विशेष


व्यावहारिक विज्ञान और उद्यमिता से युवाओं को जोड़ना 

 डॉ. अनिल कुमार गोस्वामी से  डॉ. मनीष मोहन गोरे की बातचीत

 

भारत की स्वतंत्रता के बाद देश के सभी हिस्सों में साहित्य, कला, मूलभूत विज्ञान, अर्थशास्त्र आदि ज्ञान के अनेक क्षेत्रों में इनसे जुड़े हुए लोगों के द्वारा गम्भीरता से प्रयास होने लगे। मूलभूत विज्ञान के साथ विज्ञान और प्रौद्योगिकी के व्यावहारिक पहलुओं पर भी ध्यान केंद्रित हुआ। इन्हीं में से कुछ लोग और उनसे बनी स्वैच्छिक संस्थाओं ने वैज्ञानिक जानकारी के विस्तार और लोकप्रियकरण पर भी बल देना शुरू किया। इन्हीं आरंभिक विज्ञान संचारकों में एक नाम है डॉ. अनिल कुमार गोस्वामी। डॉ. गोस्वामी ने भारत के सुदूर और दुर्गम उत्तर पूर्वी हिस्से में विज्ञान को लेकर जनमानस में जागृति लाने के अनेक प्रयास किये। गुवाहटी में 1950 के दशक में समान विचारधारा के लोगों के साथ जुड़कर इन्होंने असम साइंस सोसाइटी की स्थापना किया। पेशे से शिक्षक रहे डॉ. गोस्वामी ने उत्तर पूर्वी भारत में वैज्ञानिक शोध और विज्ञान संचार से संबंधित अनेक संस्थाओं के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाई। विद्यार्थियों की समझ को मजबूत बनाने के वास्ते वे सदा विज्ञान शिक्षा और संचार के बीच कड़ी जोड़ते रहे। ऐसी शख्सियत के अनुभव इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए के पाठकों के ज्ञान का विस्तार करने में सहायक होंगे। प्रस्तुत है डॉ. अनिल कुमार गोस्वामी से हुई बातचीत के प्रमुख अंश।
 
आप एक शिक्षक रहे हैं। परंतु विद्यार्थियों की शिक्षा से आगे बढ़कर आम जन में वैज्ञानिक जागरूकता के प्रसार की भावना आपमें कैसे उत्पन्न हुई?
असम साइंस सोसायटी की प्रेरणा से मेरे भीतर विज्ञान लोकप्रियकरण का बीजारोपण हुआ। इसके सदस्य अपनी वैज्ञानिक विशेषज्ञता के क्षेत्रों में पापुलर लेक्चर देते थे और उस माहौल में मेरी विज्ञान के लोकप्रियकरण में रूचि उत्पन्न हुई। 13 फरवरी 1953 को गुवाहटी विश्वविद्यालय और कॉटन कॉलेज के कुछ युवा प्रोफेसर ने मिलकर असम साइंस सोसायटी की स्थापना की, तब मैं बी.एस-सी. का विद्यार्थी था। मैं इस संस्था का विद्यार्थी संस्थापक सदस्य रहा। असम के सबसे पुराने महाविद्यालयों में से एक काटन कालेज का मैं विद्यार्थी हूँ, जहाँ से बी.एस-सी. करने के बाद कलकत्ता (अब कोलकाता) से एम.एस-सी. की पढ़ाई पूरी किया। उस दौरान कलकत्ता स्थित विज्ञान लोकप्रियकरण के महत्वपूर्ण केंद्र इंडियन एसोसिएशन फार द कल्टीवेशन आफ साइंस की गतिविधियों ने भी मुझमें विज्ञान के लोकप्रियकरण को लेकर एक अभिप्रेरणा उत्पन्न किया। कोलकाता से पढ़ाई पूरी करके मैं गुवाहटी लौट आया और काटन कालेज भौतिकी विभाग में शिक्षक नियुक्त हुआ तथा आगे चलकर इस कालेज का प्राचार्य भी बना। 
देश की आजादी के बाद असम राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री गोपीनाथ बोरडलोय ने असम के प्रतिभावान युवा विज्ञान शिक्षकों को प्रोत्साहन के लिए विदेश जाकर वैज्ञानिक अध्ययन-शोध का अवसर प्रदान किया। उस योजना के तहत मुझे भी विदेश जाकर शोध करने का मौका मिला था जिसका मेरे शैक्षिक और विज्ञान संचारक जीवन पर गहरा असर हुआ। उपरोक्त तीन महत्वपूर्ण कारकों ने मिलकर मेरे भीतर शिक्षक के साथ-साथ एक विज्ञान संचारक को गढने में अहम भूमिका निभाई।
 
किन महान वैज्ञानिकों से आपको विज्ञान अध्ययन में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली?
1952 में काटन कालेज अपना गोल्डन जुबली वर्ष मना रहा था और इस निमित्त आयोजित समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर देश के महान वैज्ञानिक और नोबेल लारियेट सर सी.वी. रामन को आमंत्रित किया गया था। मैं तब उस कॉलेज में बी.एस-सी. अंतिम वर्ष का विद्यार्थी था। अन्य विद्यार्थियों के साथ मैं भी उस समारोह में आयोजित विज्ञान प्रदर्शनी का भागीदार था और टेलीफोन संचार प्रदर्शनी की जिम्मेदारी मुझे दी गई थी। मुझे याद है कि उस प्रदर्शनी में मेरी प्रस्तुति से प्रभावित होकर रामन ने मेरी पीठ थपथपाई थी। उस घटना ने मेरे हृदय में विज्ञान के अध्ययन और शोध को लेकर एक उत्कट इच्छा को संवेग प्रदान किया।   
 
असम साइंस सोसायटी के उद्देश्य और विजन के बारे में बताएं। इस संस्था ने असम और उत्तर-पूर्वी भारत के लोगों में विज्ञान के प्रति दिलचस्पी कैसे जगाई?
असम साइंस सोसायटी के उद्देश्य और संविधान अद्वितीय हैं। विज्ञान की प्रगति और लोकप्रियकरण इसका मूलमंत्र है। असम और उत्तर-पूर्वी भारत के बाकी हिस्सों में इस पायनियर संस्था ने अपना व्यापक असर छोड़ा। विज्ञान लोकप्रियकरण के क्षेत्र में इस संस्था ने अनेक शख्सियतों को ढूंढकर निकाला। इसकी प्रेरणा से दूसरी असंख्य संस्थाओं का उदय हुआ जिन्होंने समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करने को अपना लक्ष्य बनाकर काम किया। इस तरह असम साइंस सोसायटी की उत्प्रेरणा से लोगों में वैज्ञानिक चेतना का एक माहौल तैयार हुआ।  
 
असम में विज्ञान लोकप्रियकरण के लक्ष्य को हासिल करने के लिए आपके भगीरथ प्रयासों से उत्तर-पूर्वी भारत में विज्ञान संग्रहालय, प्लैनेटेरियम और एस्टेक (असम साइंस, टेक्नॉलॉजी एंड इंजीनियरिंग काउंसिल) जैसी विज्ञान संचार से जुड़ी असंख्य अग्रणी एजेंसियों का जन्म हुआ। इनमें से आपको आपका कौन सा योगदान सर्वश्रेष्ठ जान पड़ता है?
असम साइंस सोसायटी ने 1958 में सरकार के समक्ष चिल्ड्रेन साइंस म्यूजियम एंड प्लैनेटेरियम और एक मूलभूत अनुसंधान संस्थान स्थापित करने का प्रस्ताव रखा। असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने एक सम्मेलन के दौरान मुझे एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया कि मूलभूत विज्ञान के साथ-साथ अनुप्रयुक्त या व्यावहारिक विज्ञान से लोगों का परिचय स्थापित करवाना चाहिए ताकि आमजन को इस जानकारी का लाभ मिले। उनकी उत्प्रेरणा से मैंने समान विचार वाले व्यक्तियों के साथ मिलकर ऐसी ही सोच के साथ एक संस्थान की स्थापना किया। सरकार का इसमें अहम सहयोग प्राप्त हुआ था। विज्ञान से जुड़े सम्मेलन, संगोष्ठियों, कार्यशालाओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को शासन ने बेहद सराहा। असम साइंस सोसाइटी की गतिविधियों में वैज्ञानिक मनोवृत्ति के विकास का प्रसार किया जाता और जिससे हम समाज के हर तबके को जागरूक बनाने का प्रयास करते थे। इसलिए हमारे इन प्रयासों में आमजन गहरी दिलचस्पी उत्पन्न होती। 1970 और 1980 के दशकों में उत्तर पूर्वी भारत में कार्डियोलाजिस्ट बहुत कम होते थे और उनका महत्व था। तब के समय मैंने असम साइंस सोसाइटी के प्लेटफार्म से असम के प्रतिष्ठित कार्डियोलाजिस्ट को आमजन के लिए ‘हम और हमारा हृदय’ जैसे जनरुचि के विषय पर पब्लिक लेक्चर देने के लिए तैयार किया। इस व्याख्यान से लोगों में जागरूकता का संचार हुआ। आम लोगों में विज्ञान की समझ का विकास करने के ऐसे ही साधारण प्रयासों को मैं अपने सर्वश्रेष्ठ योगदान के रूप में देखता हूँ। 
 
विज्ञान शिक्षण में अगर विज्ञान संचार के तत्व को शामिल किया जाए तो विज्ञान के समझने को और भी अधिक रोचक बनाया जा सकता है। व्यापक स्तर पर इस उद्देश्य को कैसे पूरा किया जा सकता है?
इस उद्देश्य को पूरा किया जाना जरूर संभव है। इसके लिए हमें शुद्ध एकेडमिशियन और टेक्नोक्रेटध्इंजीनियरों या व्यावहारिक विज्ञान के विशेषज्ञों के बीच एक आपसी रिश्ता विकसित करने की जरूरत होगी। बच्चों को प्रयोगशालाओं के साथ ही साथ विभिन्न उद्योगों का भ्रमण कराया जाना उनमें वैज्ञानिक अभिरुचि विकसित करने में अहम साबित हो सकता है। हमारे काटन कालेज के सामने टेलीग्राफ कार्यालय था और वहां की प्रौद्योगिकी से जुड़ी तकनीकी जानकारी से विद्यार्थियों का परिचय स्थापित कराने के लिए मैं अपने बी.एस-सी./एम.एस-सी. के विद्यार्थियों को वहाँ लेकर जाता था। उस प्रत्यक्ष सजीव प्रदर्शन और अनुभव का बच्चों को बहुत फायदा हुआ। इसी तरह हर शहर में कोई न कोई वैज्ञानिक या तकनीकी फील्ड स्टेशन/संस्थान/प्रयोगशाला अवश्य होते हैं जो विज्ञान के विद्यार्थियों को व्यावहारिक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की धारा से जुड़ने का एक सुअवसर प्रदान करते हैं। सभी विज्ञान शिक्षकों को इनका लाभ विद्यार्थियों तक पहुँचाने का जरुर प्रयास करना चाहिये। 
देश के कोने-कोने में मौजूद विज्ञान लोकप्रियकरण की स्वैच्छिक संस्थाओं के द्वारा भी समय-समय पर ऐसे अनेक प्रयास किये जाते हैं जो दरअसल विज्ञान शिक्षण और विज्ञान संचार के बीच पुल का निर्माण करने जैसा होता है। 
 
आईसीटी और अब डिजिटल प्रौद्योगिकी के समावेश से विद्यार्थियों, शिक्षकों, कामगारों, महिलाओं, उद्यमियों और समाज के अन्य तबकों में कैसे वैज्ञानिक जागरूकता लाई जा सकती है?
इसमें कोई दो राय नहीं कि आईसीटी और डिजिटल प्रौद्योगिकी वर्तमान युग के महत्वपूर्ण व असरदार संचार टूल हैं। समाज के अलग-अलग स्टेकहोल्डर को आधुनिक प्रौद्योगिकी के प्रशिक्षण के द्वारा उन्हें सक्षम बनाने के साथ-साथ इन प्रौद्योगिकी में दिलचस्पी विकसित की जा सकती है। स्कूल-कालेज भवन को शाम के समय और अवकाश के दिनों में पब्लिक साइंस लेक्चर, विज्ञान प्रदर्शनियों, विज्ञान मेलों आदि के लिए उपयोग किया जा सकता है। इससे जन सामान्य में विज्ञान को लेकर रूचि पैदा होगी। सरकारी और गैर सरकारी साझेदारी के माध्यम से ग्रामीण इलाके के लोगों में डिजिटल जागरूकता लाने के प्रयास होने चाहिए। 
 
उत्तर पूर्वी भारत में अनेक सामाजिक समस्याएं व्याप्त हैं। क्या लोगों में विज्ञान लोकप्रियकरण के द्वारा इन समस्याओं का समाधान संभव है? आखिर विज्ञान लोकप्रियकरण का एक अहम मकसद लोगों में तार्किक सूझबूझ (वैज्ञानिक दृष्टिकोण) का विकास करना है।
आपने ठीक कहा कि भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में अनेक सामाजिक समस्याएँ और तनाव व्याप्त हैं। यहाँ पर आमदनी के स्रोतों की कमी है इसलिए भी लोग व्यर्थ के समाज विरोधी काम में संलग्न हो जाते हैं। इनका विकास पर भी बुरा असर होता है। मेरा अभिमत है कि विज्ञान संचार की प्रक्रियाओं से जोड़कर लोगों में तर्कसंगत सूझबूझ का विकास किया जाना आवश्यक है। इस मार्ग से होकर लोगों को और खास तौर पर युवाओं को उद्यमिता (मदजतमचतमदमनतेीपच) से जोड़ा जा सकता है जिससे उन्हें रोजगार मिलेगा। सरकार द्वारा स्थानीय परंपरागत शिल्पियों और कारीगरों को प्रोत्साहन देने के लिए उचित सुविधाएँ प्रदान करनी चाहिए। अंत में इस प्रक्रिया के फलस्वरूप समाज में सौहार्द बढ़ेगा और विकास सुनिश्चित हो पायेगा। 
 
भारत के उत्तर पूर्वी हिस्सों में सबसे ज्यादा बारिश होती है लेकिन पानी की किल्लत भी यहां बड़ी है। शुद्ध पीने का पानी मिलना यहां पर एक बड़ी चुनौती है। इस समस्या को हल करने में विज्ञान संचार क्या भूमिका निभा सकता है?
देखिए, मानव समाज और पर्यावरण के आपसी संबंधों को समझने के लिए विज्ञान के साथ-साथ मानविकी और अर्थशास्त्र की भूमिका अहम है। अपने पर्यावरण को लेकर आमजन को संजीदा बनाने के लिए विज्ञान संचार के प्रयास अनोखे साबित हुए हैं। उत्तर पूर्व भारत में मानसून का संकट नहीं इसलिए यहां पर जल स्रोत पर्याप्त हैं। पानी को दूषित होने से बचाने की दिशा में विज्ञान संचार के अनेक प्रक्रम कारगर हो सकते हैं। पानी के संदूषण में गिरावट लाने के लिए अनेक स्तरों पर प्रयास किये जा रहे हैं और इनके सकारात्मक परिणाम भी मिल रहे हैं। 
 
इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए के पाठकों के लिए आपका संदेश।
बच्चे और युवा देश के भावी निर्माता होते हैं। जीवन का यही वह पड़ाव है जब कोई विचार मन में गहरे बैठ जाए तो उससे समाज और देश में सकारात्मक बदलाव लाये जा सकते हैं। यदि इस उम्र में युवाओं की सोच प्रगतिशील और तार्किक बन जाए तो ऐसे युवाओं से बने समाज का विकास अवश्यंभावी है। इस महत्वपूर्ण विज्ञान पत्रिका के पाठकों से मैं यह साझा करना चाहता हूँ कि वे किताबों और कक्षाओं में पढाये जाने वाले विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अलावा स्कूल और घर के बाहर प्रति और समाज में घटित हो रहे व्यावहारिक विज्ञान को समझें तथा मनन करें। कोई बात ना समझ आये तो अपने शिक्षकों से पूछें। एक और बात सदा ध्यान रखें कि एक वैज्ञानिक, विज्ञान संचारक बनने के अलावा हर किसी को एक जिम्मेदार नागरिक होना भी जरूरी है और हमारी सोच के सकारात्मक व तर्कसंगत होने पर ही ऐसा संभव है। 
आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा। इस सार्थक संवाद के लिए आपको ‘इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए’ परिवार की ओर से हार्दिक धन्यवाद ! 
आपको और ‘इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए’ परिवार को भी मेरी ओर से धन्यवाद एवं शुभकामनाएं।
 
mmgore@vigyanprasar.gov.in