विज्ञान

(20/May/2015)

चार डिजिटल विभाजनों की दास्तान

केनेथ केनिस्टन

आज की हमारी दुनिय्ाा क्रांति के एक नय्ो दौर से गुजर रही है जिसे हमने एक नाम दिय्ाा है सूचना य्ाुग। दुनिय्ाा भर में करोड़ों लोग इस क्रांति की धड़कन रोजाना अपने सामान्य्ा जीवन में सुनते हैं। इस नवेली (सूचना) क्रांति की कदमताल में शामिल है कम्प्य्ाूटरों व सूचना उपकरणों का विस्मय्ाकारी प्रसार; पल-पल बढ़ती जाती दिनों दिन कुलांचे भरती उनकी रफ्तार; पल-पल गिरती जाती उनकी कीमतें; एक ही माध्य्ाम (मीडिय्ाा) में सिमटते जाते बिम्ब, चित्र्ा, ध्वनिय्ाां और लेखनी तथा हर दिन फैलता जाता उपग्रहों और ब्रॉड-बैंड फाइबर ऑप्टिक केबल्स का संजाल। चौंकिएगा नहीं। य्ाह क्रांति कोई एक रात की उपज नहीं। इसका भी एक लम्बा सिलसिला है सदिय्ाों पुराना 19 वीं शताब्दी में टेलीफोन व टेलीग्राफ 20 वीं शताब्दी के मध्य्ाांतर में रेडिय्ाो व टी.वी.; और अभी हालिय्ाा नेटवर्क जैसे अरनेट (भारत) य्ाा इथरनेट (य्ाू.एस.)। लेकिन पिछले दो दशकों ने कमाल ही कित्ता सी एक बमगोला सा फूटा और सामने जो नजर आय्ाीं वे कहलाईं सूचना व संचार ‘तकनॉलॉजिय्ाां’ बोले तो आईसीटी (इन्फॉर्मेशन एण्ड कम्य्ाूनिकेशन टेक्लॉलॉजीस)।
कृषि क्रांति और औद्योगिक क्रांति के बाद की इस क्रांति का सबसे दिलचस्प पहलू जो है वो इसकी रफ्तार है। पलक झ्ापकते ही गोय्ाा य्ो क्रांति हो गय्ाी और अपनी तो दुनिय्ाा ही बदल गय्ाी। गौर कीजिए कोई 5 करोड़ लोगों को छूने में प्रिटिंग प्रेस को कम से कम एक शताब्दी लग गय्ाी। इतने ही लोगों तक अपनी आवाज पहुंचाने में रेडिय्ाो को कोई 38 बरस लग गय्ो। टी.वी. ने भी 13 साल तो लिय्ो ही सबकी आंखों का तारा बनने के लिए। लेकिन ूूू का कमाल तो देखो फकत चार बरस की जिंदगानी में य्ाह 5 करोड़ लोगों को अपने बाहुपाश में ले आय्ाी। आज से पहले आज से ज्य्ाादा कोई क्रांति इतनी फटाफट नहीं फैली जितनी कि अपने वर्ल्ड वाइड वेब के जाल वाली संचार क्रांति।
वेब क्रांति के जाल में उलझ्ो हम लोगों ने भी अपने कई सपने बुने, अपनी कल्पनाओं के फंदे तय्ा किय्ो। रौ में आकर हम कहने लगे य्ाह डिजिटल य्ाुग हमें पारदर्शी सरकार देगा, कि हमारे अपने बाजारों को तर्क की घुट्टी पिलाय्ोगा, सब जन को जानकारी सूचना का परसाद अरपेगा, दुनिय्ाा जहान के अदब (संस्कृति) को एक दूजे के करीब बिठाय्ोगा, नित नय्ो अंतरराष्ट्रीय्ा समुदाय्ा बनाय्ोगा, दुनिय्ाा भर के आम आदमी की जिंदगी और सेहत में इजाफा लाने का इल्म देगा। वगैरह वगैरह।
लेकिन सवाल तो है कि आखिर कितनी फीसदी दुनिय्ाा को य्ाह तिलिस्मी दुनिय्ाा नसीब हुई। चाहे जो भी सपने हमने बुने ‘सूचना य्ाुग’ की छुअन दुनिय्ाा की एक बहुत ही छोटी आबादी के हिस्से आ पाय्ाी है। हम अगर य्ाह कसौटी चुनें कि आखिर कितने घरों तक ूूू का जाल पहुंचा है तो पाएंगे कि सारे जगत में महज 5 फीसदी लोग ही इसके आगोश की गरमाहट में गुनगुना रहे हैं। ऐसे में जो सवाल अहम है वह य्ाह कि हमारा य्ाह ‘सूचना य्ाुग’ हमारी अपनी 95 फीसदी दुनिय्ाा की जिंदगी में बेहतरी ला पाय्ोगा कि नहीं, और अगरचे हां तो किस विधि?
बीसवीं सदी का आखिर आते-आते य्ाह सवाल और भी बुलंद हुआ। कई-कई आवाजें उठीं और डिजिटल विभाजन समाचारों की सुर्खी बन गय्ाा। आशा और उत्तेजना के शोर मचाते अतिरेक के बीचों बीच एक शांत, सुघड़ तहकीकात ने सच्चाई जताय्ाी कि तमाम दुनिय्ाा के तमाम लोग अभी भी इस क्रांति के स्पर्श से निपट अछूते रहे आय्ो हैं। हम रूबरू हुए इस बात से कि य्ाू.एस. व ऑस्ट्रेलिय्ाा जैसे आर्थिक हैसिय्ात वाले देशों में भी आईसीटी तक पहुंच को लेकर काफी बड़ा वर्ग भेद है। पता चला कि गोरों की और कालों की दुनिय्ाा में जमीन-आसमान का फर्क है। मालूम हुआ कि पढ़ों और अपढ़ों की दुनिय्ााएं भी एकदम अलग-अलग हैं। अमीर और गरीब का फर्क तो खैर जग-जाहिर है ही। तथाकथित ‘ऊपरी (उत्तरी) दुनिय्ाा’ (य्ाू एस, पश्चिमी य्ाूरोप और जापान जैसे औद्योगीकृत व सम्पन्न देश) व निचली (दक्षिणी) दुनिय्ाा (कमोबेश सगरे विकासशील कहे जाने वाले देश) के बीच आईसीटी तक पहुंच के फर्क की खाई बहुत चौड़ी, दमनकारी और दिनों दिन बढ़ती जाती है। हमारा पहला काम है इस ‘डिजिटल विभाजन’ को अच्छे से समझ्ाना। मेरा तो तर्क है कि सूचना  अमीर और सूचना गरीब लोगों के बीच चार पकार के डिजिटल विभेद हैं।
हालांकि ‘डिजिटल विभेद’ को व्य्ाापक रूप से एक ऐकिक घटना के बतौर लिय्ाा जाता रहा है। सामान्य्ा तौर पर उन लोगों के बीच फर्क को पहचानना जो इस ‘सूचना य्ाुग’ की विभाजन रेखा के आर-पार बटी, दो एकदम अलग-अलग दुनिय्ााओं (सूचना अमीर और सूचना गरीब) के वासी हैं, लगभगता के हिसाब से तो ठीक है और उपय्ाोगी भी। लेकिन गहरे पानी पैठने पर हमें तीन डिजिटल फर्क तो साफ तौर पर दिख पड़ते हैं और चौथा अभी बहुत से देशों में अपना सिर उठाते हुए नजर आता है। सबसे बड़ा जो रोड़ा है भारत में वह आर्थिक ही है। अब य्ो जो तीन फीसदी कनेक्टेड इंडिय्ान्स हैं वे भारत का सबसे सम्पन्न शहरी ‘तबका’ है। एसटीडी पीसीओ आईएसडी बूथों की सफलता के और कोई 7 लाख भारतीय्ा गांवों को टेलीफोन से जोड़ देने के सरकार के पुरजोर आश्वासनों के बावजूद तमाम भारतीय्ा गांवों में टेलीफोन नदारद हैं। बहुत से भारतीय्ा ग्रामीणों ने कभी कोई टेलीफोन कॉल ही नहीं लगाय्ाा। कुल मिलाकर हम बड़े विश्वास के साथ कह सकते हैं कि भारत में तो डिजिटल विभेद काफी चटख है और जिसके निर्धारक तत्व हैं आय्ा, शिक्षा और शहरी आवाज तथा इनसे संबद्ध आर्थिक, राजनैतिक व सांस्कृतिक फर्क। दूसरा डिजिटल विभेद जो है उस पर जरा कम ही नजर जाती है उसकी प्रकृति भाषाय्ाी और सांस्कृतिक है। बहुत से देशों में य्ाह अंग्रेजी य्ाा कोई अन्य्ा पश्चिमी य्ाूरोपीय्ा भाषा बोलने वाले तथा न बोलने वाले लोगों के बीच का विभाजन होता है। लेकिन य्ाू एस में भी जहां के 95 फीसदी से भी ज्य्ाादा बाशिंदे फर्राटा अंग्रेजी बोलते हैं, वहां भी विभिन्न जातीय्ा तथा सांस्कृतिक समूहों में आईसीटी तक पहुंच को लेकर काफी अंतर है।
भारत में तो सांस्कृतिक विसंगतिय्ाों के झ्ाोल में भाषाय्ाी जटिलताओं का छौंक और लग जाता है। दुनिय्ाा भर की वेबसाइट्स में से कोई 60.80 फीसदी अंग्रेजी में हैं। बाकी बची में कमोबेश सभी की सभी जापानी, जर्मन, फ्रेंच, स्पैनिश, पोर्टय्ाूगीस और चीनी जैसी प्रमुख उत्तर भाषाओं में से किसी एक में लिखी गय्ाी है। लेकिन अन्य्ा दक्षिणी एशिय्ाा की तरह ही भारत में भी कोई 2.10 प्रतिशत लोग धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलते हैं जबकि बाकी सभी (100 मिलिय्ान से ज्य्ाादा भारतीय्ा ओर तकरीबन 1ण्2 बिलिय्ान दक्षिणी एशिय्ााई) अन्य्ा बोलिय्ाां बोलते हैं।
अंग्रेजी न य्ाा बहुत कम बोलने वाले भारतीय्ाों के लिए सूचना य्ाुग की चारदीवारी फांदना लगभग नामुमकिन है। व्य्ाापक रूप से इस्तेमाल किय्ो जाने वाले जितने भी ऑपरेटिंग सिस्टम हैं, अंग्रेजी य्ाा किसी न किसी उत्तरी भाषा का ज्ञान जरूर मांगते हैं। इसीलिए जब तक भारतीय्ा अवाम अंग्रेजी नहीं सीखती तब तक चाहे जितने शिक्षित, धनी य्ाा उत्साही वे हों, कम्प्य्ाूटर का इस्तेमाल य्ाा इंटरनेट की सवारी उनकी पहुंच के बाहर ही रहे आय्ोंगे। नतीजतन मामला दो टूक हुआ जाता है चूंकि अंग्रेजी के अलावा दूसरी किसी भाषा में सॉफ्टवेय्ार बहुत कम उपलब्ध है, व्य्ावहारिक तौर पर हर वो दक्षिण एशिय्ााई जो कम्प्य्ाूटर का इस्तेमाल करता है, अंग्रेजी जानता है। इसीलिए सॉफ्टवेय्ार निर्माताओं का य्ाह तर्क है कि ‘भारतीय्ा भाषाओं के लिए सॉफ्टवेय्ार का कोई बाजार नहीं है।’
लेकिन धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने वाले कोई 50 मिलिय्ान (5 करोड़) भारतीय्ा किसी भी तरह से भारतीय्ा अवाम का एक प्रतिनिधि सेम्पल नहीं बन जाते। य्ो 5 करोड़ भारतीय्ा प्रमुखतः सम्पन्न, शहरी, अत्य्ाधिक शिक्षित और तकनीकी क्षेत्र्ाों से जुड़े लोग हैं।
पहला विभेद जो है, वह हर देश में, हर जगह है। फिर चाहे वह देश विकसित हो य्ाा विकासशील। अमीर, पढ़े-लिखे, शक्तिशाली लोग और गरीब, अपढ़, अशक्तिशाली। य्ाह विभाजन तो हर जगह रहता है और रहेगा। है न?
मध्य्ा 2002 के आंकड़े कहते हैं कि भारत में टेलीफोन कनेक्टिविटी काफी कम है (लगभग 3 फीसदी और कम्प्य्ाूटर व इंटरनेट कनेक्टिविटी तो और भी कमतर। एक अनुमान (ड।प्ज् का अनुमान) के मुताबिक सन 2004 भारत में कोई 90 लाख कम्प्य्ाूटर होंगे। इनमें से दो.तिहाई तो शाय्ाद व्य्ावसाय्ािक प्रतिष्ठानों, स्कूलों, सरकारी दफ्तरों वगैरह में ही होंगे। य्ाानी घरेलू कम्प्य्ाूटरों का आंकड़ा 20 लाख के आशावादी अनुमान से आगे नहीं निकल सकता। 2002 के मध्य्ा तक भारत में कोई 10 लाख इंटरनेट कनेक्शन थे जिनमें से अधिकांश तो संस्थानों के ही थे, घरेलू स्तर पर नहीं। य्ाानी अगर 2002 की बात करें तो भारत में तकरीबन 200 मिलिय्ान घरों में से महज 1 मिलिय्ान घर ही इंटरनेट से जुड़े होंगे।
अब अगर मान लें कि प्रति घर 3 कम्प्य्ाूटर इंटरनेट उपय्ाोगकर्ता हैं तो हम इस आंकड़े पर पहुंचते हैं कि कोई 6 मिलिय्ान भारतीय्ाों के पास घरेलू इंटरनेट कनेक्शन हैं और 3 मिलिय्ान ऐसे हैं जिनके पास किसी न किसी तरह इंटरनेट की सुविधा है। य्ाानी 2002 के मध्य्ाांतर तक कोई एक बिलिय्ान भारतीय्ाों में से 1 फीसदी से भी कम के पास अपने घर पर ही कम्प्य्ाूटर तक पहुंचने की सुविधा हासिल थी और ज्य्ाादा से ज्य्ाादा कोई 0ण्5 फीसदी भारतीय्ाों के पास ही अपने घर पर ही इंटरनेट पर जाने का सुकून था।
अब य्ो ‘कनेक्टेड’ भारतीय्ा कौन? निश्चित ही, अमीर, सफल और अंग्रेजी भाषी अल्पसंख्य्ाक भारतीय्ा। अब 3 फीसदी टेलीफोन कनेक्टिविटी का आंकड़ा भारत में तो बहुत ऊपर उठने से रहा। जब तक कि इसकी कीमत कम नहीं की जाती। कनेक्टिविटी बढ़ने में, दो टूक कहें तो, वे भारतीय्ा अभिजात्य्ा वर्ग के मेम्बरान हैं जिनकी ‘सम्पर्क भाषा’ ही ठहरी रही। बहुसंख्य्ाक भारतीय्ाों के लिए कम्प्य्ाूटर भाषाय्ाी हिसाब से दुर्लभ है और इसीलिय्ो अनुपय्ाोगी है।
भारत के संदर्भ में कम्प्य्ाूटर की भाषाय्ाी दुर्लभता के मुद्दे से सांस्कृतिक लिहाज से प्रासंगिक सामग्री के अभाव का मसला और नत्थी हो जाता है। य्ाूं भी सन 2000 में भारतीय्ा वेबसाइट्स की संख्य्ाा कम थी, तिस पर भारतीय्ा भाषाओं की वेबसाइट्स तो राई बराबर ही रहीं। य्ाह बात सही है कि कुछेक हुनरमंद प्रोग्रामर इस तस्वीर को बदलने के उद्यम मंे लगे हैं और बहुत सी हिन्दी, बांग्ला, तमिल वेबसाइटें अब सिर उठाने लगी हैं। लेकिन तमाम नेक इरादों के बावजूद तमाम प्राचीन सम्पन्न और परिष्कृत संस्कृतिय्ाां जिनसे मिलकर य्ाह भारत बना है वेब के पर्दे से सिरे से गाय्ाब हैं। परिणामस्वरूप भारतीय्ा भाषाओं में अच्छे और सस्ते सॉफ्टवेय्ार की अनुपस्थिति तथा तेलुगु, तमिल य्ाा हिन्दी में वेबसाइट बनाने की तकनीकी चुनौतिय्ाां, य्ो दोनों बातें मिलकर य्ाह तय्ा कर देते हैं कि य्ो संस्कृतिय्ाां लगभग अदृश्य्ा रही आय्ोंगी। काबिले गौर और काबिले जिक्र बात तो य्ाह है कि इन विकट चुनौतिय्ाों के बावजूद चंद समर्पित भारतीय्ा प्रोग्रामरों ने इन चुनौतिय्ाों से निपटने का महती बीड़ा उठाय्ाा है।
संक्षेप में, धन और सत्ता से गुंथे डिजिटल विभाजन में एक और विभाजन/विभेद जुड़ जाता है जिसका नाता अंग्रेजी भाषा (और उससे जुड़ी आंग्ल सैक्सन संस्कृति) के वर्चस्व से है। अधिकांश वेबसाइटों का जन्म य्ाूएस, ग्रेट ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिय्ाा व न्य्ाूजीलैंड जैसे अंग्रेजी भाषी राष्ट्रों में होता है य्ाा भारत, दक्षिण आफ्रीका, सिंगापुर व हांगकांग जैसे अंग्रेजी बोलने वाले नगर राज्य्ाों द्वारा होता है। तीसरा डिजिटल विभाजन पहले दो विभाजनों का ही अपरिहायर््ा परिणाम है सम्पन्न व निर्धन देशों के बीच बढ़ती डिजिटली खाई। 1999 की मानव संसाधन विकास पर य्ाू एन की रिपोर्ट (ज्ीम न्छ तमचवतज वद भ्नउंद क्मअमसवचउमदज) अपने एक अध्य्ााय्ा के अधिकांश हिस्से में इसी बात पर विमर्श करती है कि किस तरह ‘उत्तर’ के सूचना संपन्न देशों व ’दक्षिण’ के सूचना गरीब लोगों के बीच का फर्क दिनों दिन बढ़ता ही जाता है।
विभिन्न देशों के बीच की य्ाह डिजिटली खाई बढ़ते जाने के कारण तो एकदम साफ हैं। आईसीटी व्य्ाापार से पहुंचती है और इस की कमी से उसे अगर नुकसान होता है तो य्ाह सूक्ति कि ‘जिनके पास है उन्हीं को मिलेगा’  बड़े ही पुरजोर ढंग से अमल में आती है और नतीजन अंतरराष्ट्रीय्ा डिजिटल विभाजन की य्ाह खाई और भी चौड़ी हुई जाती है। देखा जाय्ो तो आईसीटी तक पहुंच संबंधी य्ाह अंतर्राष्ट्रीय्ा विसंगति वास्तव में अमीर और गरीब देशों की तमाम अन्य्ा विसंगतिय्ाों का प्रतिबिम्ब मात्र्ा है। भारत और अमेरिका जैसे देशों में इन तीन डिजिटल विभाजनों की श्रेणी में चौथा वर्ण भेद और भी जोड़ सकते हैं निहाय्ात नय्ो एक समूह का उद्भव। अपनी प्रकृति में अभिजात इस समूह में मैं अत्य्ांत सफल आईटी के लाभार्थिय्ाों के वर्ण को जोड़ना चाहूंगा। भारत में आईआईटी तथा अन्य्ा प्रमुख इंजीनिय्ारिंग कॉलेज और विश्वविद्यालाय्ाों से निकलने वाले होनहार छात्र्ा हर बार य्ाह शिकाय्ात करते मिलते हैं कि प्राकृतिक विज्ञान, य्ाांत्र्ािकी इंजीनिय्ारिंग य्ाा रासाय्ानिक इंजीनिय्ारी की राह चुनने वाले इन छात्र्ाों के मुकाबले उनके जितने ही बुद्धिमान उनके सहपाठी जिसने कम्प्य्ाूटर सांइस य्ाा बाय्ाोटेक्नॉलाजी का दामन थामा, कहीं बहुत गुना पैसा कमा रहे हैं और उनकी एक अलग ही अनूठी दूनिय्ाा है।
लेकिन अन्य्ा भारतीय्ा वर्गों के उलट य्ो नय्ो डिजिटल तबके अपनी जाति, अपनी बपौती, अपने ‘कनेक्शन’ य्ाा पारम्परिक शासकों से अपने रिश्तों के बूते नहीं बल्कि अपनी शिक्षा, अपनी दिमागी प्रखरता अपने विशेष उद्यमी कौशल तथा ‘निय्ार अद्यतन’ ज्ञान के कगार पर  हमेशा टिके रहने की अपनी क्षमता के बल पर अपने ‘विशेषाधिकार’ पाते हैं। इस नय्ो डिजिटल तबके की जीवन शैली भी चमकµदमक से भरपूर है। इनकी छुट्टिय्ााँ इनका काम काज सभी कुछ ‘बाहर’ होते हैं सिंगापुर, लंदन, ज्य्ाूरिच, मॉरिशस, य्ाा काठमाण्डू। हालांकि इनकी नय्ाी पौध आईसीटी में ही शुरू हुई थी लेकिन अब य्ो फल-फूल कर बाय्ाोटेक, फार्मास्य्ाूटिकल तथा अन्य्ा हाईटेक क्षेत्र्ाों में भी उगने लगे हैं। इस अभिजात वर्ग की सम्पन्नता के बारे में तो कोई बात नहीं और इस सेक्टर में श्रम की विश्वव्य्ाापी कमी को देखते हुए तो य्ाही कहा जा सकता है कि आने वाले समय्ा में य्ाह तबका और फैलेगा और फूलेगा।
अब इस चौथे विभाजन बाबत एक अहम सवाल है कि इस डिजिटल  अभिजात्य्ा की सम्पन्नता क्य्ाा इन्हीं तक महफूज रहेगी य्ाा फिर य्ाह छलक कर समाज के अन्य्ा तबकों की झ्ाोली में भी जाएगी। खासकर शहरी गरीबों और ग्रामीण आबादी। य्ाा फिर एक अलग-अलग महानगरीय्ा, ज्ञान आधारित द्वीप ही और फलताµफूलता रहेगा। मुद्दा कुल मिलाकर य्ाह है कि डिजिटल विभाजन दरअसल एक न होकर कम से कम चार डिजिटल विभाजन हैं। इन चारों का आपसी नाता वाकई बड़ा गहरा है। पहला जो है वह अंदरूनी है डिजिटली तरीके से समर्थ अमीर और गरीब। य्ाह खाई दोनों, उत्तरी एवं दक्षिणी देशों में मौजूदा है। दूसरी भाषाय्ाी सांस्कृतिक खाई मुख्य्ातः अंग्रेजी और अन्य्ा भाषाओं के बीच है। य्ाह मोटे तौर पर आंग्ल सेक्शन संस्कृति तथा अन्य्ा वैश्विक, संस्कृतिय्ाों के बीच है। तीसरा विभाजन जो है वह आईटी तक पहुंच के मसले पर अमीर व गरीब देशों के बीच के बढ़ते अंतर के चलते हैं। अंतिम विभाजन जो है उसकी प्रकृति अंतरµदेशीय्ा है और अभी य्ाह अपनी शैशवावस्था में है। इस विभाजन की रेखा सूचना आधारित उद्योगों व तकनालॉजिय्ाों के अनुकूल कौशल के बल पर उभरे अभिजात वर्ग से खिंची है। उनका य्ाह दबदबा उनकी य्ाह सपन्नता अभिजात्य्ा के पारंपरिक स्त्र्ाोतों से कतई कोई नाता नहीं रखती। य्ाह शुद्धता एक कौशल आधारित अभिजात्य्ा है।
ऐसे में जब करोड़ों लोग बुनिय्ाादी शिक्षा से, मूलभूत स्वास्थ्य्ा सुविधाओं से, पयर््ााप्त पोषण य्ाा न्य्ााय्ा मात्र्ा से ही वंचित हों, क्य्ाा आईसीटी में निवेश को तर्कसंगत ठहराय्ाा जा सकता है। संसाधनों की सीमितता को देखते हुए क्य्ाा उन्हें पोषण, स्वास्थ्य्ा जैसी बुनिय्ाादी जरूरतों पर खर्च करना ठीक नहीं? मार्च 1999 में भारतीय्ा प्रबंध संस्थान, अहमदाबाद में हुई ‘भारत में ग्रामीण विकास हेतु सूचना व संचार प्रौद्योगिकी पर कायर््ाशाला’ की प्रस्तावना में इस प्रश्न को अच्छे से अभिव्य्ाक्त किय्ाा गय्ाा है।
‘‘ग्रामीण विकास हेतु आईटी के महत्व के मुद्दे पर नीति निर्माता और फंडिंग एजेंसिय्ाां हमेशा इस दुविधा में रहती हैं कि ग्रामीण विकास हेतु रखे अतिसीमित संसाधनों को क्य्ाा आईटी क्षमताओं के विकास पर खर्च किय्ाा जाना ठीक होगा य्ाा फिर उन्हें स्कूलों, अस्पतालोें व औषधालय्ाों जैसी अधिक जरूरी बुनिय्ाादी चीजों पर खर्च ही श्रेष्ठ होगा?’’ 
य्ाह तो मानना ही पड़ेगा कि 21वीं सदी के पहले सालों में आईसीटी चकाचौंध और ग्लैमर से भरपूर रही। डिजिटल पिभाजन का मुद्दा लगभग हर रोज समाचारों और कॉन्फ्रेंसेस (सम्मेलनों) की सुर्खिय्ाों में रहा आय्ाा है। लेकिन सवाल है कि भला कब से अत्य्ांत गरीब लोगों को एक कम्प्य्ाूटर य्ाा इंटरनेट की  जरूरत महसूस होने लगी। तमाम बुनिय्ाादी इनसानी जरूरतों के ‘भूखे-प्य्ाासे’ रह जाने के चलते आईसीटी के लिए बहुत बड़ी मात्र्ाा में लगने वाली वर्ग व धन संबंधी जरूरतों को हम किस तरह न्य्ााय्ासंगत ठहरा सकते हैं?
इस सवाल को अक्सर इस नपे तुले अंदाज में निरस्त कर दिय्ाा जाता है, ‘हमें दोनों करने की जरूरत है। देखा जाय्ो तो आईसीटी और अन्य्ा महत्वपूर्ण मानवीय्ा सामाजिक लक्ष्य्ाों में कोई टकराहट ही नहीं है।’ लेकिन य्ाह तो तय्ा है कि मसले को ठीक से परखना जरूरी है। इसकी शुरूआत उपरोक्त प्रश्न को नय्ो सिरे से व्य्ाक्त करने से होती है। बहुत से विमर्श य्ाह मानने से लगते हैं कि आईसीटी का विस्तार आबादी के बड़े तबके तक ले जाना अपने आप में पयर््ााप्त होगा। लेकिन सवाल को और अधिक खंगालने पर जो बात स्पष्ट होती है वह य्ाह कि आईसीटी को निरपवाद रूप से अन्य्ा मानवीय्ा आवश्य्ाकताओं की पूर्ति के एक ‘जरिए’ के बतौर लिय्ाा जाता है। इस बिना पर आगे बढ़ते हुए इस बात को समझ्ाना ठीक होगा कि आईसीटी का मूल्य्ा अपने आप में कुछ नहीं होता बल्कि वह तो अन्य्ा जरूरतों की पूर्ति हेतु साधन मात्र्ा होती हैं। सदिय्ाों से लोग बिना आईसीटी ही इस दुनिय्ाा में अपनी अक्लमंदी से रहते आय्ो हैं एक खुश सेहतमंद जीवन। अब भी ऐसे ही जीते हैं। अगर आईसीटी के कोई माय्ाने हैं तो वे हैं इन्सान के सामाजिक, सांस्कृतिक आर्थिक व राजनीतिक उद्देश्य्ाों की पूर्ति के सिलसिले में एक सम्भावनापूर्ण माध्य्ाम के बतौर। इस पकार समस्य्ाा को पुनः परिभाषित करते ही य्ाह सवाल आता है कि किस तरह आईसीटी को आबादी के और बड़े तबकों तक ले जाय्ाा जा सकता है? इस सवाल में तब्दील हो जाता है कि आखिर आईसीटी को किस तरह, य्ादि ऐसा संभव है तो मूलभूत मानवीय्ा आवश्य्ाकताओं की पूर्ति तथा मूलभूत मानव अधिकारों की पुष्टि हेतु उपय्ाोग में लाय्ाा जा सकता है? आईसीटी और विकास को लेकर आज भी शोर ज्य्ाादा उपलब्धिय्ाां कम। पिछले कुछ दशकों का अनुभव बतलाता है कि इन तमाम सालों में आईसीटी को दरिद्रनाराय्ाण की सेवा में ले जाने की जितनी परिय्ाोजनाएं प्रस्तुत हुई, उनमें से कुछेक ही इन लोगों के जीवन में वास्तविक बदलाव ला पाईं। पांच सालों के भीतर संपूर्ण साक्षरता य्ाा प्रत्य्ोक गांव को रोशन कर देने के रिवाजी वाय्ादों की तर्ज पर इस मुद्दे पर बनी तमाम परिय्ाोजनाओं का असर भी प्रशासनिक दस्तावेजों तक ही महदूद रहा आय्ाा है और लक्षित लाभार्थिय्ाों को तो य्ाह छू तक न पाय्ाा है।
ऐसे में सबसे बड़ा खतरा य्ाह होता है कि डिजिटल विभाजन के खात्मे के नाम पर राष्ट्रीय्ा अंतर्राष्ट्रीय्ा स्तर के तमाम अफसरशाह निय्ाोजक खड़े हो उठते हैं, जिनकी सारी ऊर्जा और सारा पैसा अंतर्राष्ट्रीय्ा सम्मेलनों य्ाा परिय्ाोजनाएं बनाने में ही खर्च हो जाता है।एक पारखी विश्लेषक को तो बस इस सारे कोलाहल में जमीन सच्चाई से वास्ता रखना चाहिए।
अपनी मासूमिय्ात में य्ाह न मान लें कि फलते-फूलते आईटी के सेक्टर के लाभ अंततः रिस कर और लोगों तक भी पहुंचेंगे। आईटी उद्योग की समृद्धि तथा डिजिटल विभाजन को पाटने के उद्यम के बीच एक रिश्ता बिठाना एक समस्य्ाामूलक अवधारणा है। बैंगलोर, चेन्नई, हैदराबाद और मुंबई जैसे शहरों में केन्द्रित भारत के सफल सॉफ्टवेय्ार उद्योग के चलते इन शहरों के कुछ रहवासिय्ाों को तो सम्पन्नता हासिल हुई है, भारत की नियर््ाातक कमाई भी बढ़ी है तथा य्ाू एस व भारत के बीच प्रतिभावान भारतीय्ाों की आवाजाही में भी काफी इजाफा हुआ है। लेकिन निर्धनता के अथाह समंदर के बीच अमीरी का य्ाह एक छोटा सा जजीरा है।
लेकिन बैंगलोर के आईटी धमाके की गूंज का असर एक औसत भारतीय्ा पर क्य्ाा हुआ है, य्ाह सवाल बड़ा जटिल और खुद कई सवालों से घिरा है। उदाहरण के लिए अभी हाल ही में हुए कर्नाटक के एक आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक कर्नाटक आज भी भारत के गरीब राज्य्ाों की श्रेणी में आता है, इसकी वार्षिक विकास दर पर बैंगलोर के आईटी उद्योग की कामय्ााबी की कोई छाप नहीं।
इन तमाम सच्चाईय्ाों के बावजूद जब भी डिजिटल विभाजन से जुड़ा कोई बावेला मचता है समाधान हमेशा य्ाही सुझ्ााय्ाा जाता है कि फिर किस नय्ाी तरह किस नय्ाी तरफ, आईटी की नकेल आगे बढ़ाय्ाी जाय्ोगी, फिर किस तरीके से नय्ो य्ाुवा भारतीय्ाों को प्रोग्रामिंग की शिक्षा दी जाय्ो। इस तमाम कारोबार में य्ाह मान्य्ाता निहित रहती है कि भारत की सॉफ्टवेय्ार नियर््ाात से हुई कमाई का असर एक औसत भारतीय्ा के हालात की बेहतरी में होगा। य्ाह मान कर चला जाता है कि बैंगलोर में उपजी सम्पन्नता की खन-खन बिहार में दिहाड़ी पर लगे मजदूर के जीवन में भी बजेगी।
दरअसल ठीक इसके उलट भी हो सकता है। ब्राजील जैसे विकासशील देशों का अनुभव कहता है कि अमीर और गरीब के बीच की खाई को पाटने के सक्रिय्ा प्रय्ाास किय्ो बगैर टेक्नालॉजी सेक्टर का फौरी विकास इस खाई को और चौड़ा कर सकता है। हां सॉफ्टवेय्ार इंजीनिय्ारों व प्रोग्रामरों का प्रशिक्षण बोधनीय्ा है और बड़ी ही नफासत से य्ाह विभिन्न संस्थाओं द्वारा भारत में किय्ाा भी जा रहा है। लेकिन भारत में डिजिटल विभेद को खत्म करने से इसका कोई रिश्ता होना कतई जरूरी नहीं है। इसका एक ही निश्चित परिणाम दिखता है ऐसे उपाय्ाों से विभाजन के शीर्ष पर खड़े लोगों की कतार ही बढ़ती है अभिजात्य्ा में ही वृद्धि होती है जिसका असर जरूरी नहीं कि गरीबी रेखा के नीचे रह रही एक आबादी पर निश्चित तौर पर पड़े ही पड़े। 
दरअसल, सामान्य्ातय्ाा समाज के सम्पन्न तबकों की बढ़ती सम्पन्नता का समाज के वंचित तबकों का माली हालत से संबंध अपने आप में एक जटिल गुत्थी है। इसकी सीरत अलग-अलग देशों में अलग-अलग होगी। एक ही बात जो अधिक आश्वस्त होकर कही जा सकती है, वह य्ाह कि विशिष्ट समूहों की बढ़ती सम्पन्नता तभी और तभी वंचित तबकों का भी भला कर सकती है जब केवल जब निजी एवं सार्वजनिक नीति के सहारे कम से कम पहले से अमीर लोगों के बढ़ते धन का पुनः वितरण न्य्ााय्ासंगत तरीके से हो। सुनिश्चित करें कि आईसीटी कायर््ाक्रम वास्तव में उन लोगों तक पहुंचे और उन लोगों का भला करें जिन्हें उनके लक्षित लाभार्थिय्ाों के बतौर देखा गय्ाा है। जरूरतमंदों की मदद करने का इरादा रखने वाले जितने भी उद्यम भारत में हुए हैं, अमूमन उन लोगों द्वारा हथिय्ाा लिय्ो जाते हैं, जिनके पास पहले ही बहुत अधिक सत्ता, विशेषाधिकार और दबदबा है। मसलन समाज के सबसे निर्धनतम पर्ग के लिय्ो सड़क बनाने की राशि लगभग हमेशा ऐसी सड़कों के निर्माण में खर्च हो जाती है, जिनसे अमीरों के हित सधते हों। भारतीय्ा स्थानीय्ा भाषाओं के सॉफ्टवेय्ार की मार्केटिंग पर की रिपोर्ट के मुताबिक कई जिला मुख्य्ाालय्ाों में लगे कम्प्य्ाूटर धूल चाटते हैं। इसका कारण कोई भ्रष्टाचार नहीं बल्कि य्ाह मानस कि अपने दफ्तर में कम्प्य्ाूटर होना प्रतिष्ठा का मसला है। उसकी उपय्ाोगिता जाए भाड़ में। इस सब से तो य्ाही झ्ालकता है कि इन परिय्ाोजनाओं में स्थानीय्ा जिला अधिकारिय्ाों को समुचित प्रशिक्षण देने का कोई प्रावधान नहीं रखा गय्ाा। ऐसा प्रशिक्षण जो उन्हें कम्प्य्ाूटर को प्रतिष्ठा का प्रतीक मानने की बजाए, उसका उपय्ाोग करना सिखाए ताकि उनके काम का बोझ्ा कम हो और उनके काम की गुणवत्ता बढ़े। संक्षेप में, बिजली हो य्ाा टेलीफोन य्ाा फिर कम्प्य्ाूटर। महज मुहैय्ाा करा देना ही काफी नहीं है। गरीबों को इस बाबत समर्थ भी बनाना जरूरी है जिससे वे अपने को मिले कम्प्य्ाूटर का वास्तविक इस्तेमाल कर सकें और अपने जीवन को बेहतर बना सकें।
ज्य्ाादा से ज्य्ाादा वंचित तबकों तक पहुंचाने के इरादे से बनी तमाम दक्षिण एशिय्ााई परिय्ाोजनाएं एक दूसरे से अनभिज्ञ हैं। पूर्व अफ्रीका, लैटिन अमेरिका व दक्षिण प्रशांत एशिय्ााई क्षेत्र्ा में चल रही हजारों ऐसी समानांतर परिय्ाोजनाएं एक दूसरे से बेखबर चल रही हैं। उनके बीच कोई समन्वय्ा ही नहीं, नाता ही नही और ही कोई साझ्ाा। ऐसे में सफल परिय्ाोजनाओं द्वारा अर्जित समझ्ा, ज्ञान अनदेखे, अबांटे ही रह जाते हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात य्ाह है कि असफल परिय्ाोजनाओं से मिले सबक भी एक दूसरे से नहीं बांटे जाते। इसके अलावा वर्तमान में चल रही परिय्ाोजनाओं से मिले सबक भी एक दूसरे से नहीं बांटे जाते। इसके अलावा वर्तमान में चल रही परिय्ाोजनाओं के मूल्य्ाांकन भी य्ाहां वहां दबे छिपे पड़े रहते हैं य्ाा तो किसी शोध पत्र्ािका के पन्नों में य्ाा फिर किसी अनजानी वेब साईट पर जहाँ उनका कोई उपय्ाोग नहीं। ऐसे में पहिय्ाा बारम्बार आविष्कृत होता रहता है। हां य्ाह बात तो सही है कि परस्पर संवादी प्रोजेक्ट्स का एक नेटवर्क स्थापित करना असल फील्ड में जाने के मुकाबले कहीं कम प्रभावोत्पादक कायर््ा है। लेकिन सफल मॉडलों की मौजूदा अनुपस्थिति को देखते हुए तथा साधारण लोगों के जीवन में प्रदर्शनीय्ा बेहतरी लाने संबंधी परिय्ाोजनाएं बनाने में आने वाली मुश्किलों के मद्देनजर इस तरह का नेटवर्क बनाना अत्य्ांत अपय्ाोगी होगा। इस नेटवर्क से ही जानकारी और प्रासंगिक अनुभवों की साझ्ोदारी सम्पन्न होगी जो कि वर्तमान तथा आगामी परिय्ाोजनाओं की संकल्पना और क्रिय्ाान्वय्ान में महत्वपूर्ण सुधार लाएगी।
भारत में गरीबों, गैर अंग्रेजी भाषी लोगों, आदिवासिय्ाों, पिछड़ों तथा जनजातिय्ाों की अभिव्य्ाक्ति सरकार द्वारा बनाय्ाी गय्ाी सलाहकार समितिय्ाों व कायर््ादलों से सिरे से गाय्ाब रहती है। जब  भी नीति का निर्धारण होता है सबसे बुलंद सुनी जाने वाली आवाजें होती हैंµ प्रमुख सॉफ्टवेय्ार उत्पादकों की, सामग्री। विषय्ावस्तु बनाने वालों की सरकारी अधिकारिय्ाों तथा अफसरशाही की। और य्ाही ढांचागत और नीतिगत निर्णय्ा तय्ा करते हैं कि वंचित तबकों का भला इनसे होगा य्ाा नहीं।
इसकी एक उम्दा झ्ालक इस उदाहरण में मिलती है। हजारों भारतीय्ा गांव एक कॉपर केबल से जुड़े होते हैं। इस कॉपर केबल का स्वामित्व भारतीय्ा रेलवे के अधीन है। अब इन्हीं अप्रय्ाुक्त कॉपर केबल का इस्तेमाल इस पकार के संचार/सम्प्रेषण के लिए हो सकता है। इन केबल्स का उपय्ाोग होने पर करोड़ों भारतीय्ाों को बहुत कम लागत पर आईसीटी के दाय्ारे में लाय्ाा जा सकता है। लेकिन तांबे के इन तारों के इस तरह के उपय्ाोग का निर्णय्ा एक राजनैतिक व आर्थिक मुद्दा है जो केन्द्र्र सरकार के अधिकार क्षेत्र्ा में आता है न कि स्थानीय्ा समुदाय्ाों के निय्ाामक निर्णय्ाों तथा कम आय्ा वाले लोगों की पहुंच आईसीटी तक बढ़ाने के नजदीकी रिश्ते पर नीतिµनिर्धारक कभी-कभार ही गौर करते हैं। समूची निय्ाामक व्य्ावस्था में अक्सर गरीबों, सत्ताहीन, अल्पसंख्य्ाक वर्गों की अनदेखी ही होती आय्ाी है।
आईसीटी नीति बनाने वाली राजकीय्ा परिषदों में डिजिटल विपन्न लोगों की अभिव्य्ाक्ति को स्थान देना कोई आसान काम नहीं।
एक तो इस प्रकार की निर्णय्ा प्रक्रिय्ाा के भागीदार काफी शक्ति सम्पन्न होते हैं और दूसरे शासन का समूचा ध्य्ाान आईटी उद्योग को बढ़ावा देने पर ही लगा होता है। ऐसे में तकनीकी और निय्ाामक विशेषज्ञता हासिल होने के साथ इस बात का इस्तेमाल होना भी जरूरी है कि नीतिगत व ढांचागत निर्णय्ा किस पकार से गरीबों पर असर डालते हैं। फिर वंचितों के प्रति एक सेवाभावी प्रतिबद्धता होना भी आवश्य्ाक है। अब य्ो मुश्किलें और भी मुश्किल हुई जाती हैं जब ऐसी नीतिय्ाां और ऐसी अनुशंसाएं य्ाों प्रस्तुत की जाती हैं। गोय्ाा वे तकनीकी मसले हों जिन्हें समझ्ाने के काबिल सिर्फ वकील, अर्थशास्त्र्ाी सरकारी अफसर, इलेक्ट्रिकल इंजीनिय्ार, कम्प्य्ाूटर साइंटिस्ट ही हो सकते हैं। ऐसे में इस दृष्टिकोण को चुनौती देते हुए और इस बात को समझ्ाते हुए कि इन तकनीकी निर्णय्ाों के सामाजिक, मानवीय्ा, सांस्कृतिक व राजनैतिक निहितार्थ भी होते हैं। ऐसे तरीके की खोज करना जिनके जरिय्ो अब तक न सुने गय्ो लोगों की आवाजें भी सुनी जा सकें, अपने आप में एक महत्वाकांक्षी उद्यम होगा। बिना इस समझ्ा, ऐसी संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता के डिजिटल खाई को पाटना असम्भव होगा। आईटी उद्योग फिर चाहे जितना बढ़ता रहे। बावजूद इन सब सावधानिय्ाों के खतरों के चुनौतिय्ाों के सफलता और आशा के किस्से भी तमाम हैं। बावजूद उन तमाम साक्ष्य्ाों के कि डिजिटली खाई दिनोंदिन बढ़ी ही जा रही है, भारतीय्ा परिय्ाोजनाएं दिलासा देती है कि आखिर आईसीटी का इस्तेमाल इस खाई को पाटने में तो हो ही सकता है। भारत के संदर्भ में आईसीटी कम से कम दो क्रांतिय्ाां तो निश्चित ही ले आय्ाी है रेलवे आरक्षण व्य्ावस्था तथा सार्वजनिक बैंक प्रणाली। य्ो प्रय्ाोग आम भारतीय्ा जीवन के कुछ और पहलुओं की काय्ाापलट में आईसीटी की सकारात्मक भूमिका के प्रति आश्वस्त करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि बुनिय्ाादी इंसानी जरूरतों को पूरा करने में आईटी की सकारात्मक और सार्थक भूमिका हो सकती है। लेकिन य्ाह सोचना भ्रामक होगा कि आईटी कोई रामबाण है जो तमाम अन्य्ााय्ाों को इस धरती से सिरे से नेस्तनाबूद कर देगा।

(‘इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए’ दिसम्बर-जनवरी 2005)