विशेष

(20/Oct/2015)

विज्ञान लेखकों के डॉ.कलाम

मित्र, विचारक एवं पथ-प्रदर्शक

लक्ष्मण प्रसाद

मैं बचपन से ही छोटी-छोटी समस्याओं के प्रति सदैव संवेदनशील रहा हूँ। उनको हल करने के कारण सौभाग्यवश मैं एक छोटा सा सफल इनोवेटर/आविष्कारक बनने में सफल हुआ। सर्वप्रथम जब मैंने नवाचारों/आविष्कारों के क्षेत्र में प्रारंभिक सफलता पायी तो मैंने डॉ.कलाम को अपना आदर्श माना। कुछ अपने सफल नवाचारों का ब्यौरा मैंने कलाम साहब को लिखकर भेजा। परंतु उत्तर प्राप्त नहीं हुआ, फिर भी मैं निराश नहीं हुआ। मुझे विश्वास था कि कभी न कभी डॉ. कलाम से मुलाकात अवश्य होगी। आखिर वो दिन आ ही गया जब 2 जनवरी 2000 को मैं दिल्ली से हवाई जहाज द्वारा पूना जा रहा था। एकाएक मेरी दृष्टि कलाम साहब पर पड़ी जो पूरी तन्मयता के साथ कुछ लिख रहे थे। मैं उन्हें ध्यान से देखता रहा, थोड़ी देर बाद जैसे ही कलाम साहब की नजर मुझ पर पड़ी तुरन्त उन्होंने बराबर वाली खाली सीट पर बैठने के लिए कहा और मैं खुशी से बैठ गया। परिचय के उपरान्त मैंने उन्हें बताया कि मैंने आपको दो पत्र भेजे थे परन्तु किसी भी पत्र का उत्तर प्राप्त नहीं हुआ। पहला पत्र एक कम्पोजिट मैटेरियल के बार में था, जो आपकी देखरेख में उपग्रहों के लिए विकसित किया गया। उन्होंने इस हल्के एवं मजबूत पदार्थ का उपयोग विकलांगों के लिए कृत्रिम अंग बनाने हेतु किया था। तुरन्त ही कलाम साहब ने मुझसे पूछा कि मेरी इस पदार्थ में क्यों रुचि है? मैंने उत्तर दिया कि मई 1995 से मैं अलीगढ़ में विकलांगों के लिए एक निःशुल्क ‘सेवा कृत्रिम अंग केन्द्र, अलीगढ़’ चला रहा हूँ। इस कार्य को प्रारम्भ करने का श्रेय मैं तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा (जो सन 1950 में लखनऊ विश्वविद्यालय में मेरे गुरु थे) ने नवंबर, 1994 में विकलांगता विषय पर आधारित मेरी एक विस्तृत संदर्भ पुस्तक ‘रिहैबिलिटेशन ऑफ फिजिकली हैण्डीकैप्ड’ के विमोचन के उपरान्त मुझे प्रेरित किया था और कहा था कि मैं विकलांगों की सहायता के लिए ऐसा कार्य करूँ जो उनको सीधा लाभ पहुँचाये। उसके उपरान्त कलाम साहब ने मुझसे पूछा कि इस नवीन विकसित पदार्थ की जानकारी मुझे कहा से मिली तो मैंने उन्हें बताया कि इसके संबंध में एक लेख ‘इंडिया टुडे’ में प्रकाशित हुआ था। इसके उपरान्त दूसरे पत्र के विषय पर चर्चा चली जो मेरी द्वारा प्रस्तावित रचनात्मक विचारों के भंडार की स्थापना के संदर्भ में था। डॉ. कलाम को याद आ गया और कहा कि यह पत्र हाल ही में मिला था और उत्तर में कहा कि इस प्रकार के बैंक की स्थापना की आवश्यकता है जो देश के विकास में उपयोगी साबित होगी। जैसे ही में सीट से उठकर जाने लगा तो उन्होंने पूछा कि आप और क्या करते हैं तो उत्तर में मैंने बताया कि कुछ वर्ष पूर्व डाक एवं तार विभाग के लिए एक ऐसा उपकरण (टिकिट कैन्सिलेशन मशीन) का नवाचार किया है जिसका सफल प्रयोग भारत के प्रथम अंतरिक्ष यात्री स्क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा ने अंतरिक्ष उड़ान में अप्रैल, 1984 में किया था। इसके अलावा मैंने उनको बताया कि एक और महत्वपूर्ण ‘रेलवे टिकट डेटिंग मशीन’ का नवाचार किया है जिससे भारतीय रेलवे को लगभग 200 करोड़ रुपये का प्रतिवर्ष अतिरिक्त आर्थिक लाभ हो रहा है। इतनी बड़ी रकम को सुनकर उन्को कुछ संशय हुआ तो उनके इस संशय को दूर करने के लिए मैंने बताया रेलवे बोर्ड के चेयरमैन द्वारा अपने पत्र में इसकी पुष्टि की गयी है।
कलाम साहब ने मुझसे पूछा कि आप किस कार्य से पूना जा रहे हैं। मैंने बताया कि भारतीय विज्ञान कांग्रेस में डॉ.आर.ए.माशेलकर ने इन्नोवेशन इंडिया प्रदर्शनी तथा इन्नोवेशन विषय पर एक सत्र बुलाया है जिसमें भाग लेने के लिए मुझे आमंत्रित किया है। डॉ. कलाम ने मुस्कुराकर कहा कि अगली मुलाकात भारतीय विज्ञान कांग्रेस में होगी। परन्तु यह संभव न हो सका।
हमारी दूसरी मुलाकात सितम्बर 2000 के अंत में हुई जब वे भारत सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार थे और उनका दर्जा कैबिनेट मंत्री का था। समय से पूर्व पहुंचने के कारण मुझे और मेरी पत्नी को डॉ.वाई.एस.राजन जो उनके वैज्ञानिक सचिव के रूप में कार्य कर रहे थे उनके कमरे में बैठाया गया। जैसे ही डॉ. राजन अपने कमरे में आये मेरा परिचय प्राप्त करने के उपरान्त उन्होंने तुरन्त कलाम साहब को इसकी सूचना दी। डॉ. राजन ने बताया कि डॉ. कलाम हमसे स्वयं मिलने उनके कमरे में आ रहे हैं। मुझे यह शिष्टाचार के विरूद्ध लगा। डॉ. राजन ने फिर कलाम साहब से बात की और वे मेरे अनुरोध को मान गये। इससे हम दोनों को पता लगा कि कलाम साहब कितने सहृदय एवं विनम्र हैं। इस छोटी सी मुलाकात में कलाम साहब ने मेरे परिवार, मेरी शिक्षा, सेवाकाल, देश-विदेश की यात्राओं, नवाचारी कार्यों की सफलता के विषय में विस्तृत जानकारी प्राप्त की और मुझे और अधिक उत्तम कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया। हम दोनों उनके इस सद्व्यवहार से भाव-विभोर हो गये।
हमारी तीसरी मुलाकात कलाम साहब से विज्ञान भवन, नई दिल्ली में 02 जनवरी, 2001 को नवाचार विषय पर प्रकाशित पुस्तक ‘मेकिंग इंडिया इन्नोवेटिव’ के लोकार्पण के अवसर पर हुई। पुस्तक के लोकार्पण के पश्चात कलाम साहब ने उस पर अपने आशीर्वचन दर्ज किये, जिसमें लिखा था, ‘श्री लक्ष्मण प्रसाद जी को उनके समाज के प्रति उत्कृष्ट योगदान के लिए मेरी शुभकामनाएं एवं अभिवादन।’ समय बीतता गया। इस बीच मैं अमेरिका और कनाडा में 2.3 माह रहने के उपरान्त वापिस आया तो उसके बाद अगस्त 2001 में कलाम साहब से चौथी बार मिलने का अवसर मिला। बातों-बातों में उन्होंने मुझसे पूछा कि इस दौरे का उपयोग मैंने किस प्रकार किया। उत्तर में मैंने बताया कि वहां पर छोटे-छोटे उपयोगी आविष्कार/नवाचार संबंधित अनेक पुस्तकों को पढ़ा। जिज्ञासावश कलाम साहब ने कुछ आविष्कार संबंधित प्रश्न किये और कहा कि एक छोटे से इनोवेशन की कहानी सुनाये। मैंने विस्तृत रूप से बताया कि 1952 में अमेरिका की एक 27 वर्षीय महिला टाइपिस्ट ने किस प्रकार से करेक्शन फ्लुड (व्हाइटनर) का आविष्कार किया जिसका दुनिया के सभी देशों में स्वागत हुआ। इस छोटे से विचार की सफलता ने उसको मालामाल कर दिया। दुर्भाग्यवश 1979 में उस महिला का देहावसान हो गया और वसीयत के अनुसार 2ण्5 करोड़ डॉलर अपने बेटे को और 2ण्5 करोड़ डॉलर परोपकारी एवं धर्मार्थ कार्यों के लिए छोड़ गयी। कलाम साहब को यह कथा बहुत भायी और एक और दूसरी कथा को सुनाने के लिए मुझसे कहा तो मैंने बैंड-एड की सफलता की कहानी सुनाई। जिसको एक साधारण से श्रमिक ने जॉनसन एण्ड जॉनसन कंपनी में कार्य करते हुए निर्माण किया। यह कंपनी के लिए आर्थिक रूप से सबसे अधिक लाभदायक पदार्थ साबित हुआ और इस छोटे से उत्पाद से यह श्रमिक तरक्की करते-करते कंपनी के सीनियर वाईस-प्रेसिडेंट के पद तक पहुँचा। इन दो छोटे-छोटे इन्नोवेशन की कहानी को सुनने के बाद उन्होंने मुझे सलाह दी कि मैं भविष्य में छोटे-छोटे सफल आविष्कार/इनोवेशन से संबंधित पुस्तकें हिंदी में लिखूं क्योंकि इस प्रकार का साहित्य न हिंदी भाषा में और न अन्य प्रादेशिक भाषाओं में प्रकाशित किया गया है। डॉ. कलाम की इस सलाह के उपरांत मैंने उन्हें बताया कि मैं आपके लिए अमेरिका से एक छोटा सा तोहफा लेकर आया हूँ। कलाम साहब ने तुरंत ही कहा कि मैं तो टाई नहीं लगाता। उत्तर में कहा कि मैंने तो आपको पूना में टाई पहने हुए देखा है और आपका एक फोटो भी टाई लगाये हुए मेरे पास है। कलाम साहब मुस्कुराए और कहा कि मेरे पास दो टाई हैं और वे पर्याप्त हैं। इसलिए मुझे और टाई की जरूरत नहीं है और यदि आप मुझे देंगे तो वे बेकार पड़ी रहेगी। यह सुनकर मैं निराश हो गया और यह देखकर कलाम साहब ने मुझसे कहा कि आप टाई मुझे दे दें। मैंने तुरंत सादर टाई भेंट कर दी। टाई हाथ से लेकर उन्होंने कहा कि अब यह मेरी चीज हो गई और मैं जैसे चाहूं वैसे इसका प्रयोग कर सकता हूं। मैंने सहमति में सिर हिला दिया। अब कलाम साहब ने कहा कि आप अक्सर आईआईटी या आईआईएम में वार्तालाप के लिए आमंत्रित किये जाते हैं इसलिए वहां के किसी प्रतिभावान छात्र को इसे मेरी ओर से भेंट कर दें।
कलाम साहब की सलाह ने मुझको हिंदी भाषा का लेखक बना दिया। उनकी सलाह के उपरांत मेरी 12 पुस्तकें हिंदी में प्रकाशित हुई हैं। अधिकतर पुस्तकों का विमोचन कलाम साहब के कर-कमलों द्वारा संपन्न हुआ और सौभाग्यवश हिंदी में प्रकाशित दो पुस्तकों को भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय सम्मान से पुरस्कृत भी किया गया है। सौभाग्यवश सन 1999 में कलाम की दो पुस्तकें ‘इंडिया-2020’ एवं ‘विंग्स ऑफ फायर’ पढ़ने के उपरान्त मुझे लगा कि कलाम साहब 2020 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं। उनकी इस प्रकार की दृष्टि को साकार करने के लिए नवाचारों की अहम भूमिका निभायेंगे। इसलिए मैंने कलाम साहब के जन्म दिवस 15 अक्टूबर को ‘नवाचार दिवस’ प्रत्येक वर्ष सन 2000 से मनाने की पहल एवं शुरूआत की जो पिछले 15 सालों से देश के अनेक स्कूलों में प्रतिवर्ष मनाया जा रहा है।
अत्यंत व्यस्तता के कारण डॉ. कलाम 2000 एवं 2001 के नवाचार दिवस के अवसर पर अलीगढ़ आने में असमर्थ थे। जब 2001 के अंत में डॉ. कलाम ने भारत सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार पद को त्यागा और अन्नामलै विश्वविद्यालय में छात्रों को पढ़ाने का दायित्व ले लिया तो मैंने मई 2002 में अमेरिका जाने से पूर्व कलाम साहब से टेलीफोन पर प्रार्थना की कि इस वर्ष ‘नवाचार दिवस’ के अवसर पर अलीगढ़ आने की अवश्य ही स्वीकृति प्रदान करें। मेरी प्रार्थना को स्वीकर करते हुए कहा कि मैं अलीगढ़ सीधा पहुँच जाऊँगा और मुझे दिल्ली एयरपोर्ट से अलीगढ़ लाने के लिए आप कोई व्यवस्था न करें। सलाह दी कि नवाचार दिवस मनाने का कार्यक्रम किसी साधारण से स्कूल में रखा जाए और मेरे आने के विषय में अधिक प्रचार-प्रसार नहीं किया जाए। समय तेजी से बदला और डॉ. कलाम बहुमत से राष्ट्रपति चुनाव में विजयी हुए। देश ने पहली बार एक वैज्ञानिक को राष्ट्रपति पद पर सुशोभित किया जिसने अपनी लगन, कार्यकलापों और सभी के प्रति सद्व्यवहार के कारण ‘जनता के राष्ट्रपति के रूप में लोकप्रिय हुए।’
कलाम साहब से राष्ट्रपति के रूप में एवं राष्ट्रपति पद छोड़ने के उपरान्त अनेक मुलाकातें हुईं उनके विषय में बहुत कुछ लिखा जा सकता है परंतु इस लेख को कुछ पृष्ठों तक ही सीमित रखना है तो दो-चार मुलाकातों के बारे में लिखना उचित होगा। एक बार उनके जन्म दिवस पर मैंने एक सुंदर सा बधाई पत्र के साथ-साथ मेरे द्वारा आम की गुठली से बनाये गये लकड़ी के बोर्ड का सेम्पल भेजा था। शीघ्र ही कलाम साहब ने टेलीफोन पर उसके विषय में चर्चा की और मेरे आम की गुठलियों से बने बोर्ड के पीछे निहित विचार की तारीफ भी की और कहा कि बोर्ड बनाने के बजाय इसका कम्पोजिट पदार्थ बनाया जाए तो अधिक उपयोगी रहेगा। उसके लिए उन्होंने यह सेम्पल आगे कार्यवाही के लिए टाईफैक को भेज दिया। इसे पता चलता है कि कलाम साहब छोटे-छोटे कामों में भी इतनी अधिक दिलचस्पी लेते हैं।
कलाम साहब के राष्ट्रपति बनने के उपरान्त मेरी और मेरे सभी परिवारजनों की मुलाकात डॉ. कलाम से राष्ट्रपति भवन में 2003 के आरंभ में हुई। इसमें मेरी 88.89 वर्षीय सासू माँ ने उनका शॉल पहनाकर अभिनन्दन किया तो मैंने कलाम साहब की आंखों में आंसू छलकते देखे और मुझे ऐसा लगा कि शायद उनको आपनी माँ की याद आ गयी होगी। जब हमारे परिवार का फोटो खिंचने वाला था तो कलाम साहब ने फोटोग्राफर को रोका और सासू माँ से कहा ‘अम्मा, यू टेक योर स्टिक विद यू दैन वी विल हैव फोटोग्राफ’ इससे पता चलता है कलाम साहब बुजुर्गों के प्रति कितने विनम्र एवं संवेदनशील थे। कलाम साहब एक गहन चिंतक, विचारक के साथ-साथ विनोद स्वभाव के व्यक्ति थे। सन 2004 में राष्ट्रपति भवन में मैंने अपने एक नये आविष्कार ‘करेंसी नोट फास्टनर’ जिसे 100 नोटों की गड्डियों को कसने के लिए बनाया था कसने के बाद उसमें से एक भी नोट को गड्डी से नहीं निकाला जा सकता , दिखाया तो वे बहुत खुश हुए और उसकी तारीख भी की और उसको खुद 3.4 बार चलाकर देखा। जब मैंने कहा कि गड्डी डमी नोटों की है तो उन्होंने हँसकर कहा इसीलिए मैं इसको अपने पास रख सकता हूँ।
अलीगढ़ मण्डल के एक मण्डलायुक्त डॉ. पी.वी.जगनमोहन, आईएएस जो हिन्दी, अंग्रेजी एवं तमिल भाषा के एक अच्छे लेखक थे धीरे-धीरे उनकी मित्रता मुझसे हो गयी और घर आना-जाना भी होता रहता था। एक बार उन्होंने कहा कि आप मुझे कलाम साहब से मिलायें। इस कार्य के लिए बहुत इंतजार नहीं करना पड़ा और कलाम साहब से भेंट करने का समय जल्दी ही मिल गया। मैं, मेरी पत्नी एवं डॉ. जगनमोहन कलाम साहब से मिलने पहुंचे तो परिचय कराते समय मैंने कलाम साहब को बताया कि डॉ. जगनमोहन अलीगढ़ मण्डल के मण्डलायुक्त है। कलाम साहब ने मुस्कुराते हुए डॉ.जगनमोहन ने कहा कि मैं 4 जनपदों की जनता का एक छोटा सा सेवक हूँ। इस उत्तर को सुनते ही कलाम साहब बहुत खुश एवं प्रसन्न हुए और आगे की बातों का सिलसिला बढ़ता चला गया।
यह लिखना गलत नहीं होगा कि कलाम साहब मुझे घर बैठे बड़ा बना गये। जून 2008 में जब वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्याल के दीक्षान्त समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में अलीगढ़ पधारे थे तो 17 जून की शाम को लगभग 6 बजे मेरे पास फोन आता है कि कलाम साहब आपसे मिलना चाहते हैं। मैंने पूछा कि मैं किस जगह और किस समय पर कलाम साहब से मिलने पहुंचूं  तो उत्तर मिला कि यदि आप घर पर हैं तो वे शीघ्र ही आपसे मिलने पहुंचेंगे। इस प्रकार की सूचना पाकर हम सब हक्के बक्के रह गये। सुरक्षा की दृष्टि से जब एसएसपी अलीगढ़ मेरे सोफा सैट आदि की चैकिंग कर रहे थे तभी कलाम साहब मेरे घर आ पहुंचे और मैंने बहुत ही जोशीले ढंग से दरवाजे पर उनका स्वागत किया। अनेक विषयों पर चर्चा के बाद जब कलाम साहब को नाश्ता कराने के लिए ले गया तो पत्नी की गैर-हाजिरी में मेरी पुत्री ने कलाम साहब से पूछा कि क्या इडली खाना पसंद करेंगे? उत्तर मिला-हाँ। कलाम साहब ने इडली और कॉफी का नाश्ता बहुत ही प्रेमपूर्वक किया और बीच-बीच में फोटो एलबम देखकर पुरानी यादें ताजा हुई। 30.35 मिनट के बाद कलाम साहब के घर से विदा होने के बाद एक पत्रकार ने मुझसे पूछा कि आपको कलाम साहब का आना कैसा लगा रहा है? मैंने कहा कि कलाम साहब का इस प्रकार मेरे घर आना एक दुर्लभ सम्मान से कम नहीं है और एक महान आत्मा के आने से मेरा घर पवित्र हो गया। उसके बाद उसने मेरी पुत्री से सवाल किया तो उसने बताया कि डॉ.कलाम का अचानक आगमन कलियु में ‘कृष्ण-सुदामा जैसी दोस्ती’ से किसी भी रूप में कम नहीं है।
2007 में कलाम साहब की प्रेरणा के कारण मेरे निर्देशन में ग्रामीण क्षेत्र में जनता के आर्थिक सहयोग एवं दान से एक आदर्श एवं नवाचारी स्कूल 2009 में आरंभ हुआ और मेरे अनुरोध पर 2 नवंबर, 2010 को कलाम साहब विद्यालय में पधारे और लगभग 1 घंटे तक विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को संबोधन एवं संवाद किया। डॉ. कलाम विद्यापीठ के वातावरण एवं प्रगति से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने लिखित संदेश में शुभकामनाओं के साथ विद्यापीठ को एक महान स्कूल की संज्ञा दी जो विद्यापीठ के लिए एक अनमोल उपलब्धि से कम नहीं है। डॉ. कलाम की शुभकामनाओं एवं आशीर्वाद से इस छोटे से ग्रामीण विद्यालय के सभी कार्य आसानी से आगे बढ़ते गये और इसने 4 साल की अल्प अवधि में कुछ असाधारण उपलब्धियाँ अर्जित की हैं जैसे विद्यापीठ का शिलन्यास 4 छात्रों एवं 1 छात्रा द्वारा किया गया तथा प्रथम इन्नोवेशन प्रदर्शनी का उद्घाटन विद्यापीठ की एक सबसे छोटी लड़की एवं लड़के से सम्पन्न हुआ। इसके अलावा 4 महत्वपूर्ण पुस्तकें एवं 4 पत्रिकाओं का सफलतापूर्वक प्रकाशन हुआ। सीबीएसई बोर्ड से बगैर किसी लेन-देन के संबद्धन प्राप्त हुआ और 2012-13 में एनसीईआरटी ने नवाचारी परियोजना के अन्तर्गत ‘नवाचारी शिक्षण प्रवृत्तियों द्वारा विद्यार्थियों में सृजनात्मक चिंतन’ को बढ़ावा देने के फलस्वरूप राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया एवं रू. 20000ण्00 का नकद इनाम भी दिया गया जो अपने आप में एक कीर्तिमान से कम कम नहीं है।
लगभग 10 वर्ष पूर्व कलाम साहब के 75वें जन्म दिवस पर मैंने ‘कर्मयोगी कलाम’ नाम से पुस्तक प्रकाशित करने की योजना बनाई और अपने मित्रों से इसके लिए लेख लिखने के लिए प्रार्थना की। एक/दो मित्रों ने कर्मयोगी शब्द के प्रयोग पर संशय किया। इस प्रकाशित पुस्तक को जब मैंने कलाम साहब को भेंट किया तो उन्होंने भी मुझसे प्रश्न किया कि आपने मुझे कर्मयोगी कैसे बना दिया। उत्तर में मैंने कहा कि वास्तव में आप मन, कर्म एवं वचन से पूर्णरूप से कर्मयोगी हैं। जिस तरह उन्होंने कर्म करते हुए अपने शरीर को त्यागा उससे पूर्ण रूप से सिद्ध हो गया है कि वे वास्तव में सच्चे कर्मयोगी थे। ऐसे कर्मयोगी को मेरा शत्-शत् नमन, प्रणाम एवं श्रद्धांजलि।

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