विशेष

(05/Feb/2018)

पर्यावरण संरक्षण : भारतीय प्राचीन दर्शन

अखिलेश कुमार पाण्डेय

 

समूची सृष्टि पंचमहाभूत अर्थात अग्नि, जल, वायु, आकाश और पृथ्वी से निर्मित है जो किसी ना किसी रूप में जीवन का निर्माण करते हैं और उसे पोषण देते हैं। इन सभी तत्वों का सम्मिलित स्वरुप ही पर्यावरण है पर्यावरण संरक्षित तो जीवन सुरक्षित यह उक्ति मात्र एक कहावत भर नहीं बल्कि अनिवार्य एक अकाट्य सत्य है प्रकृति ने हमें जल-जंगल-जमीन का अनोखा उपहार दिया किंतु हमने इन उपहारों पर निर्दयतापूर्वक प्रहार किया। जल को हमने प्रदूषित किया, जंगल को काटा और जमीन को विषाक्त रसायनों का भंडार बना दिया। अप्रत्याशित औद्योगिक और वाहन प्रदूषण रासायनिक कचरे का बढ़ता ढेर और नदियों में नगरपालिकाओं के गंदे पानी आदि के कारण स्वास्थ्य संबंधी संकट को साफ तौर से देखा जा सकता है। इसके साथ अन्य कई कारण पर्यावरण क्षरण के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं जो कई आपदाओं जैसे तूफान, सुनामी, भूकंप, बीमारियां नई-नई बीमारियों को जन्म दे रहे हैं। करीब ८ वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र का सहस्त्राब्दि पर्यावरण आकलन आया था जिसमें तमाम विनाशकारी खतरों की ओर संकेत थे। पर्यावरण का संतुलन ही जीवन चक्र को नियमित और नियंत्रित करता है और इसमें गतिरोध आते ही जीवन संकट में पड़ जाता है। इस कटु सत्य को जानते हुए भी मनुष्य ने विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति का अंधाधुंध शोषण कर आज विश्व को एक भयानक संकट की ओर धकेल दिया। इन्हीं कारणों से पर्यावरण संरक्षण की चिंता प्राचीन काल से होती आ रही है। प्राचीन कालीन महाऋषिगणों ने इसकी आवश्यकता एवं महत्व को ध्यान में रखकर इसे शुद्ध एवं संरक्षित रखने हेतु नियम बना लिए थे ।
भारतीय वेद पुराणों में सृष्टि की जीवनदायी तत्वों की विशेषताओं का काफी सूक्ष्म विस्तृत विवरण है। यह विवरण निश्चित रूप से आज भी विश्व में पर्यावरण के नित्य नवीन चुनौतियों का समाधान करने में सक्षम है। भारतीय वेद पुराण वस्तुतः उस परम व्यवस्था की ओर संकेत करते हैं जिसके अधीन यह प्रति अपने क्रियाकलाप संचालित करती हैं। वेदों के विभिन्न सूक्तों में प्रकृति की महत्ता की ओर इंगित किया गया है। इन सूक्तों के प्रत्येक शब्द में भाव संवेदना एवं ज्ञान के उच्च स्वर ध्वनित होते हैं। ऋग्वेद में अग्नि के रूप, रूपांतरण कार्य एवं गुणों की व्याख्या की गई है। यजुर्वेद में जहां वायु के गुणों, कार्यों और उसके विभिन्न रूपों का वर्णन मिलता है, वही ऋग्वेद उसके औषधीय गुणों का बखान करता है। सामवेद में जल तत्व का विस्तार से वर्णन मिलता है। ऋग्वेद का एक अन्य मंत्र जल की शुद्धता का वर्णन करते हुए कहता है कि प्रशंसा के गीत गाएँ- प्रवाहित जल के, जो हजारों धाराओं से इस स्फटिक की तरह बह कर आंखों को आनंद देता है। ऊर्जा के अपरिमित स्रोत सूर्य को जगत की आत्मा कहकर पूजा अर्चना की गई है। स्कंदपुराण के अनुसार गंगा दशमी के दिन नदी में स्नान करने से समस्त पापों का नाश होता है। इसी प्रकार वराहपुराण के अनुसार जेष्ठ शुक्ल दशमी दिन बुधवार हस्त नक्षत्र में गंगा धरती पर आयी थी। अतः इस दिन इस में स्नान करने से सारे पापों से मुक्ति मिलती है। भविष्यपुराण में लिखा है कि जो मनुष्य गंगा दशहरा के दिन गंगा में खड़ा होकर दस बार गंगा महिमा को पढ़ता है, सारे पाप से मुक्त हो जाता है। स्कंदपुराण में नर्मदा को सर्वाधिक पवित्र एवं पुण्य दायिनी मानकर उसकी स्तुति की गई है। जल की महत्ता पर ऋग्वेद में नदी सूक्त की रचना की नदियां केवल विशाल जलराशि का भंडार यह नहीं उनसे हमारा धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पक्ष जुड़ा है। सनातन धर्म के सोलह संस्कारों में जल को विशेष महत्व दिया गया है। प्रत्येक संस्कार में जल पूजन एवं स्नान का विशेष महत्व है। इसके बिना यज्ञ और पूजन सफल नहीं माने जाती तथा जल को बुराइयों का संहारक माना गया है। बच्चों के जन्म उपरांत कुआं पूजन के बाद जल स्पर्श के पीछे यही कारण है कि जल ही जीवन है उसे संरक्षित रखना आवश्यक है।
माता भूमि : पुत्रोऽहं पृथिव्या। अर्थात मैं भूमि का पुत्र हूं और यह पृथ्वी मेरी माता है, जैसी उद्घोषणा में प्रकृति के प्रति अपार श्रद्धा व्यक्त हुई है अथर्ववेद पृथ्वी तत्व का मुख्य वेद है। आकाश तत्व का वर्णन सभी वेदों में हुआ है। पर्यावरण के निर्माण में इन्हीं चार तत्वों की मुख्य भूमिका होती है मनीषियों ने पंच तत्वों के महत्व एवं संरक्षण के लिए उन्हें भगवान या अल्लाह के साथ जो जुड़ा है तथा उसका विश्लेषण इस प्रकार किया है।
भगवान : रू भ त्र भूमि यानि पृथ्वी, ग त्र गगन यानि आकाश, व त्र वायु यानि हवा, अ त्र अग्नि यानि आग और न त्र नीर यानि जल।
अलइलअह (अल्ला) : अ त्र आब यानि पानी, ल त्र  लाब यानि भूमि, इला त्र दिव्य पदार्थ यानि वायु, आ त्र आसमान यानि गगन और हृ त्र हरक यानि अग्नि।
इस प्रकार वेद पर्यावरण की अत्यंत सूक्ष्म एवं समग्र व्याख्या करते हैं। वैदिक महार्षियों ने प्राकृतिक शक्तियों को देवी का रूप माना और उनकी उपासना व अभ्यर्थना का प्रावधान किया था। प्रकृति के प्रति भारतीय दृष्टि बिल्कुल अलग है। जहां पाश्चात्य सभ्यता में वनस्पति पर्वत वन समुद्र वायु जल सभी उपभोक्ता सामग्री है तथा बाजार शैली प्रकृति पर नियंत्रण करता है, वही भारतीय दर्शन सहजीविता का है। भगवान महावीर ने भी पर्यावरण-मिट्टी, पानी, हवा, वृक्ष आदि को सजीव कहा है। उनके अनुसार, प्राकृतिक संसाधनों पर सिर्फ मनुष्य का अधिकार नहीं है, धरती आकाश जितने हमारे हैं उतने ही अन्य प्राणियों के भी हैं। नदियां भी प्राणवान हैं, वन उपवन का भी एक व्यक्तित्व है। अतः प्रकृति के सभी घटकों को मस्ती में जीने का अधिकार है। रामायण के नायक जब समुद्र सोचने की बात करते हैं तो समुद्र अपने अस्तित्व के लिए उनसे संवाद करता है। तुलसी की रामकथा में पृथ्वी के आहत होने का भी उल्लेख है, ‘अतिसय देख धरम कै हानी। परम सभीत धरा अकुलानी॥’ यहां धर्म का अर्थ लोक मंगल आचरण है, सामवेद में जीवनदायिनी वनस्पतियों और पशु जगत तथा औषधि विज्ञान के सुंदर मंत्रों का उदाहरण है। वैदिक कर्मकांडों में अनेक स्थानों पर पर्यावरण के संरक्षण का महत्व समझाया गया है। यजुर्वेद में यज्ञों को ही पर्यावरण शुद्धि का केंद्र माना है और यज्ञ के विधि विधानों का विस्तार से वर्णन किया है। यजुर्वेद का अध्ययन किस तत्व का संकेत करता है कि उसकी शांति पाठ में पर्यावरण के सभी तत्व को शांत और संतुलित बनाए रखने का उत्कट भाव है। वही इसका तात्पर्य है कि समूचे विश्व का पर्यावरण संतुलित और परिष्कृत हो। इस में उल्लेख है कि द्युलाक से लेकर पृथ्वी के सभी जैविक-अजैविक घटक संतुलन की अवस्था में रहे। अदृश्य आकाश, पृथ्वी एवं उसके घटक, जल औषधीयाँ, वनस्पतियाँ, संपूर्ण संसाधन एवं ज्ञान शांत रहें। पर्यावरण के प्रति इतना ज्ञान एवं सूक्ष्म गहन का दिग्दर्शन अन्यत्र दुर्लभ है सामवेद को संगीतात्मक ग्रंथ माना गया है। गीता में श्रीकृष्ण ने ‘वेदानां सामवेदोस्मि’ कहकर इस ग्रंथ को विशेष महत्व प्रदान किया है। सामवेद में प्राकृतिक वैभव के साथ ही वनस्पति एवं पशु जगत के संरक्षण के महत्व को भी उभारा आ गया है। एक सूक्त में ऋषि का कथन है अत्यधिक वर्षा करने वाले इंद्र की जल वृष्टि से सूर्य की किरणें वृक्षों और वनस्पतियों का पोषण करने में सहायक होती है। एक अन्य सूक्त में याचना की गई है कि- हे इंद्र सूर्य रश्मियों और वायु से हमारे लिए औषधियों की उत्पत्ति करो। इस प्रकार सामवेद के उदाहरणों से वानस्पतिक उत्कर्ष के द्वारा सर्वत्र स्वास्थ्य जीवन की कामना व्यक्त की गई है। आयुर्वेद जिसको एक अतुल्यनीय औषध शास्त्र माना गया है, में कई औषधीय वनस्पतियों का वर्णन है। वृक्षों के प्रति प्रेम भाव हमेशा ही भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। हमारे ऋषि-मुनियों और पुराणकारों ने मनुष्य की तर्कबुद्धि की अपेक्षा उसकी मानवीय संवेदना को अधिक महत्व दिया है और इसी कारण वृक्षों में मानवीय संवेदनाओं का वर्णन किया गया है। ऋषि मुनियों ने वृक्षारोपण, वृक्ष संरक्षण को धार्मिक कृत्य बताकर वृक्षोत्सव वनोत्सव की डाल दी है। महाभारत के शांति पर्व में पेड़ पौधों में जीवन माना गया है और कहा गया है कि वे भी सुख-दुख का अनुभव करते हैं। वृक्ष विशेष रूप से पीपल को महादेव शिव का प्रतिनिधि माना गया है जो उनकी तरह ही प्रदूषण रूपी विष को पीकर प्रकृति का रक्षण करते हैं पद्मपुराण में उल्लेख है कि सभी ईश्वर के स्वरूप हैं। स्कंदपुराण के अनुसार एक वृक्ष का रोपण दस पुत्रों के समान है। विष्णु धर्मोत्तर पुराण में वृक्ष पुत्र की भांति इस लोक और परलोक सुधारने वाला माना गया है। भविष्य पुराण के अनुसार कोई व्यक्ति यदि पीपल, नीम, बरगद, बेल इत्यादि लगाता है तो नरक में नहीं जाता। पद्मपुराण एवं मत्स्यपुराण में वृक्षारोपण एक महोत्सव के रूप में मनाने का वर्णन है। बृद्धदारण्यक उपनिषद में वृक्ष की तुलना मानव शरीर से की है। श्रीमद्भागवत गीता के दसवें अध्याय के छब्बीसवे श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि ‘अक्ष्वत्य सर्ववृक्षाणां’ अर्थात सभी वृक्षों में मैं हूँ। पुराणों में वृक्षों में देवी-देवताओं का निवास होने की बात की गई है। स्कंदपुराण में कहा है कि पीपल के मूल में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण पत्तों में भगवान हरि विराजमान हैं। वृक्षों के संरक्षण के बारे में जागरूकता में साहित्यकारों ने भी अद्भुत योगदान दिया है। संस्कृत के मूर्धन्य कवि कालिदास वृक्षों के महत्व को बखूबी समझते थे। उनके साहित्य में पेड़-पौधों के प्रति गहरी संवेदना सर्वत्र मुखरित हुई है। कालिदास ने वनस्पतियों को मानव के सच्चे मित्र परिजन तथा संरक्षक के रूप में देखा और चित्रित किया है। सब की मंगल कामना करने वाले कालिदास वृक्षों को सर्वदा नाचता झूमता हँसता-खेलता और प्रेमालाप करते देखना चाहते थे। अपने साहित्य के माध्यम से संदेश दिया है कि वृक्षों का संरक्षण, पालन और संवर्धन हमारे हित में है। मेघदूत में मदार के एक पौधे का उल्लेख है जिसे यक्ष की प्रिय ने पुत्र मानकर बढ़ाया है। अभिज्ञानशाकुंतलम् में तो वृक्षों को सगे भाई जैसा और पुत्री से भी अधिक प्रिय बताया गया है। कुमारसंभव महाकाव्य के अनुसार वृक्ष केवल परिणय सूत्र में ही नहीं बनते, अपितु भुज बंधन भी प्राप्त करते हैं। भुजाओ में बंधन- लतावधु। ऋतुसंहार में कहा गया है कि प्रातः जब कमल को सूर्य की किरणें जगा रही है तब वह जम्हाई ले रहा है। वृक्षों की दानशीलता सराहनीय है। उत्तर मेघ में वर्णन है कि उलकापुरी में महिलाओं की प्रसाधन की समस्त सामग्री अकेले कल्पवृक्ष ही सुलभ कर देता है। पर्यावरण संरक्षण की एक अनिवार्य इकाई पशु जगत के प्रति भी सामवेद में अनुराग भरा दृष्टिकोण प्राप्त होता है। इसमें अनेक काव्यात्मक बिंबों के माध्यम से प्रकृति के साथ पशुधन संरक्षण के मनोरम चित्र अंकित किए गए हैं। संरक्षण की दृष्टि से पशु-पक्षियों को हमारे देवी-देवताओं या अवतारों के साथ चाहे वाहन के रूप में या साथी को के रूप में जोड़ा गया है। पशुओं के विभिन्न अंगों में देवताओं का निवास होता है उदाहरण के लिए भविष्य पुराण एवं बृहत्पराशरस्मृति के अनुसार गौ के सींगों के मूल में ब्रह्माजी, दोनों सींगों के मध्य में भगवान नारायण तथा शिरोभाग में भगवान शिव का निवास होता है। पद्मपुराण के अनुसार छः अंगों, पदों और क्रमोसहित संपूर्ण वेद गौओ के मुख में निवास करते हैं। प्रायः सभी वेद पुराणों में गौओं को महानतम की श्रेणी में रखा है। इसके मुख्य उदाहरण गणपति एवं मूषण, शिव नंदी एवं सांप, कार्तिकेय एवं मोर, विष्णु एवं शेषनाग, दुर्गा एवं सिंह, श्रीकृष्ण एवं गाय तथा सरस्वती एवं हंस आदि हैं। पर्यावरण समन्वय की अभूतपूर्व मिसाल भगवान शिव के परिवार में मिलती है। जहां सभी के वाहन अलग-अलग एक दूसरे के घोर विरोधी हैं। फिर भी सामंजस्य बनाकर प्रकृति में निवास करते हैं। उदाहरण के लिए गंगा (पानी) और आग (तीसरी नेत्र) एक दूसरे के विरोधी हैं। लेकिन शिव के मस्तक पर विराजमान हैं। शिव का वाहन नंदी, पार्वती के वाहन सिंह का आहार है। शिव के गले में सांप शिव पुत्र कार्तिकेय के वाहन मयूर का भोजन, गणेश का वाहन मूषक सांप की खुराक है लेकिन सभी प्रकृति संरक्षण की भावना से एक दूसरे के साथ रहते हैं। जीवन सुख समृद्धि से ओत-प्रोत को पर यह तभी संभव है जब वनस्पति जगत फले-फूले दिव्य औषधियां सहज सुलभ को पशुधन सुरक्षित रहें और मानव पशु एवं वनस्पति और स्नेहिल तादात्म्य के साथ संगठित रहें। वैदिक सूक्तों में पर्यावरण के संबंध में हमारे ऋषियों का यही दृष्टिकोण मुख्यतः उभरकर हमारे सामने आता है : ‘जीवेम शरदः शतम्’ की अवधारणा प्रकृति के माधुर्ययुक्त संवाद में ही संभव है अपितु वह ईश्वरीय चेतना ही क्रीडा कर रही है। पर्यावरण को संरक्षित रखने के लिए वैदिक ऋषियों ने जिस मार्ग का अन्वेषण किया, उसकी महत्ता आज भी उतनी ही है जितनी तब थी। ध्वंस के द्वारा प्रकृति अपना संतुलन स्वयं स्थापित करें इससे बेहतर यह है कि हम प्राकृतिक नियमों का पालन कर उसे ध्वंस की ओर नहीं अपितु सृजन की ओर उन्मुख करें। यज्ञ, प्रकृति प्रेम, अहिंसा यह वेदों की विशेषताएं हैं जिन पर चलकर विषाक्त हो चुके पर्यावरण को हम अमृतमय में बना सकते हैं। पर्यावरण संरक्षण एवं प्रकृति प्रबंधन का भारतीय दर्शन अति उत्तम है लेकिन प्रकृति एवं पर्यावरण संरक्षण के मूल प्रश्न मनुष्य की आधुनिक जीवन शैली से ही जुड़े हुए हैं। पश्चिमी दृष्टि में प्रकृति एवं मनुष्य के बीच अंतर्विरोध है। पश्चिमी दृष्टि में प्रकृति का अंधाधुंध दोहन एवं शोषण इसी दृष्टि का परिणाम है। विकास की दृष्टि आत्मघाती है। भारतीय जीवन दृष्टि पृथ्वी और जल को माता, आकाश को पिता, अग्नि और सूर्य को देव और वायु को प्रत्यक्ष ब्रह्मा जानती और मानती है। अतः विकास का समावेशी होना चाहिए जिसमें पर्यावरण पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। ‘आज विकास करो और बाद में इसकी कीमत चुकाओ’ वाला मॉडल भारतीय चिंतन एवं दर्शन के अनुकूल नहीं है। भारतीय सभ्यता जैव विविधता के अति संवेदनशील रही है और आदरभाव दिखाया है। इसलिए हरित विकास के क्षेत्र में वैश्विक अगुआ बनना हमारे लिए कठिन नहीं है। भारत पूरे विश्व को ‘विकास किसी कीमत पर’ वाले से सिद्धांत से होने वाली समस्याओं और पर्यावरण संरक्षण की भारतीय दृष्टि से अवगत कराएं तो विश्व तथा समस्त जीव जंतुओं का कल्याण होगा। प्रकृति और मानव में सामंजस्य स्थापित करने में सरल, सुलभ एवं मातृभाषा में उपलब्ध साहित्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्वामी विवेकानंद के शब्दों में-
कुछ कर गुज़रने के लिए मौसम नहीं मन चाहिए।
साधन सभी जुट जायेंगे संकल्प का धन चाहिए॥
अतः हमें आधुनिकता तथा प्राचीनता में सामंजस्य स्थापित करना होगा तभी प्रकृति का संरक्षण हो पाएगा।

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