विज्ञान

(20/May/2015)

स्वाईन फ्लू और प्रदूषण

विजन कुमार पाण्डेय

आज पूरे विष्व में अरबों रूपए विभिन्न बीमारियों से लड़ने में खर्च हो रहे हैं। इसमें एड्स, मलेरिया, स्वाईन फ्लू एवं टी.बी. का भी समावेष है। कई देष प्रदूषण पर तो कुछ खर्च करना ही नहीं चाहते। दूसरी ओर प्रदूषण से लाखों लोग अपनी जान गवां रहे हैं। आपको यह जानकर आष्चर्य होगा कि 2012 में विष्व में केवल प्रदूषण से ही 89 लाख लोगों की मौत हुई थी। एक रिपोर्ट के अनुसार हर सात व्यक्ति में से एक की मौत प्रदूषण के कारण हो रही है। प्रदूषण का असर कितना खतरनाक होता है, शायद इस तरफ लोगों का ध्यान ज्यादा नहीं जा रहा। इस दिषा में केवल षोध ही हो रहा है, लेकिन अमल नहीं हो रहा। ऐसे देखा जाए तो विभिन्न बीमारियों के मूल में प्रदूषण ही है। विकसित देष तो इस दिषा में कुछ चिंतित हैं। वे अपने देष में प्रदूषण कम करने के लिए प्रयत्नषील हैं। लेकिन दूसरी तरफ गरीब देष प्रदूषण का सबसे अधिक षिकार हो रहे हैं। ये गरीब देष अपनी तरफ से प्रदूषण दूर करने का कुछ भी प्रयास नहीं कर पाते। हालत ये है कि विकासषील देषों में 94 प्रतिषत लोग खराब हवा और पानी के कारण बीमार हो जाते हैं। यह प्रदूषण देष की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर रहा है। प्रदूषण का असर ग्लोबल जीडीपी पर भी पड़ रहा है। इससे जीडीपी में 6 से 12 प्रतिषत की कमी आती है। गरीब देश और गरीब होते हैं। पैसों के अभाव में गरीब अपना इलाज नहीं करा पाते, और मौत के शिकार हो जाते हैं। 
अब आप स्वाईन फ्लू को ही ले लें। यह एक तरह की नयी बीमारी है। इसमें साधारण सर्दी, खांसी और बुखार जैसे लक्षण होते हैं, लेकिन कभी कभार यह जानलेवा भी हो जाता है। यह संसार में एक नये प्रकार के वायरस के द्वारा फैल रहा है। यह सबसे पहले अप्रैल, 2009 में पहचाना गया। इसमें नयापन यह है कि इस वायरस के जीन में अनेक परिर्वतन हैं, जो कि पहले के वायरस में नहीं देखे गये हैं। इस वायरस के जीन में हमेशा परिवर्तन होता रहता है, इसलिए इसका इलाज करना मुश्किल हो जाता है। इसका वायरस किसी भी जीव को संक्रमित करने की क्षमता रखता है और इसे बढ़ाता रहता है। स्वाईन फ्लू को नयी बीमारी इसलिए कहते हैं क्योंकि इसका वायरस जानवर, चिड़िया और आदमी में एक साथ फैलता है। 11 जून 2009 को वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाईजेशन ने यह घोषित किया कि यह वायरस समूचे संसार में महामारी की तरह फैल रहा है। इसको पेडेमिक कहा जाता है। अभी तक इस पर शोध चल रहा है और वैज्ञानिक इससे लड़ने वाला टीका पर काम कर रहे हैं। यह किसी मरीज के छींकने, खांसने और हाथ न धोने से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में तेजी से फैलता है। अगर आप किसी मरीज को छूते हैं या हाथ मिलाते हैं, बगैर हाथ धोये, आप अपने मंुह या नाक को छूते हैं, तो इसका फ्लू हो सकता है। ध्यान रहे यह बीमारी सुअर की मीट खाने से नहीं फैलती। सामान्य नल के पानी पीने से भी नहीं फैलता। यह केवल छूआछूत से फैलता है। इसलिए अगर किसी को सर्दी जुकाम हुआ है तो उससे दूर ही रहे। उससे हाथ न मिलाए। खाना हमेशा हाथ धो कर ही खायें। 
प्रदूषण से केवल वयस्क ही नहीं प्रभावित हो रहे, बल्कि बच्चे भी हो रहे। इस प्रदूषण का असर बच्चों के आईक्यू पर भी पड़ता है। 2013 में 7 एशियन देशों के बच्चों पर किए गए एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई कि प्रदूषण से बच्चों के आईक्यू पर 15 प्रतिशत की कमी देखी गई। जिन गरीब देशों की आबादी बहुत अधिक है, वहां प्रदूषण का मामला अधिक देखने में आता है। ये देश अपने बजट का केवल एक प्रतिशत ही प्रदूषण के खिलाफ लड़ने के लिए रखते हैं। विकसित देश प्रदूषण से 60 के दशक में ही लड़ चुके हैं। इसलिए वे सचेत हैं। आज प्रदूषण हमारे बीच एक ऐसी समस्या है, जो दिनों-दिन भयावह होती जा रही है। इससे निबटना हर देश का कर्तव्य है। साथ ही हर नागरिक का भी यह कर्तव्य होता है कि वह गंदगी न फैलाए। प्रदूषण से दुनियाभर में जो मौते हो रही हैं उसके आंकड़े इतने खतरनाक हैं कि आपके दिल दहल जाएगें। इससे होने वाली मौतों का लेखा-जोखा इस तरह है - प्रदूषण से 89 लाख, कुपोषण से 34 लाख, घर की प्रदूषित हवा से 39 लाख, बाहर की प्रदूषित हवा से 34 लाख, प्रदूषित खाद्य से 9 लाख, गंदे पानी पीने से 7 लाख के आसपास मौतें प्रतिवर्ष पूरे विश्व मंे लोगों की हो जाती है।
गणतंत्र दिवस पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जब भारत आए थे तो वे भारत में बढ़ते प्रदूषण से चिंतित थे। कहा जाता है कि ओबामा ने राजपथ पर लंबे समय तक बैठने को लेकर अपनी लाचारी जताई थी क्योंकि वहां वायु काफी प्रदूषित थी। उन्हें साँस लेने में दिक्कत हो सकती थी। यह बात सच है कि हमारे देश में गंदगी ज्यादा है। इसके कारण प्रदूषण भी बढ़ रहा है। बढ़ते प्रदूषण पर चर्चा तो बहुत होती है, लेकिन यह तभी कम होगा जब हम स्वच्छ रहेगें। लोगों का घर से निकलना इस कारण मुश्किल हो गया है। भारत में भी स्वाईन फ्लू का प्रकोप जोरो पर है। प्रदूषित वायु से बचने के लिए लोग मुंह पर पट्टी बांधे रहते है। भगवान ने तो स्वच्छ वायु दी थी, लेकिन हमने उसे प्रदूषित कर दिया। हालत यह हो गयी है कि स्कूल जाने वाले बच्चों को अपनी कक्षाओं में भी सांस लेने में दिक्कत होती है। आज से करीब दो साल पहले चीन की राजधानी बीजिंग में भी यही स्थिति थी जो आज दिल्ली की है। लेकिन वहां की सरकार ने उसे नियंत्रित करने के लिए कदम उठाए। आज वहां वायु-प्रदूषण काफी कम हो गया है। वहीं आज संसार का सबसे प्रदूषित शहर दिल्ली बन गया है। आप कभी जनवरी महीने में दिल्ली आकर देख सकते हैं कि यहां प्रदूषण का स्तर क्या है। रोज हजारों ट्रक शहर में प्रवेश करने के लिए पंक्तिबद्ध खड़े रहते हैं क्योंकि दिन में उनका प्रवेश वर्जित होता है। उनके डीजल इंजन से निकलने वाला गंधकयुक्त धुआं सारे दिल्ली शहर को दूषित करता रहता है। स्पष्ट है कि मोटर गाड़ियों, स्कूटरों और मोटरसाइकिलों की अपेक्षा ट्रकांे और बसों से निकलने वाला धुआं काफी खतरनाक होता है क्योंकि वे डीजल का इस्तेमाल करते हैं। अन्य वाहन पेट्रोल और प्राकृतिक गैसों से चलते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार ट्रकों और बसों से निकलने वाला प्रदूषण सांस के जरिए फेफड़ों में जाकर धीरे-धीरे लोगों को रोगग्रस्त बना देता है। सर्दियों के दौरान यह धुआं ऊपर नहीं जा पाता क्योंकि हवा का दबाव नीचे की ओर होता है। इसलिए सारे दिन धुंध सा दिल्ली में बना रहता है। लोगों को सांस लेने में परेशानी होती है। अगर हालात यही रही तो कुछ वर्षों बाद वहां रहना लोगों के लिए दूभर हो जाएगा। अभी पिछले साल विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया के 1625 शहरों का अध्ययन किया था। उसमें 20 अत्यंत प्रदूषित शहरों में से 13 भारत के थे। पड़ोसी चीन की तुलना में भारतीय शहर कहीं अधिक प्रदूषित हो गए हैं, जो सभी के लिए चेतावनी है। हमारे यहां गांवों की स्थिति भी बेहतर नहीं है। वहां ट्रकांे, बसों और गाड़ियों से तो प्रदूषण नहीं होता, लेकिन मिट्टी तेल के स्टोवों, उपलों तथा लालटेन के इस्तेमाल से वायु प्रदूषण बढ़ रहा है। इस कारण गांवों में भी सांस की बीमारी लोगों को हो रही है। हर साल करीब दस लाख लोग इन बीमारियों से मौत के घाट उतरने को मजबूर होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार दमें की बीमारी न सिर्फ प्रौढ़ों में, बल्कि बच्चों में भी बढ़ती जा रही है। साथ ही कैंसर, हृदय रोग और लकवे का प्रकोप भी बढ़ता जा रहा है। जैसे-जैसे लोगों की उम्र बढ़ती जाती है वे इन बीमारियों के चंगुल में फंसते जाते हैं। उन्हें घर के अंदर और बाहर हर जगह प्रदूषित वायु ही सांस लेने को मिलती है। इसलिए वे बेमौत मारे जाते हैं।
नये शोध से पता चला है कि प्रदूषित हवा में सांस लेने से जीवन अवधि करीब साढ़े पांच वर्ष छोटी हो जाती है। आज करीब 66 करोड़ भारतीय विषैली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। अगर तुरंत कदम नहीं उठाए गए तो उनकी जीवन अवधि औसतन तीन वर्ष घट जाएगी। इसलिए भारत को अपना औद्योगीकरण करते समय इस बात को ध्यान मंे रखना चाहिए कि वायु प्रदूषित न हो। दरअसल उर्वरकों तथा अन्य रसायनों के इस्तेमाल से ओजोन और अन्य प्रदूषण फैलाने वाले तत्व वायु को प्रदूषित कर लोगों की जीवन अवधि तो घटाते ही हैं, गेंहूं जैसी फसलों की औसत पैदावार को भी एक तिहाई कम कर देते हैं।
भारत सरकार ने 17 ऐसे उद्योगांे को चिन्हित किया है जो सबसे अधिक प्रदूषण फैला रहे हैं। प्रदूषण संबंधी आंकड़ों को इकट्ठा करने के लिए उनकी चिमनियों के साथ यंत्र लगाए गये हैं। इसमें दिल्ली का बदरपुर थर्मल पावर प्लांट सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाला पाया गया है। यह प्लांट देश भर में सबसे अधिक प्रदूषण फैला रहा है। ऐसे मंे वायु की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए ईंट की भट्टियों से निकलने वाले धुएं को कम करने का प्रयत्न करना चाहिए। ऐसे यंत्र हैं जिसे लगाने से धुंए की मात्रा कम की जा सकती है। भारत में 14 ऐसे शहर हैं जहां मेट्रो रेल का निर्माण आरम्भ हो चुका है। इससे भी प्रदूषण में कमी आएगी। लोगों को थोड़ी दूरी तय करने के लिए साइकिल आदि का प्रयोग बढ़ाना होगा। 125 करोड़ भारतीय अगर यह ठान ले कि भारत स्वच्छ हो और प्रदूषण मुक्त हो तो यह कार्य निश्चित रूप से हो जाएगा। मानव शक्ति सर्वोपरि होती है। व्यक्ति चाहे तो इस धरती को स्वर्ग बना सकता है। इसके लिए सभी को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। देश के तीन बड़े औद्योगिक राज्यों गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु मंे यह प्रयास जारी है कि कारखाने कोयले पर अपनी निर्भरता कम करें। कारखानों को करों में छूट देकर प्रदूषण को कम करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। यदि यह रास्ता प्रभावी नहीं हो पाता तो जुर्माने का रास्ता अख्तियार किया जा सकता है। 
आज पूरे भारत में स्वच्छता अभियान चलाया जा रहा है। स्वच्छ भारत होगा तो स्वस्थ भारत होगा। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वच्छ भारत बनाने के लिए खुद बहुत प्रयत्नशील हैं। वे योग करने के लिए पूरे संसार को संदेश दिया है। यह एक अच्छा कदम है। लेकिन योग वहीं हो सकता जहां स्वच्छ वायु हो। अपने आसपास की जगह अगर साफ होगी तो हमें काम करने में भी मन लगेगा। योग का भी हमें अच्छा फल मिलेगा। विज्ञान का यह मूल सिद्धांत है कि अगर प्रकृति रहेगी तो हम रहेगें। सृष्टि में दिखाई देने वाली हर वस्तु में संतुलन आवश्यक है। यही योग का सिद्धान्त भी है। योग केवल हमारे शरीर को ही संतुलित नहीं रखता बल्कि ब्रह्मांड को भी संतुलित रखता है, क्योंकि ब्रह्मांड में जो है वही हमारे शरीर में भी है। हमारा ब्रह्मांड जल और वायु से बना है जो हमारे शरीर में भी है। अगर ब्रह्मांड की वायु और जल ही दूषित हो जाएगें तो हम कहां रहेगें। दरअसल हमारा विज्ञान तत्व है तो धर्म शक्ति। पर्यावरण को तभी संतुलित रखा जा सकता है जब कि हम पर्यावरण के धर्म का पालन करें। दरअसल पर्यावरण का धर्म एक रहस्यमयी विज्ञान है। जिसमे हमारे सत्कर्म ही काम आते हैं। अगर हमारा जीवन धर्माधारित होगा तो पर्यावरण भी जीवन्त रहेगा। हम सभी पर्यावरण के अंग हैं। हमें अपने पर्यावरण से सामंजस्य बनाना होता है। विज्ञान भी यही कहता है। लेकिन आज सम्पूर्ण मानवता पर्यावरण को दूषित करने पर उतारू है। यह संसार ईश्वर द्वारा रचित है। उस ईश्वर की खोज में आज विज्ञान भी लगा है। हम भी ईश्वर की एक सुन्दर रचना है। इसी तरह प्रकृति भी है। जिसको ईश्वर ने इतना मन से बनाया उसे नष्ट करने का हमें अधिकार नहीं है। हमें ईश्वर प्रेम तभी करेगा जब हम उसकी रचना से प्रेम करेगें। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। हम ईश्वर से प्रेम करना चाहते हैं लेकिन उसकी बनायी गई वस्तु को नष्ट कर रहे है। अगर हम कोई नया शोध करते हैं तो उससे हमारा प्रेम और लगाव बढ़ जाता है। वही बात यहां प्रकृति से है। भगवान को प्रकृति से बहुत प्रेम है। वह नहीं चाहता कि कोई इसे नष्ट करे।
इसलिए हमें धरती के हवा पानी अग्नि आदि के प्रति कृतज्ञ भाव रखना चाहिए। पंचतत्वों की अक्षुण्णता ही हमारे अस्तित्व का आधार है। अग्नि तत्व की दहकता पवित्र और पावस करती है। जल जीवन दाता है। इसीलिये कहा जाता है कि जल ही जीवन है। धरती हमारी पोषक है। उसी से हमें अन्न मिलता है। माटी से ही हमारी देहष्टि बनती है। जब हमारे चारों ओर का ऊर्जा क्षेत्र सकारात्मक और प्रभावशाली होता है तो हम भी पूर्ण उत्साहित और आनंदित रहते हैं। यही हमें योग भी सिखाता है। आज सारा संसार योग के महत्व को समझ रहा है। अगर हम भी इसे अपने जीवन में अपनाये ंतो निश्चित रूप से हम स्वस्थ और स्वच्छ रहने लगेगें।
गंगा मात्र एक नदी ही नहीं है बल्कि यह हमारे जनमानस की आस्था, आध्यात्मिकता की भी प्रतीक है। भारतीय संस्कृति की गाथा से लेकर आज तक असंख्य वर्षों में घटित हुए सभी बदलावों की गंगा साक्षी है। लेकिन गंगा के साथ किये गए इंसानों के कुत्सित-भत्सर्नीय आचरण ने उसे ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया है कि वह स्वयं विलुप्त होती नजर आ रही है। गंगा जन्म, विवाह आदि से लेकर मृत्युपर्यंत तक सभी संस्कारों से जुड़ी हुई है। यहाँ तक कि देहावसान के बाद भी पितरों की अतृप्त आत्माओं को इसी माध्यम से तर्पण-अर्पण किया जाता है। हमारे खेतों की सिंचाई से लेकर भूमिगत जलस्तर तथा उर्वरता बनाये रखना, हमें दाना-पानी से लेकर यातायात तक मुहैया कराती है। यदि हम आंकड़ों की बात करें तो गंगा की तुलना में दुनिया की कोई भी नदी नहीं ठहर सकती।
गंगा गंगोत्री से होकर अनेक छोटे-बड़े शहरों से होते हुए करीब 2500 कि.मी. की यात्रा करके सुंदरबन डेल्टा बनाते हुए बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाती है। अपनी इस महायात्रा में यह 5 राज्यों के 50 से भी ज्यादा बड़े षहरों और अनेक छोटे कस्बों के करीब 50 करोड़ से भी ज्यादा लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पोषित करती है। गंगा में करीब 25 से 30 लाख लोग रोज स्नाान करते हैं। इसके मार्ग का सबसे बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश से होकर जाता है और यहीं पर इसकी स्थिति सबसे दयनीय है। गंगा में रोजाना करोड़ों लीटर मलजल सैकड़ों छोटे-बड़े नालों द्वारा इसमें आकर मिलता है। भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे लम्बी नदी, करीब 50 करोड़ लोगों का भरण पोषण करने वाली पवित्र गंगा, दुनिया की सबसे प्रदूषित नदी बन गई है। भागीरथ के प्रयासों से धरती पर लाई गई गंगा भागीरथी प्रयासों से ही स्वच्छ, निर्मल और अविरल होगी। गंगा के प्रदूषण के लिए बढ़ती आबादी, शहरीकरण, औद्योगीकरण तथा कृषि ज्यादा जिम्मेदार हैं। शहरीकरण से गंगा के घाटों पर दबाव बढ़ गया जिसके कारण नदी का प्रदूषण स्तर बढ़ता गया। आज हालत यह है कि गंगाा का पानी आचमन की तो छोड़िये स्नान करने लायक भी नहीं बचा। वैज्ञानिकों के अनुसार जो बैक्टीरिया 500 फैकल प्रति 100 मिली होना चाहिए वह 120 गुना ज्यादा 60,000 फैकल प्रति 100 मिली पाया गया। जिससे गंगा का पानी स्नान करने योग्य भी नहीं रहा। उत्तर प्रदेश के अन्दर कानपुर से लेकर वाराणसी तक करीब 450 किमी के बीच गंगा सबसे ज्यादा प्रदूषित है। इस क्षेत्र की फैक्ट्रियां गंगा को सबसे ज्यादा प्रदूषित कर रही हैं। वैज्ञानिक अनुमान के अनुसार गंगा में 75 फीसदी सीवरेज तथा 25 फीसदी औद्योगिक प्रदूषण पाया जाता है।
हमारी स्वार्थ परक उपभोग वाली मानसिकता ने हमारे परिस्थितिकी तन्त्र को कितना नुकसान कर दिया है इसको हमारी आने वाली पीढ़ी भुगतेगी। अगर हम वास्तविक धर्म में विश्वास रखते थे तो मोक्ष दायिनी मां गंगा को प्रदूषित नहीं करते। ऐसा नहीं कि गंगा के सफाई के प्रयास नहीं हुए हैं। लेकिन ये सारे प्रयास बेकार चले गये। प्रदूषण मुक्त गंगा करने का पहला प्रयास 1986 में शुरू हुआ था। इसको गंगा एक्शन प्लान का नाम दिया गया था। इसका मुख्य उद्येश्य था गंगाजल को प्रदूषण मुक्त करना और उसके जल की गणवत्ता को सुधारना। इस एक्शन प्लान में उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के 25 प्रमुख छोटे-बड़े शहरों के लिए 261 छोटी-बड़ी स्कीमें बनायी गई थी। इन स्कीमों का फोकस मुख्य रूप से इन शहरों के सीवेज को नियंत्रित करना, डायवर्ट करना और ट्रीट करना था। इस प्लान का दूसरा चरण भी 1993 में शुरू कर दिया गया था। इस पर काम भी हुआ लेकिन इसके कोई ठोस नतीजे नहीं निकल पाए। कुछ दिनों तक तो सफाई रही लेकिन उसके बाद फिर वही गंदगी गंगा में जाने लगी। वेदों में कहा गया है कि गंगा के स्मरण और दर्शन मात्र से समस्त पाप धुल जाते हैं। उसका आचमन करना और उनमें स्नान करना तो हजारों तीर्थ करने के बराबर है। लेकिन आज गंगा जल की स्थिति यह है कि हरिद्वार के बाद से उसकी गुणवत्ता प्रभावित होनी शुरू हो जाती है और उत्तर प्रदेश में प्रवेश करने के बाद तो उसका जल आचमन के लायक भी नहीं रहता। आज गंगा खुद को तारे जाने के लिए टकटकी लगाये मरणासन्न सी हमारी तरफ देख रही है। शायद अब भी हमारी आँखें खुल जाए और अंधकार से प्रकाश में आ जाए।

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