विशेष

(11/Jan/2016)

विज्ञान लेखन में तकनीकी शब्दावली की जरूरत

सुभाषचंद्र लखेड़ा से मनीष मोहन गोरे की बातचीत

 

सुभाष चंद्र लखेड़ा एक स्पष्टवादी, निडर और जिंदादिल व्यक्ति हैं। श्री लखेड़ा रक्षा शरीरक्रिया एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान (डिपास), डीआरडीओ से वरिष्ठ वैज्ञानिक के पद से सन 2009 में सेवा-निवृत्त हुए हैं। संभवतः उनके भीतर के असीम उत्साह ने डीआरडीओ से सेवानिवृति के बाद भी विभिन्न रचनात्मक क्षेत्रों में उन्हें ऊर्जावान बनाए हुए है। वे मूलतः एक वैज्ञानिक रहे हैं और उन्होंने अपने लेखकीय अवदान से लोकविज्ञान लेखन को समृद्ध किया है। हार्डकोर विज्ञान संबंधी शोध के समांतर लखेड़ा जी आम जन को विज्ञान की गूढ़ बातों को सरल भाषा शैली में समझ्ााने का महत्वपूर्ण कार्य विगत लगभग तीन दशकों से करते आ रहे हैं। उनके विज्ञान लोकप्रियकरण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के प्रतिष्ठित ‘आत्माराम पुरस्कार’ सहित अनेक उल्लेखनीय पुरस्कारों व सम्मानों से विभूषित किया जा चुका है। लखेड़ा जी के जीवन्त व्यक्तित्व की झलक उनकी रचनाओं में भी दिखाई देती है। वह जितने बेबाक वक्ता हैं, उतने ही लोकप्रिय विज्ञानी लेखक भी हैं। डिजिटल मंचों पर वे पिछले कुछ वर्षों से अपने यात्रा संस्मरणों को समय-समय पर लिखते रहे हैं। अगर इन संस्मरणों को सिलसिलेवार ढंग से संकलित किया जाए तो महत्वपूर्ण रचना शृंखला उभरकर सामने आ सकती है। दूसरी ओर लखेड़ा जी ने हिंदी में लघु कथाओं का लेखन भी खूब किया है। एक विज्ञान लेखक का यह आयाम अनोखा और प्रेरणाप्रद है।

विज्ञान लेखन की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली? शुरुआती दौर में क्या आपको विज्ञान लेखन में मुश्किलों का सामना करना पड़ा?
लेखन में तो मेरी रूचि छात्र जीवन से ही रही लेकिन उसको कई कारणों से लंबे समय तक कोई ठोस दिशा न मिल पाई थी। मैं एक रसायन विज्ञानी था लेकिन मुझ्ो जिस प्रयोगशाला में नौकरी मिली, उसका नाम ‘रक्षा शरीरक्रिया एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान’ है और वहां मूल रूप से सैन्य उपयोगी शरीरक्रिया विज्ञान (फिजियोलॉजी) एवं जैव-रसायन (बायोकेमिस्ट्री) संबंधी अनुसंधान कार्य होता है। यह प्रयोगशाला रक्षा अनुसंधान तथा विकास संगठन की नौ ‘लाइफ साइंसेज लैबोरेट्रीज’ में एक प्रमुख स्थान रखती है। विषम वातावरण एवं परिस्थितियों में मानव शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन और यदि ऐसे प्रभाव सैन्य बलों की शारीरिक-मानसिक क्षमताओं का ह्रास करते हैं तो उनके निराकरण के लिए प्रभावी उपायों की खोज करना इस प्रयोगशाला के मूल उद्देश्यों में शामिल हैं। फलस्वरूप, मुझे प्रारंभिक वर्षों में फिजियोलॉजी से जुड़े मूल तथ्यों को समझाने में काफी मेहनत करनी पड़ी। मैं इस प्रयोगशाला के ‘हृदयश्वसन ग्रुप (कार्डियोरेस्पिरेटरी ग्रुप)’ से 28 दिसंबर 1971 में जुड़ा और सन् 2000 तक इसी में बना रहा। 
इस बीच विभिन्न विषयों पर मैं समाचार पत्रों में पत्र इत्यादि लिखता रहा और मेरा सारा ध्यान अपने शोध कार्यों पर केंद्रित रहा। आखिर नियति ने मेरे साथ एक नया खेल खेला और 20 मार्च 1977 से लेकर जून 1977 तक मैं एक गंभीर मस्तिष्कीय रोग की वजह से सफदरजंग अस्पताल के वार्ड 13 का मेहमान रहा। अस्पताल से रोग मुक्त होकर लौटा तो मुझ्ो लगा कि अब मुझे कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे मैं समाज से सीधे तौर पर जुड़ा रहूँ। फिर मुझ्ो लगा कि मेरे जैसे साधारण इंसान के लिए समाज से जुड़ने का सर्वोŸाम साधन लेखन कार्य साबित हो सकता है। मैंने अपने शुरूआती कुछ लेख अंग्रेजी में लिखे। मेरा पहला लेख ‘आर यू फ़्रस्टेटेड’ शीर्षक से हिन्दुस्तान टाइम्स (8 जनवरी, 1978) की संडे मैगज़ीन सेक्शन में छपा। उसके बाद मैंने कुछ और लेख लिखे और वे भी अंग्रेजी के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में स्थान पाने में कामयाब रहे। इसके बावजूद मैं अंग्रेजी में लेखन करने में अपनी सोच का यथेष्ठ तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पा रहा था। सुयोग समझ्ािए कि उन दिनों हमारे संस्थान में डीआरडीओ की एक अन्य प्रयोगशाला से हुसैन फारुकी साहब स्थानांतरण पर आये। वे उर्दू में विज्ञान लेखन करते थे। ‘थे’ इसलिए कहा है क्योंकि वे कुछ वर्षों बाद पार्किंसन रोग का शिकार होकर चल बसे। खैर, एक दिन फारुकी साहब ने मेरे से कहा, ‘ये तुम्हारी अंग्रेजी में लिखने की बात मेरी समझ में नहीं आती। तुम उस भाषा में क्यों नहीं लिखते जिसमें तुम दक्षता पूर्वक लिख सकते हो।’ शब्दों में कुछ अंतर हो सकता है लेकिन उनके कहने का आशय यही था।
मित्र फारुकी की सहज भाव से कही बात मेरे दिल को भा गई। कुछ दिन बाद मैंने ‘हम सांस क्यों लेते हैं?’ विषय पर एक लेख लिखा और नवभारत टाइम्स के ‘रवि वार्ता’ में प्रकाशनार्थ भेजा। ठीक अठारहवें दिन मेरा यह लेख छप गया (13 दिसंबर 1981)। समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के संपादक आपको यह सूचना नहीं देते कि आपके लेख का क्या हुआ? अगर आपने वापसी के लिए पर्याप्त टिकट लगा लिफाफा नहीं भेजा तो वे उसे या तो छाप देंगे अन्यथा रद्दी की टोकरी के हवाले कर देंगे। इस व्यवस्था के चलते न जाने कितने संभावित लेखक खिलने से पहले ही मुरझा जाते हैं। लेकिन सभी संपादक ऐसा नहीं करते। उदहारण के लिए मैंने अपना एक लेख ‘क्या आप रिटायर होने वाले हैं?’ हिंदुस्तान में प्रकाशनार्थ भेजा। उन दिनों हिंदुस्तान की संपादक पद्मश्री से सम्मानित श्रीमती शीला झुनझुनवाला थी। एक दिन मुझे उनका एक पोस्टकार्ड मिला जिसमें उन्होंने मुझसे मेरे उस लेख पर चर्चा के लिए बुलाया था। मैं अगले दिन वहाँ गया तो उनसे सलाह मिली कि मैं अपने लेख को बेहतर बनाने के लिए ऐसे कुछ लोगों से मिलूं जो रिटायर होने वाले हैं और संक्षेप में उनके विचारों को इसमें शामिल करूं। मैंने अगले कुछ दिनों के दौरान ऐसे पंद्रह - सोलह लोगों से मुलाकात की जो निकट भविष्य में सेवानिवृत होने वाले थे। मैंने लेख को उनकी सलाह के अनुसार समृद्ध किया और तत्पश्चात यह लेख हिन्दुस्तान के रविवारीय परिशिष्ट में प्रकाशित हुआ (2 दिसंबर 1979)। बहरहाल, अब मैंने अपना सारा ध्यान हिंदी में विज्ञान लेखन पर केंद्रित कर दिया। नवभारत टाइम्स में छपने के बाद अरस्तू की लोक प्रसिद्ध उक्ति ‘वेल बिगन इज़ हाफ डन’ के अनुसार अब मैंने मानव शरीर से जुड़े विषयों भूख, प्यास, पसीना, नींद, सपनों आदि पर लिखना शुरू किया। मेरी ऐसी सभी रचनाएं हिन्दुस्तान, नवभारत टाइम्स जैसे समाचार पत्रों में छपने जो सिलसिला शुरू हुआ, वह अगले बीस वर्षों तक निरंतर बना रहा। सन् 1982 में मैंने ‘विज्ञान प्रगति’ में लिखना शुरू किया और मेरे लेख तत्कालीन संपादक डॉ. ओम प्रकाश शर्मा को इतने पसंद आये कि एक दिन उनके साथ ‘विज्ञान प्रगति’ में सेवारत श्री सिन्हा ने मुझ्ो कहा कि डॉ. शर्मा मेरे से मिलना चाहते हैं। जब मैं शर्मा जी के कमरे में गया और उनको अपना परिचय दिया तो वे मुस्कराते हुए बोले, ‘बहुत अच्छा लिखते हो लिखते रहो।’ इस घटना का उल्लेख मैंने सिर्फ यह बताने के लिए किया है कि बिना किसी पूर्व परिचय के जब कोई हमें उत्साहित करता है तो उससे हमारे आत्मविश्वास में अत्यधिक बढ़ोतरी होती है। धीरे-धीरे मेरी लिखने की गति बढ़ती गई और मैं हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, जनसŸाा, राष्ट्रीय सहारा, संडे ऑबजर्वर, अमर उजाला, साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, मनोरमा, स्पाइस इंडिया, सैनिक समाचार आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगा। विज्ञान प्रगति के बाद मैंने आविष्कार और विज्ञान गरिमा सिंधु में लिखना शुरू किया। ‘आविष्कार’ में मेरा पहला लेख ‘स्तन कैंसर हो सकता है अधिक चीनी खाने से’ शीर्षक से फरवरी 1984 में छपा था। तत्पश्चात, मैं विज्ञान प्रगति की तरह आविष्कार के लिए भी नियमित रूप से लिखने लगा। इसी दौरान मुझे ‘विज्ञान परिषद् प्रयाग’ इलाहाबाद से जुड़ने का मौका मिला और यह सिलसिला आज तक बना हुआ है। मुझे आज भी 10 दिसंबर 1988 की वह रात याद है जब मैं परिषद् द्वारा आयोजित ‘भारतीय भाषाओं में विज्ञान लेखनः समस्याएँ और समाधान (11-13 दिसंबर 1988)’ त्रिदिवसीय संगोष्ठी में भाग लेने हेतु प्रयागराज एक्सप्रेस के द्वितीय वातानुकूलित डिब्बे में पहुँचा तो वहाँ दिल्ली के दूसरे विज्ञान लेखक भी मौजूद थे। इसके बाद तो परिषद् द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में भाग लेने के अनेक अवसर आये और सदैव ही हमने सुबह-सवेरे इलाहाबाद पहुँचने पर वहाँ स्टेशन पर श्री शिवगोपाल जी सहित परिषद् से जुड़े अन्य स्नेह जन पाये। इतना ही नहीं, इसके बाद परिषद् ने अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर लोकप्रिय विज्ञान लेखन से जुड़े जो भी कार्यक्रम इलाहाबाद से बाहर मैसूर, मुंबई, जोधपुर, कानपुर आदि स्थानों पर किये, उन सभी में मुझे शिरकत करने का मौका मिला। विज्ञान परिषद् प्रयाग को मैं विज्ञान लेखकों के लिए ‘संगम’ की भांति पवित्र मानता हूँ। 

आप डीआरडीओ में वैज्ञानिक रहे हैं और यह आम धारणा है कि वैज्ञानिक प्रायः विज्ञान लोकप्रियकरण और विज्ञान लेखन में दिलचस्पी नहीं लेते। मगर आपके मन की ऐसी कौन सी प्रेरणा थी, जिसने आपको विज्ञान लेखन की ओर प्रवृŸा किया?
मुझे अपने बचपन से यह महसूस होने लगा था कि हम लोग अंग्रेजी में जो ज्ञान-विज्ञान हासिल करते हैं, हम उसका इस्तेमाल खुद का हित साधने में करते हैं। मेरा विचार था कि विज्ञान से जुड़ी बातों को आम लोगों तक पहुँचाने के लिए हम सभी को कोशिश करनी चाहिए। बहरहाल, भाषा के प्रश्न पर उस वक़्त मैंने नहीं सोचा था। मेरा मानना था कि भाषा कोई भी हो लेकिन हम उसका इस्तेमाल इस तरह से करें ताकि वह बात जो हम कहना चाहते हैं, अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच सके। रक्षा अनुसंधान की मैं जिस प्रयोगशाला ‘डिफेंस इंस्टीट्य्ाूट ऑफ़ फिजियोलॉजी एंड अलाइड साइंसेज (रक्षा शरीरक्रिया एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान)’ से जुड़ा, संयोगवश वहां विषम वातावरण में सैनिकों को शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टि से चुस्त-दुरुस्त बनाये रखने के उपायों पर शोध किया जाता है। फलस्वरूप, मुझे लगा कि यह जानकारी तो सभी के लिए उपयोगी होगी कि अपने स्वास्थ्य पर किसी भी वजह से पड़ने वाले संभावित प्रतिकूल प्रभावों से कैसे बचा जाए। इसके अलावा संभवतया मैं लेखकों को किशोरावस्था से ही एक सम्मानजनक नजर से देखने लगा था तो कहीं न कहीं मेरे मन में भी बीज रूप में वह अभिलाषा मौजूद रही होगी कि मुझे भी लेखक बनना चाहिए। सही समय आया तो यह बीज पहले अंकुरित हुआ और फिर अपना आकार ग्रहण करने लगा।

हिंदी को ही आपने अपने लेखन की भाषा के रूप में क्यों चुना?
मेरा जन्म एक गाँव में हुआ। पारिवारिक परिवेश, आर्थिक स्थिति, सोच का तरीका जैसी बहुत सी बातें मुझे संभवतया हिंदी की तरफ ले र्गइं। सरकारी स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करते हुए बड़ा हुआ। गुणा, भाग, जोड़, घटा सब कुछ लम्बे समय तक हिंदी माध्यम से सीखा। किशोरावस्था में जो भी साहित्य पढ़ा, उससे हिंदी के प्रति लगाव बढ़ा। घर में पिता जी नियमित रूप से रामचरित मानस पढ़ते थे। अपने आसपास जो कुछ था, हिंदीमय था। बाद में ऐसा जरूर महसूस हुआ कि अंग्रेजी पढ़नी भी जरूरी है। उच्च शिक्षा के लिए अंग्रेजी के अलावा कोई विकल्प मौजूद नहीं था। फलस्वरूप बी एससी और एम.एससी की पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम से की। इसके बावजूद यह भी सच है कि अंग्रेजी बोलने में तब से लेकर आज तक कभी खुद को सहज नहीं पाया। इतना जरूर है कि अंग्रेजी सीखने और उसमें पढ़ने-लिखने की रूचि तब भी रही और आज भी है। मित्र हुसैन फारुकी ने जिस सहज ढंग से मुझ्ो हिंदी में विज्ञान लिखने की सलाह दी, उसने मेरे दिल को छुआ और मैंने तय कर लिया था कि यदि मुझे लोगों तक वैज्ञानिक जानकारी पहुंचानी है तो उसके लिए मेरे पास हिंदी सर्वाधिक उपयुक्त और उपयोगी माध्यम है।

विविध विधाओं में विज्ञान लेखन करते हुए आपको लगभग चार दशक हो गए हैं। आपके मन में विज्ञान लेखन से जुड़ी ऐसी कौनसी योजना या कार्य है जिसे पूरा करना चाहेंगे? विज्ञान लेखन-संचार के क्षेत्र में आपकी भावी योजनाएँ क्या हैं?
मैं लेखन तो करता रहा लेकिन उस दौरान और सच कहूँ तो आज भी मैंने यह सोच कर कभी विज्ञान लेखन नहीं किया कि इससे मैं अधिक से अधिक लाभ कैसे उठा सकता हूँ। यही वजह है कि मैंने जो 150 के लगभग विज्ञान वार्ताएं आकाशवाणी से प्रसारण के लिए लिखी, उनकी मूल प्रतिलिपि को मैं वहीं कार्यक्रम अधिकारी के हवाले कर देता था। उनकी फोटोकॉपी तक रखने का ख्याल कभी मेरे मन में नहीं आया। इसी तरह से लेख तो बहुत लिखे किन्तु उनको पुस्तक रूप में प्रकाशित करने की बात कभी सोची नहीं। खैर, जब जागो, तभी सवेरा वाली बात को ध्यान में रखते हुए अब यही कोशिश है कि जो कुछ छपा है, उसे वर्गीत कर पुस्तकों के रूप में सामने लाया जाए।

आपकी दृष्टि में विज्ञान संचार की सबसे प्रभावी विधा कौन सी है और क्यों?
मेरे विचार से विज्ञान संचार की सबसे प्रभावी विधा आज भी पत्र-पत्रिकाएं हैं। खेद की बात ये है कि पिछले बारह-पंद्रह वर्षों से हमारे समाचार पत्र विज्ञान से विमुख होते गए। आप आज कोई भी समाचार पत्र उठा लीजिए, उसमें फिल्मों पर तो खूब छपता है लेकिन उस विज्ञान पर कुछ नहीं जो हमारे समाज को वैचारिक दृष्टि से एक स्वस्थ और लोकोपयोगी सोच दे सकता है। हमारे लोग तथाकथित बाबाओं के नाम तो जानते हैं किन्तु उनसे यदि देश के दस शीर्षस्थ वैज्ञानिकों का नाम बताने के लिए कहा जाए तो वे बगलें झ्ाांकने लगते हैं। वैसे दृष्य-श्रव्य माध्यमों की भी अपनी उपयोगिता है बशर्ते उसमें परोसी जाने वाली सामग्री सूझ्ाबूझ्ा से तैयार की गई हो। पुस्तकों की एक बड़ी भूमिका हो सकती है बशर्ते वे सतही तौर पर सिर्फ पुरस्कार पाने के उद्देश्य से न लिखी गयी हों।
भारत को सपेरों का देश कहा जाता रहा है और हमारे देश की इस छवि के मूल में यहाँ पर व्याप्त अंधविश्वास और अतार्किक रूढ़ियाँ जिम्मेदार हैं। हम अपने देशवासियों के मन में तार्किक सोच या वैज्ञानिक दृष्टिकोण को क्यों नहीं उत्पन्न कर पा रहे? इसके पीछे क्या वजहें हैं?
विश्व में ऐसा कोई देश नहीं है जहाँ के सभी लोगों की सोच विज्ञान सम्मत हो। इतना ही नहीं, दुनिया के सभी देशों में लोग कुछ ऐसी बातों में विश्वास करते हैं जिनका विज्ञान से कुछ लेना- देना नहीं है। हम सभी जानते हैं कि कैसे कुछ तथाकथित आधुनिक कहे जाने वाले देशों में लोग संख्या 13 को अशुभ मानते हैं। ऐसे ही छींक जैसे सामान्य शारीरिक प्रतिवर्त को दुनिया के अनेक देशों में विभिन्न तरह के नफे-नुकसान से देखा जाता है। इतना जरूर है कि हमारे यहाँ ऐसे अंधविश्वास कुछ अधिक नजर आते है और अधिक नुकसान पहुँचा रहे हैं। इसकी अपनी वजह भी हैं। आर्थिक रूप से खस्ताहाल इंसान आसानी से अंधविश्वासों का शिकार होता है क्योंकि गरीबी एक ऐसी बीमारी है जो आदमी की सोच को पनपने नहीं देती है। इसके अलावा इसकी जड़ में दूसरे कारण भी हैं। हमारी व्यवस्था धर्म निरपेक्ष है। हम सभी धर्मों को समान आदर देते हैं। यह एक बहुत ही उम्दा बात है लेकिन इससे एक हानि भी हुई है। हमारे यहाँ धर्म का बहाना बनाकर कुछ लोग समाज को दकियानूसी सोच से बाहर नहीं निकलने दे रहे हैं। शासन के हाथ बंधे हुए हैं। ऐसे में वैज्ञानिकों के ऊपर यह जिम्मेदारी आ जाती है कि वे सीधे हस्तक्षेप से बचते हुए लोगों को वैज्ञानिक सोच के लाभों से परिचित कराएं। खेद की बात यह है कि कई बार अच्छे पढ़े-लिखे लोग भी इन रूढ़िवादी विचारों का समर्थन करते दिखते हैं।

समाज को बदलने में वैज्ञानिक सोच का क्या महत्व है?
समाज को बदलने में वैज्ञानिक सोच का अत्यधिक महत्व है। जो परम्पराएं आज के युग की जरूरतों के अनुकूल नहीं हैं, उन्हें त्यागने में ही भलाई है। हमारे कई ऐसे रीति-रिवाज हैं जिन पर विचार की जरूरत है। मैं आपको एक उदाहरण देकर अपनी बात समझ्ााना चाहूँगा। हमारे यहाँ यह रिवाज आज भी है कि पूजा करने के बाद पुष्प-पŸो, हल्दी-चंदन आदि जो कुछ सामग्री अवशेष के रूप में बच जाती है, उसका विसर्जन किसी नदी के जल में किया जाना चाहिए। मुंडन के बाद कटे बालों को भी नदियों में ही बहाया जाता है। आज नदियां तो उतनी हैं लेकिन आबादी किस कदर बढ़ी है, हम सभी जानते हैं। हमारे ऐसी कई परम्पराएं जल प्रदूषण बढ़ाती जा रही हैं। नदियों को हम पवित्र मानते आये हैं लेकिन न जाने क्यों हम उनकी पवित्रता को अपने रीति-रिवाजों से नुकसान पहुँचाते रहते हैं। यह तो एक छोटा सा उदहारण है। मनुष्य ने सदियों के परिश्रम के बाद जो ज्ञान अर्जित किया है, उसका उपयोग का अर्थ सिर्फ महंगे उपकरण खरीदना नहीं है। हमें उस ज्ञान का उपयोग सामूहिक विकास के लिएए पर्यावरण को बचाने के लिएए संसाधनों के विवेक सम्मत इस्तेमाल के लिए और धरती को बेहतर बनाने के लिए करना चाहिए।

आप व्यक्तिगत जीवन में अंधविश्वासों और अवैज्ञानिकता का कैसे विरोध करते हैं?
किशोरावस्था से ही मुझे टोने-टोटके जैसी बातों पर यकीन नहीं था। मैं आज भी इन बातों में यकीन नहीं करता कि किसी बाबा के पास जाने से हमारी किसी समस्या का समाधान हो सकता है महज इसलिए कि बाबा जी चमत्कारी हैं। यह कुछ लोगों को बुरा लग सकता है लेकिन यह भी सच है कि व्यक्तिगत शुचिता बनाए रखने के लिए मैं उन सामाजिक बंधनों का आदर करता हूँ जो एक वृहद् समाज की संरचना और स्थायित्व के लिए निर्धारित किये गए हैं। तंत्र-मंत्र की बात करने वालों के खिलाफ मैं समाचार पत्रों में समय-समय पर अपना पक्ष रखता आया हूँ। सबसे बड़ी परेशानी की बात यह है कि आज हमारे राष्ट्रीय स्तर के कई समाचार पत्रों में तथाकथित तांत्रिक नियमित रूप से अपने विज्ञापन छपवाते रहते हैं। स्वामियों में मैंने अपने पूरे जीवन में सिर्फ स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती जी के पाँव छुए हैं। वह भी इसलिए कि वे आजीवन विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए कार्य करते रहे और इसके लिए उन्होंने अपनी निजी सम्पति का भी इस्तेमाल किया।

भारत में विज्ञान संचार की वर्तमान स्थिति की समीक्षा आप किस प्रकार करेंगे?
अपनी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट होना हमें नुकसान पहुँचा सकता है। भारत में विज्ञान के प्रचार-प्रसार का कार्य भी एक ऐसा ही है जिसको जितना भी करेंगे, उसमें कमी नजर जरूर आएगी। आज विज्ञान में जिस तरह से नित नए तथ्य सामने आ रहे हैं, उनसे समाज को परिचित कराना एक दुष्कर न सही कठिन कार्य अवश्य है। हमारे यहाँ विज्ञान के प्रचार-प्रसार का कार्य सरकारी हाथों में है। हमारे व्यापारिक घराने अपने उपकरणों की जो जानकारी आम लोगों तक पहुंचाते हैं, उसका एक मात्र उद्देश्य व्यापारिक होता है। जनता में फैले अंधविश्वासों को दूर करने के लिए वे कभी कोई चेष्टा नहीं करते। कई बार तो यह तक देखने में आता है कि इन व्यापारिक घरानों के मालिक तक ढोंगी बाबाओं का इस्तेमाल अपना हित साधने के लिए करते हैं। मैंने अपने पूरे जीवन में ऐसे नेता नहीं के बराबर देखे हैं जो पुरजोर तरीके से ढोंग-पाखंड और उसे फ़ैलाने वाले तथाकथित बाबाओं और तांत्रिकों का विरोध करते हों। ऐसे में विज्ञान संचार की स्थिति को मजबूती से आगे कैसे बढ़ाया जा सकता है? 

भारत के सन्दर्भ में विज्ञान संचार या लोकप्रियकरण की उपादेयता को आप कैसे व्याख्या करना चाहेंगे?
भारत हो या विश्व का कोई दूसरा देश, विज्ञान लोकप्रियकरण की उपादेयता तो तय है। बिना वैज्ञानिक सोच को अपनाये आज के युग में आगे बढ़ पाना नामुमकिन है। कृषि व्यापार, उद्योग धंधे सहित जीवन के किसी भी क्षेत्र में आज सतत विकास के लिए वैज्ञानिक सोच का अत्यधिक महŸव है। यह वैज्ञानिक सोच सिर्फ विज्ञान संचार के द्वारा विज्ञान के लोकप्रियकरण के माध्यम से पैदा की जा सकती है। हम विज्ञान को कितना लोकप्रिय कर पाये हैं, इसका जायज़ा आप दिल्ली या अन्य किसी भी महानगर के बाजारों में सुबह दस-ग्यारह बजे के बीच घूमते हुए ले सकते है। ऐसी दुकान का मिलना मुश्किल है जिसके आगे नींबू और हरी मिर्च न बिखरी हों। दिक्कत यह है कि किसी भी स्तर पर ऐसे टोटकों की कभी भर्त्सना नहीं हुई।
सरकारी स्तर पर विज्ञान संचार क्षेत्र में जो प्रयास किये गए और किये जा रहे हैं, उनका मूल्यांकन आप किस प्रकार करते हैं? इस विशिष्ट क्षेत्र में व्यक्तिगत और निजी संस्थाओं की पहल और उनके योगदान पर आपकी राय भी हम जानना चाहेंगे।
भारत में विज्ञान का प्रचार-प्रसार सरकारी हाथों में है। यहां निजी क्षेत्र की भागेदारी नहीं के बराबर है। अब सवाल उठता है कि सरकारी क्षेत्र विज्ञान के प्रचार-प्रसार में कितना प्रभावी है? विशेषकर, आजादी के बाद इस क्षेत्र में कितना कार्य हुआ और उसका हमारे समाज की दशा और दिशा को सुधारने में क्या भूमिका रही है? इन सवालों का जवाब खोजने के लिए जरूरी है कि हम ऐसे सभी सरकारी विभागों के बारे में पहले संक्षेप में चर्चा कर लें जिनसे हम विज्ञान के प्रचार-प्रसार की अपेक्षा रखते हैं। इनमें सर्वोपरी स्थान भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय का है। बहरहाल भारत सरकार में यूं तो कोई भी ऐसा मंत्रालय या विभाग नहीं है जिसका रिश्ता कहीं न कहीं विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और इसके प्रचार-प्रसार से न हो किन्तु ऐसे मंत्रालयों की संख्या भी कम नहीं है जिनका संबंध सीधे तौर पर विज्ञान के सृजन और उसके प्रचार-प्रसार से है। नवीन एवं अक्षय ऊर्जा मंत्रालय, ऊर्जा मंत्रालय, मानव संसाधन विकास और दूरसंचार एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, कृषि मंत्रालय, खाद्य प्रसंस्त मंत्रालय, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय, भू-विज्ञान मंत्रालय, जल संसाधन मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, खेल एवं युवा मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को इस सूची में शामिल कर सकते हैं। इसके आलावा परमाणु ऊर्जा विभाग एवं अंतरिक्ष विभाग का संबंध भी विज्ञान के प्रसार से जुड़ा है। इन सभी मंत्रालयों एवं विभागों के तहत अनेक ऐसी संस्थाएं एवं प्रयोगशालाएं हैं जिनका कार्य विज्ञान का सृजन एवं प्रसार करना है। उदहारण के लिए रक्षा मंत्रालय का ‘रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन’ कृषि मंत्रालय का ‘भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्’, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय से संबंधित ‘भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद्’ और भारत सरकार के विज्ञानं एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा पोषित ‘वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद्’ ऐसे प्रमुख वैज्ञानिक संगठन हैं जिनसे यह अपेक्षा की जाती है की वे सतत रूप से विज्ञान का प्रसार करते रहेंगे। इन संस्थानों/संगठनों के अलावा विज्ञान के प्रसार के लिए हमारी सरकार ने अलग से भी कुछ संस्थान बनाये हैं जिनका कार्य प्रत्यक्ष रूप से विज्ञान का प्रसार करना तो नहीं है किन्तु इस कार्य में सहायता पहुंचना है। हम सभी जानते हैं कि आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी को आत्मसात किए बिना कोई भी भाषा राष्ट्र की संपूर्ण जरूरतों को पूरा नहीं कर सकती है। केंद्र सरकार ने इस बात को समझ्ाते हुए हिंदी में वैज्ञानिक और तकनीकी शब्द मुहैया करवाने के लिए ‘वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग’ का गठन किया। आज आयोग द्वारा किए गए परिश्रम के बदौलत हिंदी में ऐसे शब्दों का विपुल भंडार उपलब्ध है। सभी जानते हैं कि इन शब्दों का उपयोग वैज्ञानिक और तकनीकी लेखन में होना है ताकि विज्ञान का प्रसार आमजन तक किया जा सके। इतना ही नहीं, हमारे सरकारी वैज्ञानिक संगठनों ने कुछ ऐसे स्वतंत्र संस्थान भी बनाये हैं जिनका कार्य सिर्फ और सिर्फ विज्ञान का प्रसार करना है। ऐसी प्रमुख संस्थाओं में राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद्, विज्ञान प्रसार, राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं सूचना संसाधन संस्थान, राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद् और नेहरु तारामंडल जैसे संस्थान/इकाइयां शामिल हैं।
बहरहाल, यह एक कटु सत्य है कि सारे ताम-झ्ााम के बावजूद हमारे सरकारी क्षेत्र विज्ञान का उतना प्रसार नहीं कर पाये हैं जितने की उनसे अपेक्षा थी। यहां मैं विज्ञान परिषद् प्रयाग, इलाहाबाद की चर्चा करना चाहूंगा। वर्ष 1913 में स्थापित इस संस्था ने विज्ञान की जानकारी को आमजन तक पहुंचाने के लिए अब तक जितना कार्य किया हैए वह सरकारी विभागों और मंत्रालयों के लिए सबक हो सकता है। सरकारी विभागों ने विज्ञान प्रसार के कार्य को उसी तरह से किया जैसे कोई सरकारी बाबू पानी अथवा बिजली के बिल जमा करता है। दरअसल, विज्ञान सृजन की तरह विज्ञान प्रसार का काम भी एक मिशन के रूप में लिया जाना चाहिए। हमारे सरकारी संस्थानों ने विज्ञान प्रसार संबंधी पुस्तकें छापी तो हैं किन्तु वे छपने के बाद आम जनता को नहीं पहुंचाई गयीं। सरकारी क्षेत्र में आज तक जो भी लोकप्रिय विज्ञान पत्रिकाएं छप रही हैं, उनका वितरण किसी ऐसे अधिकारी के हाथ में होता है जिसका पत्रिका के प्रकाशन से कोई तालुक नहीं होता है। फलस्वरूप, पत्रिकाएं छपने के बाद भी गोदामों में पड़ी रहती हैं। विभिन्न मंत्रालयों से जुड़े वैज्ञानिक संगठनों के तहत आने वाली सभी प्रयोगशालाएं जो गृह पत्रिकाएं छापती हैं उनमें विज्ञान संबंधी सामग्री बहुत कम होती है। जो थोड़ी बहुत विज्ञान संबंधी सामग्री उनमें मौजूद रहती है, अक्सर उसे देखकर यही लगता है कि लिखने वाले ने उसे शायद मजबूरी में या किसी दबाव में लिखा है। यदि कोई उत्कृष्ट विज्ञान लेख उसमें छपा भी हो तो उसके लेखक को कहीं से कोई ऐसा प्रोत्साहन नहीं मिलता है जिससे उसमें वह भावना बलवती हो जो किसी वैज्ञानिक को लोकप्रिय विज्ञान लेखन के लिए प्रेरित करती है।

आम धारणा है कि विज्ञान बहुत क्लिष्ट विषय है। किताबें भी जटिल भाषा में लिखी गई हैं। दूसरे विज्ञान का संबंध केवल पाठ्य्ाक्रम तक सीमित है। क्या लोगों तक विज्ञान नहीं पहुँचने का यह बड़ा कारण नहीं है?
अगर आप किसी विषय को नहीं जानते तो निस्संदेह वह आपको क्लिष्ट लगेगा। बहरहाल, जब आप लोगों को गर्मियों में प्रखर धूप के सीधे संपर्क में न आने की बात समझ्ााना चाहते हैं तो इसके लिए आपको उनको प्रकाश से जुड़ी सारी भौतिकी समझ्ााने की जरूरत नहीं है। आपको तो उन्हें सिर्फ यह बताना होता है कि तेज धूप उनके स्वास्थ्य को कैसे नुकसान पहुंचा सकती है और उससे बचना क्यों जरूरी है। जहाँ तक किताबों की बात है तो पाठ्य्ाक्रम के लिए किताब चाहे दुनिया की किसी भी भाषा में क्यों न लिखी जाए, उसमें तकनीकी शब्दों का इस्तेमाल बेहद जरूरी है। जब हम कोई पुस्तक आमजन तक विज्ञान का पहुँचाने के उद्देश्य से लिखते हैं तो हमारी यही कोशिश होनी चाहिए कि उसे पुस्तक में मौजूद सामग्री को भाषा का सामान्य ज्ञान जानने वाले लोग समझ्ा सकें। यूं इसमें दो बातें दिक्कत पैदा करती हैं। ऐसी पुस्तक वही व्यक्ति लिख सकता है जिसकी विषय और भाषा, दोनों पर गहरी पकड़ हो और दूसरे यह भी जरूरी है कि वह अपने पाठक वर्ग की शब्द संपदा से परिचित हो। समस्या यह है अपने यहाँ लोकप्रिय विज्ञान लेखन को आज तक कभी ऐसी कोई तरजीह नहीं दी गयी है जिससे इसमें निखार आये। मैंने एक नहीं अनेक ऐसी तथाकथित लोकप्रिय विज्ञान की पुरस्कृत पुस्तकें देखी हैं जिनमें विषय और भाषा, दोनों तरह की त्रुटियों की भरमार है।

आपके अनुसार, विज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के लिए क्या किया जाना चाहिए?
मैं अपने दीर्घकालिक अनुभव के आधार पर यह निस्संकोच कह सकता हूँ कि हमारे देश में मौजूद सैकड़ों प्रयोगशालाओं में अपवाद स्वरूप एक या दो ऐसी प्रयोगशालाएं हो सकती हैं जहां इस बात पर गंभीरता से विचार होता हो कि विज्ञान का प्रसार कैसे किया जाये? घड़ी देख कर नौकरी करने वाले लोगों से इस तरह की आशा रखना व्यर्थ है। यूं ऐसे लोग भी आपको इन वैज्ञानिकों के बीच मिल जायेंगे जो घड़ी देख कर नौकरी नहीं करते हैं किन्तु ऐसा वे विज्ञान के सृजन या प्रसार के लिए नहीं अपितु अपने प्रचार-प्रसार के लिए करते हैं ताकि वे समय से पहले प्रोन्नति पाते रहें। ऐसे लोग देश और समाज का अपेक्षाकृत अधिक नुकसान करते हैं। ये अक्सर समाज को गलत जानकारी परोसते हैं और आंकड़ों से खिलवाड़ कर अपने वरिष्ठ अधिकारियों को गुमराह करते हैं और कई बार तो पूरे देश को गुमराह करते हैं। मुझ्ो एक ऐसी बात याद आ रही है जिसे मैंने वर्ष 1972-73 के दौरान सुना था। एक वैज्ञानिक ने जीन संबंधी अनुसंधान हेतु एक परियोजना पर कार्य करने की इच्छा अपने किसी ऐसे अधिकारी से जताई जो प्रशासनिक सेवा से तालुक रखते थे। वे अधिकारी तपाक से बोले, ‘जीन तो अपने कपड़ा मिलों में वर्षों से बनाई जा रही है, तुम इस पर क्यों सर खपाना चाहते हो।’ हो सकता है यह किस्सा किसी की कल्पना की उपज हो किन्तु इससे मिलते-जुलते किस्से अक्सर सुनने में आते हैं। राष्ट्र की प्रगति के लिए विज्ञान सृजन और उसका प्रसार, दोनों ही बेहद जरूरी हैं। हम अक्सर जिस वैज्ञानिक चेतना की बात करते हैं, वह तभी संभव है जब हम सरकारी और गैर सरकारी, दोनों स्तरों पर विज्ञान की जानकारी उस आम आदमी तक पहुंचाएं जिसके आंसू पोंछने की बातें सभी सरकारें करती हैं। यह खेद की बात है कि हमारे वैज्ञानिक जिस भाषा में बात करते हैं, वह आम भारतीयों की भाषा नहीं होती, वे जिन मुद्दों पर परियोजनाएं लेते हैं उनका संबंध भारतीय समस्याओं से नहीं होता और वे स्वदेश के बजाए विदेश के जर्नलों में अपने कार्यों का विवरण छपवाना चाहते हैं। वे सिर्फ एक ही बात दोहराते मिलेंगे, ‘हमारे जर्नल अंतरराष्ट्रीय स्तर के नहीं हैं।’ ऐसे लोग क्या यह बताने की कृपा करेंगे कि हमारे जर्नलों का स्तर कैसे बेहतर हो सकता है? अगर हमारे देश को तरक्की करनी है तो उसके लिए किसी विदेशी को नहीं अपितु हमें ही कठिन परिश्रम करना होगा। अगर हमें अपने जर्नलों को बेहतर बनाना है तो हमें अपने अच्छे शोध पत्र और रिव्यू आलेख उनमें छापने होंगे। हम इस तथ्य से परिचित हैं कि विदेशी जर्नल महंगे होने के कारण हमारे विद्यालयों के पुस्तकालयों तक नहीं पहुंच पाते हैं। फलस्वरूप हमारे छात्र तक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हो रहे नवीनतम कार्यों से परिचित नहीं हो पाते हैं। सरकार को अब अविलम्ब ऐसे सभी कदम उठाने होंगे जो विज्ञान प्रसार के कार्य को वह गति प्रदान कर सकें जो वर्ष 2020 में न सही, वर्ष 2030 तक हमें एक विकसित राष्ट्र का दर्जा दिलाने में सहायक हो सकते हैं। ‘विज्ञान प्रसार’ द्वारा देश भर में विपनेट क्लबों की स्थापना को मैं इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानता हूँ बशर्ते कि हम इनका निरंतर उपयोग करते रहें। 

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