विज्ञान


एक अप्रतिम वैज्ञानिक एवं महामानव

डॉ.दिनेष मणि

डॉ. कलाम एक सफल महान वैज्ञानिक के साथ-साथ एक नव प्रवर्तक भी थे। देश को शक्तिशाली, बलशाली एवं विकासशील बनाने में कलाम साहब का योगदान अभूतपूर्व एवं असाधारण है। उनका मानना था कि किसी भी देश के विकास में प्रौद्योगिकी का अहम योगदान होता है। तकनीकी प्रगति के लिए आवश्यक है कि हम नयी खोजों के प्रति प्रेरित हों। अतएव हमें ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन करना होगा कि जो इस सोच को नयी गति दे सके। तभी हम सन् 2020 तक भारत को विकसशील देश की श्रेणी से उठाकर विकसित राष्ट्र बनाने का स्वप्न पूरा कर सकेंगे और इक्कीसवीं शताब्दी को भारत की शताब्दी बनाने में सफल होंगे। नवोन्मेष के बिना ज्ञान की कोई उपयोगिता नहीं है। नवोन्मेष की प्रक्रिया के माध्यम से ही ज्ञान को समृद्धि एवं जन कल्याण में परिवर्तित किया जाता है। नवोन्मेषक के लिए कुछ भी असंभव नहीं होता। नवोन्मेषक वही देखते हैं जो सब देखते हैं, किंतु उनकी सोच दूसरों से भिन्न होती है। सच्चे नवोन्मेषक यथापूर्व स्थिति को स्वीकार नहीं करते और वे प्रेरणाओं को समाधानों में और विचारों को कार्यों में परिवर्तित कर देते हैं। ऐसे नवोन्मेषक तैयार करने के लिए जीवन और कार्य के प्रति सर्वव्यापी मानस-परिवर्तन की अपेक्षा रहेगी। निष्क्रियता की संस्कृति को सक्रियता की संस्कृति में, निरर्थकता की संस्कृति को विचारोत्तेजकता एवं कार्य की संस्कृति में, आत्म संशय को आत्मविश्वास में और निराशा को आशा में बदलना होगा। भारतीय सर्जनात्मकता और नवोन्मेष की भावना को आज उसी भावना और उसी स्तर पर राष्ट्रीय आंदोलन में बदलने की आवश्यकता है, जिस भावना के साथ राष्ट्रीय आंदोलन संचालित किया गया था। डॉ. कलाम जीवन पर्यन्त वैज्ञानिक और तकनीकी खोजों को सही ढंग से मनुष्य के विकास में प्रयोग करने के लिए संघर्ष करते रहे।
डॉ. कलाम का मानना था कि ‘‘नवाचारी भारत का निर्माण करके ही हम विकसित भारत के सपने को साकार कर सकते हैं। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आज नवाचार की आवश्यकता है। प्रत्येक भारतीय को नवाचार के प्रति जागरूक करना समय की माँग है। वैसे तो प्रत्येक विद्यार्थी में कुछ न कुछ नया करने की अन्तः प्रवृत्ति होती है किन्तु इस प्रवृत्ति को सही दिशा देने में देश के अनुभवी अध्यापकों तथा वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। स्मरण रहे, कोई भी नवाचार सृजनात्मक विचारों के बिना संभव नहीं है। सृजनात्मक विचार अत्यंत महत्वपूर्ण है और वैज्ञानिक तथा तकनीकी ज्ञान के विकास और उत्पादों के सुधार के लिए आवश्यक हैं।’’
यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि नवाचार के बिना ज्ञान का कोई महत्व नहीं है। नवाचार की प्रक्रिया द्वारा ही ज्ञान को धन और जनकल्याण में बदला जा सकता है। भारत एक विकसित राष्ट्र तभी बनेगा जब प्रत्येक महिला और पुरूष अपनी बेहतरीन योग्यताओं और क्षमताओं के साथ योगदान देंगे।
शिक्षा के संबंध में डॉ. कलाम के विचार अत्यंत प्रासंगिक हैं-‘एक नया समाज तभी उभरकर सामने आएगा, जब शिक्षा व्यवस्था अपने वर्षों पुराने सांस्कृतिक व सामाजिक ढांचे से मुक्त हो बदलाव की प्रक्रिया से गुजरेगी। एक व्यक्ति में मौजूद प्रतिभा को सामने लाने में व्यक्ति को सहयोग करना शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए, यह सिर्फ कहने तक सीमित नहीं होना चाहिए।’
भौतिक रूप से मस्तिष्क ही स्नायुतंत्र का केन्द्र है। यही अंग हड्डियों को समझता है, इसलिए यही इंद्रियों, स्मृति, तार्किक शक्ति व बौद्धिक ज्ञान केषीय समन्वय के लिए जिम्मेदार होता है। मन जो भौतिक रूप में नहीं होता, वह अंतर्ज्ञान के संबंध रखता है- ऐसा दृष्टिकोण, जो दृश्य को समर्पित नहीं होता, करूणा और गहरी बुद्धिमत्ता यही सब जीवन के वास्तविक उद्देश्य है और इसीलिए शिक्षा के भी।
यह सही है कि एक व्यक्ति को ठीक ढंग से कार्य करने के लिए मस्तिष्क चाहिए, जैसे उसे हृदय या जिगर चाहिए होता है, लेकिन ठीक ढंग से कार्य करने तथा अच्छाई एवं नेकी से परिपूर्ण जीवन का वास्तविक स्रोत मन ही है। ऐसी बेमेल जोड़ी में मस्तिष्क मन में कोई सुधार नहीं कर सकता। जो कर सकता है वह यह कि जिस स्थिति में मन अटक गया है, उस स्थिति से उसे आजाद कर देें और उन गतिविधियों से आजाद कर दें, जो मन को ठीक से कार्य करने में बाधा डालती है जैसे घृणा, डर, घमंड आदि मस्तिष्क को यह सब कर पाने में मदद करना भी शिक्षा का ही कार्य है।
कलाम ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- देश के प्रति प्यार हमारी मूल प्रेरणा शक्ति होनी चाहिए। हे सर्वशक्तिमान ईश्वर ! मेरे देश को लोगों को पसीना बहाने के लिए प्रेरित करना। उनके परिश्रम से विभिन्न प्रकार की अग्नियां जन्म लेंगी, जो बुराई को नष्ट कर सकेंगी। मेरे देश में शांति और समृद्धि आए। मेरे देशवासी मिल-जुलकर रहें। हे ईश्वर ! मुझको भारत का गौरवान्वित नागरिक होने के नाते इसकी धूल में मिल जाने देना, ताकि मैं दोबारा जन्म लेकर इसकी यशोगाथा का आनंद ले सकूँ। (भारतीय प्रक्षेपास्त्र के जनक पृष्ठ- 120)
ऊर्जा के विषय में डॉ0 कलाम का मानना था- ‘‘कोई भी राष्ट्र बिना गुणवत्तापूर्ण ऊर्जा की उपलब्धि के अत्याधुनिक एवं विकसित बनने की आकांक्षा नहीं कर सकता। कोई भी आधुनिक मशीन बाधारहित विद्युत व्यवस्था के बिना नहीं चल सकती। सूचना-तकनीक के जादू की छड़ी अर्थहीन हो जाएगी यदि विद्युत आपूर्ति की व्यवस्था उचित नहीं होती।’’
डॉ0 कलाम का कहना था- ‘‘जब आप किसी महान उद्देश्य के लिए एक असाधारण परियोजना पर कार्य कर रहे होते हैं, आप सभी विचारों से उन्मुक्त हो जाते हैं, आपका मस्तिष्क सीमाओं को पार कर जाता है, आपकी चेतनता का विस्तार होता है और आपको यह विश्व अद्भुत एवं प्रिय लगने लगता है।’’
कृषि विकास हेतु दूसरी हरित-क्रांति की प्रासंगिकता बताते हुए डॉ. कलाम का यह मत पूर्णतः वैज्ञानिक है कि विकसित भारत के स्वरूप के लिए कृषि में उत्पादकता का स्तर सुधारना होगा तथा दूसरी हरित-क्रांति को गति प्रदान करनी होगी। डॉ0 कलाम ने दूसरी हरित-क्रांति के लिए अपना बड़ा ही वैज्ञानिक चिंतन प्रस्तुत किया था, उनके अनुसार ‘‘दूसरी हरित-क्रांति की मुख्य अवधारणाएं हैं- बीजों के अनुकूल भूमि विशिष्टीकरण, हाइब्रिड बीजों का विकास तथा उपयुक्त बीज चयन, उपयुक्त उर्वरक, जल प्रबंधन, कृषक प्रशिक्षण, फसल प्रबंधन, फसल कटाई के बाद प्रबंधन, सफल विपणन।’’
उन्होंने हरित-क्रांति के लिए कृषकों में मानसिक क्रांति का आह्वान भी किया था और लिखा है कि- ‘‘कृषकों को नये प्रयोगों के प्रति खुली मानसिकता रखनी होगी और सभी संबद्ध क्षेत्रों में उन्नत प्रौद्योगिकी तथा प्रशिक्षण के प्रति ग्रहणशीलता बढ़ानी होगी।’’ इसमें कोई सन्देह नहीं कि भारत का आर्थिक विकास अब भी बड़े पैमाने पर कृषि पर आधारित है। कृषि तथा कृषि खाद्य उद्योग के साथ आधुनिक तकनीकी का समन्वय इस क्षेत्र में क्रांति ले आएगा और बड़े पैमाने पर रोजगार तथा आर्थिक विकास को प्रेरित करेगा।

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