विज्ञान

(04/Apr/2015)

कहानी न्यूट्रीनो की खोज की

डॉ. विजय कुमार उपाध्याय

न्यूट्रीनो उन मूल कणों में से एक है जिनके द्वारा पदार्थों तथा ब्रह्माण्ड की रचना हुई है। न्यूट्रीनो सुपरिचित इलेक्ट्रॉन कणों के समान हैं परन्तु इन दोनों में एक मौलिक अन्तर यह है कि जहाँ इलेक्ट्रॉन पर ऋणात्मक विद्युत आवेश रहता है वहीं न्यूट्रीनो विद्युत आवेश रहित कण है। चूंकि न्यूट्रीनो कण विद्युत आवेश रहित होते हैं, अतः वे विद्युत चुम्बकीय बलों से प्रभावित नहीं होते हैं। इसके विपरीत इलेक्ट्रॉन कण विद्युत चुम्बकीय बल से निश्चित रूप से प्रभावित होते हैं। न्यूट्रीनो कण सिर्फ उप परमाणविक बल (सब ऐटमिक फोर्स) से प्रभावित होते हैं। उप परमाणविक बल विद्युत चुंबकीय बल की तुलना में बहुत ही क्षीण तथा बहुत ही कम दूरी तक प्रभाव डालने वाला होता है। यही कारण है कि न्यूट्रीनो कण किसी भी पदार्थ में लम्बी दूरी बिना प्रभावित हुए तय कर सकते हैं। न्यूट्रीनो कणों में नगण्य परिमाण में पिण्डमाल मौजूद रहता है जिसके कारण वे पिण्डमान से युक्त अन्य कणों के साथ गुरुत्व बल के कारण पारस्परिक क्रिया (इंटरएक्शन) प्रदर्शित करते हैं। परन्तु यह गुरुत्व बल नगण्य रहता है।
न्यूट्रीनो कण तीन प्रकार के होते हैं। इनमें से प्रत्येक प्रकार को एक फ्लेवर कहा जाता है। प्रत्येक फ्लेवर एक आविष्ट कण से संबंधित होता है जिसके आधार पर उसका नामकरण किया जाता है। इन तीन प्रकार के न्यूट्रीनो के नाम हैं- इलेक्ट्रॉन न्यूट्रीनो, म्युओन न्यूट्रीनो, टाऊ न्यूट्रीनो। वस्तुतः म्युओन तथा टाऊ भी इलेक्ट्रॉन के ही अलग-अलग रूप हैं जिनका पिण्डमान इलेक्ट्रॉन की तुलना में अधिक होता है। उदाहरण के लिए म्युओन का पिण्डमान इलेक्ट्रॉन के पिण्डमान का 207 गुना होता है। इलेक्ट्रॉन न्यूट्रीनो एक उप परमाणविक प्राथमिक कण (लेप्टन) है जिस पर कोई भी विद्युत आवेश मौजूद नहीं रहता है। इलेक्ट्रॉन के साथ मिलकर यह पहली पीढ़ी के लेप्टन का निर्माण करता है। अन्य सभी कणों के समान इलेक्ट्रॉन न्यूट्रीनो का भी अपना एक विपरीत कण (एंटी पार्टिकल) होता है जिसे ‘इलेक्ट्रॉन एंटी न्यूट्रीनो’ कहा जाता है। इलेक्ट्रॉन न्यूट्रीनो और एंटी इलेक्ट्रॉन न्यूट्रीनो में यही अन्तर है कि इनके कुछ गुणों के परिमाण बराबर परन्तु उनके चिन्ह विपरीत होते हैं। इसी प्रकार म्युओन न्यूट्रीनो भी एक उप परमाणविक (सब एटामिक) प्राथमिक कण है जिस पर कोई विद्युत आवेश मौजूद नहीं रहता। टाऊ के साथ मिल कर यह तीसरी पीढ़ी के लेप्टन का निर्माण करता है। इस कण की खोज की घोषणा जुलाई 2000 में की गयी।
अब प्रश्न उठता है कि न्यूट्रीनो की खोज कब तथा किसके द्वारा की गयी? सन 1931 में वोल्फांग पौली नामक वैज्ञानिक ने सैद्धांतिक आधार पर एक नये कण की उपस्थिति की भविष्यवाणी की। उसके द्वारा यह भविष्यवाणी इस आधार पर की गयी कि कुछ प्रकार इस आधार पर की गयी कि कुछ प्रकार के रेडियोधर्मी विखंडन में ऊर्जा तथा संवेग का संरक्षण (कंजर्वेशन) होता हुआ दिखायी नहीं देता था। उसने विचार प्रगट किया था कि यह खोयी हुई ऊर्जा सम्भवतः किसी आवेश रहित कण द्वारा वहन की जा रही हो जिसका पता हम लोग नहीं लगा पा रहे हैं।
सन 1934 में एनरिको फर्मी ने पौेली द्वारा परिकल्पित (हाइपोथेटिकल) कण को शामिल करते हुए रेडियोधर्मी विखंडन से संबंधित एक विस्तृत सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। अपने सिद्वान्त में फर्मी ने पौली द्वारा अनुमानित कण का नाम ‘न्यूट्रीनो’ रखा। वस्तुतः न्यूट्रीनो इटालियन भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है ‘छोटा या तटस्थ या आवेश रहित’। चूंकि एनरिको फर्मी स्वयं इटालियन मूल का अमरीकी नागरिक था, अतः उसने जो शब्द चुना वह इटालियन भाषा का था। न्यूट्रीनो को शामिल करने के बाद फर्मी द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त प्रयोग द्वारा पर्यवेक्षित अधिकांश नतीजों की सही एवं संतोषजनक व्याख्या करने में सक्षम हो जाता है। सन 1959 में क्लाइड कौवान तथा फ्रेडराइन द्वारा एक ऐसे कण की खोज प्रयोग द्वारा कर ली गयी जिसके सभी गुण फर्मी द्वारा प्रस्तावित कण न्यूट्रीनो से पूरी तरह मिलते थे। बाद में किये गये शोधों से पता चला कि न्यूट्रीनो इलेक्ट्रॉन का साथी (पार्टनर) है।
सन 1962 में ब्रूखेवेन नेशनल लेबोरेटरी तथा यूरोपियन लेबोरेटरी फॉर न्यूक्लियर फिजिक्स में किये गये शोधों से पता चला कि कुछ शोध नतीजे आश्चर्यजनक थे। देखा गया कि म्युओन के साथ उत्पन्न किये न्यूट्रीनो के कण इलेक्ट्रॉन के साथ उत्पन्न किये गये न्यूट्रीनो से भिन्न थे। अर्थात ये न्यूट्रीनो अलग किस्म के थे। सन 1978 में ‘स्टैनफोर्ड लीनियर ऐक्सेलेरेटर सेंटर’ में प्रयोगों के दौरान तीसरे प्रकार के न्यूट्रीनो की खोज की गयी जिसे ‘टाऊ न्यूट्रीनो’ कहा गया। यह न्यूट्रीनो पहले खोजे गये इलेक्ट्रॉन न्यूट्रीनों तथा म्युओन न्यूट्रीनों की तुलना में अधिक भारी था। परन्तु अधिकांश वैज्ञानिक इसे नया कण मानने के प्रति आश्वस्त नहीं थे। वैज्ञानिकों को आश्वस्त होने में काफी लम्बा समय लगा। अन्ततः सन 2000 के जुलाई में ‘टाऊ न्यूट्रीनो’ की खोज की आधिकारिक घोषणा की गयी। सन 1985 में रूस के कुछ वैज्ञानिकों ने न्यूट्रीनो के पिण्डमान की सही माप करने में सफलता प्राप्त करने की घोषणा की। इन वैज्ञानिकों ने अपने द्वारा किये गये प्रयोगों से पता लगाया कि इलेक्ट्रॉन के साथ उत्पन्न न्यूट्रीनो का पिण्डमान इलेक्ट्रॉन के पिण्डमान के दस हजारवें भाग के बराबर है। परन्तु बाद में कुछ अन्य वैज्ञानिकों द्वारा किये गये प्रयोगों से न्यूट्रीनो के उपर्युक्त पिण्डमान की पुष्टि नहीं हो पायी।
अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि प्रकृति में न्यूट्रीनो के स्रोत क्या है? तथा वे किस प्रकार उत्पन्न होते हैं? विभिन्न वैज्ञानिकों द्वारा किये गये शोधों तथा अध्ययनों से पता चला है कि बाह्य अन्तरिक्ष से आने वाली ब्रह्माण्ड किरणों के कण जब पृथ्वी पर मौजूद वायुमंडल के अणुओं से टकराते हैं तो अनेक प्रकार के कणों की उत्पत्ति होती है जिनमें न्यूट्रीनो की विभिन्न किस्में (इलेक्ट्रॉन न्यूट्रीनों, म्युओन न्यूट्रीनो तथा टाऊ न्यूट्रीनो) भी शामिल हैं। वायुमंडल में पैदा होने के बाद न्यूट्रीनो के ये कण पृथ्वी के भीतर प्रवेश करते हैं तथा पृथ्वी के भीतर चलते हुए भूसतह के दूसरे छोर से बाहर निकलते हैं। वायुमंडल के अलावा न्यूट्रीनो-उत्पादन का एक अन्य प्रमुख स्रोत है हमारा सूर्य। जिस जटिल शृंखला प्रतिक्रिया के दौरान न्यूट्रीनो कणों का भी उत्पादन होता है। सूर्य में उत्पन्न होने वाले सभी न्यूट्रीनो कण इलेक्ट्रॉन न्यूट्रीनो श्रेणी के पाये गये हैं। इन कणों की ऊर्जा वायुमंडल में उत्पन्न न्यूट्रीनो की ऊर्जा की तुलना में बहुत कम पायी गयी है। यही कारण है कि सौर न्यूट्रीनों का विश्लेषण करना काफी कठिन काम साबित होता है क्योंकि डिटेक्टर के आस-पास मौजूद रेडियोधर्मी पदार्थों के विखंडन से उत्पन्न ऊर्जा भी सौर न्यूट्रीनो से उत्पन्न ऊर्जा के लगभग बराबर होती है जिसके कारण दोनों में अन्तर मालूम करना काफी कठिन कार्य माना जाता है। न्यूट्रीनो कणों के उत्पादन का एक अन्य स्रोत सुपरनौवा विस्फोट होता है। सन 1987 में एक सुपर नौवा विस्फोट हुआ था जिससे अपरिमित परिमाण में न्यूट्रीनो कणों का उत्पादन होते पाया गया था। इस सुपर नौवा का नाम खगोल वैज्ञानिकों द्वारा ‘सुपरनौवा 1987 ।’ रख दिया गया।


वाया-जोधाडीह, वास, जिला-बोकारो, झारखंड 
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