विशेष

(19/Mar/2017)

विज्ञान, आसपास के संसार का ज्ञान है

बाल विज्ञान लेखिका डॉ. मधु पंत से मनीष मोहन गोरे की बातचीत

डॉ. मधु पंत को डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे महान साहित्यकार शिक्षक के रूप में मिले जिनके सानिध्य और शिक्षण ने उसके व्यक्तित्व को समृद्ध किया। विज्ञान स्नातक के बाद हिंदी साहित्य में एम.ए. और पी-एचडी. की शिक्षा ग्रहण करने के दौरान ही रुझान कविता और गीत लेखन की तरफ हो गया। प्रकृति और विज्ञान से सहज लगाव होने के नाते ने विज्ञान में गीतों की रचना की जो बच्चों में सहज ही विज्ञान के प्रति जिज्ञासा पैदा करते हैं। डॉ. पंत दिल्ली स्थित राष्ट्रीय बाल भवन की करीब 17 वर्षों तक निदेशक रहीं और इस दौरान उन्होंने बच्चों में सृजनशीलता और नवाचारी शिक्षण के विकास के निमित्त अनेक विशेष योजनाओं का सूत्रपात किया।
बच्चों में वैज्ञानिक प्रयोग-अन्वेषण की अलख जगाने वाले राष्ट्रीय मंच राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस का लोकप्रिय गीत ‘हम नन्हें विज्ञानी है’ की लेखिका और कोई नहीं डॉ. मधु पंत ही हैं। डॉ. मधु बच्चों और किशोरों को लक्ष्य करके अपनी रचनाएँ लिखती हैं जो उन्हें (बच्चों को) प्रकृति व पर्यावरण संरक्षण के प्रति संवेदनशील बनाती हैं। बाल-केंद्रित विज्ञान लेखन के लिए डॉ. मधु पंत को अनेक पुरस्कारों से सम्मानित भी किया गया है। उनकी प्रेरणादायी फिल्म ‘विज्ञान क्या है?’ के लिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय एन.एच.के. अवार्ड तथा नार्वे के पर्यावरण सम्मेलन में उनकी कविता ‘पानी की कहानी’ के लिए पहला पुरस्कार प्रदान किया गया है। 
डॉ. मधु का मानना है कि बच्चों के माध्यम से किसी संदेश, शिक्षा या भावना का संचरण बेहद प्रभावी और व्यापक होता है। इसलिए पर्यावरण संबंधी विज्ञान गीतों का लेखन कर डॉ. मधु ने उनकी ऑडियो सीडी और पुस्तक देश के 5000 स्कूलों में वितरित किये। भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने बच्चों में विज्ञान व प्रौद्योगिकी की भावना को लोकप्रिय बनाने हेतु उनके प्रयासों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से भी उन्हें सम्मानित किया है। बच्चों के लिए विज्ञान लेखन करने वाली इस रचनाकार के रचना संसार को जानते हैं इस बातचीत के जरिये।

आप एक संवेदनशील और प्रकृति प्रेमी विज्ञान लेखिका हैं। आपने बच्चों और किशोरों को अपना लक्ष्य बनाकर लोकविज्ञान साहित्य का सृजन किया है। आपको इस क्षेत्र विशेष में अपना योगदान देने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
मैंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से बी.एस.सी. करने के बाद हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिंदी साहित्य) और कानपुर विश्वविद्यालय से पी-एचडी. की शिक्षाएं पूरी कीं। हिंदी साहित्य के अध्ययन ने मुझमें साहित्य के प्रति एक रुझान पैदा किया। यद्यपि गीत तो मैं पहले ही लिखती थी। मैंने विज्ञान स्नातक की शिक्षा भी ग्रहण की थी और अपने आस-पास के पर्यावरण को लेकर मेरे मन में विज्ञान गीतों को लेकर एक सहज भाव आता था। इसलिए जन सामान्य और खास तौर पर बच्चों के लिए विज्ञान साहित्य सृजन आरम्भ किया। मेरा मानना है कि इस ओर कदम बढ़ाने की प्रेरणा मुझे प्रति और अपने विद्वान शिक्षकों से मिली।

बाल मन पर शिक्षक के प्रभाव को लेकर आपकी क्या राय है? आपके दौर और वर्तमान शिक्षा को लेकर भी आपका बहुमूल्य विचार हमारे पाठक जानना चाहेंगे।
शिक्षा बच्चे के भावी व्यक्तित्व का निर्माण करती है। इसलिए शिक्षक को कुम्हार की संज्ञा दी जाती है। शिक्षक बच्चों को समाज और देश का एक सुयोग्य नागरिक बनाने में अपनी अहम भूमिका निभाते हैं। मेरे बचपन और युवावस्था के दिनों में शिक्षा तथा शिक्षक दोनों ही बेहद महत्वपूर्ण हुआ करते थे। उस दौर की और मौजूदा शिक्षा में कई मायने में अंतर देखने को मिलता है। मुझे सौभाग्य से डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी सरीखे हिंदी के विद्वान साहित्यकार गुरु के रूप में मिले जिनके व्यक्तित्व, ज्ञान और विद्वता ने मुझे बहुत प्रभावित किया। मेरे भौतिकी के शिक्षक रहे ए.आर. वर्मा से भी मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। हमारे जमाने में शिक्षक विद्यार्थियों को अच्छे अंक मिले, इस बात को लेकर चिंतित नहीं रहते थे। उनका फोकस इस ओर होता था कि विद्यार्थी को विषय कितना समझ में आया। इस दिशा में आज गंभीरता के साथ विचार किया जाना जरूरी है। रही बात विद्यार्थी की तो ज्ञान उसे ही ग्रहण करना है इसलिए उसे सुग्राही होना अत्यंत आवश्यक है। आखिर विद्यार्थियों को भी समाज और देश की तरक्की के प्रति अपने सरोकारों को समझना होगा।

विज्ञान शिक्षा की आवश्यकता और इस दिशा में नये प्रयोगों की गुंजाइश को लेकर आपका क्या मत है?
विज्ञान दरअसल हमारे आस-पास के संसार का ज्ञान होता है। हम प्रकृति की घटनाओं के प्रति जितने अधिक जिज्ञासु होंगे, हमें विज्ञान उतना ही ज्यादा रोचक और सरस जान पड़ेगा। बच्चों में वैज्ञानिक प्रवृत्ति के विकास और पोषण के लिए प्रयोग एवं गतिविधियों पर आधारित विज्ञान शिक्षा की आज दरकार है। इस ओर अच्छे खासे प्रयास सरकारी और गैर सरकारी स्तरों पर लगातार हो रहे हैं।

माता-पिता वास्तव में स्कूल और बच्चों के बीच सेतु के समान होते हैं। आज के तेजी से बदलते समाज में इस कड़ी को अपनी भूमिका का निर्वहन किस तरह करना चाहिए कि सामाजिक-राष्ट्रीय चुनौतियों के सामने हमारे कल के कर्णधारों का व्यक्तित्व निर्माण समग्रता के साथ हो सके?
यह एक बड़ी चुनौती आज हम सबके सामने है। विज्ञान, इतिहास, भूगोल जैसी ज्ञान की शाखाएं बच्चों के ज्ञान का दायरा बढाती हैं। शिक्षक और बच्चों के बीच में माता-पिता एक ऐसी अहम कड़ी है जो संजीदगी से अपनी भूमिका निभाए तो समाज में बड़े बदलाव लाये जा सकते हैं। यह कड़ी बच्चों को नैतिकता और जीवन मूल्यों से जोड़ने का महत्वपूर्ण काम करती है। आजकल महानगरों और शहरी जनजीवन में एकल परिवार की प्रधानता है। ऐसे में बच्चों के प्रति माता-पिता की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। यहाँ स्कूल और शिक्षकों की भूमिका भी समान रूप से बड़ी है। 

प्राकृतिक और पर्यावरण विनाश के कारण हमारे सामने शुद्ध हवा-पानी की किल्लत, प्रदूषण और जंगलों का विनाश जैसी अनेक समस्याएं खड़ी हो गई हैं। हम मनुष्य इन समस्याओं को उत्पन्न करने के लिए जिम्मेदार हैं और इनके समाधान भी हमारे ही हाथ में हैं। बच्चों को किस तरह समाधान की दिशा में प्रेरित किया जा सकता है?
बच्चों को प्रति और पर्यावरण से जोड़ना तथा उनके प्रति संवेदनशील बनाना सहज कार्य है। मगर मेरी चिंता मेरे-आपके जैसे गंभीर नागरिकों और माता-पिता से जुड़ी हुई है। हम इतने समझदार हैं कि खराब नतीजों को जानते हुए भी प्रकृति को नुकसान पहुँचाते हैं। हम अपनी आदत कैसे बदलेंगे? यह बड़ा सवाल है। प्रति संरक्षण को लेकर नागरिकों और माता-पिताओं की कार्यशालाएँ कराने की मुझे आज जरूरत दिखाई देती है।
 
बच्चों की नैसर्गिक जिज्ञासु प्रवृत्ति उनकी शक्ति होती है। देखा जाता है कि घर या स्कूल में बच्चों की इस प्रवृत्ति को उचित प्रोत्साहन नहीं मिलने से उनकी प्रतिभा निखर नहीं पाती। इस ओर आपका क्या सुझाव है?
बच्चे प्रारंभ से ही अपने आस-पास की घटनाओं को लेकर जिज्ञासु होते हैं और प्रश्न करना उनका स्वभाव होता है। प्रश्न करने के बाद जब उन प्रश्नों के सही जवाब उन्हें मिलते हैं तो उनका बौद्धिक विकास होता है। इसलिए माता-पिता हों या शिक्षक दोनों को बच्चों के इस स्वाभाविक प्रश्न पूछने के स्वभाव को हतोत्साहित नहीं बल्कि प्रोत्साहित करना चाहिए।  वाट्सएप जैसे नये संचार माध्यमों का सहारा लेकर बच्चों को छोटी-छोटी शिक्षाप्रद कहानियाँ सुनाई जानी चाहिए जिनके द्वारा उन्हें अच्छे सबक मिलें और उनमें मानवीय, नैतिक तथा वैज्ञानिक मूल्यों का विकास हो। 

कहानियों के द्वारा बच्चों में मानवीय, नैतिक और वैज्ञानिक मूल्यों के संवर्धन का आपने एक बेहतर विचार सामने रखा। बाल कहानी के अलावा विज्ञान कथा भी एक उत्तम संचार विधा है। अब विचारणीय बात यह है कि बाल कहानी और विज्ञान कथा लिखने वालों की संख्या एवं उनका प्रभाव कैसे बढ़ाया जाए?
बेहद अहम मुद्दा आपने उठाया मनीष जी! बच्चों में नैतिकता के साथ-साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के लिए जन विज्ञान आंदोलन जैसे अभियान की रूप-रेखा तय की जा सकती है। फेसबुक और वाट्सएप विज्ञान जैसे अभियान शुरू किये जाएं। इन मंचों से बाल कहानीकारों और विज्ञान कथाकारों को चिह्नित करना तथा नए लेखकों को तैयार करना संभव हो सकेगा।

कहानी, गीत और विज्ञान कथाओं के माध्यम से विज्ञान संचार को बढ़ावा देने के लिए आपकी दृष्टि में सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं को क्या करना अच्छा होगा?
संस्थाओं को खुलकर आगे आना चाहिए और कहानी, गीत एवं विज्ञान कथा जैसी सशक्त संचार विधाओं को प्रोत्साहन देना चाहिए। इस प्रकार के साहित्य का संरक्षण भी इसके प्रसार जितना ही ज़रूरी है इसलिए हमें इनका डाक्यूमेंटेशन भी करना चाहिए।

आपने विज्ञान गीत लिखा है और बच्चों के मन पर इनका विशेष प्रभाव देखने को मिला है। विज्ञान गीतों के महत्त्व और प्रेरणा के बारे में हमारे पाठकों को कुछ बताएं।
गीत में कही गई बात बच्चों के मन की गहराई तक पहुँचती है। विज्ञान गीत कविता के द्वारा विज्ञान के संदेश को आगे ले जाने का दायित्व भी निभाता है। मेरा सुझाव है कि यदि देश के सभी स्कूलों की मार्निंग असेंबली में आधे घंटे विज्ञान गीत गाए जाएं तो इससे बड़ा परिवर्तन आ सकता है। एक साथ मिलकर बच्चे विज्ञान गीत गाएंगे तो उनमें सामाजिकता (एक साथ मिलकर रहने) और आत्मिक अनुशासन के अलावा वैज्ञानिक संस्कृति की भावना का भी विकास होगा।

आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा। बाल साहित्य लेखन और विज्ञान गीत पर इस सार्थक संवाद के लिए आपको ‘इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए’ परिवार की ओर से हार्दिक धन्यवाद ! 
आपको और ‘इलेक्ट्रॅानिकी आपके लिए’ परिवार को भी मेरी ओर से धन्यवाद एवं शुभकामनाएं।


mmgore1981@gmail.com