विशेष

(05/Feb/2018)

विज्ञान : पश्चिम व भारतीय धारणा

सुरेश सोनी

पाश्चात्य व भारतीय दृष्टि से निम्न तीन प्रश्नों का संक्षिप्त विचार करते हैं
१ विज्ञान याने क्या,
२ विज्ञान की परिधि कहाँ तक व्याप्त है,
३ विज्ञान की अभिव्यक्ति किस रूप में होती है?

पश्चिमी दृष्टि में

१. कार्ल पियर्सन अपनी पुस्तक ग्रामर ऑफ साइंस Grammer of Science में विज्ञान की व्याख्या करते हुए लगता है “तत्वों का विभक्ति कारण उसकी क्रमबद्धता तथा तुलनात्मक पाँचवी विज्ञान का कार्य है इन प्राप्त तत्वों से व्यक्तिगत सीमित अनुभूतियों से निरपेक्ष रहे निष्कर्ष प्राप्त करना ही वैज्ञानिक सोच का लक्षण है।” इस प्रकार हम कह सकते हैं कि जिज्ञासा, प्रयोग, निरीक्षण, कारण-मीमांसा तथा निष्कर्ष - इन पाँच कडि़यों की शृंखला के माध्यम से विज्ञान गतिमान होता है।
२. विज्ञान की परिधि के संदर्भ में इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका ने कहा गया है “लेटिन” भाषा के शब्द सायंशिया Grammer of Science का अर्थ ज्ञान है। इस शब्द का वर्तमान काल में प्रयोग कुछ ऐसे ज्ञान पर होता है इसका क्षेत्र इतना व्यापक है कि कोई भी व्यक्ति उसके एक अंश से अधिक को नहीं समझ सकता। साइंस विषयक ज्ञान नानाविध हैं। यह अंतर अनुविषयों से लेकर मानसिक क्रियाएँ तक फैला हुआ है... नक्षत्रों के जन्म मरण से लेकर पक्षियों के स्थानांतरण तक सूक्ष्मजीवों से लेकर महान गैलेक्टिक नेबुलाओं (आकाश गंगा) तक रवेदार चरणों के उत्थान पतन से लेकर अनुभव और ब्रह्मांड के निर्माण और विघटन तक फैला हुआ है इसमें प्राणियों के कार्य की ज्ञान और विचार करने के नियम और उनमें विघ्न बाधाओं का ज्ञान भी सम्मिलित है।
३द्ध विज्ञान के विकास में दो रूप माने गए एक्टिव साइंस का विशुद्ध विज्ञान तथा दूसरा अप्लाइड साइंसेस व्यावहारिक विज्ञान शोध विज्ञान में ब्रह्मांड की अंतिम सत्य एवं उसे संचालित करने वाले नियम की खोज तथा व्यवहारिक विज्ञान के क्षेत्र में उन नियमों को समझ मानव समाज का जीवन विस्तार अधिकारी सुविधापूर्ण हो इस नाते विद्युत का आविष्कार आते हैं। व्यवहारिक विज्ञान की दृष्टि से पश्चिम में अनेक विज्ञान विकसित हुए हैं। भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, जीव शास्त्र, नक्षत्र विज्ञान, गणित, तथा इनकी अनेकानेक शाखाएं।

भारतीय दृष्टि में

१द्ध भारत के प्रथम परमाणु वैज्ञानिक महर्षि कणाद अपने वैशेषिक दर्शन के दसवें अध्याय में कहते हैं ‘दृष्टानां दृष्ट प्रयोजनानां दृष्टाभावे प्रयोगोऽभ्युदयाय’ अर्थात प्रत्यक्ष देखे हुए और अन्य को दिखाने के उद्देश्य से अथवा स्वयं और अधिक गहराई से ज्ञान प्राप्त करने हेतु रखकर किए गए प्रयोगों से अभ्युदय का मार्ग प्रशस्त होता है।
इसी प्रकार सामान्य कण से लेकर ब्रह्मांड और उनका प्रयोजन जानने के लिए महर्षि गौतम न्याय दर्शन में १६ चरण की प्रक्रिया बताते हैं प्रमेय याने वे साधन जिससे जानना है। प्रमाण याने वे साधन जिससे जानने का प्रयत्न करते हैं। संशय याने जिसके कारण जाँच पड़ताल की जाती है। समाधान के सभी अंगों का अलग-अलग जानना अवयव कहलाता है। उसके बाद प्रतिज्ञा याने हाइपोथिसिस रखी जाती है। फिर हेतु, उदाहरण आदि माध्यम से सत्य तक पहुँचने का प्रयत्न, इस प्रकार की प्रक्रिया बताई गई।
२द्ध जानने की परिधि का भारतीय वर्णन अधिक स्पष्ट है यहाँ कहा गया कि कार्य जगत यानी दृष्यमान जगत और उसके समस्त व्यापार तथा जगत का कारण दोनों को जानना चाहिए आज पश्चिम जगत को आब्जर्व कर रखा है पर आब्जर्वर के बारे में उतना नहीं जानते।
गीता के अध्याय ७ में भगवान कृष्ण कहते हैं कि ब्रम्हा के समग्र रूप को जानने के लिए ज्ञान-विज्ञान दोनों को जानना चाहिए क्योंकि जिन्हें जानने के बाद कुछ जानना शेष नहीं रहता। आगे वह कहते हैं कि पृथ्वी याने ठोस, जल याने द्रव्य, वायु यानि गैस, अग्नि याने ऊर्जा, आकाश, मन, बुद्धि, अहंकार तथा यह सब जिसमें हैं वह परम चेतना तत्व इंसान के बारे में जानना चाहिए।
इस प्रकार महर्षि कणाद कहते हैं पृथ्वी जल तेज वायु आकाश देख कर मन और आत्मा में जानना चाहिए इस परिधि में जड़ चेतन सारी प्रति व जीव आ जाते हैं।
३द्ध ज्ञान विज्ञान का अंतिम उद्देश्य जगत के अंतिम कारण की खोज है इस दृष्टि से अनेक संदर्भों का वेदों उपनिषदों का दर्शन ग्रंथों में उल्लेख है इसमें दृष्टि की उत्पत्ति क्रम तथा लाभ प्रक्रिया दृष्टि संचालन के नियमों का उल्लेख आता है किसी के साथ साथ व्यावहारिक विज्ञान की दृष्टि से भौतिक, रसायन, वनस्पति शास्त्र, कगणित नक्षत्र विज्ञान जीव शास्त्र आयुर्वेद धातु विज्ञान और विभिन्न कला कौशल की भी अध्ययन व प्रयोग का क्षेत्र था यह संदर्भ छांदोग्योपनिषद् के सप्तम अध्याय के प्रथम खंड में नारद जी और सनत कुमार के संवाद से ज्ञात होता है एक बार नारद सनत कुमार जी के पास गए और प्रार्थना की कि भगवान मुझे ज्ञान दीजिए तब सनत कुमार ने पूछा तुमने क्या पढ़ा है क्या जानते हो (छा.७.१.१) इसके उत्तर में नारद कहते हैं भगवान मैंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, सामवेद, इतिहास, पुराणरूप, पाँचवा वेद, व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित, ज्योतिष, विधिशास्त्र, तर्कशास्त्र नीतिशास्त्र, देवविद्या, ब्रम्हविद्या, भूत विद्या, क्षत्र विद्या, नक्षत्र विद्या, गारुड़ मंत्र देवजन विद्या, नृत्य-संगीत, शिल्प यह सब पढ़ा है मैं मंत्रवेत्ता हूँ पर आत्मवेत्ता नहीं और कहते हैं हाथ में वैधता दुख के समुंद्र से पार हो जाता है अतः वह ज्ञान मुझे दीजिए।
छा। (७.१.२ए३)
आगे के पृष्ठों मैं प्रायोगिक या व्यावहारिक विज्ञान के विविध क्षेत्रों और शुद्ध विज्ञान के क्षेत्र में भारतीय परंपरा व योगदान के बारे में जानने का कुछ प्रयत्न करेंगे।
जब हम वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, आरण्यक, पुराण, महाभारत, रामायण आदि भारत का प्राचीन साहित्य पढ़ते हैं तो उसमें वर्णित कुछ घटनाएं वैज्ञानिक विकास का आभास देती है जैसे उपनिषद में वर्णित घटना की उपमन्यु की नेत्र ज्योति आ जाती है और अश्विनी कुमार उसे पुनः ज्योति देते हैं शाण्डिल के पति की मृत्यु पर अनुसुइया उसे पुनः जीवित कर देती है च्यवन ऋषि का वार्धक्य अश्विनी कुमार दूर करते हैं रावण द्वारा विभिन्न भौतिक शक्तियों पर नियंत्रण, त्रिपुरासुर के तीन नगर जमीन, आसमान व जल पर गतिमान होते थे पौलुमी आकाशस्थ नगरवासी असुरों से अर्जुन का युद्ध विभिन्न देवताओं की अंतरिक्ष यान, दिव्यास्त्रों का वर्णन, रामायण में इच्छा अनुसार चलने वाला पुष्पक विमान आदि पड़े हैं तो चित्र एक विकसित सभ्यता का उभरता है परंतु फिर प्रश्न उठता है क्या यह मात्र कथा कहानी या कवि कल्पना हैं। क्योंकि यदि ऐसा हुआ था तो उसकी तकनीक क्या थी? इस तकनीक को बताने वाले ग्रंथ है क्या? यह जानने का प्रयत्न करने में सबसे बड़ी बाधा है, जो जानकारी है संस्कृत में हैं और आज भी हजारों, लाखों पांडुलिपियां यत्र-तत्र बिखरी पड़ी है फिर भी प्रायोगिक विज्ञान के क्षेत्र में हुई प्रगति के प्रमाण और कुछ ग्रंथ हैं जिनसे हम इसे जान सकते हैं।

वैज्ञानिक परंपरा

वैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन अनुसंधान की परंपरा प्राचीन काल से चली आई है अनेकों ऋषियों ने इसके लिए जीवन खपाया। भृगु, वशिष्ठ, भरद्वाज, अत्रि, गर्ग, शौनक, शुक्र, नारद, चाक्रायण, धुंडीनाथ नंदीश, काश्यप, अगस्त्य, परशुराम, द्रोण, दीर्घतमस आदि हुए जिन्होंने विमान विद्या, नक्षत्र विज्ञान, रसायन विज्ञान, अस्त्र-शस्त्र रचना, जहाज निर्माण और जीवन के सभी क्षेत्रों में काम किया उदाहरण के लिए भृगु अपने शिल्पशास्त्र में शिल्प की परिभाषा करते हुए जो लिखते हैं उसे ज्ञान की परिधि कितनी व्यापक थी इसकी कल्पना आती है।

नानाविधानां वस्तूनां यंत्राणाँ कल्पसंपदा
धातूनां साधनां च वास्तूनां शिल्पसंज्ञितम्।
कृषिर्जलं खनिश्चेति धातचखण्डं त्रिधाभिधम॥
नौका-रथाग्नियानानां, तिसाधनमुच्यते।
वेश्म, प्राकार, नगररचना वास्तु संज्ञितम्॥

-भृगु संहिता-१३


भृगु १० शास्त्रों का उल्लेख करते हैं : १द्ध कृषि शास्त्र,
२द्ध जल शास्त्र, ३द्ध खनि शास्त्र, ४द्ध नौका शास्त्र, ५द्ध रथ शास्त्र, ६द्ध अग्नि शास्त्र, ७द्ध वेषम शास्त्र, ८द्ध प्राकार शास्त्र, ९द्ध नगर रचना, १०द्ध यंत्र शास्त्र इसके अतिरिक्त ३२ प्रकार की विधाएं तथा ६४ प्रकार की घटनाओं का उल्लेख आता है इन में धातु विज्ञान, वस्त्र विज्ञान, स्वास्थ्य, कृषि, बांध बनाना, वन रोपणी, युद्ध, शस्त्र, पुल बनाना, मुद्राशास्त्र नौका, रथ विमान, नगर रचना, गृह निर्माण, स्वास्थ्य, जीव शास्त्र, वनस्पतिशास्त्र, भोजन बनाना, बालसंगोपन, राज्य संचालन, आमोद-प्रमोद आदि सब आते थे। इस विषय सूची को देखकर लगता है इन की परिधि संपूर्ण जीवन को व्याप्त करने वाली थी। इन विधाओं की अनेक ग्रंथ थे, कितने ही लुप्त हो गए। कई विद्याएं जानने वालों के साथ ही लुप्त हो गई क्योंकि हमारे यहाँ एक मान्यता रही कि अनधिकारी के हाथ में विद्या नहीं जानी चाहिए यह सत्य है कि बहुत सा ज्ञान लुप्त हो गया, परंतु आज भी लाखों पांडुलिपियां बिखरी पड़ी है आवश्यकता है उनके अध्ययन, विश्लेषण और प्रयोग की।

(‘भारत में विज्ञान की उज्ज्वल परंपरा’ से साभार)
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