयं सायकल पर सवार होकर उसे चलाने का कौशल स्वयं (या किसी की सहायता से) सीखना होगा। प्रयास करते समय शायद एकाध बार ज़मीन पर गिरना भी पड़ सकता है। चलाना सीख जाने के पश्चात्, अभ्यास करने से, आप इस कौशल में बेहतर और पूर्णतयः दक्ष हो सकेंगे। यही कुछ, कार चलाने के कौशल पर भी लागू होता है। विज्ञान विधि को आत्मसात् करके, इसे अपने काम करने का तरीका बनाने के लिए भी आपको ‘स्वयं करके’ सीखना पड़ेगा और अधिक अभ्यास से आप इस में बेहतर दक्षता प्राप्त कर सकेंगे।

विज्ञान विधि

इस आलेख के संदर्भ में, विभिन्न विज्ञान क्षेत्रों में, विषय-वस्तु से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, विज्ञान की विधि, यानि सभी विज्ञान क्षेत्रों में काम करने का विशिष्ट तरीका। वैज्ञानिक सोच, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, वैज्ञानिक मिज़ाज, अलग-अलग अर्थ वाले शब्द हो सकते हैं, लेकिन इन सब को परस्पर जोड़ने वाली सांझी कड़ी है, विज्ञान-विधि। यदि कहा जाए कि इन सब - यानि वैज्ञानिक सोच, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वैज्ञानिक मिज़ाज - को विकसित करने और बढ़ावा देने के लिए लोगों द्वारा ‘विज्ञान-विधि’ को स्वयं में समाहित या आत्मसात करना आवश्यक हैं, तो अतिश्योक्ति न होगी। चलो देखें, यह विज्ञान-विधि है क्या!
विज्ञान-विधि में सम्मिलित हैंः जिज्ञासा, कौतूहल, प्रश्न पूछना और उनके उत्तर ढूंढ़ना; सभी उपलब्ध संबंद्ध तथ्यों, जानकारियों और प्रमाणों का संज्ञान लेना, यदि कुछ सामने न आता प्रतीत हो, उसे ढूंढ़ या खोज निकालना; सभी (कही और अनकही) मान्यताओं की जांच-पड़ताल करना, दावों का प्रयोगात्मक सत्यापन करना और इन सभी के आधार पर ही किसी निर्णय, परिणाम या निष्कर्ष तक पहुंचना।
ऐसा भी नहीं है कि, इस तरीके/विधि का उपयोग अन्य लोगों/संस्थाओं द्वारा अपने काम में बिल्कुल नहीं किया जाता, या नहीं किया जा रहा। वास्तव में, सभी लोग, हम और आप समेत, अपनी सुविधानुसार इसका उपयोग करते रहते हैं, घर में, अपने व्यवसाय में, निजि जीवन में, और अन्य हर जगह भी। अन्तर मात्र इतना है, कि विज्ञान के सभी क्षेत्रों में काम करने के लिये इस विधि का शतप्रतिशत अपनाया जाना, बिना किसी अपवाद के, अनिवार्य है। जबकि अन्य क्षेत्रों में काम के लिये, यह शतप्रतिशत अनिवार्य नहीं है। मेरी मानो तो हर क्षेत्र में, लगभग हर काम के लिये इस विधि का अनिवार्य न होना, या अनिवार्य न समझा जाना, ही हमारे समक्ष अधिकांश अनसुलझी समस्याओं को अभी तक सुलझा न पाने का एक मुख्य कारण है। कुछ उदाहरणों से, बात अधिक स्पष्ट हो जायेगी और विज्ञान विधि के बारे में सही धारणा बनाने में सहायता मिलेगी। समाज में इसका सर्वोत्तम उदाहरण है, चोरी और हत्या जैसी घटनाओं के बाद, अपराधियों को खोजने और सच्चाई तक पहुंचने के लिये अपनाई जाने वाली कार्यविधि। यह विज्ञान विधि ही तो है। सभी, शायद, हेमराज-आरुषी हत्याकांड की यादें भूले नहीं होंगे। वास्तव में, इस मामले में, घटना के उजागर होने के तुरन्त बाद लापरवाही के कारण, बहुत से सम्भव प्रमाण और प्रमाण-सूत्र नष्ट हो जाने के कारण, विज्ञान-विधि का सही उपयोग नहीं हुआ। रोज़मर्रा के जीवन में, खरीदारी करते समय, गुणवत्ता और मूल्यों के मामले में; निवेश करते समय, कम्पनी के रिकार्ड, उसकी आर्थिक सेहत, काम-काज करने के ढंग, जैसे कई कारकों की जांच करते समय; निवेश के लिये उपलब्ध नकदी से होने वाले वांछित लघु या लम्बी अविध से आशातीत लाभ प्राप्त करने के मामले में; अपनी बेटी के लिये योग्य और हर प्रकार के उपयुक्त वर ढूंढने के मामले में, इत्यादि, विज्ञान-विधि का ही उपयोग तो करते हैं, सभी लोग।
यह आवश्यक नहीं कि हर मामले में विज्ञान-विधि के सभी पहलुओं और तत्वों का प्रयोग करना पड़े। बहुत बार, मात्र जिज्ञासा और प्रश्न पूछने और उनके उत्तर प्राप्त करने की प्रक्रिया में ही काम बन जाता है।
इसके विपरीत, ऐसे भी बहुत से उदाहरण हैं, जहां हम विज्ञान विधि का उपयोग न करते हुए, धोखेबाज़ी और धोखेबाज़ों की बातों में आकर उनके शिकार बन जाते हैं। जैसे, पैसा और गहनों को दो गुणा करने के लालच में; बैंकों में सामान्यतः उपलब्ध अधिकतम ब्याज दर से कहीं अधिक ब्याज दर पाने के लालच में, इत्यादि। इन सभी उदाहरणों में, पढ़े-लिखे लोग भी पीड़ितों में सम्मिलित पाये जाते हैं।
उदाहरण और भी बहुत हैं। यह तो स्पष्ट है कि विज्ञान-विधि काम करने की एक विधि/तरीका भर है। विज्ञान से जोड़ कर, इसे मात्र इसलिये प्रस्तुत किया जाता है, क्योंकि दुनिया भर में विज्ञान के सभी क्षेत्रों में, और सभी वैज्ञानिकों द्वारा, अपने काम में इसका सर्वाधिक प्रयोग किया जाता है। अन्यथा, काम-काज करने के तरीके या एक विधि के रूप में, इसका विज्ञान से कुछ लेन-देन आवश्यक नहीं हैं जैसा कि ऊपर उल्लेख भी किया जा चुका है, नाममात्र, कम या अधिक, हर कोई इसका उपयोग, अपनी आवश्यकतानुसार करता रहा है, और कर रहा है। इस सब का एक और अर्थ भी निकलता हैः वैज्ञानिक सोच हम सभी में जन्म से ही होती है, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति में इसका विकास, उस व्यक्ति द्वारा अपने जीवन, काम-काज में, उसके उपयोग पर निर्भर करता है। 
भारत में, ‘विज्ञान लोकप्रियकरण तथा वैज्ञानिक सोच के विकास’ हेतु किये जा रहे प्रयासों पर चर्चा और कुछ उदाहरण प्रस्तुत करने से पहले इन सब कार्यों में हिन्दी की भूमिका पर ध्यान देना आवश्यक है। ‘हिन्दी की भूमिका’ विषय कुछ प्रश्न उठाता है। यह विषय, प्रौद्योगिकी, रेडियो, टेलीविज़न, लोक-कथाओं, लोक संगीत, कथा-कहानी, जादू..... इत्यादि की भूमिका जैसा विषय तो निश्चित रूप से नहीं है। हां, यह पंजाबी, मराठी, तमिल, गुजराती..... इत्यादि अन्य भारतीय भाषाओं की भूमिका, जैसा समानान्तर विषय अवश्य है। यानि, किसी भी भाषा की भूमिका सम्बन्धी प्रश्नों के उत्तरों की रूपरेखा लगभग एक जैसी ही होनी चाहिये। अतः, इस दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के संदर्भ में, मैं निम्नलिखित में, इससे अलग प्रश्न पूछना चाहूंगा। उस के उत्तर ढूंढना, सुझाना या जुटाना शायद अधिक लाभकारी सिद्ध हो सकता है।

हिन्दी: विज्ञान की भाषा?

भारत और विश्व भर में हिन्दी भाषियों - यानि हिन्दी बोलने, पढ़ने, लिखने और समझ सकने वालो - की संख्या इतनी अधिक है कि विज्ञान लोकप्रियकरण और वैज्ञानिक सोच के विकास हेतु, समस्त प्रयासों में हिन्दी का उपयोग किया जाना अत्यावश्यक है। भारत में ऐसा करने का प्रयत्न भी किया गया है। लेकिन, यह स्वीकार करना पड़ेगा कि वर्तमान में इस प्रकार के प्रयासों में, हिन्दी का उपयोग, मात्रात्मक एवं गुणात्मक दृष्टियों से, आवश्यकता के अनुकूल बिल्कुल भी नहीं है। ऐसा इसलिये है कि अभी तक, स्वतन्त्रता के इतने वर्षों के बाद भी, हम हिन्दी को ‘विज्ञान की भाषा’ नहीं बना सके हैं। क्या हिन्दी विज्ञान की भाषा बन सकती है? यदि हां, तो क्या निकट भविष्य में ऐसा हो सकता है?
वैसे, असम्भव तो कुछ भी नहीं होता। लेकिन, हिन्दी को विज्ञान की भाषा बनने, या बनाने, के लिये जिन-जिन स्थितियों और परिस्थितियों का होना आवश्यक है, दूर-दूर तक भी, किसी क्षितिज पर दिखाई नहीं पड़तीं। शुरू से अन्त तक विज्ञान विषयों में शिक्षा के लिये अच्छे शिक्षक, मूल रूप से हिन्दी में रचयित, सभी आवश्यक पाठ्य पुस्तकें, संदर्भ पुस्तकें, तरह तरह की अभ्यास पुस्तकें, सहायक, पूरक और अन्य सम्बद्ध पुस्तकंे सहजता से प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होनी आवश्यक हैं। हर श्रेणी के लिये, हर विज्ञान विषय में, पाठ्य और अन्य सभी प्रकार की पुस्तकों के हिन्दी में ही कई सारे अच्छे विकल्पों का उपलब्ध होना भी आवश्यक है। इस सब के बीच ऐसी स्थिति उत्पन्न होनी चाहिये कि, अन्य विकल्प होते हुए भी, बहुत से माता-पिता अपने बच्चों को विज्ञान शिक्षा हिन्दी में दिलाने के इच्छुक प्रतीत हों।
ऐसी स्थिति तब उत्पन्न हो सकेगी, जब अनुसंधानकार्यों में हिन्दी का उपयोग होगा, और शोध पत्रिकाओं में उच्च कोटि के उपयोगी आलेख, सर्व प्रथम हिन्दी ही में प्रकाशित होना आरम्भ हो जायेंगे। इनमें से बहुत से शोध पत्र ऐसे होने होंगे जिनकी विषय वस्तु की उपयोगिता, नयेपन और सम्भावनाओं के कारण, विश्व में अन्य शोधकर्ता इन आलेखों को पढ़ना चाहेंगे और पढ़ कर लाभ उठाना चाहेंगे। यदि इस प्रकार के शोध साहित्य में गुणात्मक और मात्रात्मक वृद्धि इतनी हो जाये कि अन्य देशों के शोधकर्ता, हमारे हिन्दी शोध-पत्रों से लाभ उठाने हेतु, हिन्दी सीखने या हमारे शोध पत्रों का नियमित रूप से अनुवाद करवाने के लिये विवश हो जायें, तो उस स्थिति में हिन्दी विज्ञान की भाषा बन जायेगी। तो, संक्षेप में, हिन्दी विज्ञान की भाषा तब बनेगी, जब किसी विज्ञान विषय, या विषयों, पर मात्र हिन्दी में नियमित रूप से प्रकाशित सामग्रियों में, अहिन्दी भाषियों को कुछ ऐसा लाभकारी प्राप्त होता दिखे, जो उन्हें कहीं और से प्राप्य ही न हो, और जिसकी उन्हें अत्यन्त आवश्यकता हो। ये प्रकाशित सामग्रियां कैसी विषय वस्तु लिये हो सकती हैं? किसी जटिल वैज्ञानिक समस्या से सम्बंध महत्वपूर्ण शोध के परिणाम हो सकते हैं। किसी बिल्कुल नये खोजे गये ‘पदार्थ’ की उपयोगिताओं के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी हो सकती है और आगे के शोध के बारे में छिपे संकेत प्राप्त हो सकते हैं। इत्यादि, इत्यादि। यानि ऐसा कुछ भी, जिसमें अन्य लोगों को किसी प्रकार का यथेष्ठ लाभ दिखाई पड़े। अब आते हैं भारत में ‘विज्ञान लोकप्रियकरण और वैज्ञानिक सोच के विकास’ हेतु किये जा रहे प्रयासों की चर्चा पर और प्रस्तुत करते हैं उनसे कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण।

प्रयास एवं उदाहरण

विज्ञान को लोकप्रिय बनाने हेतु विश्वभर में बहुत विभिन्न तरीके अपनाये जाते हैं। इनमें कुछ प्रमुख हैं, विज्ञान संग्रहालय, बड़े और छोटे विज्ञान केन्द्र, विज्ञान नगर, तारामण्डल, विज्ञान प्रदर्शनियां, दृश्य-श्रव्य प्रदर्शन, चलती-फिरती प्रयोगशालायें, विज्ञान खेल-खिलौने, स्वयं-कर-के-देखने और सीखने वाले किट्स और प्रयोग; विज्ञान विषयों/प्रयोगों पर पोस्टर सेट्स, सीडीज़, चलचित्र, विज्ञान पहेलियां, विज्ञान पुस्तकें, विज्ञान समाचार पत्र-पत्रिकायें, विज्ञान कवितायें, विज्ञान नाटक-नाटिकायें, विज्ञान रेडियो और टेलिविज़न धारावाहिक, विज्ञान चर्चायें, सम्वाद और वाद-विवाद; विज्ञान गल्प कथायें, विज्ञान मोबाईल फोन संदेश, इत्यादि इत्यादि। इन सब का प्रयोग भारत में भी किया जा रहा है, वर्षों से। इनमें कुछ तो बहुत पुराने और परम्परागत तरीके हैं; कुछ का आधुनिकीकरण किया गया है; कुछ नये और अपरम्परागत तरीके भी हैं, जो कहीं से आरम्भ होकर, अन्य जगहों पर भी अपना लिये गये हैं। 
लेकिन, अस्सी दशक के प्रथम पांच वर्षों के दौरान, ‘विज्ञान लोकप्रियकरण और वैज्ञानिक सोच को उजागर करने और बढ़ावा देने के लिये’, जो प्रयास भारत में आरम्भ किया और चलाया गया, वह स्वयं में एक अनोखा उदाहरण है। ढूंढने पर भी, विश्व में बहुत कम ऐसे उदाहरण मिलेंगे। इस योजनाबद्ध प्रयास में, (1) लोगों को ‘विज्ञान’ के पास लाने की बजाय, ‘विज्ञान’ को लोगों तक उनकी अपनी भाषा में पहुंचाने और (2) विज्ञान-विधि को अधिकाधिक लोगों द्वारा अधिकाधिक प्रयोग में लाने, को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई थी। 

इस प्रयास के अन्तर्गत, बहुत सराहे गये, विश्व प्रसिद्ध कार्यक्रमों को अन्जाम दिया गया। कुछ उदाहरण हैंः
 ‘‘भारत जन विज्ञान जत्था’’ (1987): उस समय यह विश्व का सबसे बड़ा विज्ञान-संचार प्रयोग था, जिसके अन्तर्गत देश भर में ‘विज्ञान’ के साथ 70.80 लाख लोगों तक सीधे, और उससे कई गुणा तक, जन संचार माध्यमों द्वारा, अप्रत्यक्ष रूप से पहुंचा गया। लगभग 25ए000 कि.मी. के सफर के दौरान, 500 पड़ावों पर, हर राज्य से होते हुए, विशेष रूप से तैयार की गई संचार सामग्री के उपयोेग से, जत्था पूर्व, जत्था के दौरान और उसके पश्चात् लोगों के साथ उन्हीं की भाषा में विभिन्न विज्ञान संचार कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की गई थी।
 ‘विज्ञान-विधि’: 13 भाग का एक रेडियों धारावाहिक जो हिन्दी सहित, 16 भारतीय भाषाओं में बनाया और जून से सितम्बर 1989, के बीच हर रविवार प्रातः 8 से 9 बजे के बीच, आकाशवाणी के लगभग सभी केन्द्रो से प्रसारित किया गया। प्रसारण से पूर्व, 140000 प्रतिबद्ध श्रोताओं के रूप मंे 10-14 वर्ष को आयु वाले बच्चों का पंजीकरण किया गया था, विभिन्न आकाशवाणी केन्द्रों द्वारा। हर जगह बच्चों ने इसे अपनी भाषा में सुना। प्रसारण के दौरान हर पंजीकृत बच्चे को उसकी अपनी भाषा में विशेष रूप से तैयार किये गये चार पोस्टरों और दो विज्ञान किट्स का एक सेट उपलब्ध कराया गया था। पोस्टर और किट्स के साथ संलग्न निर्देश भी 16 भाषाओं में छापे गये थे। इस धारावाहिक की प्रत्येक कड़ी, मानव-उत्पत्ति में हुए किसी न किसी युगप्रवर्तक पल या घटना पर केंद्रित थी। किट्स में सुझाये या तथा दर्शाये प्रयोगों या क्रिया कलापों में विज्ञान विधि का प्रयोग आवश्यक था।
 ‘मानव का विकास’: 144-भाग का एक रेडियो धारावाहिक, जो ‘विज्ञान-विधि’ की तज़र््ा पर ही विभिन्न भाषाओं में बनाया गया और जून 1991 से फरवरी 1994 के बीच आकाशवाणी के लगभग सभी केन्द्रो से स्थानीय भाषा में प्रसारित किया गया। इसके साथ भी 100ए000 बच्चों (10-14 वर्षीय) और 10000 स्कूलों का, प्रतिबद्ध श्रोताओं के रूप मंे, पंजीकरण किया गया था। पंजीकृत बच्चों और स्कूलों को विशेष रूप से तैयार किये गये पोस्टर तथा विज्ञान किट्स उपलब्ध कराये गये थे।
 ‘भारत जन-ज्ञान विज्ञान जत्था’ (1992): ‘भारत जन विज्ञान जत्था (1987)’ की तज़र््ा पर लेकिन कहीं अधिक बड़े स्तर पर, इसे अन्जाम दिया गया था। इसमें विज्ञान के साथ साक्षरता विषय को भी लिया गया था।
 ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’: वर्ष 1987 में आरम्भ हुआ, एक सप्ताह से एक मास तक चलने वाले कार्यक्रमों के साथ मनाया जाता है। विभिन्न गति-विधियां, 28 फरवरी से शुरू की जाती हैं, या उस दिन उनका समापन होता है। यह देश भर में मनाया जाता है और इस दिन विज्ञान लोक प्रियकरण से सम्बद्ध राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्रदान किये जाते हैं।
 ‘राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस’: वर्ष 1993 में आरम्भ की गई थी। हर वर्ष 27-31 दिसम्बर के दौरान, एक पूर्व निर्धारित केन्द्रीय विषय पर इसका आयोजन किया जाता है। इसमें (10-14) और 14 से बड़े और 17 वर्ष तक की आयु के बच्चे भाग ले सकते हैं। इसे क्रमशः जिला, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित किया जाता है। बच्चे कम से कम 2 और अधिक से अधिक 5 के