विशेष

(20/Mar/2017)

विज्ञान वार्ता

विज्ञान-संचार प्रतिभाओं को पहचानें 

डॉ. चंद्रमोहन नौटियाल से मनीष मोहन गोरे की बातचीत

 

अक्सर इस बात पर ज़ोर दिया जाता है कि विज्ञान की समझ और वैज्ञानिक सूझबूझ को बढ़ावा देने की दिशा में जब वैज्ञानिक आगे आकर विज्ञान संचारकों का हाथ बटायेंगे तो तस्वीर बदल सकती है। ऐसे उदाहरण बहुत कम देखने को मिलते हैं। डॉ. चंद्र मोहन नौटियाल एक ऐसा ही उदाहरण है। मूलतः भौतिक विज्ञानी डॉ. नौटियाल ने लगभग तीन दशकों तक विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग की लखनऊ स्थित एक राष्ट्रीय प्रयोगशाला (बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान) में रेडियोकार्बन लैब के प्रभारी के पद पर अपनी सेवाएँ दीं। आरंभ से मेधावी विद्यार्थी रहे डॉ. नौटियाल ने वैज्ञानिक शोध में भी उत्कृष्ट योगदान दिये। वर्ष 1988 में राष्ट्रपति भवन में भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (इंसा) का युवा वैज्ञानिक मेडल हासिल किया जिसके बाद तात्कालीन राष्ट्रपति डॉ. आर. वेंकटरामन के द्वारा डॉ. नौटियाल सहित सभी विजेताओं को राष्ट्रपति भवन में विशेष भोज पर आमंत्रित किया गया। उन्हें आगे चलकर इंसा/डीएफजी छात्रवृत्ति पर जर्मनी की प्रतिष्ठित दो मैक्स प्लांक संस्थानों में शोध का अवसर मिला। इसके समांतर वे सतत रूप से विज्ञान संचार की गतिविधियों में भी संलग्न रहे। इस विधा के भारतीय पुरोधा रहे प्रोफेसर यशपाल, डॉ. जयंत विष्णु नार्लीकर और डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का उन्हें सानिध्य मिला। अनेक रेडियो-टीवी विज्ञान कार्यक्रमों का लेखन-समन्वय नए विज्ञान संचार के विभिन्न फार्मेट के लिए बहुत सारे माध्यमों और भाषाओं में योगदान दिया तथा विज्ञान तकनीकी एवं विज्ञान संचार पर केंद्रित करीब 700 लोकविज्ञान व्याख्यान देकर डॉ. नौटियाल ने इस क्षेत्र में एक मिसाल कायम की है। उन्होंने संचार की विरल विधा कविता और गीत का लेखन करके भी विज्ञान संचार को समृद्ध किया है। भारत रत्न डॉ. सी.एन.आर. राव और पद्म भूषण डॉ. आर.ए. माशेलकर के व्याख्यानों का संकलन तथा श्रव्य-दृश्य रूप में सम्पादित करके प्रकाशित किया। राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद्, डीएसटी (भारत सरकार) के एक महत्वपूर्ण विज्ञान संचार अभियान राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस के साथ भी वे प्रारंभ से जुड़े हुए हैं। 1995 में घटित महत्वपूर्ण आकाशीय घटना (पूर्ण सूर्यग्रहण) के इरादतगंज (इलाहाबाद) से सीधा प्रसारण का आपने आँखों देखा हाल सुनाया। आपको कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (सेंट डियागो), कलोन विश्वविद्यालय (जर्मनी), बर्न विश्वविद्यालय (स्विट्जरलैंड), न्यू मैक्सिको विश्वविद्यालय (अमरीका), मास्को (रूस) तथा कोचिमिंह (वियतनाम) में व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया गया। विज्ञान संचार के क्षेत्र में आपके योगदान का संज्ञान लेते हुए यूरोप के सबसे बड़े विज्ञान कार्यक्रम यूरोपियन साइंस ओपन फोरम 2006 में आपको संपूर्ण व्यय देकर आमंत्रित किया गया। इसके अलावा, डॉ. नौटियाल की प्रतिभा को देश और विदेश की अनेक संस्थाओं ने सम्मानित भी किया है। वैसे तो डॉ. नौटियाल जुलाई 2016 में सेवानिवृत्त हुए हैं मगर वे उसके बाद विज्ञान संचार की गतिविधियों में पहले से ज्यादा सक्रिय हो गये हैं। 

आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और शिक्षा के बारे में हमारे पाठकों को संक्षेप में बताएं।
हमारा परिवार मूलतः उत्तराखंड (गढ़वाल) से है। मेरा जन्म मेरठ में हुआ। मेरे दादा जी ब्रिटिश काल में तथा स्वाधीनता के बाद भी बस्ती, बरेली, पीलीभीत, बदायूं, श्रीनगर आदि के राजकीय विद्यालय में प्रधानाध्यापक तथा कुछ समय इंस्पेक्टर ऑव स्कूल्स रहे थे (बस्ती में विद्यालय के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रम में मैंने डॉ. कलाम को बोर्ड पर दादाजी का नाम दिखाया!)। जैसा मैंने उनके विद्यार्थियों के माध्यम से जाना (जिनमे मुख्यमंत्री, कुलपति आदि भी थे), वे असाधारण व्यक्तित्व के थे। वे मूलतः अंग्रेजी के अध्यापक थे (शायद गढ़वाल क्षेत्र के पहले ग्रेजुएट) पर हिंदी और राष्ट्रीयता के परम समर्थक। ये संस्कार परिवार में रहे। उन्होंने देश के स्वाधीन होने पर अंग्रेजी का उपयोग न करने की शपथ ली थी और पेंशन के कागजों पर हिंदी में हस्ताक्षर करके अस्थायी असुविधा भी झेली पर डाकघर एवं अन्य अधिकारियों ने हस्ताक्षर प्रमाणित करके समस्या हल कर दी। वे अपने बच्चों के सरकारी नौकरी में जाने देने के बिलकुल इच्छुक नहीं थे (उनके निधन के बाद एक चाचाजी सरकारी सेवा में गए)। इसलिए मेरे एक ताऊ जी चित्रकार (लखनऊ से), दो ताऊजी चिकित्सक तथा पिताजी भी चित्रकार तथा बाद में छायाचित्रकार बने। पंजाब के राज्यपाल से उन्हें स्वर्णपदक भी मिला था। उनका स्टूडियो पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सबसे प्रतिष्ठित स्टूडियो रहा एवं वे नॉर्थन इण्डिया फोटोग्राफिक सोसायटी के संयुक्त सचिव थे। वे सदैव सामाजिक कार्यों से जुड़े रहे तथा विवेकानंद शिला स्मारक समिति के कोषाध्यक्ष भी रहे। उनका शिक्षा क्षेत्र से निरंतर जुड़ाव रहा तथा वे दशाब्दियों अनेक संस्थाओं जैसे सरस्वती शिशु मंदिर, सरस्वती विद्या मंदिर की प्रबंध समितियों के अध्यक्ष आदि रहे। उन्होंने देवनागरी स्नातकोत्तर विद्यालय तथा मेरठ विश्वविद्यालय में फोटोग्राफी भी पढ़ाई। अतः घर में कलात्मक, सांस्कृतिक एवं शैक्षिक वातावरण रहा। मैं सरस्वती शिशु मंदिर, राजकीय इंटर कॉलेज में पढ़ा तथा देवनागरी कॉलेज से भौतिकी से बी.एससी ऑनर्स करके रुड़की विश्वविद्यालय (अब आईआईटी) से एम.एससी. किया। मैं मूलतः भौतिकविद हूँ। भौतिक अनुसन्धान प्रयोगशाला, अहमदाबाद में मैंने प्रो. एम.एन.राव के निर्देशन में प्रो. देवेंद्र लाल के ग्रुप में शोध कार्य किया। वहाँ मैं नासा के प्रोजेक्ट में वैज्ञानिक सहकर्मी रहा। मेरे शोध कार्य में समस्थानिक (आइसोटोप) एक कॉमन थ्रेड रहा है।

आप प्रारंभ से ही एक बहुमुखी प्रतिभा वाले व्यक्ति रहे हैं। आपने अध्ययन के लिए विज्ञान को ही क्यों चुना?
मैं विज्ञान का शौकीन था। जिज्ञासु था (जैसा स्कूल की रिपोर्ट में भी लिखा जाता था), अपनी पॉकेट मनी से भी विज्ञान की किताबें ही लेता था। घर पर हम स्वयं ही प्रयोग भी करते थे पेरिस्कोप और प्रोजेक्टर बनाना, कॉपर सल्फेट (नीला तूतिया) के विलयन में डाल कर लोहे की कील पर ताँबे की पर्त चढ़ाना, पिनहोल कैमरा बनाना, पानी में डुबा कर कैंची से कांच काटना, गत्ते की ट्यूब और धागे से टेलीफोन साबुन लगा कर या तेल की बूँद के उपयोग से पानी में कागज की मछली तैराना, पानी की बूँद का लेंस की तरह उपयोग करके माइक्रोस्कोप बनाना हमारे शौक थे। विज्ञान, विज्ञान प्रगति, वैज्ञानिक जैसी पत्रिकाएं देखना अच्छा लगता था। मैं स्वतन्त्र व्यक्तित्व का था, जिज्ञासु था और मुझे लगा कि विज्ञान के क्षेत्र में रचनात्मकता तथा वांछित स्वाधीनता दोनों मिलेंगे। पढ़ाई में अच्छा होने के कारण प्रवेश भी अच्छी संस्थाओं में मिलता चला गया।   

आप राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक रहे हैं। वैज्ञानिक शोध में आपके महत्वपूर्ण योगदान के विषय में हम जानना चाहेंगे।
आरम्भ में मेरा कार्य मास स्पेक्ट्रोमेट्री के उपयोग से चन्द्रमा से आए नमूनों एवं उल्काओं के समस्थानिक - विश्लेषण का था जिसके आधार पर हमने सूर्य से निकले वाली सौर पवन, ऊर्जावान कणों तथा अंतरिक्ष किरणों की नाभिकीय अभिक्रियाओं से बने समस्थानिकों में अंतर को समझा। उपग्रह से किए प्रयोगों के आधार पर कहा गया था कि सूर्य से निकली ऊर्जावान कणों में नियॉन के समस्थानिक उसी अनुपात में हैं जिस में ‘प्लेनेटरी’ कहे जाने वाले पदार्थों में। हमारे निष्कर्ष भिन्न थे। आरम्भ में तो हमारा विचार नहीं माना गया परंतु 1983 की अंतर्राष्ट्रीय कॉस्मिक-रे कॉनफेरेन्स होने तक शिकागो विश्वविद्यालय तथा कैलटेक के विज्ञानियों ने भी मान लिया कि दीर्घकालीन आधार पर हम सही थे। बीरबल साहनी पुरावनस्पति विज्ञान संस्थान (2016 से पुराविज्ञान संस्थान) में मैंने कॉस्मिक किरणों से वायुमंडल में बने रेडियोकार्बन समस्थानिक के मापन से रेडियोकार्बन आयुनिर्धारण का उपयोग करके पूर्व काल की जलवायु एवं सभ्यताओं के परिवर्तनों के काल निर्धारण का कार्य किया। इससे अनेक रोचक तथ्य उजागर हुए। पता चला कि प्रतिकूल जलवायु के गुजरात में चार हजार वर्ष से पूर्व भी साल में दो फसल निकाली जाती थीं। उत्तर-पूर्व भारत, तथा गंगा के मैदान की जलवायु के परिवर्तन के अध्ययन के परिणाम अच्छी अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में छपे।

आप उत्कृष्ट संस्थाओं में पढ़े हैं, अच्छे विद्यार्थी रहे। वैज्ञानिक शोध के साथ-साथ विज्ञान संचार की ओर आपका झुकाव कैसे हुआ? आपने विज्ञान संचार कैसे सीखा?
स्कूली जीवन में मैं विज्ञान पर लिखता था। मजेदार बात यह है कि गंभीर विज्ञान संचार में मेरा पहला कदम पड़ा जब भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के प्रांगण में हम युवा वैज्ञानिक पदक प्राप्त करने के उपरान्त राष्ट्रपति भवन जाने की तैयारी कर रहे थे। दिल्ली आकाशवाणी के युवा रिपोर्टरों के आग्रह पर भी हिंदी में बोलने को कोई तैयार नहीं हुआ, अकेले मैं था जो सहमत हो गया। यह रेडियो पर मेरा पहला प्रसारण था। 
वर्ष 1993 में राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस के साथ मेरे जुड़ाव से मेरा सुखद संपर्क डॉ. नरेंद्र सहगल से हुआ। मैं एनसीएसटीसी नेटवर्क का संयोजक भी बना जिसके अध्यक्ष प्रो. यशपाल थे। अनुज सिन्हा जी की पहल से मैं साइंस कांग्रेस के लखनऊ सत्र में बच्चों के लिए विज्ञान सत्र का समन्वयक बना। धीरे-धीरे लखनऊ विश्वविद्यालय, भारतीय भू सर्वेक्षण उत्तर प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् आदि एवं मैटीरियल रिसर्च सोसायटी जैसे अन्य वैज्ञानिक संगठन भी मुझे अपने विज्ञान कार्यक्रमों से जोड़ने या उनमे सहयोग हेतु आमंत्रित करने लगे। शिक्षा संस्थाओं, आंचलिक विज्ञान नगरी आदि की विज्ञान गतिविधियों तथा प्रबंधन से जुड़ाव बढ़ा। जब 2006 में प्रो.सी.एन. आर.राव, डॉ. आर.ए.माशेलकर एवं प्रो. विजयन के लोकप्रिय व्याख्यान हुए तो उनके आयोजन एवं डॉक्यूमेंटेशन/प्रकाशन का दायित्व मुझे दिया गया। धीरे-धीरे मेरी विज्ञानी के साथ-साथ विज्ञान संचारक वाली पहचान और पुख्ता हो गई। एनसीएसटीसी एवं विज्ञान प्रसार के अब तक के सब प्रमुखों से मेरा अच्छा संपर्क रहा जिनमें डॉ. विनय बी.कांबले, डॉ.भानु प्रताप सिंह एवं डॉ. गोपीचंद्रन भी हैं। विज्ञान परिषद् प्रयाग के डॉ. शिवगोपाल मिश्र ने मुझे परिषद् से जोड़ा।
वर्ष 1995 में पूर्ण सूर्य ग्रहण के समय दूरदर्शन ने इलाहाबाद में इरादतगंज से भी उसका सीधा प्रसारण करने का निर्णय लिया। मैं लखनऊ केंद्र की सर्वप्रिय पसंद रहा और मुझे आँखों देखा हाल देने के लिए इलाहाबाद भेजा गया। दिल्ली में प्रो. यशपाल स्टूडियो में थे। इलाहाबाद में डॉ. जयंत विष्णु नार्लीकर थे। दूरदर्शन के निदेशक आर.के. सिन्हा साहब वहाँ थे जो काफी प्रभावित हुए। लौट कर उन्होंने सहायक निदेशक श्रीमती जलाल से कहा कि आप साइंस मैगजीन आरम्भ करें और डॉ. नौटियाल को उसमें जोड़ें। इसके बाद काफी समय तक मैंने साइंस मैग्जीन की जिसमे आधे घंटे के सर्ग में एक वृत्तचित्र, एक छोटा साक्षात्कार और 5 मिनट का विज्ञान समाचार थे और तीनों मैं ही करता था। कार्यक्रम बहुत सफल रहा लेकिन जब शनिवार और इतवार को रिकॉर्डिंग बंद हो गई तो मेरा भी दूरदर्शन से नाता लगभग टूट गया। हाँ बीच-बीच में ई-टीवी, दूरदर्शन, स्टार आदि आकर बाइट रिकॉर्ड करके दिखा देते थे। संस्थान के कुछ वृत्तचित्र बने तो मैंने आलेखन और नेपथ्य से पढ़ने का कार्य किया। ई-टीवी से निमिष कपूर जी के माध्यम से तथा कुछ में परिचय के कारण प्रायः वैज्ञानिक सोच तथा अंधविश्वासों से जुड़े मुद्दों पर बाइट जाना सामान्य बात हो गई थी। उस समय स्वतंत्र भारत के (बाद में संपादक, हिंदुस्तान) नवीन जोशी जी ने स्नेहिल आग्रह कर के 3 अंकों के लिए जीवन के आरम्भ और विकास पर लेख लिखवाए। 
अनेक वर्ष बाद पिछले 2-3 वर्षों में फिर से मैं दूरदर्शन गया जिनमें से कुछ विज्ञान दिवस पर थे, कुछ कार्यक्रम भूकंप, कुछ डॉ. कलाम तथा कुछ ऊर्जा एवं हिग्स बोसॉन से संबंधित थे। पहचान बनने का लाभ हुआ कि रूस, दक्षिण अफ्रीका, जर्मनी आदि में व्याख्यान देने/ भ्रमण हेतु मुझे आमंत्रित किया गया।
एक बार प्रो.यश पाल लखनऊ आए, शायद 1995 की बात है। हम उन्हें उत्तर प्रदेश बाल कांग्रेस में आमंत्रित करना चाहते थे। मालूम नहीं उन्हें याद होगा या नहीं, मैं उनसे मिलने मिलने क्लार्क-अवध होटल गया। वे डॉ. नित्यानंद की प्रतीक्षा कर रहे थे जिससे मुझे समय मिल गया। बातों ही बातों में यह जानने पर कि मेरी लेखन में रूचि है, उन्होंने कहा टर्निंग पॉइंट के लिए लिख सकते हो? मैंने कहा मुझे नहीं पता कि टी.वी.स्क्रिप्ट कैसे लिखते हैं। उन्होंने कहा, उसमें क्या है! कागज में एक तरफ विजुअल लिखो, दूसरी तरफ ऑडियो! टर्निंग पॉइंट के लिए मैं कभी नहीं लिख पाया परंतु लखनऊ दूरदर्शन और रेडियो के लिए आलेखन किया। अब भी मैं कार्यशालाओं में आलेखन पढ़ाता हूँ तो हमेशा इस मन्त्र को याद करता हूँ! आलेखन तथा फोटोग्राफी एवं वृत्तचित्र बनाने पर फोकल जैसे प्रकाशकों की पुस्तकें भी पढ़ीं। पर मुख्यतः विज्ञान मैंने संचार प्रयोग कर-कर के सीखा। 
 

आपको पूर्णकालिक वैज्ञानिक के रूप में कार्य करते हुए विज्ञान संचार के क्षेत्र में योगदान करने में कोई परेशानी नहीं हुई?
अगर आप टीवी परदे पर दिखाई देते हैं, पत्र-पत्रिकाओं में आपका नाम आता है तो आपको अधिक सतर्क रहना पड़ता है। पर मैं तो अधिक समय संस्थान में रहता था, अवकाश के दिनों में भी, इसलिए कुछ समय के बाद इस कारण तो कोई परेशानी नहीं हुई। हाँ, एक दौर में जब मुझे एक खराब उपकरण चलाने के लिए दे दिया गया तब थोड़ा परेशानी हुई। यह कहना बहुत आसान था कि उपकरण को उतना ध्यान नहीं मिल पा रहा है। सौभाग्य से अनेक विशेषज्ञों ने स्पष्ट रूप से उस उपकरण की गुणवत्ता पर प्रतिकूल मौखिक ‘प्रमाणपत्र’ देकर मेरी नैतिक समस्या को हल कर दिया यद्यपि मेरे उससे मेरी व्यावसायिक हानि फिर भी बहुत हुई। सच तो यह है कि उन परिस्थितियों में विज्ञान संचार की गतिविधि ने मेरा आत्मविश्वास बनाए रखने में मेरी सहायता की। अपने लिखने बोलने की क्षमता के उपयोग से संतोष भी रहा।  

आपके मत में एक वैज्ञानिक अधिक अच्छा संचारक होगा या एक पत्रकार?
कौन लिखे इसके लिए नियम तो नहीं बनाया जा सकता। अच्छी संचार क्षमता वाला विज्ञानी अथवा अच्छा विज्ञान समझने लिखने वाला लेखक/पत्रकार दोनों सशक्त विज्ञान लेखक हो सकते हैं। आदर्श स्थिति तो वह है जब विषय का जानकार या विशेषज्ञ ही आम व्यक्ति के लिए लिखे। ऐसे में विषय की व्याख्या गलत नहीं होती। पर इसके लिए उसकी संचार क्षमता अच्छी होना अनिवार्य है जो प्रायः अपवाद है। परंतु विषय को न जानने वाले कभी-कभी विषय वस्तु में गलती कर देते हैं। एक कहावत है कि जीमतम पे दवजीपदह सपाम बसमंत पउंहम व िं न्र्रिल वइरमबज। लेखक को स्वयं विषय स्पष्ट नहीं होगा तो पाठक को कैसे करा पाएगा? मेरे मत में यदि विषय दुरूह है तो विशेषज्ञ द्वारा या उसके साथ समन्वयन करके लिखना अधिक प्रभावी होगा। कुछ लेखक प्रयास करके इन अड़चनों को पार कर लेते हैं, कुछ कच्चा-पक्का परोसते हैं! विशेषज्ञों में फ्रांसिस क्रिक एवं जेम्स वाटसन, तथा जानकारों में पॉल डेवीज तथा जॉन ग्रिबिन इसके उदाहरण हैं जिनका लेखन उत्कृष्ट है। डॉ. नार्लीकर ने गुरुत्व पर ज्ीम स्पहीजमत ैपकम व िळतंअपजल जैसी अच्छी पुस्तक तथा विज्ञान कथाएं लिखी हैं। प्रो. यश पाल तथा डॉ. राहुल, दोनों मूलतः विज्ञानी हैं, पर उन्होंने आम बच्चे के मन में उमड़ने-घुमड़ने वाले प्रश्नों को अपनी पुस्तक में पिरोया है। डॉ.डी बालसुब्रणयन ने सामान्य पाठक के लिए काफी लिखा है। और उदाहरण भी हैं। बिमान बसु जी व्यवसाय से शोधकर्ता नहीं है पर इतना अच्छा, सरल और सही लिखते हैं!   

प्रायः विज्ञान के विद्यार्थी साहित्य और भाषा पक्ष से उतने बेहतर नहीं माने जाते। पर आपने तो विज्ञान पर आधारित कविताएं भी लिखी हैं ! आप विज्ञान संचार की कार्यशालाओं में असंख्य नवांकुर विज्ञान संचारकों को प्रशिक्षण दिया है। यह तालमेल कैसे किया आपने?
मेरी स्कूली शिक्षा सरस्वती शिशु मंदिर में हुई। यहाँ हिंदी का स्तर तो उत्कृष्ट था ही, अंग्रेजी का भी अच्छा था। मैंने पहली कविता चौथी कक्षा में लिखी और पांचवी कक्षा में पत्रिका में कार्टून कथा भी छापी! पांचवीं कक्षा में मैंने स्कूल के कार्यक्रम का आँखों-देखा हाल भी सुनाया जिसमें थोड़ी देर के बाद मैंने दी गई स्क्रिप्ट को एक ओर रख कर स्वयं बोलना आरम्भ कर दिया। मैं पढ़ने का भी बहुत शौकीन था। मेरे पिता जी ने इसमें मुझे बहुत प्रोत्साहित भी किया। वे विशेषतः विज्ञान की किताबें मुझे खरीद कर देते थे पर केवल उनसे मेरा क्या होता? आखिर उन्होंने मुझे 8-9 वर्ष की आयु में जिला पुस्तकालय का सदस्य बनवा दिया। 4 साल बाद मैं पुस्तकालय अध्यक्ष के पास पहुँच गया कि मैंने चिल्ड्रन सेक्शन की सब किताबें पढ़ ली है, अब क्या करूँ? पेशोपेश में पड़े मोहम्मद हसन साहब ने मेरा संक्षिप्त इंटरव्यू लिया, संतुष्ट हुए और लाल कलम से मेरे कार्ड पर लिखा-इन्हें एडल्ट सेक्शन की किताबें इशू कर दी जाएं। यह पुस्तकालय के इतिहास की संभवतः अकेली ऐसी घटना होगी। तब आरटीआई आदि का डर नहीं था! आज शायद कोई ऐसा साहस न कर पाए। पर यह सरल नहीं था। मुझे अन्य विद्यार्थियों की तुलना में कहीं अधिक परिश्रम करना पड़ता था। हमारा विद्यालय (राजकीय इंटर कॉलेज) मेरठ का सर्वश्रेष्ठ विद्यालय था। बहुत गतिविधियां होती थीं और उनसे हमने बहुत कुछ सीखा। पढ़ने का यह शौक संभवतः मेरे भाषा पक्ष को समृद्ध करने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रहा। मैं 7 वर्ष क्लास मैग्जीन, फिर पीजी कालेज तथा फिर रुड़की विश्वविद्यालय की पत्रिकाओं का संपादक रहा। 

आपने एक कुशल विज्ञान संचारक के रूप में मुद्रित, रेडियो और टेलीविजन जैसे सभी माध्यमों में काम किया है। आपका कैसा अनुभव रहा है?
मुझे इन सभी संचार माध्यमों में काम करते हुए बहुत आनंद मिला पर पत्र-पत्रिकाओं से अधिक मैंने टीवी और रेडियो के लिए लिखा है। शायद एक कारण यह रहा कि उनमें हाँ कहने के बाद डेडलाइन होती थी। पत्र-पत्रिकाओं में प्रायः मैंने आग्रह के दबाव में ही लिखा! इनके अतिरिक्त मैंने श्रोताओं के साथ सीधे संवाद तथा व्याख्यान देने के आनंद को भी अनुभूत किया है, करीब 700 व्याख्यान दिए हैं। इसमें सभी वर्गों के श्रोता रहे-12वीं कक्षा तक के विद्यार्थी, स्नातक, परास्नातक, शोध छात्र, कालेज/विश्वविद्यालय के शिक्षक, प्रशासक और ग्रामीण लोग भी। 
विज्ञान संचारक के रूप में आपके कुछ रोचक अनुभव?
लखनऊ से मैंने उत्तरायण कार्यक्रम में 1990 से 2016 तक 25 से अधिक वर्ष तक वार्ताएँ प्रस्तुत की। आरंभ गढ़वाली में विज्ञान वार्ताओं से हुआ। पहली बार जब मैं अनुबंध पत्र मिलने के बाद आकाशवाणी पहुँचा तो मैं हिंदी में आलेख लेकर गया था। कार्यक्रम अधिशासी जरधारी जी को दिखाया तो उन्होंने कहा, यह तो हिंदी में है गढ़वाली में होना चाहिए था। उन्होंने अनुबंधपत्र में विषय के आगे कोष्ठक में लिखे शब्द दिखाए -ग.वा. यानी गढ़वाली वार्ता! कोई चारा नहीं था, पर उन्होंने समस्या को समझकर इस शर्त के साथ अनुमति दी कि अगली बार गढ़वाली में लिख कर लाऊंगा। तीन महीने बाद मैंने जब गढ़वाली में अपनी वार्ता रिकार्ड कराई तो नर्वस था लेकिन बाद में मालूम हुआ कि उसे पसंद किया गया है, मुझे यह जानकर खुशी हुई। उसके बाद मेरी वार्तायें लखनऊ के साथ-साथ शार्ट वेव पर नजीबाबाद से भी प्रसारित हुईं। अगले वर्ष दूरदर्शन से निमंत्रण मिला। इस पहली वार्ता में मेरी सारी परीक्षायें हो गईं ! एयर कंडीशनर खराब होने के कारण रिकॉर्डिंग हो नहीं पाई। कम्पीयर अनुपस्थित थे पर प्रोग्राम लग चुका था लिहाजा कैमरे में देखकर अकेले बोलना था ! मैं बिलकुल सहज नहीं था। विषय था हमारा सौर मंडल। इस अनुभव के बाद फिर धीरे-धीरे मैं दूरदर्शन का नियमित वार्ताकार, ऐंकर, आलेखक और यहाँ तक कि नेपथ्य से वाचक तथा कमेंटेटर भी बन गया।  

आपकी दृष्टि में विज्ञान संचार क्यों महत्त्वपूर्ण है?
आज समाज के सामने जो चुनौतिाँ हैं, उनमे से सबसे महत्त्वपूर्ण है तार्किक सोच का अभाव। यह हमारी अनेक सामाजिक समस्याओं का भी कारण है। वैज्ञानिक सूझबूझ के विकास से समाज में अंधविश्वास उन्मूलन होता है। यदि हम लोगों को बतायें कि गांगेय डॉल्फिन जन्म से अंधी होती हैं तो वे इस अफवाह पर विश्वास नहीं करेंगे कि नरोरा के नाभिकीय संयत्र से निकले अपशिष्ट पदार्थों के कारण गंगा का जल प्रदूषित हुआ जिससे डॉल्फिन अंधी हो गईं! लोगों की जिज्ञासा को शांत करके उन्हें घटनाओं को तर्कसंगत ढंग से समझाना विज्ञान संचार का मकसद है। इससे नवीन प्रौद्योगिकियों को स्वीकार या अस्वीकार करने संबंधी निर्णय लेने में आम जन सक्षम बनता है। दैनिक जीवन के लिए तो आपका कुछ विज्ञान-प्रौद्योगिकी जानना अनिवार्य है ही !

क्या भारत में विज्ञान संचार की स्थिति संतोषजनक है? आज हमारे देश में विज्ञान संचार के सामने क्या मुख्य चुनौतियां हैं? आप किन कार्यक्रमों को देश में विज्ञान संचार के लिए महत्त्वपूर्ण उपलब्धि मानेंगे?
पिछले कुछ वर्षों में इस ओर संख्यात्मक सुधार हुआ है पर स्तर में वांछित परिवर्तन नहीं आया है। वैसे हमारे देश में राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद्, एनसीएसएम, विज्ञान प्रसार, निस्केयर जैसे संगठन सक्रिय हैं। अधिकांश प्रदेशों में विज्ञान प्रौद्योगिकी परिषद् तथा गैर-सरकारी संगठन भी सक्रिय हैं लेकिन मुझे लगता है कि उनमें कहीं न कहीं वांछित पैशन की कमी है। दूसरे देशों में रचा जा रहा लोकविज्ञान साहित्य सभी वर्गों के लिए अलग-अलग हैं जबकि हमारे यहाँ हम मुख्यतः कम आयु वर्ग को ही लक्ष्य कर रहे हैं। विषय-वस्तु (बवदजमदज) तथा पैकेजिंग दोनों महत्त्वपूर्ण है।
मुझे लगता है 1995 में पूर्ण सूर्यग्रहण का सीधा प्रसारण क्रांतिकारी कदम था। यह उस वर्ष के सबसे अधिक देखे गए 10 कार्यक्रमों में था। मुझे नहीं लगता कोई और विज्ञान कार्यक्रम लोकप्रियता के इस स्तर को छू पाया है। उसके बाद शुक्र पारगमन काफी देखा गया। संयोग से मैं इन दोनों घटनाओं के प्रसारण से जुड़ा रहा। टर्निंग पॉइंट एक और उच्च स्तरीय कार्यक्रम था। रेडियो पर ‘मानव का विकास’ भी उत्कृष्ट था। ये इसलिए भी देखे गए क्योंकि तब चैनल कम थे। विज्ञान प्रसार द्वारा चलाई गई विज्ञान रेल अपनी प्रस्तुति के अनूठेपन के कारण विशेष तौर पर लोकप्रिय हुई। विज्ञान प्रसार के विपनेट क्लब, पुस्तक प्रकाशन, विज्ञान फिल्म जैसे प्रयासों में काफी संभावनाएं हैं। देश की अनेक विज्ञान पत्रिकाएं अच्छी हैं पर अधिकांश संसाधनों के अभाव से जूझ रही हैं। 

विज्ञान संचार के क्षेत्र में विदेशों की तुलना में हम कहाँ पर खड़े हैं? इस स्थिति को कैसे बेहतर किया जा सकता है?
हम मात्रात्मक तथा गुणात्मक दोनों दृष्टि से विकसित देशों से बहुत पीछे हैं। हम कॉस्मॉस की टक्कर का कोई कार्यक्रम नहीं बना पाए। विदेशों में स्कूली बच्चों से लेकर शिक्षित वयस्कों के लिए भी संगठन हैं। हमारे यहां डाऊशेज म्यूजियम या स्मिथसोनियन जैसा कोई संग्रहालय नहीं हैं। यद्यपि भारत के राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद् (एनसीएसएम) का इस दिशा में अवश्य अच्छा योगदान है। ईमानदारी से विज्ञान-संचार प्रतिभाओं को पहचाने जाने की भी आवश्यकता है। जो शोध नहीं कर सकता, उससे विज्ञान संचार करा लें वाली सोच से उद्धार नहीं होगा। इसी तरह जो शोध अच्छी करेगा, विज्ञान संचार भी अच्छा करेगा, यह अनिवार्य नहीं है। शोध संस्थानों में सोच बदलने की आवश्यकता है। हमें यह बात समझनी होगी कि जनसंपर्क तथा विज्ञान लोकप्रियकरण एक ही नहीं है। एनसीएसएम के केंद्रों को विज्ञान संचार के हब की तरह विकसित करना चाहिए पर इसके लिए वहां अच्छे स्तर के वैज्ञानिक पृष्ठभूमि के और अधिक व्यक्तियों की आवश्यकता होगी। यह भी समझा जाना चाहिए कि विज्ञान संबंधी लेखन के उद्देश्य भिन्न-भिन्न हो सकते हैं जैसे जानकारी देना, सोच बदलना, जिज्ञासा शांत करना, प्रकृति की व्याख्या करना, जीवन सरल करना, जानकारी के साथ निर्णय लेने में सहायता करना इत्यादि। उद्देश्य तथा लक्षित समूह के सम्बन्ध में सोच की स्पष्टता आवश्यक है। पचास वर्ष पहले की तुलना में आज प्रबुद्ध वर्ग में सक्रियता 65 साल की आयु के बाद भी काफी है और आम तौर पर आर्थिक सम्पन्नता भी। इस ऊर्जा को भी टैप किया जाना चाहिए।

आप हाल में एक वैज्ञानिक के रूप में लम्बी सेवा के बाद बीरबल साहनी पुराविज्ञान अनुसंधान संस्थान (ठैप्च्) से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपको देखकर नहीं लगता कि आपकी आयु 60 वर्ष है। सेवानिवृत्ति के बाद आप अपने को कैसे सक्रिय रखते हैं?
वृद्ध न लगने के आनुवंशिक के साथ शारीरिक एवं मानसिक कारण होते हैं। मेरा मानना है कि सोच सकारात्मक और जीवन सरल रखना चाहिए। मैं अब भी काफी सक्रिय हूँ। सेवानिवृत्ति के बाद समय के बंधन कम हो गए हैं जिससे रचनात्मक कार्य अधिक हो पा रहे हैं। इस वर्ष 3 शोधपत्र प्रकाशित हुए हैं और पत्र-पत्रिकाओं एवं रेडियो, टी.वी. के लिए लेखन चल रहा है। उत्तर प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद सहित देश की अनेक लोकविज्ञान संस्थाओं की कई समितियों से जुड़ा हूँ। इस साल 30 से अधिक व्याख्यान देश के अनेक हिस्सों में दिए हैं। एक पी-एच.डी. प्रबंध का मूल्यांकन कर रहा हूँ तथा एक विश्वविद्यालय के बोर्ड ऑफ स्टडीज जैसे शैक्षिक सहयोग भी दे रहा हूँ। उत्तर प्रदेश की शैल चित्र समिति का संयोजक हूँ। विज्ञान प्रसार और एनसीएसटीसी की कुछ फिल्म तथा लेखन प्रशिक्षण कार्यशालाओं से जुड़ा हूँ। इन सब के बीच एक विज्ञान पुस्तक का लेखन भी चल रहा है। पिछले एक महीने में ही 8 व्याख्यान दे चुका हूँ, अनेक प्रदर्शनी में प्रोजेक्ट चयन, चयन समिति आदि रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रहा हूँ। कुल मिलाकर कहूँ तो मेरी व्यस्तता बिलकुल कम नहीं हुई है!  


सोशल मीडिया के माध्यम से विज्ञान संचार के प्रसार और प्रभाव पर आपके क्या विचार हैं?
सोशल संचार माध्यम बहुत प्रभावी हैं पर विज्ञान के लिए इसके उपयोग में हम पिछड़ रहे हैं। यद्यपि कुछ ऐसी साइट हैं जिनको बहुत लोग देख रहे हैं। मुझे लगता है कि सरल संवाद के इस युग में किसी संस्था के द्वारा वैज्ञानिकों एवं विज्ञान संचारकों को एक मंच पर लाकर उनके ज्ञान को दूसरे लोगों को उपलब्ध करना चाहिए। ऐसे बहुत से अवकाश प्राप्त या फ्री-लांस विशेषज्ञ होंगे जो जुड़ना चाहेंगे। नेट पर ‘यूनिवर्स टुडे’, ‘हाव स्टफ वर्क्स’ जैसी साइट हैं तो नासा तथा अमरीकी वैज्ञानिक सर्वे जैसी सरकारी संस्थाओं के भी वेबसाइट हैं। हम काफी पीछे हैं। इसमें शोध संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण है। जिस भी संस्था में संग्रहालय है उसे वर्चुयल रूप में संस्था की वेबसाइट पर होना चाहिए। इस संबंध में सम्बद्ध मंत्रालय-विभाग अपने अधीन संस्थाओं को निर्देश दे सकते हैं।

भारतीय विज्ञान संचार के भविष्य को आप किस तरह देखते हैं?
मुझे आशा है कि निराशा हाथ नहीं लगेगी ! पर केवल संचारकों को अधकचरा प्रशिक्षण देकर काम नहीं चलने वाला है। गहन प्रशिक्षण तथा रोजगार के अवसर बढ़ाना भी आवश्यक है।

देश के युवा वैज्ञानिकों और विज्ञान संचारकों के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
विज्ञान संचार समाज की चिंतन तथा बौद्धिक क्षमता में इजाफा करता है। अगर वैज्ञानिक हैं तो जुनून के साथ शोध करिए। अगर मन से करेंगे तो उसमें मजा आएगा और नतीजे के रूप में देश की वैज्ञानिक प्रगति होगी। आप चाहे शोधकर्ता हैं या संचारक, समाज के लिए अपना कर्तव्य समझते हुए विज्ञान लोगों तक भी ले जाइए। यदि लोगों से आप अपने शोध की बात करेंगे तो समय व्यर्थ नहीं होगा, बल्कि उस शोध को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझने का अवसर मिलेगा। बिना प्रतिफल की आशा के विज्ञान संचार कीजिए। यह आप पर समाज का ऋण है जो आपको चुकाना चाहिए और सरकार के लिए भी: विज्ञान संचार की प्रतिभाओं को ईमानदारी से पहचाने जाने की भी आवश्यकता है। प्रतिभाएं केवल महानगरों में नहीं होतीं !

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