विज्ञान

(20/May/2015)

पारे की विषाक्तता इतिहास के झरोखे से

डॉ.विजय कुमार उपाध्याय

इतिहास में उल्लेख मिलता है कि 16वीं शताब्दी में स्वीडन का सम्राट था एरिख-14, परन्तु उसका भाई योहान-।।। एरिख को हटाकर स्वयं सम्राट बनना चाहता था। उसने सन 1568 में एरिख को परायुकत विष देकर मार डाला तथा स्वयं गद्दी पर बैठ गया। परन्तु विष इतनी चतुराई से दिया गया था कि लोगों को उस पर संदेह नहीं हुआ। परन्तु तत्कालीन इतिहासकारों द्वारा लिखित ग्रंथों में इस संबंध में शंका जरूर व्यक्त की गयी थी। इस संदेह की पुष्टि हाल में वैज्ञानिकों द्वारा  की गयी है। एरिख का अस्थि पंजर तथा बाल सुरक्षित रखे हुए थे। वैज्ञानिकों ने नाभिकीय भौतिकी की विधि से जब उसके बालों का विष्लेषण किया तो उसमें पारे की मात्रा सामान्य स्तर से बहुत अधिक पायी गयी। इस विश्लेषण से प्राप्त नतीजों से स्पष्ट हो गया की एरिख-14 को पारे का विष देकर मारा गया था।
इतिहास में ही पारे की विषाक्तता से ग्रस्त होने का एक और उदाहरण मिलता है। कहा जाता है कि रूस का शासक जार इवान अपने जीवन के अंतिम दिनों में बहुत क्रोधी हो गया था। इसकी वजह यह थी कि अपने शरीर के जोड़ो के दर्द से राहत पाने के लिए वह पारे से निर्मित मरहम की मालिश किया करता था। इसी कारण वह धीरे-धीरे  बहुत क्रोधित स्वभाव का हो गया था। एक बार तो उसने क्रोध में आकर अपने पुत्र को ही मार डाला था। पारे से निर्मित दवाओं के अत्यधिक सेवन के कारण उसे दृष्टि भ्रम तथा घबराहट की समस्या से भी जुझना पड़ता था।
वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि पारे के वाष्प के सम्पर्क में लम्बे समय तक रहने से कई प्रकार की बीमारियाँ पैदा होती हैं जिनमें प्रमुख हैं दांतों का झड़ना, स्वभाव में चिड़चिड़ापन पैदा होना, शरीर में ऐंठन पैदा होना तथा दीर्घकालिक यूरेमिया। इस संबंधमें एक उदाहरण इतिहास में मिलता है। सत्रहवीं शताब्दी में इंग्लैंड का सम्राट था चार्ल्स-।। जिसे किमियागरी का बहुत शौक था। उसने अपने महल में ही एक प्रयोगशाला बना रखी थी। फुर्सत के समय वह इस प्रयोगशाला में जाकर मिमियागरी संबंधी प्रयोग किया करता था। लम्बे समय तक पारद वाष्प के सम्पर्क में रहने के कारण वह कई रोगों से ग्रस्त हो गया जिनमें प्रमुख थे शरीर के विभिन्न भागों में ऐंठन, यूरेमिया तथा स्वभाव का चिड़चिड़ापन। राजकीय चिकित्सकों ने उसकी काफी चिकित्सा की परन्तु उसकी स्थिति लगातार बिगड़ती गयी तथा अन्त में उसकी मृत्यु हो गयी।
तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व वृहत पैमाने पर लोगों के पारद विषाक्तता से ग्रस्त होने तथा उसके कारण अकाल काल कवलित होने की एक घटना का विवरण  इतिहास में मिलता है। चीन के प्रथम चक्रवर्ती सम्राट शी हुआंग दी ने 259 वर्ष ईसा पूर्व एक बहुत ही बड़ा नगर बसाया था जिसमें पूरे चीन में मौजूद नदियों, झीलों तथा अन्य जल भंडारों को धात्विक पारे के निरूपित किया गया था। पारे का इतना अधिक उपयोग किया गया था कि उस नगर के भग्नावशेषों की खुदाई आज भी खतरनाक साबित हो रही है। कहा जाता है कि जिस समय यह नगर बसाया जा रहा था उसके निर्माण कार्य में लगे लगभग 70 हजार मजदूर तथा कारीगर पारे की विषाक्ता से ग्रस्त होकर अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गये। शी हुशंग दी अमर होने के लिये नित्य पारे की गोलियों का सेवन करता था जिसके कारण उसे स्वास्थ्य संबंधी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा तथा सिर्फ 49 वर्ष की अवस्था में ही उसकी मृत्यु हो गयी।
पारे की विषाक्ता से बहुत अधिक लोगों के ग्रस्त होने की एक घटना सन 1956 में जापान के मिनामाता नामक नगर में घटी। पारे से प्रदूषण के कारण यहाँ न सिर्फ हजारों लोग मारे गये, अपितु बहुत से लोग गम्भीर बीमारियों के शिकार भी हो गये। वहाँ सिस्को कॉर्पोरेशन के रासायनिक कारखाने में प्लास्टिक की सामग्री ‘विनाइल क्लोराइड’ बनाने के लिए पारे के एक यौगिक का उपयोग किया जाता था। औद्योगिक कचरे के रूप में प्राप्त विनाइल मर्करी को संयंत्र के अन्य कचरों के साथ मिनामाता खाड़ी में डाल दिया जाता था। समुद्र में डाले जाते समय यह पारा अपने कम विषैले अकार्बनिक रूप में रहता था। परन्तु खाड़ी की तलहटी में सूक्ष्म प्राणी उसे कार्बनिक रूप में परिवर्तित कर देते थे। यह कार्बनिक पारा पहले मछलियों के ऊतकों में जाता था और फिर उनके माध्यम से उस क्षेत्र के लोगों के पेट में पहुँच जाता था। इसका नतीजा यह हुआ कि सिर्फ मनुष्य ही नहीं अपितु कुत्ते, बिल्ली तथा अन्य जीव जन्तु तक गम्भीर बीमारियों का शिकार होकर मरने लगे। चिकित्सकों के मतानुसार पारे के प्रदूषण से पाचन तंत्र नष्ट होना, गुर्दों का क्षतिग्रस्त होना, देखने, सुनने तथा बोलने की क्षमता समाप्त होना तथा याददाश्त खोने जैसी समस्यायें पैदा हो सकती हैं।
पुनर्जागरण काल के प्रमुख चिकित्सा वैज्ञानिक पैरासेल्सस ने सन 1550 में लिखित अपनी पुस्तक में मध्य यूरोप की सिनोबार (पारे का प्रकुख अयस्क) खानों में कार्यरत मजदूरों की दुर्दशा का बहुत ही मार्मिक विवरण दिया है। फिर सन 1713 में इटालियन चिकित्साविद बर्नारदिनों रामाजिनी पारद खनिज के उत्खनन से जुड़े लोगों की दयनीय स्थिति को देख कर इतना अधिक द्रवित हुआ कि उसने ‘व्यवसायिक औषध अनुशासन (डिसिप्लिन ऑफ औकुपेशनल मेडिसिन)’ नामक एक संस्था की स्थापना कर दी। उसने लिखा था पारद की ये खाने विनाशकारी विष पैदा करती हैं जो खनिकों के लिए बर्बादी तथा मृत्यु का पर्याय है। इन खान मजदूरों के अलावा कई मुलम्मा चढ़ाने वाले (गिल्डर्स) लोगों में बहुत कम ऐसे हैं जो अपना बुढ़ापा देख पाते हैं। इनमें से कुछ अभागे यदि जवानी में नहीं मर पाते तो उनके स्वास्थ्य की दशा इतनी दयनीय रहती है कि वे रोज भगवान से अपनी मृत्यु की भीख मांगते हैं। ऐसी ही दशा उन कारीगरों की रहती है जो आइना बनाने का काम करते हैं। आइना बनाने के क्रम में पारे के यौगिक का उपयोग करते-करते अधिकांश कारीगर या तो दमा से ग्रस्त हो जाते हैं अथवा लकवा का शिकार बन जाते हैं।
पारे का प्रमुख अयस्क है लाल रंग का खनिज सिनोबार। रासायनिक संघटन की दृष्टिकोण से यह पारे का सल्फाइड है। आधुनिक काल में सिनोबार का खनन करने वाले प्रमुख देशों में शामिल हैं चीन, सर्बिया, पेरू, तथा संयुक्त राज्य अमेरिका।
प्राचीन काल के दोरान इस अयस्क का खनन काफी खतरनाक माना जाता था। इस खनिज के उत्खनन से जुड़े मजदूरों को स्वास्थ्य संबंधी अनेक समस्याओं से जूझना पड़ता था। उनके दाँत धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होते रहते थे। इन लाल पत्थरों को पहाड़ से ढोकर लाने में हजारों मजदूरों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता था। इन मृत मजदूरों के नर कंकाल आज भी जेराबशान पहाड़ों की पुरानी खानों में पाये जाते हैं। ये पहाड़ कजाकिस्तान तथा अजबेकिस्तान में हैं।
पेरू की ऐंडीज पर्वतमाला में हाल में किये गये पुरातात्विक उत्खनन से ऐसी साक्ष्य प्राप्त हुए हैं जिनसे पता चलता है कि लगभग 1400 वर्ष ईसा पूर्व इस क्षेत्र में सिनोबार का खनन किया जाता था। आज से लगभग साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व भी लोगों को इस बात की जानकारी थी कि पारे के अयस्क के खनन कार्य से जुड़े लोग स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याओं से ग्रस्त हो जाते हैं। इन समस्याओं में शामिल हैं दाँतों का झड़ना, अंधापन तथा बहरापन से ग्रस्त होना तथा अकाल मृत्यु को प्राप्त होना। यही कारण था कि रोमन साम्राज्य में दासों तथा सजायाफ्ता लोगों को सिनेबार के खनन कार्य में लगाया जाता था। मध्य काल के दौरान दक्षिणी तथा मध्य अमेरिका में स्पेन के उपनिवेशों में भी दासों  तथा वहाँ के मूल निवासियों को ही सिनेबार के खनन कार्य में लगाया जाता था।
पारद विषाक्तता को चिकित्सा विज्ञान में ‘हाइड्रारजेरियम’ या ‘मक्युरियलिज’ कहा जाता है। यह रोग पारे अथवा इसके यौगिकों के संपर्क में लम्बे समय तक रहने के कारण पैदा होता है। अल्प परिमाण में भी पारे से शरीर का संपर्क काफी हानिकारक पाया गया है। जब पारा शरीर में प्रवेश करता है तो वह न्युरोटौक्सिन के समान काम करता है। अर्थात यह हमारे मस्तिष्क तथा स्नायु प्रणाली को नुकसान पहुँचाता है। इसके अलावा यह गुर्दे तथा फेफड़ों को भी नुकसान पहुँचाता है। वैसे तो पारे से सम्पर्क सबके लिये हानिकारक है, परन्तु बच्चों तथा गर्भवती महिलाओं को यह अधिक नुकसान पहुँचाता है। पारे की विषाक्तता के कारण जो रोग पैदा होते हैं उनमें शामिल हैं शरीर में खुजलाहट, जलन तथा कभी-कभी दर्द की अनुभूति। इसके अलावा कुछ अन्य रोगों में शामिल हैं ऐक्रोडाइनिया (पिंक डिजीज), हेम्टर रसेल सिंड्रोम तथा मिनामाता डिजीज। त्वचा का बदरंग होना (जिसमें गाल तथा हाथ-पैरों की अंगुलियों के सिरे का रंग गुलाबी हो जाता है) शरीर के विभिन्न भागों में सूजन तथा त्वचा में परतों के उखड़ने जैसी समस्यायें भीे पैदा होती हैं। पारद विषाक्तता से ग्रस्त होने पर रोगी को बहुत पसीना निकलता है तथा टैचिकार्डिया की स्थिति पैदा हो जाती है जिसमें हृदय की धड़कन असामान्य रूप से बहुत तीव्र हो जाती है। मुँह में लार का निर्माण बहुत अधिक मात्रा में होने लगता हैे तथा हाइपर टेंशन की स्थिति पैदा हो जाती है। यदि बच्चे पारे की विषाक्तता से ग्रस्त होते हैं तो उनके गाल, नाक तथा होंठ गुलाबी हो जाते हैं। साथ ही बाल उड़ने लगते हैं, दाँत झड़ने लगते हैं, नाखून बदरंग होने लगते हैं तथा समय-समय पर शरीर पर दाने या चकत्ते निकलते रहते हैं। उनकी मांसपेशियों में कमजोरी आने लगती है तथा प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है। पारे की विषाक्तता से ग्रस्त लोगों के गुर्दे धीरे-धीरे खराब होने लगते हैं, स्मरण शक्ति घटने लगती है तथा अनिद्रा रोग उन पर हावी हो जाता है।
अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि पारे की विषाक्तता का स्रोत क्या है? अध्ययनों से पता चला है कि मछली (विशेषकर समुद्री मछली) को आहार के रूप में ग्रहण करने वाले मानव तथा अन्य जीवधारी पारद विषाक्ता से अधिक ग्रस्त होते हैं। मछली के अलावा आहार के रूप में ग्रहण किये जाने वाले कुछ अन्य जीव जन्तुओं में भी पारद पाया जाता है जिनके माध्यम से पारद विषाक्ता से ग्रस्त होने का खतरा रहता है। पारे से संदूषित (कंटामिनेटेड) वायु को साँस द्वारा ग्रहण करने से भी पारद विषाक्तता से ग्रस्त होने का खतरा रहता है। दन्त चिकित्सा के दौरान सिल्वर अमलगम के उपयोग के कारण भी पारा हमारे शरीर में प्रवेश करता है। इसके अलावा टूटे हुए फ्लोरेसेंट ट्यूब तथा थर्मामीटर इत्यादि सामानों को ठिकाने लगाने के क्रम में भी हम पारे के संपर्क में आ जाते हैं। जापानियों द्वारा व्हेल तथा डॉल्फिन का सेवन काफी अधिक किया जाता है। ये जन्तु समुद्री पानी से काफी मात्रा में पारे को अपने शरीर में संचित कर लेते हैं। अतः इनके मांस के सेवन के फलस्वरूप पारे की काफी मात्रा जापानियों के शरीर में पहुँच जाती है। जापान में होक्कैडो नामक स्थान पर हेल्थ साइंस युनिवर्सिटी में कार्यरत तेनसुमा एंडो नामक एक वैज्ञानिक ने तैजी नाम स्थान पर व्हेल के मांस को क्रय कर उसका विश्लेषण किया तो पता चला कि उसमें स्वीकार्य जापानी मानक से 20 गुना पारा मौजूद है।
वायुमंडल की जिस हवा को हम साँस द्वारा ग्रहण करते हैं उसमें भी पारे की कुछ मात्रा पायी जाती है। इस पारे की कुछ मात्रा तो प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त होती है जिनमें शामिल हैं ज्वालामुखी विस्फोट, उष्णोत्स(गीजर), वाष्पमुख(फ्युमरॉल) तथा गर्म झरने। जबकि कुछ मात्रा मानवीय कार्य कलापों के कारण वायुमंडल में पहुँचती है। मानव द्वारा वायुमंडल में पारे का किया गया योगदान विभिन्न कारखानों की चिमनियों से निकलने वाली गैसों के द्वारा होता है जिनमें प्रमुख हैं ऐसे पॉवर प्लांट जिनमें कोयला जलाया जाता है। इसके अलावा घरेलू ईंधन के रूप में भी बहुत अधिक कोयला जलाया जाता है जिसके कारण वायुमंडल में परा पहुँचता रहता है। इनके अलावा हमारे वायुमंडल में पारे का योगदान देने वाले अन्य स्रोतों में शामिल हैं स्वर्ण उत्पादन, शव ज्वलन, कॉस्टिक सोडा उत्पादन, पिग आयरन एवं इस्पात उत्पादन, मर्करी उत्पादन तथा बायो गैस का ज्वलन इत्यादि।
सोने की छोटी-छोटी खानों में काम करने वाले लोग पारे की विषाक्तता से ग्रस्त होने का काफी अधिक खतरा मोल लेते हैं क्योंकि इन खानों में प्रसंस्करण(प्रोसेसिंग) के तरीके पुराने तथा बहुत ही अपरिष्कृत (क्रूड) रहते हैं। उदाहरण के तौर पर घाना में स्वर्ण खानों में काम करने वाले मजदूर तथा पड़ोसी देशों की स्वर्ण खानों में काम करने वाले मजदूर ऐसा ही खतरा झेलते हुए काम रकते हैं। घाना की स्वर्ण खानों में लगभग पाँच हजार ऐसे मजदूर काम करते हैं। इन मजदूरों में से अधिकांश मर्करी की विषाक्ता से ग्रस्त हो चुके हैं।
हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका की पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी ने पावर प्लांट्स से होने वाले वायु प्रदूषण के नियंत्रण हेतु कुछ सुरक्षा नियमों को लागू किया है जिसमें पारे द्वारा होने वाले प्रदूषण का नियंत्रण भी शामिल है। इन नियमों को अमल में लाने पर वायुमंडल में 30 मीट्रिक टन मर्करी की कमी प्रति वर्ष होने की आशा है। इसके फलस्वरूप प्रति वर्ष लगभग 13500 अमरीकी लोगों की जान बचायी जा सकती है तथा प्रतिवर्ष लगभग डेढ़ लाख लोगों को दमा से ग्रस्त होने से बचाया जा सकता है।
जहाँ तक वायु को प्रदूषित करने का प्रश्न है मर्करी कोई अन्तर्राष्ट्रीय सीमा को नहीं मानता। यही कारण है कि संयुक्त राज्य अमेरिका का एन.आर.डी.सी.विभाग संयुक्त राष्ट्र संघ तथा ‘जीरो मर्करी वर्किंग ग्रुप’ के साथ मिल कर एक विश्व स्तरीय समझौता कराने का प्रयास कर रहा है। ‘जीरो मर्करी वर्किंग गु्रप’ 80 से अधिक विभिन्न सरकारी संगठनों का समूह है।

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