विशेष

(20/Jun/2016)

विज्ञान लोकप्रियकरण में हिन्दी सबसे उपयुक्त भाषा

डॉ. षिवगोपाल मिश्र से मनीष मोहन गोरे की बातचीत

 

विज्ञान संचार या लोकप्रियकरण की उपादेयता स्वयंसिद्ध है। जन-जन को वैज्ञानिक भावना से अवगत कराने के लिए विज्ञान संचार या उसका लोकप्रियकरण ही एकमात्र साधन है। लोकप्रिय शैली में जितना ही अधिक विज्ञान साहित्य रचा जायेगा, देश की जनता उतना ही अधिक जागृत होगी और लाभान्वित हो सकेगी।

 

डॉ. साहब, आप मूलतः मृदा-विज्ञानी और प्राध्यापक रहे हैं, फिर विज्ञान लेखन और उसके लोकप्रियकरण की  ओर आपका झ्ाुकाव कैसे हुआ? क्या कोई प्रेरणा चेतन अथवा अवचेतन में रही?

मनीष जी, यह सच है कि मैं मृदाविज्ञानी और अध्यापक रहा हूँ। अतः अध्यापक होते हुए ही मैंने अपना कर्तव्य समझा कि जनसामान्य को भी मृदा विज्ञान के विषय में समझाऊँ। भले ही मैं छात्रों को नित्य-प्रति मृदा विषयक शिक्षा देता रहा हूँ। मैं यह बता दूँ कि मृदा विज्ञान अति रोचक विषय है यदि उसे ठीक से प्रस्तुत किया जाए। भारत एक कृषि प्रधान देश है। अतः कृषकों को मृदा (मिट्टी) का सही-सही ज्ञान होना अत्यावश्यक है। 
मैं जानता था कि हमारे कृषक भले ही भूमि (पृथ्वी) को माता कहकर प्रणाम करते हों, उस पर खेती करते हों किंतु वे उसके विषय में बहुत कम जानते हैं। पृथ्वी को आदर देना ही काफी नहीं। पृथ्वी की ऊपरी सतह यानी मिट्टी को जानना परमावश्यक है। फलतः मैंने एम.एस-सी. उत्तीर्ण करते ही अपने जनपद के एक पाक्षिक अखबार ‘पंचदूत’ में लगातार मिट्टी, उसकी संरचना, उसकी उर्वरता, खादों के विषय में हिंदी में लेख लिखना शुरू कर दिया था। मैं स्वयं गांव का रहने वाला था अतः अपने जनपद के किसानों के लिए हिंदी में यह सारा ज्ञान लिख-लिख कर प्रकाशित कराता रहता। मुझे लगा कि जब अवसर मिला है तो क्यों न अपने जनपद के किसानों का हित करूं। यदि वे मिट्टी के विषय में सही ज्ञान पा लेंगे तो उनका उद्धार हो सकेगा। वे दीन-हीन दशा में नहीं रहेंगे - वे अपने खेतों से भरपूर उपज ले सकेंगे। 
मैंने उन्हें घाघ भड्डरी की कहावतों में छिपे विज्ञान से भी अवगत कराने का प्रयास किया। इतना ही नहीं, इस लेखन से प्रेरित होकर मैंने पहली पुस्तक ‘भारत में कृषि का विकास’ लिख डाली। मृदा विज्ञान को लोकप्रिय बनाने का मेरा यह पहला प्रयास था और आपको जानकर खुशी होगी कि मेरी इस पुस्तक पर स्वामी हरिशरणानंद पुरस्कार मिला, जिसमें एक रजत पदक तथा 1100/- रुपए नकद राशि थी। इसके पश्चात् ‘माटी का मोल’, ‘मृदा परिचय’ जैसी पुस्तकें भी लिखीं। बस यहीं से हिंदी में मेरा विज्ञान लेखन शुरू हो गया।

आपने हिंदी के महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के साथ भी काम किया है। 
हिंदी साहित्य और लोक विज्ञान साहित्य में आप क्या साम्य पाते हैं?

1950 ई. में ही मैं हिंदी के विख्यात छायावादी कवि पं. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी के संपर्क में आ चुका था। उनके पास जाने पर मुझे लगा कि हिंदी साहित्य विषयक मेरा ज्ञान अत्यल्प है अतः मैंने हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग की ‘विशारद’ तथा ‘साहित्यरत्न’ की हिंदी परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं। इससे मुझे लाभ हुआ। मेरी पैठ हिंदी साहित्य में हो सकी और जब इलाहाबाद में मैं लेक्चरर नियुक्त हुआ तो हिंदी में काम करने के लिए विख्यात संस्था ‘विज्ञान परिषद्’ से मेरा संबंध जुड़ा। इसका भवन म्योर सेंट्रल कॉलेज परिसर में ही था। डॉ. सत्यप्रकाश मेरे अध्यापक भी रह चुके थे और अपनी भारतीयता तथा हिंदी प्रेम के लिए जाने जाते थे। उन्होंने पहले मुझे ‘विज्ञान’ मासिक पत्रिका में लिखने और फिर ‘विज्ञान परिषद् अनुसंधान पत्रिका’ हेतु आए शोधपत्रों को संपादित करने के लिए प्रोत्साहित किया। इतना ही नहीं, कुछ वर्षों बाद मेरे हिंदी प्रेम से परिचित होने पर उन्होंने ॅमंसजी व िप्दकपं के हिंदी अनुवाद ‘भारत की संपदा’ के संपादनार्थ सी. एस.आई.आर.के अंतर्गत पी.आई.डी. (पब्लिकेशन्स एवं इन्फार्मेशन डाइरेक्टरेट) में ‘हिंदी विशेष अधिकारी’ के रूप में भेजा। वे सी.एस.आई.आर. के तत्कालीन महानिदेशक डॉ. आत्माराम के गुरुभाई थे। डॉ. आत्माराम भी मेरे हिंदी अनुराग से परिचित हो चुके थे। वहां पर दो वर्षों तक लगातार अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद करते तथा अनूदित सामग्री का संशोधन करते-करते पारिभाषिक शब्दावली से मेरा अंतरंग परिचय हो गया।
आप यह जानना चाहते हैं कि हिंदी साहित्य तथा लोक विज्ञान साहित्य में क्या साम्य है? भारत देश में हिंदी को ‘निज भाषा’ बनाने का स्वप्न भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र का था। निज भाषा की उन्नति के बिना भारत की उन्नति असंभव थी। ऐसी स्थिति में विज्ञान को लोकप्रिय बनाने, उसे जन-जन के लिए सुलभ बनाने में हिंदी सर्वाधिक उपयुक्त भाषा हो सकती थी। इसी उद्देश्य से इलाहाबाद में 1913 में विज्ञान परिषद की स्थापना हो चुकी थी। किंतु विज्ञान की भाषा हिंदी बने, इसके लिए हिंदी का शास्त्रीय ज्ञान आवश्यक था। डॉ. सत्यप्रकाश, डॉ. गोरख प्रसाद, डॉ. फूलदेव सहाय वर्मा तथा डॉ. ब्रजमोहन अपने हिंदी अनुराग के बल पर ही विज्ञान के पारिभाषिक कोश निर्माण में सहयोग दे सके जिससे विज्ञान लोकप्रियकरण में हिंदी साधक बन सकी। मुझे अपने हिंदी ज्ञान तथा उपर्युक्त विद्वानों की संगति का जो लाभ मिला, वह अकथनीय है। उन्होंने अपना सारा जीवन हिंदी में विज्ञान अवतरण हेतु लगा दिया और मैं यह कह सकता हूं कि मैं तथा मेरे ही समान दिल्ली के कई विज्ञान लेखकों ने विज्ञान लोकप्रियकरण हेतु जो भी हो सकता था, करते रहे हैं। मुझे प्रसन्नता है कि हम लोगों के हिंदी प्रेम ने हिंदी को विज्ञान की भाषा बना डाला है।

भारत देश में हिंदी को ‘निज भाषा’ बनाने का स्वप्न भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र का था। निज भाषा की उन्नति के बिना भारत की उन्नति असंभव थी। ऐसी स्थिति में विज्ञान को लोकप्रिय बनाने, उसे जन-जन के लिए सुलभ बनाने में हिंदी सर्वाधिक उपयुक्त भाषा हो सकती थी। इसी उद्देश्य से इलाहाबाद में 1913 में विज्ञान परिषद की स्थापना हो चुकी थी। 

हिंदी को आपने अपने लेखन की भाषा के रूप में क्यों चुना?

आप जानना चाहते हैं कि मैंने हिंदी को ही अपने लेखन की भाषा क्यों चुना? यदि मैं चाहता तो लेखन कार्य अंग्रेजी में कर सकता था किंतु मैं जान चुका था कि मेरे पीछे आने वाली पीढ़ी की अंग्रेजी कमजोर है, विशेषकर कृषि विज्ञान के छात्रों की। मैं अपनी कक्षा में छात्रों को अंग्रेजी तथा हिंदी दोनों ही भाषाओं में पढ़ाता था और उन्हें हिंदी में ही उत्तर लिखने के लिए प्रेरित करता था। आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि मेरे कई छात्र आगे चलकर अच्छे हिंदी विज्ञान लेखक बने। मुझे प्रसन्नता होती है कि उन्होंने मेरा अनुकरण किया है तो वे घाटे में नहीं रहे। उनके द्वारा हिंदी में रची गई पुस्तकें पुरस्कृत हुई हैं और वे हिंदी आंदोलन में हम सबों के साथ हैं। वे भी गर्व से कह सकते हैं कि हम हिंदी के समर्थक ही नहीं हिंदी के लेखक हैं। अब साहित्य और विज्ञान की सीमाएं टूट चुकी हैं - विशेषकर सूचना प्रौद्योगिकी के आगमन से विज्ञान तथा साहित्य निकट आए।


आपने हिंदी भाषा में स्वयं विज्ञान लेखन किया और विज्ञान प्रसार तथा समीक्षा भी।
आप इस विज्ञान मुहिम में किस निष्कर्ष पर पहुँचे?

आप मेरे द्वारा ‘विज्ञान प्रसार’ के लिए ‘विज्ञान लेखन के सौ वर्ष’ (दो खंड) का सम्पादन किये जाने का उल्लेख करते हुए यह जानना चाहते हैं कि इस सम्पादन से कौन-कौन से निष्कर्ष प्राप्त हुए। देखिये, यह कार्य एक प्रोेजेक्ट के रूप में पूरा करना था। इसके लिए मैंने एक शोध सहायक रखा था। वह मेरा ही छात्र था। मैंने हिन्दी में प्रकाषित तमाम पत्रिकाओं से 160 लेखों का चयन किया। जिन्हें मैं प्रतिनिधि कह सकता था। मुझे हर्ष है कि मेरे द्वारा सम्पादित दो खंडों में ऐसी प्रतिनिधि वैज्ञानिक सामग्री, जो विगत सौ वर्षों में मुद्रित हो चुकी थी, पाठकों तथा समीक्षकों के समक्ष प्रस्तुत की जा सकी।
इसके पूर्व ऐसा ऐतिहासिक कार्य सम्पन्न नहीं हुआ था। आलोचकों की दृष्टि में इसे हिन्दी में विज्ञान लेखन का इतिहास विषयक सर्वाधिक प्रामाणिक दस्तावेज कह सकते हैं। मेरी दृष्टि में इस संकलन से विज्ञान की विविधता, हिन्दी भाषा के स्वरूप एवं उसके विकास तथा पारिभाषिक शब्दों की व्यवहार्यता पर प्रकाश पड़ा है। हिन्दी के नये विज्ञान लेखकों को इन दोनों खण्डों का पारायण करना चाहिए। इससे उनकी भाषा और शैली को नया प्रकाश मिल सकेगा।

भारत में हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञान लेखन-संचार की पूर्व की तथा 
मौजूदा स्थितियों को आप किस रूप में देखते हैं?

भले ही हिन्दी राष्ट्रभाषा से राजभाषा बनी हो किन्तु इसमें अभी तक जो वैज्ञानिक साहित्य उपलब्ध है वह बंगला, मराठी तथा तमिल जैसी क्षेत्रीय भाषाओं की तुलना में कमतर है। इसका कारण यह है कि इन तीन क्षेत्रीय भाषाओं में हिन्दी की तुलना में काफी समय पूर्व से विज्ञान लेखन होता रहा है और उनकी पाठक संख्या काफी अधिक रही है। बंगला तथा मराठी में विश्वकोशों की रचना बहुत पहले हो चुकी थी। उनमें विविध विधाओं में लेखन हो रहा था और उनमें पारिभाषिक शब्दों को लेकर हो हल्ला नहीं हुआ था। उन्हें अपने निर्मित पारिभाषिक शब्दों पर गर्व था फलतः वे आज भी भारत सरकार द्वारा तैयार की गई पारिभाषिक शब्दावली का अक्षरशः पालन नहीं कर रहीं। उन्होंने संस्कृत-आधारित शब्दावलियां पहले से अपना रखी थीं। भाषा के सरलीकरण का उनमें कभी आन्दोलन नहीं चला। 
    हिन्दी प्रदेशों के राजनेता सस्ती लोकप्रियता के फेर में प्रायः स्वीकृत पारिभाषिक शब्दावली को कठिन कहकर उसे सरल बनाने की सलाह देने लगते हैं। वे भूल जाते हैं कि विज्ञान विशेष प्रकार का ज्ञान है, वह शास्त्र है अतः उसकी शास्त्रीय शब्दावली है जिसे अपना कर ही आगे बढ़ा जा सकता है। उसके सरल या कठिन होने का प्रश्न ही नहीं उठता। यदि हमारे छात्र अंग्रेजी और लैटिन शब्दों को ग्रहण कर सकते हैं तो हिन्दी विज्ञान के पारिभाषिक पर्यायों को क्यों नहीं ?

अभी तक जो वैज्ञानिक साहित्य उपलब्ध है वह बंगला, मराठी तथा तमिल जैसी क्षेत्रीय भाषाओं की तुलना में कमतर है। इसका कारण यह है कि इन तीन क्षेत्रीय भाषाओं में हिन्दी की तुलना में काफी समय पूर्व से विज्ञान लेखन होता रहा है और उनकी पाठक संख्या काफी अधिक रही है। बंगला तथा मराठी में विश्वकोशों की रचना बहुत पहले हो चुकी थी। 

भारत के सन्दर्भ में विज्ञान संचार या लोकप्रियकरण की उपादेयता को 
आप कैसे व्याख्या करना चाहेंगे?

विज्ञान संचार या लोकप्रियकरण की उपादेयता स्वयंसिद्ध है। जन-जन को वैज्ञानिक भावना से अवगत कराने के लिए विज्ञान संचार या उसका लोकप्रियकरण ही एकमात्र साधन है। लोकप्रिय शैली में जितना ही अधिक विज्ञान साहित्य रचा जायेगा, देश की जनता उतना ही अधिक जागृत होगी, लाभान्वित हो सकेगी। विज्ञान का वातावरण व्यापक बने, इसके लिए विज्ञान संचार या लोकप्रियकरण ही सर्वश्रेष्ठ साधन है।

वर्तमान में विज्ञान संचार और लेखन में आपकी अनुभवी दृष्टि क्या प्रमुख चुनौतियाँ देखती हैं और क्या आपको लगता है कि सरकारी एजेंसियाँ इन्हें पहचानकर कोई ठोस कदम उठा रही हैं?

आप जानना चाहते हैं कि वर्तमान समय में विज्ञान संचार एवं लेखन के समक्ष कौन सी प्रमुख चुनौतियाँ हैं। इसे मैं इस तरह से कहना चाहूँगा कि हमने पारिभाषिक शब्दावली निर्माण करके और उसे सर्वसुलभ बनाकर पहले ही प्रमुख चुनौती पर विजय प्राप्त कर ली है। चुनौतियाँ पहले भी थीं और आगे भी रहेंगी किन्तु वे पारिभाषिक शब्दों को लेकर नहीं होंगी-अर्थात् भावाभिव्यक्ति में अब कोई अवरोध नहीं आ सकेगा। अब जो चुनौतियाँ होंगी वे विज्ञान की प्रगति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलनेे की होंगी। नित्य नये-नये आविष्कार हो रहे हैं, नये-नये सिद्धान्त प्रतिपादित हो रहे हैं। ऐसी स्थिति मंे हिन्दी में समस्त ज्ञान के अवतरण के लिए जरूरी होगा कि विश्व के किसी भी कोने में जो नई-नई खोजें हो रही हैं, उन्हें हिन्दी से लाया जाय, हिन्दी के विज्ञान लेखक सतत जागरूक रहें और ज्ञान में अभिवृद्धि करने के लिए उद्यत रहें। विश्व की अन्य भाषाओं में ऐसा ही हो रहा है। 
    अब हिन्दी को विश्व की प्रमुख भाषाओं-जापानी, रूसी से स्पर्धा करनी होगी। अतः विज्ञान लेखकों को कुछ अन्य भाषाएँ भी सीखने एवं अन्य भाषाओं से हिन्दी में अनुवाद करने की क्षमता विकसित करनी होगी। केवल अंग्रेजी के ज्ञान से अब काम नहीं चलेगा। मुझे नहीं लगता कि कोई भी सरकारी एजेन्सी इस कार्य को पूर्णनिष्ठा से कर पायेगी। व्यक्तिनिष्ठ प्रयास ही कारगर साबित होंगे।

आपके अनुसार कौन सी विधा विज्ञान संचार के लिए सर्वोपयुक्त है?

विज्ञान संचार के लिए सर्वोपयुक्त विधा हिन्दी आलेख अथवा निबंध विधा हैं। विज्ञान कथा या विज्ञान कविता कभी भी पुष्ट निबंधों का स्थान नहीं ले सकेंगी।

लम्बे समय से हिंदी विज्ञान पत्रिका के संपादक के रूप में कार्य करने के बाद आप 
विज्ञान पत्रिकाओं के प्रकाशन की दिशा में क्या संभावनाएँ देखते हैं?

विज्ञान पत्रिकाओं के प्रकाशन की दिशा में सम्भावनाओं की तलाश करना हितकर होगा किन्तु इसके पूर्व जितनी भी विज्ञान पत्रिकाएँ सम्प्रति प्रकाशित हो रही हैं, उन्हीं में कुछ परिष्कार करके उनकी पाठक संख्या बढ़ाकर नये-नये लेखकों को प्रोत्साहन देने का कार्य किया जाना चाहिए। किसी नई पत्रिका के प्रकाशन हेतु धन चाहिए, पाठक समुदाय चाहिए और चाहिए अनुभवी सम्पादक। ऐसा नहीं लगता कि नई-नई पत्रिकाएं शुरू करने के लिए धन तथा सम्पादक दोनांे ही एक साथ उपलब्ध हो सकंेगे। फिलहाल जमी-जमाई पत्रिकाओं के स्तर में पृष्ठ संख्या और विषयवस्तु में वृद्धि करना श्रेयस्कर होगा। जो लोग सोचते हैं कि तड़क-भड़क वाली पत्रिकाएं चिरस्थायी बन सकेंगी वे स्वप्नलोकचारी हैं। क्यों न हम ‘नेचर’ पत्रिका का अनुकरण करें। अपनी पत्रिकाएं हैं। उनकी पाठक संख्या बढ़ाकर अभीष्ट प्राप्त किया जा सकता है। खरीदकर पढ़ने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देना छात्रों के लिए विज्ञान पत्रिकाओं का ग्राहक बनना अनिवार्य करना होगा।  

विज्ञान लोकप्रियकरण से जुड़ी ऐसी कौन सी योजना या कार्य है जिसे पूरा करना चाहेंगे?
विज्ञान लेखन-संचार के क्षेत्र में आपकी भावी योजना यें क्या हैं?

यह सच्चाई है कि विगत 60 वर्षों से मैं विज्ञान लेखन तथा सम्पादन के क्षेत्र से जुड़ा रहा हूँ। मैंने लगातार प्रयत्न किया है कि उन क्षेत्रों में विज्ञान लेखन हो जो अभी रिक्त हैं। मैं इस पक्ष का समर्थक हूँ कि लगकर ग्रन्थों का हिन्दी अनुवाद किया जाय। हिन्दी में विज्ञान के कोश तथा विश्वकोश तैयार हों। डॉ. चन्द्रशेखर वेंकट रमन के सम्पूर्ण कार्य का हिन्दी अनुवाद हो, आइंस्टाइन या हाकिंग की कृतियों का प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद हो। इसी तरह रूसी या चीनी वैज्ञानिक कृतियों का भी अंग्रेजी माध्यम से हिन्दी अनुवाद हो। इतना ही नहीं, विज्ञान परिषद प्रयाग द्वारा 1958 से ही प्रकाशित ‘विज्ञान परिषद् अनुसंधान पत्रिका’ का कई खण्डों में प्रकाशन हो जिसमें देश के उच्चतम वैज्ञानिक अपने शोध कार्यों को प्रकाशित कराएं और जहाँ तक हो सके एक ।इेजतंबजपदह ंहमदबल हिन्दी की बने। विश्वविद्यालयों को इन पाण्डित्यपूर्ण कार्यांे में हाथ बँटाना होगा। एक व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता।

सरकारी स्तर पर विज्ञान संचार क्षेत्र में जो प्रयास किये गए और किये जा रहे हैं, उनका मूल्यांकन आप किस प्रकार करते हैं? 

विज्ञान संचार के क्षेत्र में सरकारी प्रयासों का मैं प्रशंसक हूँ। विज्ञान प्रसार, सीएसआईआर, एनसीईआरटी, एनबीटी द्वारा जो भी कार्य योजनाबद्ध रूप में हाथ में लिए गये, वे इसलिए पूरे हो सके क्योंकि उनके समक्ष किसी प्रकार का आर्थिक संकट या अवरोध आड़े नहीं आया। इसमें कर्तव्यनिष्ठ कार्यकर्ताओं की उपस्थिति सबसे बड़ा कारक रही है। ऐसी योजनाओं को दीर्घकालिक होना चाहिए-कुछ को तो निरन्तर चलते रहना चाहिए। सरकार आखिर लोकशक्ति ही तो है। उसको अनुशासन के अन्तर्गत चालू रखने का प्रयास होना आवश्यक है। 

विज्ञान लेखन और लोकप्रियकरण के अतिरिक्त आपके दूसरे शौक क्या हैं?

कार्य की व्यस्तता - लेखन, सम्पादन की व्यस्तता के बाद आखिर कितना समय बचता है कि कोई अन्य शौक किया जाय। फिर भी विज्ञान के साथ-साथ हिन्दी साहित्य की पत्रिकाओं एवं नवीन प्रकाशनों से परिचित होते रहने से जो संतोष एवं सुख मिलता है, उससे जीवन सार्थक लगने लगता है। मैंने तो हिन्दी को प्राचीन पाण्डुलिपियों के सम्पादन एवं लोकसाहित्य के संकलन में प्रारम्भ से ही रूचि ली है और बीच में जो कार्य अवरूद्ध था, उसे पूरा करने के लिए इच्छा शक्ति मिलती है। साहित्य, विज्ञान, धर्म, दर्शन सबों का समन्वय आवश्यक है। पारिवारिक व्यस्तता इसमें आड़े नहीं आती।

 

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