विज्ञान

(20/May/2015)

भूकंप के प्रभाव से आ रहे बदलाव

डॉ.जे.जी.नेगी

प्राकृतिक आपदा भूकम्प कुछ पल के लिए धरती को हिलाती है पर इस पर रहने वाले बाशिंदे जीवन भर इसकी सिहरन भूल नहीं पाते। भूकम्प धरती को नहीं हिलाता बल्कि वातावरण पर भी असर डालता है। एक आकलन के मुताबिक 8 य्ाा उससे अधिक तीव्रता के भूकंप वर्ष में सामान्य्ातः एक बार आते हैं। किन्तु वर्ष 2004 में तीन दिन के अंतराल में ही दो बड़े भूकंप आय्ो। पहला भूकंप न्य्ाूजीलैंण्ड के पास उत्तर मैक्वाय्ार में 8ण्1 तीव्रता का था। य्ाह 23 दिसम्बर 2004 को आय्ाा एवं दूसरा 9ण्3 तीव्रता का भूकंप 26 दिसम्बर 2004 को उत्तरी सुमात्र्ाा में आय्ाा। य्ाह भूकंप सभी सिस्मोमीटर पर दर्ज हुय्ो। इन दोनों भूकंपों से विनाशकारी शक्ति 50ए000 मैगाटन टीएनटी (हाइड्रोजन बम) के विस्फोट के समकक्ष ऊर्जा उत्सर्जित हुई एवं पृथ्वी पर लगभग 12ए000 किलोमीटर लंबी भ्रंश की कमजोर सतह उत्पन्न हुई। इसके परिणामस्वरुप 10 से 30 मीटर अधिकतम ऊँचाई की हिन्द महासागर में सुनामी लहरें आय्ाी। इस सुनामी द्वारा उत्पन्न ऊर्जा हीरोशिमा, जापान पर गिराय्ो 23ए000 एटमी बम के बराबर थी। य्ाूनाइटेड स्टेट जिय्ाोलॉजिकल सर्विस (य्ाू.एस.जी.एस) के अनुसार य्ाह इतिहास की सर्वाधिक क विनाशकारी सुनामी थी। इसमें 4ण्32 मिलिय्ान से भी अधिक की जनहानि हुई।
दिसम्बर 2004 में ग्रेट टैक्टोनिक प्लेट के टूटने से पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूमने से औसत स्थिति में बड़ा विचलन प्रारंभ हो गय्ाा। वर्ष 2005.2006 में पृथ्वी के शेन्लर्स वोबल की एक बड़ी असामान्य्ा घटना थी। इन भूकंपों द्वारा उत्सर्जित घर्षण ऊर्जा के फलस्वरुप लिथोस्पीय्ार का तापमान बढ़ गय्ाा एवं पृथ्वी की सतह का जल गरम होने लगा साथ ही समुद्र सतह का स्तर ऊपर उठ गय्ाा। इसके साथµसाथ वाय्ाुमण्डल में ऊर्जा का प्रवाह भी बढ़ा एवं वाय्ाुमण्डल, जल की गर्मी में लगातार वृद्धि होने लगी। इस बात का प्रमाण वर्ष 2005 में आकाशीय्ा विद्युत गिरने की कई घटनाओं में वृद्धि होना है एवं समुद्री तूफानों की आवृत्ति का दुगना होना है। इससे विश्व के कई भागों में बेमौसम वर्षा की घटनाय्ों हुई। इसके साक्ष्य्ा में कुछ प्रमुख घटनाय्ों य्ाहाँ उल्लेखित हैंःµ
एक से नौ मार्च, 2006 की अवधि के दौरान मध्य्ाप्रदेश एवं मध्य्ाभारत के अन्य्ा राज्य्ाों में 89ण्7 मिलीमीटर वर्षा हुई। जिसने विगत 30 वर्षों का रिकार्ड तोड़ दिय्ाा। परिणामस्वरुप मध्य्ाभारत के विभिन्न शहरों में विद्युत वितरण प्रणाली बाधित हुई एवं शार्ट सर्किट के कारण अचानक बिना किसी पूर्व सूचना के विद्युत प्रदाय्ा अवरुद्ध होने की घटनाय्ों हुई। इसी दौरान आकाशीय्ा विद्युत गिरने से अकेले खण्डवा में ही 06 लोगों की मृत्य्ाु हुई साथ ही प्रदेश में 24 तथा देश में लगभग 50 लोगों की जानें गई।
दक्षिणी राजस्थान के ऊपर बने वाय्ाु चक्रवात के कारण बुधवार 8 मार्च 2006 की शाम में दिल्ली में वर्षा एवं ओले गिरे। 21 जनवरी 2006 को हिमाचल प्रदेश में अचानक मौसम बदलने से तेज ठण्ड हो गई एवं -700ब् पर पहुँच गय्ाा। इसके बाद भी उत्तरी क्षेत्र्ा में काफी बर्फबारी हुई।
रविवार 8 जनवरी 2006 की सुबह भारत की राजधानी दिल्ली में 70 साल के अंतराल के बाद सर्वाधिक ठण्डी सुबह के रुप में दर्ज हुई। इस दौरान एशिय्ाा के अधिकतर भागों में शीतलहर चली एवं तापमान जमाव बिन्दु तक पहुँच गय्ाा था। जिसके परिणामस्वरुप प्राथमिक शालाएं एवं दफ्तर तीन दिन के लिय्ो बंद करने हेतु विवश होना पड़ा। सुबह भ्रमण करने वाले लोगों ने घूमने के दौरान पाय्ाा कि पार्क की घास एवं कारों की छत पर बर्फ की एक पतली परत जम गई है। इस वर्ष शीतलहर के कारण 100 से भी अधिक की जनहानि हुई। दिल्ली शहर का सबसे ठण्डा तापमान 1935 में -600C (30.920 F) दर्ज किय्ाा गय्ाा था। इसके बाद पुनः 2006 में रविवार 8 जनवरी को उत्तरी भारत एवं कश्मीर भीषण शीतलहर से कांप उठा जब रात का तापमान गिरकर -800C हो गय्ाा।
विगत 10 वर्षों के इतिहास में पहली बार श्रीनगर, कश्मीर में डल झ्ाील पूरी तरह से जम गई एवं पारा गिरकर -600ब् हो गय्ाा। पश्चिमी राजस्थान के कुछ जिलों में भी कई वर्षों के अंतराल के बाद रिकार्ड तोड़ ठण्ड पड़ी एवं चुरु जिले में तापमान गिरकर -300C हो गय्ाा। पूर्व में मौसम विभाग द्वारा वर्ष 1974 में चुरु जिले का तापमान -300C दर्ज किय्ाा गय्ाा। 
जनवरी 2006 को जापान में इस दशक की सर्वाधिक (10 फीट) बर्फबारी रिकार्ड की गई। चीन में 20 साल के बाद सर्वाधिक ठण्ड इस वर्ष पड़ी और पारा -500C के नीचे चला गय्ाा। जिंग झ्ािय्ाांग क्षेत्र्ा में तापमान -430C से भी नीचे चला गय्ाा जिसके कारण कई पशुओं की मृत्य्ाु हुई और य्ौलो नदी बर्फ में परिवर्तित हो गई। उत्तरी य्ाूरोप में भी बर्फबारी का कहर जारी रहा। पेरिस में बर्फबारी के कारण एफिल टावर बंद करना पड़ा। स्पेन में भी पर्वतीय्ा विस्तार का सम्पर्क टूट गय्ाा। जर्मनी में भी लोगों को विद्युत के बिना रहना पड़ा।
बेल्जिय्ाम में फुटबाल प्रेमिय्ाों को निराशा तब हुई जब एक महत्वपूर्ण मैच बर्फबारी के कारण रद्द करना पड़ा एवं हवाई  य्ााताय्ाात भी अवरुद्ध हो गय्ाा जिसके परिणामस्वरुप जर्मनी के डसल्डार्फ हवाई अड्डे से 36 उड़ानें रद्द करनी पड़ी।
12 फरवरी 2006 को आय्ो बर्फीले तूफान ने एटलान्टिक क्षेत्र्ा एवं उत्तर पूर्वी अमेरिका के कुछ हिस्सों के जन-जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव डाला। इस दौरान कुछ क्षेत्र्ाों में 60 सेंटीमीटर से भी अधिक की बर्फबारी हुई। य्ाह 26 दिसम्बर 1947 को न्य्ाूय्ाार्क के सेन्ट्रल पार्क में हुई बर्फबारी के बाद दूसरी बड़ी घटना थी। न्य्ाूय्ाार्क के सेन्ट्रल पार्क में लगभग 68 सेंटीमीटर बर्फ गिरी एवं 77 लोगों की जानें गई। (य्ाह आंकड़े राष्ट्रीय्ा मौसम सेवा के मुताबिक दिय्ो जा रहे हैं।)
वातावरण के बदलाव की गति तथा उसका माप पृथ्वी पर उसका असर दर्शाय्ोगा। पयर््ाावरण वैज्ञानिकों का मत है कि विश्व में ठण्ड का प्रमाण काफी तेजी से बढ़ेगा और पिछले 10,000 वर्षों में वातावरण में बदलाव बहुत तेजी से हो रहे है। पिछले 41,000 वर्षों का ग्रीनलेण्ड प्रदेश का ळप्ैच्2 रिकार्ड तथा 250,000 वर्ष का परीक्षण ग्लेशिय्ाल इन्टरग्लेशिय्ाल चक्र की आवृत्ति एवं समय्ा का अभ्य्ाास करने के लिय्ो प्रेरित कर रहे हैं।
हाल ही में वर्षों में हुय्ो अधिकतम बदलाव की आवृत्ति ठण्डी परिस्थितिय्ाों की तरफ इशारा कर रही है।
ग्रीनलैण्ड में हिम शिलाय्ों 1 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष की रफ्तार से बढ़ रही है। जबकि विश्व में समुद्रतल में कुछ मिलीमीटर की ही कमी हुई है। सबसे उल्लेखनीय्ा बात य्ाह है कि हिम शिलाओं की मोटाई दक्षिण पश्चिमी भाग में ही बढ़ रही है जो कि पहले वातावरण के बदलाव के साथ भी नहीं बदलती थी।
नेचर मैगजीन के जुलाई 1999 के अंक में वैज्ञानिकों ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण ठण्ड बढ़ सकती है। वैज्ञानिकों ने कहा कि प्लेसटोसीन गलेशिय्ोशेन के समय्ा (8,200 वर्ष पूर्व) भी ठण्ड का पकोप होता था। जिसके कारण उत्तरी एटलांटिक में ठण्ड बढ़ जाती थी। ग्रीनलैण्ड की हिम शिलाओं के ग्लोबल वार्मिंग के कारण पिघलने से वातावरण में काफी उथल.पुथल हो सकती है। 14 वीं सदी में इस पकार से लिटिल आईसऐज की शुरुआत हुई थी।
सूर्य की गतिविधि का पृथ्वी के वातावरण पर सीधा असर होता है। सूर्य के ऊपर के बनते सनस्पाट के चक्र की लंबाई महत्वपूर्ण है। सामान्य्ातः इस चक्र की लंबाई 11 वर्ष होती है। हर ग्य्ाारह वर्ष के पश्चात् य्ाह चक्र अपने न्य्ाूनतम स्तर पर पहुंचता है। जब य्ाह चक्र न्य्ाूनतम हो जाता है तब आईसऐज की परिस्थितिय्ाों का निर्माण होता है और सूर्य की तीव्रता में कमी होती है। स्पष्ट है कि पृथ्वी पर ठण्ड का प्रभाव अधिक हो जाता है। इस समय्ा 23वां सनस्पाट चक्र चल रहा है जो 2007 की शुरुआत में समाप्त हो जाय्ोगा। इससे भी ठण्ड बढ़ने का प्रभाव मिल रहा है।
23वां सनस्पाट चक्र में सूर्य अपने अधिकतम स्थान को अप्रैल 2000 में पहुंचा था। जब य्ाह अधिकतम में पहुँचता है तो दो से तीन वर्ष तक सूर्य की गर्मी का प्रभाव पृथ्वी पर ज्य्ाादा होता है जिसके कारण पृथ्वी पर तापमान बहुत बढ़ जाता है। एक कहावत है कि  New Under the Sun खुद सूर्य के लिय्ो सच नही है और आने वाले समय्ा में 23वें सनस्पाट चक्र में काफी रोचक गतिविधिय्ााँ देखने को मिल सकती है। एक अनुमान के मुताबिक विश्व के तापमान में बदलाव का 70-80 वर्ष का चक्र दर्शाता है। इससे वर्ष 2005 से विश्व के तापमान में गिरावट आय्ोगी तथा भविष्य्ा में तीव्र ठण्ड का पकोप जारी रहेगा। इस घटना का असर 200N और उसके ऊपरी भाग में अनुभव किय्ाा जाय्ोगा। इससे हिमालय्ा की हिमशिलाओं के पिघलने की दर कम होगी और रात्र्ाि के तापमान में औसतन गिरावट दर्ज की जाय्ोगी।

(‘इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए’ जून 2006)