विशेष

(20/Oct/2015)

सपने बड़े देखो!

भारत के लिए मेरे पास तीन विजन है। हमारे 3000 साल के इतिहास में, दुनियाभर से लोग आए और हम पर धावा बोला। हमारी जमीनें हड़पीं, हमारे दिमाग अपने अधीन कर लिए। पर ऐसा सलूक हमने कभी भी किसी दूसरे मुल्क के साथ नहीं किया क्यों? क्योंकि हम दूसरों की आजादी का भी सम्मान करते हैं।
यही मेरा पहला विजन है- आजादी।
भारत ने आजादी का पहला विजन पाया वर्ष 1857 में। जब हमने आजादी के लिए लड़ाई की शुरुआत की। वह आजादी ही है, जिसकी हमें रक्षा करनी चाहिए, पोषण करना चाहिए और आगे बढ़ाना चाहिए। अगर हम आजाद नहीं है तो कोई हमारी कद्र नहीं करेगा।
मेरा दूसरा विजन है-विकास। बरसों से हम विकासशील देश हैं। अब वह वक्त है जब हम खुद को विकसित राष्ट्र की तरह देखें। आज दुनियाभर में हमारी उपलब्धियों ने जगह बनाई है। पर फिर भी खुद को एक विकसित, आत्मनिर्भर राष्ट्र के तौर पर देखने के लिए हमारे भीतर आत्मविश्वास की कमी है। क्या यह स्थिति गलत नहीं है?
मेरा तीसरा विजन है कि भारत दुनिया के समक्ष खड़ा हो। मेरा विश्वास है कि भारत जब तक दुनिया के सामने खड़ा नहीं होगा तब तक हमारी कोई इज्जत नहीं करेगा। दुनिया में ताकत ही ताकत का सम्मान करती है। हमें न सिर्फ सैन्य शक्ति बनना है बल्कि एक आर्थिक शक्ति भी। दोनों साथ-साथ चलने चाहिए। हमारे पास कई चकित करने वाली सफल कहानियां हैं लेकिन फिर भी हम उन्हें स्वीकार नहीं करते। आखिर क्यों? दुनिया में दूध उत्पादन में हम नम्बर एक हैं। रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट में हम पहले पायदान पर हैं। गेहूं और चावल के दूसरे बड़े उत्पादक हैं। ऐसी लाखों उपलब्धियां हैं पर हमारा मीडिया केवल नकारात्मक, विफलता वाली खबरों के प्रति ही आसक्त रहता है। मैं एक बार तेलअवीव में था और एक इजरायली अखबार पढ़ रहा था। उस वक्त वहां हमले और बम धमाके हो रहे थे। लोग मारे गए थे। पर उस अखबार के मुख्य पृष्ठ पर एक यहूदी आदमी की तस्वीर थी, जिसने पांस साल में घनी रेतीली जगह को ऑकिड और अन्नभंडार में तब्दील कर दिया था। यह एक प्रेरणादायी तस्वीर थी, जिससे लोग सुबह-सुबह रूबरू हुए। वहीं बमबारी धमाकों और मौत की खबरें अखबार के अंदर वाले पृष्ठों पर थी। पर भारत में हमारे अखबारों के पन्ने नकारात्मक खबरों से ज्यादा रंगे रहते हैं। आखिर हम इतने नकारात्मक क्यों है? एक और सवाल। हम भारतीयों को विदेशी वस्तुओं के प्रति इतनी आसक्ति क्यों है? हमें विदेशी टेलीविजन, विदेशी कपड़े क्यों चाहिए? हमें विदेशी तकनीक चाहिए। क्या हमें यह अहसास नहीं होता कि आत्मसम्मान सिर्फ आत्मनिर्भरता से ही आता है।
एक 14 साल की बच्ची ने मुझसे ऑटोग्राफ मांगा। मैंने उससे पूछा कि तुम्हारा जीवन में क्या लक्ष्य है? उसने जवाब दिया- मैं एक विकसित भारत में रहना चाहती हूं। उसके लिए, आप और मुझे विकसित भारत बनाना होगा। आप कहते हैं कि हमारी सरकार अक्षम है। आप कहते हैं कि हमारे कानून बहुत पुराने हैं। आप कहते हैं कि नगरपालिका कचरा नहीं उठाती। रेेलवे का मजाक उड़ाया जाता है, एयरलाइन दुनिया में सबसे खराब बताई जाती है। चिट्ठी-पत्री सही पते पर नहीं पहुंचती। आप कहते ही रहते हैं। पर आप इस बारे में करते क्या हैं?
आप सिंगापुर जाते हैं, तो वहां आप राह चलते सिगरेट पीकर नहीं फेंकते। किसी स्टोर में कुछ खा नहीं सकते। दुबई में रमजान के दौरान आप सार्वजनिक तौर पर कुछ खाने की हिमाकत नहीं कर सकते। वॉशिंगटन में आप 88 कि.मी. प्रति घंटे से ज्यादा गाड़ी दौड़ाने की नहीं सोचेंगे। टोक्यों जाते हैं तो वहां की सड़कों पर पान की पीक नहीं थूकते। हम वही लोग हैं, जो विदेश जाकर तो नियम-कायदों को पूरा-पूरा पालन करते हैं पर भारत में कूड़ा-करकट, सिगरेट सब सड़कों पर फेंकेंगे। सोचते हैं कि सरकार सफाई कराए हम खुद नहीं करें। हर कोई सिस्टम को गाली देने में लगा रहता है सिर्फ पैसा कमाना ही हमारी प्राथमिकता रहता है। खुद से पूछिए कि हम भारत के लिए क्या कर सकते हैं। वह काम करिए जिससे भारत भी अमरीका और अन्य पश्चिमी देशों जैसा बन सके। आप किसी अन्य देश जाते हैं तो वहां उस देश के नियम-कायदों जैसा व्यवहार करते हैं लेकिन जैसे ही अपने यहां के हवाई अड्डे पर उतरे तो फिर आप वहीं हो जाते हैं जैसे कि आप वास्तव में हैं। यदि आप सिंगापुर जाएं तो वहां आप भारत की तरह कहीं भी सड़क पर सिगरेट के बचे हुए टुकड़े नहीं फेंक सकते शॉपिंग मॉल या रेस्तरां में समय बिताने के बाद यदि आपने वहां निर्धारित समय से अधिक समय बिताया है तो आपको दोबारा से पंच करके पार्किंग का अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है। वहां इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस स्तर के व्यक्ति हैं और आपकी पहचान क्या है? 
हम तो बस एक बार मतदान करते हैं और अपनी जिम्मेदारियों से मुक्ति पा लेते हैं। हम चाहते हैं कि अब जो करे सो सरकार ही करे। हमारा सहयोग नकारात्मक ही रहता है। हम चाहते तो है कि सरकार साफ-सफाई रखे, लेकिन हम कचरे को इधर-उधर फेंकने से बाज नहीं आते। हम रास्ते में पड़ा एक टुकड़ा भी कचरा पात्र में डालने की कोशिश नहीं करते हम चाहते हैं रेलवे हमें स्वच्छ बाथरूम उपलब्ध कराए लेकिन हम उसके उचित इस्तेमाल के बारे में सीखना तक नहीं चाहते। हम चाहते हैं कि इंडियन एयरलाइंस या एयर इंडिया में सर्वश्रेष्ठ भोजन और टॉयलेटरी (प्रसाधन) मिले लेकिन हम कोई मौका नहीं चूकना चाहते उन्हें पार कर ले जाने का। यह बात इन सेवाओं के स्टॉफ पर भी लागू होती है जिन्हें इस पार नहीं होने देने के बारे में पता है।
यदि हम महिलाओं, कन्या, शिशु, दहेज आदि जैसे सामाजिक मुद्दों की बात करें तो हम अपने घरों के ड्राइंग रूम में बैठकर खूब जोर-जोर से अपना विरोध प्रदर्शित करते हैं। लेकिन जब बात खुद पर आती है तो हम पलट जाते हैं। वास्तविक सकारात्मक सहयोग के नाम पर हम खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित दायरे में बांध लेते हैं और फिर ऐसे देखते हैं कि देश के किसी दूर-दराज कोने से कोई मिस्टर क्लीन जादुई झाडू के साथ आएगा और अपने ही हाथों से उसे चमत्कारिक ढंग से स्वच्छ बनाएगा। यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो हम कायरों की भांति देश छोड़कर अमरीका चले जाएंगे। जब न्यूयार्क असुरक्षित हो जाएगा तो हम इंग्लैंड की ओर भागेंगे। जब इंग्लैंड में रोजगार नहीं मिलेगा तो हम खाड़ी देशों की ओर उड़ान भरेंगे। जब खाड़ी में युद्ध के हालात होंगे तो हम भारत सरकार से मांग करेंगे कि हमें सुरक्षित निकाल लो और घर वापस बुला लो। समझ नहीं आता कि देश को सभी गालियां देने में क्यों लगे हैं और गरिमा के साथ खिलवाड़ क्यों किया जा रहा है?