विज्ञान

(07/Jul/2015)

सिलिकोसिस धूल कणों से फैलता रोग

सचिन नरवड़िया

यह कल्पना करना कितना असहज कर देता है कि कोई रोग व्यवसाय से सम्बंधित होता है। लेकिन यह सच है ‘सिलिकोसिस’ नामक रोग व्यवसाय से सम्बधित होता है जो कि धूल में मौजूद सिलिका के कणों के कारण मनुष्यों में हो सकता है। भले ही इस रोग के बारे में आज बात की जा रही हो परन्तु यह रोग अत्यंत पुराना है। यह रोग क्षेत्र विशेष में नहीं सिमटा होता है, बल्कि यह पूरे विष्व में व्याप्त है और हर साल इसके चलते हजारों लोगों की जानें जाती हैं।
सिलिकोसिस पुरातन समय से अनेक नामों से जाना गया है, जिसमें मायानेर्स थेसिस, ग्राइंडरस अस्थमा, पॉटर्स रॉट कुछ प्रमुख नाम हैं। यह फेफड़ों से जुड़ा एक रोग होता है। सिलिकोसिस नाम का सर्वप्रथम प्रयोग 1870 में अचिले विस्कोन्ती (जो की एक वकील थे) ने किया था। इस रोग के इतिहास पर नज़र डालें तो यह पता चलता है कि 16वीं शताब्दी में अग्रिकोला ने लिखा था कि यूरोप के कर्पेथेइओन नामक पर्वत की खदानों में कई महिलाओं ने 7.7 पतियों से शादी की और वे सभी पुरुष सिलिकोसिस-तपेदिक के कारण कम उम्र में मर गए थे। उत्तरी थाइलैंड में एक पूरे गाँव को विधवाओं का गाँव कहा जाता है, क्योंकि वहां पर काफी लोग इस बीमारी की वजह से मर गए थे। सिलिकोसिस फेफड़ों की एक लाइलाज बीमारी है, जो धूल में मौजूद मुक्त सिलिका के कणों को अंतःष्वसन करने के कारण होती है। यह बीमारी होने के बाद इसमें सुधार होने की संभावना नहीं रहती मगर इस रोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है। यह रोग सिलिका मिश्रित धूल के संपर्क के कारण होता है। इसलिए व्यक्ति जितने लम्बे समय तक सिलिका मिश्रित धूल के संपर्क में रहता है, उतना ही अधिक इस रोग के चपेट में आता है। इस रोग से वे लोग अधिक प्रभावित होते हैं जो सिलिका मिश्रित धूल के संपर्क में आते हैं और ऐसा तभी होता है जब उनका कार्य स्थल ऐसा हो, जहाँ पर उन्हें चट्टानों को तोड़ना हो, रेत एकत्रित करना हो, पत्थर, अयस्क आदि को तोड़ना या बारीक चूरा करना शामिल होता है। इन सभी कार्यों में सिलिका उत्सर्जित होती है। इसके अतिरिक्त खदानों, कांच के कारखानों, मृत्तिका आदि जगहों पर होने वाले कार्यों में भी सिलिका मिश्रित धूल के कणों के संपर्क में आते हैं।
बालू विस्फोट एक सबसे खतरनाक प्रक्रिया है, जिसमें सिलिकोसिस होने का सबसे अधिक खतरा रहता है। तीव्र विस्फोट में अगर निकलने वाले मलबे में सिलिका हो तो सिलिकोसिस होने की संभावना रहती है। सूखी खुदाई, रेत या कंक्रीट को साफ़ करना, दबाव में वायु का प्रयोग आदि जैसी प्रक्रियाएं धूल के बादलों का निर्माण करते हैं। ये धूल के बादल ष्वसन से फेफड़ों तक सिलिका पहुँचाने में सहायक होते हैं। सिलिका के 3 स्वरूप होते हैं - स्फटिक, सूक्ष्म स्फटिक और अक्रिस्टली। मुक्त सिलिका शुद्ध सिलिकोन डाइऑक्साइड होता है।
सिलिकोसिस के कारण फेफड़ों में तन्तुमयता और वातस्फिति होती है। सिलिकोसिस का प्रकार और उसकी उग्रता इस बात पर निर्भर करती है कि सिलिका के संपर्क में रोगी कितने समय तक रहा है। सिलिकोसिस जीर्ण, त्वरित और तीक्ष्ण आदि रूप में पहचाना जाता हैं। इस रोग में संकटमय स्थिति असमर्थता और मृत्यु के रूप में प्रकट होती हैं। अक्सर सिलिकोसिस से मौत का कारण सिलिकोसिस के साथ फेफड़ो का तपेदिक होता है और इसे सिलिको-तपेदिक कहते हैं। ष्वसन के कार्यों की क्षमता में कमी बड़े पैमाने पर तन्तुमयता और वातस्फिति होने से होती है। इसके साथ कभी-कभी दिल का दौरा भी मौत का कारण बनता है।
हमारे देश में राष्ट्रीय खनिक स्वास्थ्य संस्थान सिलोकोसिस के रोगियों की पहचान और रोग का निदान करने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। हाल ही में इस संस्थान ने राजस्थान के करौली जिले में 101 लोगों की जांच में पाया कि उनमें से 78ण्5ः लोग सिलोकोसिस पॉजिटिव थे। माइन लेबर प्रोटेक्शन काम्पैग्न ट्रस्ट ने भी जोधपुर में 987 सिलोकोसिस पॉजिटिव मामलों को चिह्नांकित किया था। सिलोकोसिस का शीघ्र निदान कर पाना डाक्टरों के लिए कठिनाई का विषय होता है, क्योंकि इसके लिए उन्हें प्रशिक्षण और विशिष्टता की जरुरत होती है और सिलिकोसिस के लक्षण तपेदिक से बहुत ज्यादा मिलते-जुलते होने से गलत निदान होने की संभावना बनी रहती है।
सिलिकोसिस की रोकथाम के लिए नियोक्ता द्वारा किये जाने वाले उपाय -
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  • वायु में स्फटिक सिलिका की नियमित जांच करना जिसके संपर्क में खनिक रहते हैं।
  • स्फटिक सिलिका के संपर्क को कम करने के लिए गीली खुदाई करवाना, सिलिका के निकास के लिए स्थानीय खुलाव करना तथा धूल के उत्सर्जन को कम करना।
  • कर्मचारियों को सुरक्षात्मक कपड़े, मास्क, फव्वारे आदि मुहैया कराना।
  • कर्मचारियों को सिलिका और उसके स्वास्थ्य पर होने वाले खतरे से आगाह करना।
  • कर्मचारियों को सुरक्षा के सामान के सही उपयोग हेतु प्रशिक्षण देना।
  • निर्देश चिन्हों का प्रयोग करना जिससे कर्मचारियों को सिलिका और उसके जोखिम से अवगत कराना।
  • समय-समय पर कर्मचारियों की स्वास्थ्य जांच करवाना। सारे सिलिकोसिस पॉजिटिव मामलों की सूचना स्वास्थ्य विभाग को देना।
  • इन उपायों को यदि हर नियोक्ता अपनाये तो हम सब मिलकर इस खतरनाक रोग को अपने समाज से दूर हटा पाएंगे और एक स्वस्थ समाज के निर्माण में अपनी भूमिका का निर्वहन कर सकेंगे।

sachin@yigyanprasar.gov.in