विज्ञान

(04/Apr/2015)

वायुमंडल में फैलता ज़हर

डॉ.डी.डी.ओझा

कार्बन मोनो-ऑक्साइड को तो हमने हमेषा बुरा-भला ही कहा है। वह विषैली होती है यह तो हमेषा ही कहा जाता है। शुद्ध एवं ताजी हवा में इसकी मात्रा न के बराबर ही होती है। इस विषैली गैस को हम ही हवा में बिखेरते रहते हैं। मोटर-कारों के धुएँ से तथा जहाँ पर अधूरा ज्वलन होता है, वहाँ से वह वातावरण में विलीन हो जाती है। एक अकेले न्यूयार्क शहर की बसों तथा मोटर कारों से एक लाख पच्चीस हजार टन कार्बन मोनो-ऑक्साइड हर महीने इस धरती को प्रदान की जाती है तथा धरती भी ज्वालामुखियों के जरिए वातावरण में कार्बन मोेनो-ऑक्साइड की लपटों को छोड़ देती है। 

कार्बन-डाइ-ऑक्साइड गैस के गंधहीन, स्वादहीन तथा रंगहीन गुणों को हमने पाठषाला की परीक्षाओं में निष्चित ही लिखा होगा। हवा के दस हजार भागों में से केवल चार भागों को व्याप्त करने वाली इस गैस को हम ब्रेड को फुलाने में तथा बिस्किटों को हल्का तथा स्वादिष्ट बनाने में इस्तेमाल कर ही चुके हैं। इस गैस ने सोडा-लेमन जैसे पेय-पदार्थों को भी चेतना प्रदान की है। इतना ही नहीं, यह आग को बुझाने का काम भी करती है, फिर भी इस गैस के बारे में बिना कारण ही हमने अपने मन को दूषित कर लिया है तथा इस पर नाक-भौंह सिकोड़ी है। वास्तव में यदि देखा जाए तो मानव आज भी इस धरती पर अपना जो अस्तित्व बनाए हुए हैं, इसका श्रेय इस गैस को जाता है। इस गैस, पानी तथा सूर्य के प्रकाष की सहायता से वनस्पतियाँ अपना खाना स्वयं ही बनाती हैं। मानव तो अपना भोजन स्वयं पका सकता है परंतु उसका निर्माण नहीं कर सकता है। वह अपने संपूर्ण पोषण के लिए वनस्पतियों पर ही पूरी तरह से निर्भर है। समुद्र के पानी में यह गैस हवा से पचास गुना अधिक मात्रा में होती है तथा इस तरह उसने इतने सारे पानी के अम्ल धर्म तथा क्षारीय धर्म में संतुलन स्थापित किया हुआ है। यदि इन तथ्यों पर ध्यान दिया जाए तो हम कार्बन-डाइ-ऑक्साइड का महत्त्व जान जाएंगे। 
तथापि कार्बन-डाइ-ऑक्साइड का ‘छोटा भाई’ माने जाने वाले कार्बन मोनो-ऑक्साइड को तो हमने हमेषा बुरा-भला ही कहा है। वह विषैली होती है यह तो हमेषा ही कहा जाता है। शुद्ध एवं ताजी हवा में इसकी मात्रा न के बराबर ही होती है। इस विषैली गैस को हम ही हवा में बिखेरते रहते हैं। मोटर-कारों के धुएँ से तथा जहाँ पर अधूरा ज्वलन होता है, वहाँ से वह वातावरण में विलीन हो जाती है। एक अकेले न्यूयार्क शहर की बसों तथा मोटर कारों से एक लाख पच्चीस हजार टन कार्बन मोनो-ऑक्साइड हर महीने इस धरती को प्रदान की जाती है तथा धरती भी ज्वालामुखियों के जरिए वातावरण में कार्बन मोनो-ऑक्साइड की लपटों को छोड़ देती है। इस गैस का भी कोई स्वाद, गंध, रंग इत्यादि न होने के कारण इसके अस्तित्वों को हम महसूस नहीं कर सकते। वस्तुतः यह गैस रासायनिक दृष्टि से बेहद क्रियाषील होती है। 
कार्बन-डाइ-ऑक्साइड गैस कार्बन के एक तथा ऑक्सीजन के दो परमाणुओं से मिलकर बनती है। परंतु कार्बन मोनो-ऑक्साइड में केवल एक कार्बन का तथा एक ऑक्सीजन का अणु होता है। अतः इसे हम सीओ ;ब्व्द्ध कह सकते हैं। पानी से इसकी मित्रता नहीं है। वह पानी से दूर ही रहती है। परंतु रक्त से इसकी अच्छी दोस्ती है। हीमोग्लोबिन के साथ यह बहुत जल्दी एकरूप हो जाती है। 
हवा के एक हजार भाग में यदि कार्बन मोनो-ऑक्साइड की मात्रा चौदह तक बढ़ जाती है तो हमें सिरदर्द, जी मिचलाने अथवा कमजोरी की षिकायत होने लगती है। यदि साफ शुद्ध, ताजी तथा खुली हवा में हम साँस लेते हैं तो हम तरोताजा महसूस करते हैं। हवा के एक हजार भाग में यदि कार्बन मोनो-ऑक्साइड की मात्रा चालीस से अधिक बढ़ जाए और हम यदि ऐसी हवा में अधिक समय तक साँस लें तो जान पर भी बन सकती है। बड़ी लंबाई की सुरंगों में से जब कारें, बसें अथवा रेलगाड़ियाँ गुजर रही होती हैं तब उस समय इस गैस की मात्रा एक हजार में चौदह अंष से अधिक बढ़ जाती है। विकसित देषों में जब इसकी मात्रा सुरंगों में बढ़ जाती है तो इसे सुरंगों से बाहर निकालने तथा शुद्ध हवा को सुरंग के अन्दर प्रवेष कराने के लिए एक स्वचालित व्यवस्था है। हवा की अपेक्षा हलकी होने के कारण कार्बन मोनो-ऑक्साइड हवा से शीघ्र ही निकल जाती है। यह हम प्राणियों का सौभाग्य ही है। (कार्बन - डाइ - ऑक्साइड हवा से डेढ़ गुना भारी होने के कारण इतनी जल्दी नष्ट नहीं होती है।) कार्बन मोनो-ऑक्साइड हीमोग्लोबिन के साथ रहने वाली ऑक्सीजन से अधिक शीघ्रता से मिल जाती है जिसके फलस्वरूप प्राणियों के लिए उसका जहर बहुत ही घातक हो जाता है, यहाँ तक कि सायनाइड से भी ज्यादा खतरनाक। इस तथ्य के बावजूद भी पिछले कुछ वर्षो में हुए अनुसंधानों से यह सिद्ध हुआ है कि कार्बन मोनो-ऑक्साइड इतनी बुरी नहीं हैं क्योंकि अत्यंत सूक्ष्म मात्रा में अपनी उपस्थिति से मस्तिष्क के अंदर वह अद्भुत चमत्कार कर सकती है। 
नाइट्रिक ऑक्साइड तथा कार्बन मोनो-ऑक्साइड इन दोनों गैसों का मस्तिष्क से संदेष लाने और ले जाने के कार्य में बहुत बड़ा सहयोग होता है। मस्तिष्क में स्मृति के संकलन के कार्य में कार्बन मोनो-ऑक्साइड की आवष्यकता होती है। इतना ही नहीं यदि मस्तिष्क में इसका असंतुलन हो जाए तो मनुष्य ‘भूल-भुलैया’ में फँस जाता है। यह प्रोफेसर चार्ल्स स्टीवेन्स का कहना है कि उन्होंने चूहों को प्रषिक्षित करके कुछ बाते उन्हें भलीभाँति सिखाई थीं। बाद में मस्तिष्क की उन विषेष कोषिकाओं में कार्बन मोनो-ऑक्साइड का निर्माण रोकने वाले रसायन का इंजेक्षन उन चूहों को उन्होंने दिया। आष्चर्य की बात यह है कि जो बाते चूहों को सिखाई गई थी, वे उन्हें सब भूल गये थे। जिस तरह किसी केसेट से सारे गाने मिटा दिये जाते है, उस तरह से उनके मस्तिष्क से वे सारी स्मृतियाँ नष्ट हो गई थीं। 
कार्बन-मोनो-ऑक्साइड का निर्माण कैसे और कहाँ होता है, इस प्रष्न का उत्तर जानना बहुत महत्वपूर्ण है। अमेरिका के जॉन हाफकिन इंस्टिटयूट के शोधकर्ताओं ने कार्बन मोनो-ऑक्साइड पर शोध कार्य किया। उन्हें पता चला कि यह मस्तिष्क के विषेष भाग की कोषिकाओं में विकसित होती है। इन दोनों गैसों का एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य रक्त वाहिनियों को आवष्यकतानुसार षिथिलता प्रदान करना भी होता है। इसलिए रक्तदाब के सन्तुलन बनाये रखने का कार्य इन गैसों की कार्य क्षमता पर ही अधिकतर निर्भर होता है। कार्बन मोनो-ऑक्साइड का संबंध नासिका से होता है। मस्तिष्क में रस, गंध तथा स्वाद को समझने वाली कोषिकाएं होती हैं। उन्हें चक्रिय ग्वानोसिल मोनो फास्फरेट नामक अणुओं से चेतना प्राप्त होती है। नासिका को चेतना प्रदान करने वाले ये अणु ग्वानिलीन सायक्लेज नामक एन्जाइम की सहायता से बनते हैं। परंतु उन्हें सक्रिय करने के लिए कार्बन मोनो-ऑक्साइड की आवष्यकता होती है।
हीमोग्लोबिन को तोड़ने वाले ये एन्जाइम कार्बन मोनो-ऑक्साइड का अत्यधिक उत्पादन कर सकते हैं तथा इसका परिणाम भंयकर हो सकता है। विस्मरण तथा पार्किन्सन रोग के निवारण का आज तक तो कोई परिणामकारक उपाय नहीं प्राप्त हो सका है। किसी भी कारण से यदि मस्तिष्क में रक्त स्राव होता है तो उसके परिणामस्वरूप कार्बन मोनो-ऑक्साइड के निर्माण में अनियमितता हो जाती है। कार्बन मोनो-ऑक्साइड तथा नाइट्रिक ऑक्साइड पर अनुसंधान मौलिक जीव रसायन विज्ञान के अध्ययन तक ही सीमित हो गया है। विकसित देषों में ड्रग डिजाइनिंग पर अनुसंधान को हाल ही में बहुत महत्व प्राप्त हुआ है। विभिन्न व्याधियों के उपचार के लिए नई दवाईयों को किस तरह का होना चाहिए, इस बात का ज्ञान शोधकर्ताओं को करवाने वाले द्रुतगामी कम्प्यूटर भी बन रहे हैं। युवा भारतीय शोधकर्ता इस अनुसंधान से परिचित है, इस पर हमे गर्व है। नई दवाईयों को कार्बन मोनो-ऑक्साइड तथा नाइट्रिक ऑक्साइड की स्वीकृति प्राप्त होनी चाहिए। यदि ऐसा सम्भव हुआ तो आधुनिक उपचार पद्धति में चिकित्सा विज्ञान का एक ओर कदम अग्रसर होगा।


‘गुरुकृपा’ ब्रह्मपुरी, हजारी चबूतरा, जोधपुर-342001
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