विशेष

(15/May/2019)

स्वास्थ्य सबकी जरूरत

डॉ.कृष्ण कुमार मिश्र
 
 
एक सुप्रसिद्ध कहावत है; एक तंदुरुस्ती, लाख नियामत। कहने का आशय है कि स्वास्थ्य एक अमूल्य संपदा है। शास्त्रों में सबके निरोगी होने की कामना की गयी है यथा - सर्वे सन्तु निरामयाः। इसीलिए कहा जाता है; पहला सुख, निरोगी काया। सुखमय जीवन के लिए स्वास्थ्य को सहेजना बहुत जरूरी है। आज दुनिया में बहुत सारी बीमारियाँ फैली हुई हैं। इनसे बचना बहुत बड़ी चुनौती है। इन स्वास्थ्य सम्बन्धी चुनौतियों से निपटने के लिए 7 अप्रैल सन् 1948 को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) की स्थापना की गई। डब्ल्यू.एच.ओ. के स्थापना दिवस, 7 अप्रैल को पूरे विश्व में ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। डब्ल्यू.एच.ओ. का मुख्यालय स्विट्जरलैंड के जेनेवा शहर में स्थित है। इस अन्तर्राष्ट्रीय संगठन का उद्देश्य पूरे विश्व में स्वास्थ्य के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन दुनिया के देशों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर परस्पर सहयोग एवं मानक विकसित करने वाली संस्था है। भारत भी विश्व स्वास्थ्य संगठन का एक सदस्य देश है। इसका राष्ट्रीय मुख्यालय नई दिल्ली में है। 
विश्व की करीब आधी आबादी तक आज भी सभी आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएँ नहीं पहुँच सकी हैं। डब्ल्यू.एच.ओ. के आँकड़ों के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च के कारण हर साल दुनिया भर में करीब दस करोड़ से अधिक लोग ‘गरीबी’ की रेखा के नीचे चले जाते हैं। भारत सरकार ने ग्रामीण और कमजोर जनसंख्या में सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली का विस्तार करने के लिए ‘‘आयुष्मान भारत’’ नामक कार्यक्रम की शुरूआत की है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य पूरे देश में नागरिकों को आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है। भारत ने पिछले कुछ बरसों में तेजी से आर्थिक विकास किया है। लेकिन इस तरक्की के बावजूद बड़ी संख्या में देशवासी कुपोषण के शिकार हैं। यह राष्ट्र के लिए चिंताजनक है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार तीन वर्ष की उम्र वाले 46 प्रतिशत बच्चे अपनी आयु की तुलना में कम वजन के हैं जबकि लगभग 70 प्रतिशत बच्चे एनीमिया (रक्ताल्पता) से पीड़ित हैं। गर्भवती महिलाओं में एनीमिया 50 से 58 प्रतिशत बढ़ा है। कहा जाता है बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं से नागरिकों की औसत आयु बढ़ती है। इस स्तर पर देखें तो बांग्लादेश भारत से आगे है। भारत में औसत आयु जहाँ 64ण्6 वर्ष मानी गई है वहीं बांग्लादेश में यह 66ण्9 वर्ष है। वर्ष 1990 में भारत की शिशु मृत्यु दर प्रति हजार पर 129 थी। वही वर्ष 2005 में ये घटकर प्रति हजार 58 हो गई, जबकि 2017 में यह प्रति हजार पर 39 रह गई है। दुनियाभर में होने वाली शिशु मौतों में भारत का हिस्सा घटकर 18 प्रतिशत रह गया है। भारत सरकार द्वारा जननी एवं बाल सुरक्षा को लेकर बहुत सारी योजनाएं संचालित की जाती हैं तथा बहुत-सी जानलेवा बीमारियों से बचाव के लिए टीकाकरण भी करवाया जाता है। इनमें से प्रमुख टीके इस प्रकार हैं -
  • बी.सी.जी. - तपेदिक (टी.बी.)
  • डी.टी.ए.पी./डी.टी.डब्ल्यू.पी. - डिप्थीरिया, टिटनस, पर्टुसिस (काली खांसी)
  • हैपेटाइटिस ए टीका - हैपेटाइटिस ए
  • हैपेटाइटिस बी टीका - हैपेटाइटिस बी
  • एच.आई.बी. टीका - हेमोफिलस इन्फ्लुएंजा टाइप बी
  • एम.एम.आर.-खसरा (मीजल्स), मम्प्स (कंठमाला का रोग), रुबेला (जर्मन खसरा)
  • ओ.पी.वी.-पोलियो
  • रोटावायरस टीका-रोटावायरस
  • टायफॉइड टीका-मोतीझरा (टायफॉइड)
भारत में स्वास्थ्य सम्बन्धी चुनौतियाँ
भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं अभी भी पूरी तरह से मुफ़्त नहीं हैं, और जो हैं भी उनकी हालत बहुत अच्छी नहीं है। देश में स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रशिक्षित लोगों की भारी कमी है। भारत में डॉक्टर और आबादी का अनुपात बेहद असंतोषजनक है। देश के अधिकांश हिस्सों में 1000 लोगों पर भी एक डॉक्टर नहीं है। आबादी के हिसाब से अस्पतालों में बिस्तर की उपलब्धता भी काफ़ी कम है। देश के देहात में चिकित्सा सेवा दयनीय हालत में है। यहाँ अप्रशिक्षित, अल्पप्रशिक्षित तथा झोलाछाप डॉक्टरों की भरमार है। मेडिकल की पढ़ाई करने के बाद डॉक्टर गाँव-देहात में रहकर सेवाएं नहीं देना चाहते। जिला मुख्यालय तथा तहसील स्तर से नीचे शायद ही कोई एमबीबीएस डॉक्टर मिले। विकास खंड स्तर पर तथा गांवों में जो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं उनमें अव्वल तो डॉक्टर मिलते ही नहीँ, क्योंकि वे शहर में रहते हैं। इन स्वास्थ्य केंद्रों पर जरूरी सुविधाओं का अभाव भी मरीजों को अन्यत्र जाने के लिए विवश कर देता है। ग्रामीण इलाकों के अधिकांश सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र स्वयं में बीमार हैं। फिर आम नागरिक को चिकित्सा कैसे सुलभ हो सकती है।  
पिछले कुछ सालों में यहाँँ एच.आई.वी. एड्स तथा कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का फैलाव बढ़ा है। साथ ही मधुमेह, हृदय रोग, क्षय रोग, मोटापा, अवसाद की चपेट में भी लोग बड़ी संख्या में आ रहे हैं। महिलाओं में स्तन कैंसर तथा गर्भाशय के कैंसर के मामले बढ़े हैं। ये बीमारियां बड़ी तादाद में असमय मौत का कारण बन रही हैं। ग्रामीण इलाकों में देश की अधिकतर आबादी उचित खानपान के अभाव में कुपोषण की शिकार है। महिलाओं एवं बच्चों में कुपोषण का स्तर अधिक देखा गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार प्रति दस में से सात बच्चे एनीमिया से पीड़ित हैं। वहीं, महिलाओं की 36 प्रतिशत आबादी कुपोषण की शिकार है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि एक समय में कहा जाता था की मधुमेह कि बीमारी बड़े लोगों को होती है, जिन्हें खानपान की कमी से नहीं जूझना पड़ता। लेकिन बदलते भारत में यह बीमारी अब खास से आम हो चली है। अब हर उम्र हर वर्ग के लोगों को मधुमेह की बीमारी अपनी गिरफ्त में ले रही है। ठीक इसी प्रकार हार्ट अटैक के अलावा उच्च और निम्न रक्तचाप की बीमारी के बारे में कहा जाता था कि यह बीमारी एक नियत उम्र के बाद होती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तुलनात्मक तौर पर कम उम्र के लोगों में भी यह बीमारी होना आम बात हो गई है।
 
कुछ प्रमुख जानलेवा बीमारियाँ
पूरी दुनिया में अनेक जानलेवा बीमारियाँ फैली हुई हैं। इनमें डायरिया, कैन्सर, हृदयाघात, टीबी आदि प्रमुख हैं, जिनसे प्रतिवर्ष लाखों-करोड़ों लोगों की जान चली जाती है। इन खतरनाक बीमारियों के बारे में जानकारी एवं जागरूकता बहुत आवश्यक है। यहाँ कुछ प्रमुख बीमारियों के बारे में जान लेना उचित होगा। 
 
हृदयाघात (हार्ट अटैक)
दुनिया भर में हर साल होने वाली 31 प्रतिशत मौतों की एक प्रमुख वजह हृदय की बीमारियां और हृदयाघात है। एक अनुमान के मुताबिक हृदय की बीमारियों से हर साल 1ण्75 करोड़ से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है। ताजा आकड़ों के अनुसार दुनिया में सबसे ज्यादा हृदय रोगी भारत में हैं। हृदय रोग बढ़
ने का प्रमुख कारण शिथिल जीवन-शैली, मानसिक तनाव, मधुमेह, धूम्रपान, मोटापा तथा वसायुक्त भोजन का सेवन है। ‘सर्कुलेशन’ जर्नल में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक जो लोग अपने भोजन में अत्यधिक वसा, नमक, अंडे और मांस खाते हैं, उन्हें दूसरों के मुकाबले दिल का दौरा पड़ने का जोखिम 35 प्रतिशत अधिक होता है। इसकी तुलना में जो लोग साबुत अनाज, फल, दलिया आदि खाते हैं, उन्हें यह जोखिम कम होता है। हृदय रोग का खतरा ऐसे लोगों को अधिक होता है, जिनका अतिनिम्न घनत्व लिपोप्रोटीन कोलेस्टेरॉल (वीएलडीएल) और निम्न घनत्व लिपोप्रोटीन कोलेस्टेरॉल (एलडीएल) अधिक होता है।  
 
क्षय रोग (टीबी)
क्षय रोग एक जानलेवा संक्रामक बीमारी है। इसे तपेदिक या राजयक्ष्मा के नाम से भी जाना जाता है। यह बीमारी माइकोबैक्टीरियम ट्यूबर- कुलोसिस नामक बैक्टीरिया की वजह से होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2016 में 1 करोड़ 4 लाख लोग टीबी की चपेट में आये जिनमें से लगभग 18 लाख लोगों की मृत्यु हो गई। पूरे भारत में यह बीमारी बहुत ही भयावह तरीके से फैली है। भारत में क्षय रोग के इस प्रकार से विस्तार पाने का सबसे बड़ा कारण बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, जनचेतना की कमी, अशिक्षा एवं समुचित साफ-सफाई की आदतों का न होना है। हालांकि टी.बी. की बीमारी को समुचित इलाज से काबू में लाया जा सकता है, लेकिन समुचित इलाज न कराने, या दवाओं को एक निर्धारित अवधि से पहले ही बंद करने वाले रोगियों में एमडीआर टी.बी. के बढ़ते मामले चिन्ताजनक हैं। एमडीआर टीबी में टी.बी. की दवाएं भी बेअसर होने लगती हैं। टी.बी. वैसे तो किसी को भी हो सकती है। लेकिन इससे बचने के लिए कुछ एहतियात जरूर बरते जा सकते हैं।
 
कैंसर
कैंसर एक घातक बीमारी है। इसके 100 से अधिक प्रकार होते हैं। अधिकतर कैंसरों के नाम उस अंग या कोशिकाओं के नाम पर रखे जाते हैं जिनमें वे प्रकट होते हैं- उदाहरण के लिए, यकृत में शुरू होने वाले कैंसर को यकृत कैंसर कहा जाता है, कैंसर जो कि त्वचा की बेसल कोशिकाओं में शुरू होता है, उसे बेसल सेल कार्सिनोमा कहा जाता है। कैंसर शब्द ऐसे रोगों के लिए प्रयुक्त किया जाता है जिसमें असामान्य कोशिकाएं बिना किसी नियंत्रण के विभाजित होती हैं और वे अन्य ऊतकों पर आक्रमण करने में सक्षम होती हैं। कैंसरजनित कोशिकाएं रक्त और लसीका प्रणाली के माध्यम से शरीर के अन्य भागों में फैल सकती हैं। सामान्य भाषा में कैंसर कोशिकाओं की  अनियमित और असामान्य वृद्धि है, जो शरीर के किसी भी हिस्से, ऊतक या अंग से शायद किसी ज्ञात अथवा अज्ञात कारण से शुरू हो सकती है। यह शुरुआती कारण खत्म हो जाने के बाद भी जारी रह सकती है, जिसकी प्रवृत्ति आसपास के सामान्य ऊतकों में घुसपैठ करने और रक्तवाहिकाओं में घुस जाने की है। इससे यह रोग फेफड़ों, यकृत, मस्तिष्क और हड्डियों जैसे कुछ अंगों या पूरे शरीर के हिस्सों में फैल जाता है, जिसे मेटास्टैसिस कहते हैं। अगर इलाज न हो तो आखिरकार रोगी की मौत हो जाती है। भारत में कैंसर की प्रमुख वजह गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण, कम उम्र में विवाह, गंदगी और सेहत को लेकर अनदेखी आदि हैं। यही नहीं, कैंसर से जुड़े लगभग एक-तिहाई मामले तंबाकू की वजह से, तो एक तिहाई खानपान की गलत आदतों के कारण होते हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था की दृष्टि से देखें तो इसमें विकासशील देशों का हिस्सा महज पाँच फीसदी है, जबकि कैंसर के दो-तिहाई मामले इन्हीं विकासशील देशों में पाये गये हैं।
डायरिया (अतिसार)
अतिसार एक पाचन-तंत्र से जुड़ी समस्या हैं, जिसमें बार-बार मल त्यागना पड़ता है। दिन में पाँँच बार या इससे अधिक बार मल त्याग करने पर स्थिति चिंताजनक हो जाती है। इसके कारण व्यक्ति को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसमें पतले दस्त आते हैं, जिसमें जल की मात्रा अधिक होती हैं। इसी कारण शरीर में पानी की कमी हो जाती है और कमज़ोरी का अनुभव होता है। अगर यह स्थिति एक सप्ताह से ज़्यादा रहती है तो उसे क्रॉनिक डायरिया कहते है। ऐसी स्थिति में कमज़ोरी के कारण बेहोशी आ जाती है और समय पर इलाज न होने पर रोगी की मौत भी हो सकती है। निर्जलीकरण, बच्चों और वयस्कों दोनों के लिए ही बहुत खतरनाक हो सकता है। पेट में तीव्र दर्द, या थोड़ी-थोड़ी देर में ऐंठन होना, बार बार मल त्यागने के बाद भी पेट में ऐंठन, उल्टी आना, जी घबराना, पेट में सूजन, भूख में कमी, तरल मल अधिक आना, आदि अतिसार के प्रमुख लक्षण हैं। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार प्रति वर्ष पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु होने का दूसरा सबसे बड़ा कारण डायरिया की बीमारी है। इस बीमारी से सबसे अधिक मृत्यु जिन पांच देशों में होती हैं, उनमें भारत, नाइजीरिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और इथियोपिया शामिल हैं। इस बीमारी का संक्रमण दूषित भोजन या दूषित पेयजल से होता है।  
स्वास्थ्य का रखें खयाल 
भाग-दौड़ भरी जिंदगी में लोगों को अपने स्वास्थ्य की ओर ध्यान देने का पर्याप्त मौका नहीं मिलता, जिसका उन्हें भारी खामियाजा चुकाना पड़ता है। लोग आसानी से गंभीर जानलेवा बीमारियों के गिरफ्त में आ जाते हैं। कुछ बीमारियों का इलाज बहुत महँगा होता है, जो आम आदमी के पहुँच से बाहर होता है। लेकिन समुचित देखरेख तथा बचाव से बहुत सी बीमारियों से बचाव जरूर किया जा सकता है। इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य का नियमित ख्याल रखना चाहिए। जैसे कि-
  • सुबह जल्दी उठें, योग व प्राणायाम करें।
  • अगर आप हमेशा फिट रहना चाहते हैं तो नियमित रूप से पैदल चलें तथा चलने को अपनी दिनचर्या में शामिल करें। 
  • सात-आठ घंटे की पर्याप्त नींद लें, तथा तनावमुक्त रहें।
  • जिन्दगी की मुसीबतों का हिम्मत से सामना करें।
  • खेलकूद में रुचि बढ़ाएं।
  • खानपान के प्रति लापरवाह न रहें, और न ही आवश्यकता से अधिक आहार लें। खाने में ताजे फल तथा हरी पत्तीदार सब्जियों का प्रयोग बढ़ाएं।
  • नहाना, खाना और सोना, ये तीनों कार्य नियत समय पर करें।
  • तम्बाकू, सिगरेट, शराब तथा अन्य नशीली वस्तुओं के सेवन से बिलकुल ही बचें।
 
दुनिया के अधिकांश देशों में आज ऐसे हालात बन गए हैं जिनमें जटिल और तनावग्रस्त जीवनशैली से जूझता हुआ व्यक्ति ना तो अपने खानपान पर ध्यान दे पाता है और न ही अपने स्वास्थ्य की अहमियत समझता है। लोग सुबह का नाश्ता, दोपहर में लेते हैं, दिन का खाना देर अपराह्न में। इसके अलावा कभी भी, कहीं भी, कुछ भी खा लेने की प्रवृत्ति लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रही है। व्यस्त दिनचर्या के कारण लोग व्यायाम के लिए समय नहीं निकाल पाते और धीरे-धीरे उनका शरीर बीमारियों का घर बन जाता है। अच्छी सेहत के लिए स्वास्थ्यकर आहार जरूरी है, साथ में श्रम की भी उतनी ही महत्ता है। संतुलित आहार तथा शारीरिक श्रम का सम्मिश्रण ही जीवन में स्वास्थ्य का मूल है।  
 
 
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