विज्ञान

(07/Jul/2015)

भूकंप
इस मातम को कैसे नापें?

विजन कुमार पाण्डेय

अगर आप नेपाल की राजधानी काठमांडू पहले गए हों तो आज उसे पहचानना आपको मुश्किल हो जाएगा। 1932 में बना नौ मंजिला ऐतिहासिक धरहरा टावर, जिसकी आठवीं मंजिल पर चढ़कर हम पूरे काठमांडू को देखते थे, मलबे में बदल गया है। काठ की खूबसूरत स्थापत्य कला और मंदिरों के लिए दुनियाभर में मषहूर काठमांडू एक प्रकार से नष्ट हो चुका है। काठमांडू का काष्ठमंडप जिसे गोरखनाथ मंदिर कहा जाता है वह खत्म हो गया है। काठमांडू का नाम भी इसी से पड़ा था। काठमांडू काष्ठमंडप से ही बना है। काठमांडू में यूनेस्को द्वारा वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया गया दरबार स्क्वेयर तबाह हो गया है। नेपाल में राजशाही के प्रतीक चिन्हों में से एक काठमांडू के दरबार चौक का चेहरा बदल गया है। षाही भवन के सामने स्थित इस इलाके में कई महत्वपूर्ण मंदिर, प्रतिमाएं, फव्वारे सब खत्म हो गए हैं। जनकपुर का नौलखा मंदिर और राम-जानकी विवाह मंडप को भी नुकसान पहुंचा है। भारत में भी उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, सिक्किम, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, चंडीगढ़, राजस्थान, गुजरात सहित कई राज्य इसकी चपेट में आ गए हैं। ऐसा लग रहा है कि संसार अब महाविनाश की ओर बढ़ रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रकृति हमसे बदला ले रही है।
यह तो सच है कि इंसान गलती कर रहा है। वह गलती करता है लेकिन उसे मानता नहीं है। उसे अपनी गलती पर पछतावा भी नहीं होता। इंसान ही तो है जिसने पहाड़ों का सीना छेदकर सुरंगें बनाईं। जंगल काट दिया। नदियों के रास्ते मोड़ दिए। गंगा का पानी पीने लायक नहीं छोड़ा। धरती पर बेतरतीब इमारतें खड़ी कर दी। अब क्या करता? मानव ने अपने को सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए प्रकृति से खिलवाड़ किया। प्रकृति को बेदर्दी से लूटा। हमने अतिक्रमण किया नदियों पर, पहाड़ों पर, जंगलों पर और हम डरे नहीं। इंसान ने सोचा कि इस मनमानी को कोई देख तो रहा नहीं है। भगवान से भी हम नहीं डरे। बस, यही हमारी सबसे बड़ी भूल थी जो आज ये दुर्दिन देखने को मिला। केदारनाथ हादसे के वक्त भी बांध दी जाने वाली नदियों ने मनुष्य को अपनी ताकत का एहसास कराया था। लेकिन हम फिर भी नहीं चेते। जिन नदियों को हम मृतप्राय समझ बैठे थे, उसने साबित कर दिया कि संकट उन पर नहीं हम पर है। वे हमें नेस्तानबूत कर देगीं। इंसान कितना भी षक्तिशाली हो जाए लेकिन भगवान के सामने वह हमेशा षक्तिहीन ही रहेगा। हिमालय की गोद में बसा नेपाल फिर हिल गया। इसके साथ ही भारत भी हिल गया। नेपाल में कहर ढाने वाले भूकंप ने प्रकृति के सामने मनुष्य को एक बार फिर असहाय कर दिया है। मनुष्य के लिए भूकंप का अनुमान लगाना अभी भी टेढ़ी खीर है। पलों में सारा षहर खंडहर में बदल जाता है और हम देखते रह जाते हैं। लोग चिल्लाते रहे और धरती हिलती रही। नेपाल में धरती मां की गोद में उसके ही लाडले सदा के लिए सो गये। वैज्ञानिक देखते रहे वह तांडव नृत्य। वे भी क्या करते मजबूर थे। वे बस इतना बता सकते थे कि भूकंप की आशंका वाले इलाके कौन हैं? उनके पास ऐसा कोई यंत्र नहीं जो धरती के कंपन को रोक सके। हिमालय चट्टान की तरह खड़ा रहा और लोगों के आंसू गिरते रहे। नेपाल की तबाही देख सभी का दिल पिघल गया। जिसका जख्म बढ़ता ही जा रहा है।
नेपाल उन देशों में है जहां भूकंप का जोखिम सबसे ज्यादा है। इसका एक बड़ा कारण उसका हिमालय क्षेत्र में स्थित होना है। इसी पर्वतीय क्षेत्र में भारत का भी एक बड़ा हिस्सा है। इसीलिये भूकंप आने पर नेपाल के साथ भारत भी हिल जाता है। नेपाल के साथ भारत का अच्छा खासा इलाका भूकंप के लिहाज से जोखिम भरा है। हिमालय के भीषण भूकंप ने फिर साबित कर दिया कि प्राकृतिक आपदा की अनदेखी करना कितना खतरनाक है। भूकंपशास्त्री अनेक मौकों पर हिमालय में ऊंची तीव्रता वाले भूकंप की भविष्यवाणी करते रहे हैं। फिर भी हम हर साल भीषण भूकंपों से पैदा होने वाले विनाश को झेलते रहे हैं। नेपाल जो आज झेल रहा है कभी हमें भी यह कष्ट सहना पड़ेगा। हम अभी भी इसके प्रति सचेत नहीं हैं। हिमालयी इलाकों में अभी भी विकास के नाम पर तेजी से निर्माण कार्य हो रहे हैं। हमारे देश में भी थोड़े-थोड़े अंतराल में भूकंप की पुनरावृत्ति होती रहती है। आपदा प्रबंधन विभाग ने हमें बताया था कि हिमालय की तलहटी में काफी अलग ढंग की ढांचागत संरचनाएं मिली हैं। इसके जमीन के भीतर भारी मात्रा में ऊर्जा का भंडार है। एक न एक दिन यह ऊर्जा हमारे महाविनाश का कारण बनेगी। जब यह झटके से बाहर निकलने का प्रयास करेगी तो नेपाल-उत्तराखंड समेत हिमालय भी हिल जाएगा। हैरानी तो इस बात की है कि हम इन संकटों से बचाव का कोई ठोस जतन अभी भी नहीं कर रहे। हम क्षति हो जाने के बाद की स्थितियों से जूझते हैं। उसमें हमारी ज्यादा दिलचस्पी है। भूकंप से बचाव की तैयारियों का आलम यह है कि गुजरात और उत्तराकाशी जैसे अनुभव के बाद भी भूकंपरोधी इमारतें नहीं बन रहीं। विकास का नारे बुलंद हैं। अनगिनत विशाल और ऊंची इमारतें लगातार बन रही हैं। क्या इनमें भूकंप सहने की क्षमता है? इस सवाल का जवाब हमारे पास नहीं है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम विकास के नाम पर विनाश का रास्ता बना रहे हों। इसपर सभी को गंभीरता से सोचना होगा।
हम जान लें, भूकंप कभी भी बता कर नहीं आएगा। हमें अपनी गलतियों को सुधारने का मौका वह नहीं देगा। इसलिए हमें नेपाल की तबाही से सीख लेनी होगी। भूगर्भ वैज्ञानिकांे का कहना है कि भारतीय उपमहाद्वीप षेष एशिया की ओर हर साल दो सेंटीमीटर की दर से बढ़ रहा है। दूसरी तरफ हिमालयी क्षेत्र का भीतरी भूभाग कुल 13 सेंटीमीटर से ज्यादा का दबाव सहन नहीं कर सकता। इस दबाव के कारण चट्टानों के अंदर घनीभूत ऊर्जा धरती को फाड़ने को तैयार है। वैज्ञानिकों का ऐसा अनुमान है कि हिमालय क्षेत्र में करीब नौ की तीव्रता का भूकंप कभी भी आ सकता है। अगर ऐसा हुआ तो हमारे सारे विकास के नारे विनाश में तब्दील हो जाएंगे। इसलिए विकास के साथ विनाश को भी रोकने का नारा बुलंद होना चाहिए। नेपाल दुनिया का सबसे ज्यादा भूकंप संभावित क्षेत्र है। यहां इतने भूकंप क्यों आते हैं इसे भी हमें समझना होगा। दरअसल इस क्षेत्र में पृथ्वी की इंडियन प्लेट यूरेशियन प्लेट के नीचे दबती जा रही है। इस कारण हिमालय ऊपर उठता जा रहा है। हर साल करीब पांच सेंटीमीटर ये यूरेशियन प्लेट के नीचे जा रही है। इससे हर साल हिमालय पांच मिलीमीटर ऊपर उठता जा रहा है। वहां के चट्टानों के ढांचे में एक तनाव पैदा हो जाता है। जब ये तनाव चट्टानों के बर्दाश्त के बाहर हो जाता है तो ये भूकंप आता है। आज भी वैज्ञानिक ये अंदाजा नहीं लगा सकते कि दुनिया में कब कहां और कितनी तीव्रता वाला भूकंप आएगा। लेकिन वैज्ञानिक यह जरूर कह रहे हैं कि हिमालयी क्षेत्र में बड़ा भूकंप कभी भी आ सकता है। इसलिए भारत को भी पहले से तैयार रहना होगा। विज्ञान इतना आगे जा रहा है लेकिन विडंबना यह है कि अभी भी हम इस क्षेत्र में बहुत पीछे हैं। इस दिशा में नये षोध की आवश्यकता है जिससे भूकंप आने की पहले से ही सूचना दी जा सके। वैसे वैज्ञानिक ऐसे तरीके की तलाश में हैं जिससे भूकंप के आने की संभावना का पता लगाया जा सके, लेकिन अभी तक इसमंे कोई भी कामयाबी नहीं मिली है। हिमालय पर्वत शृंखला के बीच नेपाल पड़ता है। यहीं पर दुनिया की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट है। इस क्षेत्र में काफी उर्वर घाटियां हैं। दुनिया की सबसे ऊँची 14 पहाड़ी चोटियों में से आठ यहीं पर स्थित हैं। इसलिए भी नेपाल पर भूकंप का खतरा ज्यादा है। नेपाल को दुनिया सबसे गरीब देश भी है। यहाँ की करीब एक चौथाई आबादी गरीब है। नेपाल की 80 फीसदी से ज्यादा आबादी कृषि पर निर्भर है। यहां की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 656 अमेरिकी डॉलर है। ऐसे में यह प्राकृतिक आपदा ने उसे और पीछे धकेल दिया है। नेपाल में जन-धन की जैसी हानि हुई है उसे देखते हुए उसकी जितनी सहायता की जाए कम है। इस देश की ऐतिहासिक इमारतों को भी अच्छी खासी क्षति पहँुची है। पहले से तमाम समस्याओं से जूझ रहे नेपाल को इस त्रासदी से उबरना आसान नहीं होगा। मोदी सरकार जिस तरह से मदद के लिए हाथ बढ़ाया है यह वास्तव में सराहनीय है। ऐसे में सभी राजनीतिक पार्टियों को बिना भेदभाव के खुले दिल से नेपाल की मदद करने की जरूरत है, क्योंकि वह हमारा एक अच्छा पड़ोसी देश भी है।
क्या भूकंप का पूर्वानुमान लगाना संभव है? क्या वैज्ञानिकों को ये मालूम हो सकता है कि कब और कहां भूकंप आ सकता है? दरअसल विज्ञान की तमाम आधुनिकताओं के बाद भी ये संभव नहीं है। भूकंप आने के बाद उसके असर के दायरे में ये बताना संभव है कि भूकंप के झटके कहाँ, कुछ सेकेंड बाद आ रहे हैं। सोशल मीडिया में भूकंप आने के बारे में लगाए जा रहे कयास और टिप्पणियां बेबुनियाद और वैज्ञानिक तौर पर अतार्किक हैं। भूकंप विशेषज्ञ बताते हैं कि भूकंप के केंद्र में तो नहीं, लेकिन उसके दायरे में आने वाले इलाकों में कुछ सेकेंड पहले वैज्ञानिक तौर पर ये बताया जा सकता है कि वहां भूकंप आने वाला है। यह समय बेहद कम होता है। यही वजह है कि इसको लेकर पहले से ही कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। भारत में तो यह भी संभव नहीं है। लेकिन जापान में कुछ सेकंड पहले भूकंप का पता लग जाता है। ऐसे में बुलेट टेªन और परमाणु संयंत्रों को काम करने से रोक दिया जाता है।
कुछ सेकंेड पहले भी भूकंप का पता कैसे लग सकता है, इसकी भी जानकारी सभी को आनी चाहिए। जब भी कोई भूकंप आता है तो दो तरह की वेव निकलती हैं। एक प्राइमरी वेब है और दूसरी सेकेंडरी वेब है। प्राइमरी वेव औसतन 6 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से चलती है। जबकि सेकंेडरी वेव औसतन 4 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से। इस अंतर के चलते प्रत्येक 100 किलोमीटर में 8 सेकेंड का अंतर हो जाता है। अर्थात भूकंप केंद्र से 100 किलोमीटर की दूरी पर 8 सेकंेड पहले पता चल सकता है कि भूकंप आने वाला है। इतने कम समय में कुछ भी नहीं किया जा सकता। अतः भूकंप के बारे में भविष्यवाणी करना नामुमकिन है। जापान और ताइवान जैसे देशों में इस तकनीक का इस्तेमाल होता है जिससे नुकसान काफी कम होता है। जापान में ऐसे भी बहुत भूकंप आते रहे हैं। इसलिए वहां सभी मकान भूकंपरोधी बनाए जाते हैं। अब वहां भूकंप आने से नुकसान नहीं होता। लेकिन वहीं भारत में लोग अभी भी इसके प्रति सचेत नहीं है। दरअसल भूकंप से लोग नहीं मरते, बल्कि उसके कारण मकान और पेड़ आदि गिरने से लोगों की मृत्यु होती है। हां, ऐसा माना जाता है कि भूकंप आने की जानकारी चूहे, सांप और कुत्ते को पहले हो जाती है। चूहे और सांप ज्यादातर पृथ्वी के अंदर ही रहते हैं इसलिए उनको भूकंप वेब का असर पहले ही हो जाता है। इसलिए वे कुछ अलग ढंग का व्यवहार करने लगते हैं। कुत्ते को भांपने की क्षमता ज्यादा होती है इसलिए उसे भी पहले ही एहसास हो जाता है कि भूकंप आने वाला है।
एवरेस्ट और ऊंचा हो रहा भूकंप के बाद नेपाल की राजधानी काठमांडू की तस्वीर ही बदल गई है। वहां केवल खंडहर ही दिखाई दे रहे हैं। यूनेस्को विश्व धरोहर की सूची में षामिल ‘दरबार स्क्वॉयर’ मलबे में तब्दील हो चुका है। वहां का मशहूर ‘धरहरा टॉवर’ धराशायी हो गया है। नेपाल में अक्सर भूकंप आते रहते हैं। यह दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंप क्षेत्र में आता है। इसे समझने के लिए हिमालय की संरचना और पृथ्वी के अंदर की हलचल के बारे में जानना जरूरी है। हिमालय दरअसल भारतीय टेक्टोनिक प्लेट के यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेट (मध्य एशियाई) के नीचे दबते जाने के कारण बना है। पृथ्वी की सतह की ये दो बड़ी प्लेटें करीब चार से पांच सेंटीमीटर प्रति वर्ष की गति से एक दूसरे की ओर आ रही हैं। इन प्लेटों की गति के कारण पैदा होने वाले भूकंप की वजह से ही एवरेस्ट और इसके साथ के पहाड़ ऊंचे होते जा रहे हैं। हिमालय के पहाड़ हर साल करीब पाँच मिलीमीटर ऊपर उठते जा रहे हैं। जिससे भारतीय प्लेट के ऊपर हिमालय का दबाव बढ़ रहा है। दरअसल इस तरह के दो या तीन फॉल्ट हैं। ऐसा अनुमान है कि इन्हीं में से किसी प्लेट के खिसकने से यह ताजा भूकंप आया है। कोई भी बड़ा भूकंप आता है तो षुरूआत में नुकसान कम नजर आता है। लेकिन बाद में यह बड़ी तेजी से बढ़ता जाता है। नेपाल के लिए तो भूकंप का डर हमेशा बना रहेगा, क्योंकि वह तो हिमालय की गोद में बसा है। तबाही सिर्फ इसलिए नहीं हुई कि भूकंप की तीव्रता बड़ी थी। यह रिक्टर स्केल पर 7ण्9 थी। बल्कि चिंता इस बात की है कि इस भूकंप का केंद्र बहुत उथला था- करीब 10 से 15 किलोमीटर नीचे इसका केंद्र था। इस कारण सतह पर कंपन और ज्यादा महसूस हुआ। हर विनाशकारी भूकंप के बाद 10.20 हल्के झटके और आते हैं लेकिन उनकी तीव्रता कम होती जाती है। यहां हमें यह जानना जरूरी है कि रिक्टर स्केल पर तीव्रता में हरेक अंक की कमी का मतलब है, बड़े भूकंप से 30 फीसदी कम ऊर्जा मुक्त होना। नेपाल में कई ऐसी इमारतें थी जो बहुत ही पुरानी थी। जब इमारतें पहले से ही जर्जर होती हैं तो एक छोटे से झटके भी उसे जमीदोज कर देते हैं। इसलिए नेपाल की जितनी भी पुरानी इमारतें थी सभी धराशायी हो गई। नेपाल गरीब देश है वहां की अधिकांश आबादी ऐसे घरों में रह रही है, जो किसी भी भूकंप के लिए बहुत ज्यादा खतरनाक है। यहां भूस्खलन की आशंका भी ज्यादा है। पहले भी कई ऐसे भूस्खलन हुए हैं जिनमें लोगों की जानें गई हैं। यहाँ अभी ऐसा भी अनुमान है कि इस पहाड़ी क्षेत्र में कई गांव मुख्य आबादी से कट गया हो या ऊपर से गिरने वाले पत्थरों या कीचड़ में दफन हो गया हो। हिमालय क्षेत्र पर नजर डालें तो पता चलता है कि 1934 में बिहार में 8ण्1 तीव्रता का भूकंप आया था। इसी तरह 1905 में 7ण्5 तीव्रता का भूकंप कांगड़ा में आया और 2005 में 7ण्6 तीव्रता का भूकंप काश्मीर में आया था। इसमें बाद के दो भूकंप काफी विनाशकारी थे, जिसमें करीब 1ए00ए000 लोग मारे गए थे और दसों लाख लोग बेघर हो गए थे। इस बार भी बिहार सबसे ज्यादा प्रभावित रहा है। इसका मुख्य कारण है भूकंप से बचाव की जानकारी का अभाव। इसलिए कभी भी भूकंप का झटका आने लगे तो लोगों को घरों से बाहर खुले स्थान में चले जाना चाहिए। मकानों को मजबूत बनाना चाहिए जिससे वे भूकंप के बड़े झटक सह सके। धरती के अंदर ज्यादा निर्माण कार्य न करें। अगर हम भूकंप के समय सतर्क रहेंगे तो भारी नुकसान से बचा जा सकता है। इंसान यह न भूले कि वह सर्वशक्तिमान नहीं है। मनुष्य का षरीर पंचतत्व से मिलकर बना है। मानव ने उस षक्ति को न सिर्फ चुनौती दी बल्कि उसके खिलाफ काम करना भी षुरू कर दिया। मानव ने प्रकृति के तमाम कानून तोड़े। तमाम चेतावनियों को नजर अंदाज किया। एक नई कुदरत की रचना करने की कोशिश की। इंसान ने पहाड़ों को खोखला कर दिया, जंगलों का सफाया कर दिया, नदियों का पानी रोक दिया। ऐसे में आखिरकार इंसान को उसकी इस गलती का सिला तो मिलेगा ही न। अंत में मैं यही कहूंगा कि प्रकृति हमें ऐसा दर्द दे रही है जिसको नापने के लिए मेरे पास कोई यंत्र नहीं है। आज विज्ञान भी असहाय है ऐसे दर्द को नापने के लिए। वह लाचार है ऐसे मातम को सहने के लिए।

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