विशेष

(17/Nov/2015)

जीवन की एक भाषा होती है

प्रो.यश पाल



आम तौर पर यह माना जाता है कि इस ग्रह पर हम पहले समझदार प्रजाति हैं। किसी ने कछुए, पेंग्विन या डाल्फिन से कभी नहीं पूछा कि क्या वे समझदार प्राणी हैं या उनकी नजर में हम समझदार हैं। मगर हमें किसी न किसी पूर्वधारणा के साथ आरम्भ तो करना होता और स्वाभाविक रूप से हम मनुष्य अपने पक्ष में ही बात करेंगे। खैर, दुनिया के विभिन्न हिस्सों से एकत्र की गई जंतु जातियों के सदस्यों में अधिकांश हमारे जैसा व्यवहार प्रदर्शित नहीं करते हैं। अपने को बेहद समझदार प्राणी मानने के दौरान मेरे मन में अचानक इस मूल बात से हटकर एक ख्याल आता है। यह सबसे अच्छा होगा यदि यहां पर मैं समय के साथ विकसित हुई मेरी अपनी समझ (जागरूकता) का विश्लेषण करने का प्रयास करूं। मैं बता दूं कि मेरी परवरिश एक आर्य समाज परिवार में हुई है। मनुष्य की समझ या अक्लमंदी से जुडा समस्त विश्वास चार वेदों में समाहित हैं। उपनिषद इन चारों वेदों पर केवल व्याख्याएं (टिप्पणियां) हैं। राम महज एक नेक मनुष्य थे और रामायण, महाभारत तथा गीता से हमें अनेक शिक्षाएं तथा नीतिपरक सबक सीखने को मिलते हैं। इन साहित्यों में जो भी चमत्कार वाले प्रसंग हैं, वे सभी बाद में विवेकहीन लोगों के द्वारा फिजूल में जोडे गए हैं। वास्तव में, प्राचीन आर्य सब कुछ जानते थे और हम भी जान पायेंगे अगर हम वेदों को पढें, समझें और उन्हें आत्मसात करें। अपने बचपने में मैंने आर्य समाज के सभी नियम याद किये थे और मेरे बाल मन पर इस सबक का निस्संदेह गहरा असर हुआ था। हम इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि हम सनातनी या अन्य धर्मों की अपेक्षा अधिक विज्ञानसम्मत थे। जाति-प्रथा या मूर्ति पूजा के हम घोर विरोधी थे। हम यह भी मानते थे कि ईश्वर केवल एक है और अनेक ईश्वर की कहानियां अनभिज्ञ लोगों द्वारा रची गई हैं। जाति प्रथा में विश्वास नहीं रखने के कारण हमने बहुत पहले ही अपने सरनेम हटा दिए थे (यह बहुत आसान भी था क्योंकि उस जमाने के पंजाब में अक्सर सरनेम नहीं रखा जाता था)। लेकिन जब मेरी उम्र 13 साल की हुई और मुझे अपना स्कूल बदलना था, तब मैंने अपना सरनेम ‘आर्य’ रख लिया। इसी सरनेम के साथ मैंने अपना मैट्रिकुलेशन पूरा किया। 1942 में जब पूरे देश में आजादी के संग्राम का माहौल था, उस समय 15 साल की उम्र में मैंने अपना सरनेम देश-प्रेम की भावना में ‘भारती’ रख लिया। उस समय मैं कॉलेज जाता था और खूब पढ़ाई किया करता छात्र आन्दोलनों में भी हिस्सा लिया करता था। यहाँ पर मैं इस बात को दर्ज करना चाहता हूं कि हमारी चेतना पर, व्यक्तिगत अनुभवों के अलावा हमारी बौद्धिक समझ प्रभाव सशक्त होता है। तभी कुछ वर्षों के बाद, मैंने ‘भारती’ सरनेम भी हटा लिया, मगर मैंने अपने परिवार के अन्य सदस्यों की तरह अपना मूल सरनेम ‘भूटानी’ का प्रयोग कभी नहीं किया। हालांकि आधुनिक व्यक्ति की यह एक आवश्यकता होती है कि वह कोई न कोई सरनेम लगाए। इस लिहाज से मैंने भी कई सरनेम लगाए जबकि बाद में लोग मुझे मिस्टर पाल कहकर पुकारने लगे और मेरी पत्नी श्रीमती पाल हो गईं तथा इस तरह मेरे बच्चों का सरनेम भी स्वाभाविक रूप से पाल हो गया।यह कहना गलत होगा कि मैंने अपने आर्य समाजी बचपन को पूरी तरह धो डाला। वैदिक मन्त्रों के एक खास प्रकार से किये जाने वाले मंत्रोच्चार और यज्ञ के दौरान प्रयोग की जाने वाली सामग्री की गंध भी मुझे पसंद हैं। एक परंपरागत हिन्दू मंदिर जाने में मैं आज भी असहज महसूस करता हूं क्योंकि मैं वहां के रीति-रिवाजों से परिचित नहीं हूं। मैं मानता हूं कि अपने जीवन में मैंने विज्ञान के क्षेत्र में कुछ गंभीर काम किये हैं। हालांकि शायद ये महान कार्य की श्रेणी में नहीं आते मगर ये रोचक व गंभीर जरुर रहे हैं और इनसे मुझे बौद्धिक आनंद मिला है। विज्ञान की समझ उत्पन्न करने में मेरे से बेहतर प्रतिभावान लोग मौजूद हैं। मेरा विश्वास है कि प्रकृति की क्रियाओं में कोई गहन अध्यात्म का तत्व अवश्य होता है जो सूक्ष्म व स्थूल और सजीव तथा निर्जीव के बीच सुंदर एवं तार्किक सेतु का काम करता है। यह तत्व ही संभवतः तारों, मंदाकिनियों और ब्रह्माण्ड को पूरा न सही कुछ हद तक समझने में हमें समर्थ बनाता है।
विज्ञान की जटिलताओं और गूढ़ताओं के अलावा भी इसमें बहुत कुछ अनुत्तरित है। मसलन ‘मैं कौन हूं’, ‘मैं किससे संबंधित हूं’, ‘इन सबके क्या मायने हैं’, इन सबसे कुछ सुंदर जवाबों को पाने की शुरुआत होती है जो रहस्योद्घाटन स्रोतों पर आधारित नहीं होते। हमारे पृथ्वी ग्रह पर लगभग चार अरब वर्ष पहले एक कोशिका से हुए जीव विकास के जरिये मैं अपनी वंशावली को चिह्नित कर सकता हूं और यह मेरे लिए एक महत्वपूर्ण बात है। इसी पहली कोशिका के विकास क्रम में इस ग्रह पर सभी जीवधारियों की वंशावलियों का पता लगाना संभव है। सामानांतर रूप में यह भी सच है कि जीवधारियों की दीर्घजीविता प्रकृति में मौजूद अजीव पदार्थों और प्राकृतिक संसाधनों के मध्य सहयोग तथा सहजीविता पर निर्भर करती है।
हमारे जीवन की एक भाषा होती है जिसकी कुछ वर्णमालायें हैं और कमोबेश यही भाषा और वर्णमालाएं हमारी धरती के सभी जीवधारियों में मौजूद हैं। हो सकता है कि हमारी धरती के जैसा जीवन हमारे आस-पास या सुदूर आकाशीय पिंडों में भी मौजूद हो और हमारे या हमसे जिज्ञासु और बेहतर जीव जातियां वहां विद्यमान हों। यह अनिश्चित है और ऐसा होना संभाव्य भी है। इस दिशा में खोज चल रही है और क्या पता जब तक इस गुत्थी का जवाब मिले, उस वक्त मैं न रहूं।
मैं सोचता हूं, जब सूर्य का जन्म हुआ होगा और उसके बाद हमारी पृथ्वी सहित अन्य ग्रहों का विकास हुआ तथा यह कैसा विरल संयोग है कि पृथ्वी पर ऐसी प्राकृतिक दशाएं उपयुक्त हो पाईं जिससे यहां जीवन का संचार हुआ। इसे हम प्रकृति का एक उपहार मान सकते हैं। टैगोर ने एक पंक्ति लिखी थी ‘प्रकृति में चीजों की योजना के ऐसे अनोखे सरोकार निहित हैं जो हमें आनंद प्रदान करते हैं।’
मुझे किसी ने बताया कि कोई दो हजार साल पहले हमारे ग्रह पर कुछ लाख लोग पाए जाते थे। इस बात से यह स्पष्ट होता है कि हजारों साल पहले लोग छोटे-छोटे समूहों में जीवन-यापन करते थे और ये समूह एक-दूसरे से दूर रहते थे। मैं सोचता हूँ कि ऐसा करना लाजमी था। दूरी के कारण उनकी भाषाएँ और दर्शन में भी अंतर स्वाभाविक थे। यह आश्चर्यजनक है कि इन कारणों से दुनिया में सामाजिक और सांस्कृतिक स्तरों पर इतनी विविधता आई। इस विविधता के बावजूद इन तमाम मानव समाजों के गहरे मूलभूत दार्शनिक प्रश्नों में समानता थी। इस तरह के मानव अतीत की साधारण समझ हमें पृथ्वी के अन्य मानव समाजों के करीब लाती है और उन्हें हमारा साथी ग्रहवासी बनाती है। मेरी दृष्टि में, पृथ्वी के अन्य मानव समाज व जीवधारी और हमारे बीच के प्राकृतिक संबंध का उत्सव ही यहां पर जीवन का आधार है। 

लौकिक बोध

ऊपर मैंने जो कुछ भी कहा, उसे मैं लौकिक बोध या वैश्विक समझ का नाम देना चाहूँगा। यह बोध मुझे न केवल पृथ्वी पर सर्वश्रेष्ठ प्राणी मानने की ओर ले जाता है बल्कि अन्य जीवधारियों को भी सर्वश्रेष्ठ समझने को प्रेरित करता है। मैं स्वीकार करता हूं कि ऐसा सोचना सभी मनुष्यों के लिए कठिन है मगर ऐसी सोच स्थायी मानव अस्तित्व के लिए अनिवार्य है। इस तरह का दृष्टिकोण विकसित नहीं करने पर हेनरी थोरे के शब्दों में ‘यंत्रों के यंत्र’ बनकर हम रह जायेंगे।
इस लौकिक बोध को उत्पन्न करने में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का बहुत महत्व होता है। अधिकांश लोगों को गलतफहमी होती है और वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण का रिश्ता विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बारे में सीखने से निकालते हैं। इस शब्द के प्रणेता देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने दरअसल इस सोच के साथ यह शब्द रचा था कि लोग तार्किक ढंग से या सूझ-बूझ के साथ अपने जीवन के निर्णय लें और ऐसी मति ही वास्तव में वैज्ञानिक दृष्टिकोण है न कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी को सीखना। मैं नहीं मानता कि जिन देशों में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में ज्यादा तरक्की हुई है, वहां के लोगों में उच्च स्तर का वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वैश्विक समझ आवश्यक रूप से मौजूद होता है। 

वैश्वीकरण और मैं

आज के समय हम सभी वैश्वीकरण की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। हमें परिवहन व संचार के आधुनिक माध्यमों का शुक्रमंद होना चाहिए। हम सब जानते हैं कि वैश्वीकरण की लहर केवल एकतरफा चलती है, कुछ विशेष और सशक्त से शेष सभी की ओर। इस प्रवृत्ति के कारण तनाव का बढना लाजमी है। हमें यह समझना चाहिए कि वैश्वीकरण की वर्तमान प्रक्रिया वैश्विक समझ की अवधारणा के प्रति पूर्णतः विरोधात्मक है। वैश्वीकरण का मुख्य जोर इस धारणा से संबंधित है कि दुनिया का विशाल हिस्सा सामान और सेवाओं के लिए केवल एक बाजार है। इस तरह की परिस्थितियों में अंतर्राष्ट्रीय समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। मेरी समझ से प्रौद्योगिकियाँ मानव समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए होनी चाहिए और इस प्रक्रिया को लेकर कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए। 

सामाजिक प्रतिरक्षा

इस आलेख में स्वयं, दूसरे और सामाजिक व्यवहारों में प्रतिरक्षा की भूमिका पर कुछ बात मैं रखना चाहता हूँ। यह स्पष्ट है कि सुरक्षा क्रिया-विधि या प्रतिरक्षा प्रणाली के बिना कोई भी जैविक या सामाजिक जीव खतरे में रहता है। किसी आक्रमण की स्थिति में छोटा ही पुलिस बल अत्यावश्यक होता है। लेकिन बहुत विशाल सेना या बहुत विशाल सुरक्षा या प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया बीमारी या विखंडन पैदा कर सकती है जिसका अच्छा होना मुश्किल है। वास्तव में, अति सुरक्षा रक्षक के लिए खतरनाक होती है।
इन बातों से यह प्रतीत होता है कि सभी बाहरी प्रभाव खतरनाक होते हैं क्योंकि वे प्रत्यक्ष या अतार्किक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया के द्वारा ‘स्वयं’ को भंग करते हैं। जैविक और सामाजिक दोनों ही तंत्रों में सहजीविता की संरचनाओं के लिए प्रक्रियाएं होती हैं जो चयनित रूप से प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को दबाती हैं। विकासवादी जीव विज्ञान में ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं, जिसमें जीवधारी उचित बदलाव और समायोजन के द्वारा अपना जीवन व्यतीत करते हैं और इसमें सहजीवी संबंधों की अहम भूमिका होती है। सामाजिक विकास के लिए समय के पैमाने जीव विज्ञान के समान लम्बे नहीं हो सकते हैं, परंतु ये हमारी प्रौद्योगिकियों की क्रियान्वयन अवधियों से तो लम्बे होते ही हैं। इस सदी के उत्तरार्द्ध में हमारे सामने ऐसी चुनौतियां हैं, जो पहले के युगों से गुणात्मक रूप से अलग हैं। दूसरी तरफ मेरा यह भी विश्वास है कि इन चुनौतियों को दूर किया जा सकता है। वैश्विक समझ की आधारभूत अनिवार्यता मुझे भविष्य को लेकर आशावादी बनाती है और मुझे विश्वास है कि हम इन चुनौतियों को पार कर आगे निकल जायेंगे।

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