विशेष

(07/Jul/2015)

‘इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए’ 250वाँ अंक विमोचन समारोह

 

  • नाटक ‘गैलिलियो’ का मंचन 
  • विज्ञान फिल्म प्रदर्षन 
  • विज्ञान विमर्ष 
  • टेलीस्कोप निर्माण एवं आकाष दर्षन कार्यषाला 
  • विज्ञान मॉडलों एवं प्रयोगों का प्रदर्षन 
  • विज्ञान फिल्मों का प्रदर्षन 
  • चलित विज्ञान प्रदर्षनी 
  • कम्प्यूटर आधारित गतिविधियाँ।

 आईसेक्ट विष्वविद्यालय भोपाल में ‘इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए’ 250वें अंक का विमोचन समारोह संपन्न हुआ। समारोह में विभिन्न सत्रों में विज्ञान से संबंधित गतिविधियां आयोजित की गईं जिसमें महान नाटककार ब्रेख्त द्वारा रचित एवं संतोष चौबे द्वारा अनूदित नाटक गैलिलियो का मंचन किया गया। विज्ञान प्रसार द्वारा विज्ञान फिल्मों का प्रदर्षन हुआ। विज्ञान परिचर्चा एवं विमर्ष के अंतर्गत ‘हिन्दी में विज्ञान लेखन: स्थिति एवं चुनौतियां’ तथा ‘विज्ञान का गल्प’ विषय पर चर्चा की गई। प्रष्नोत्तर सत्र में विज्ञान प्रेमियों की जिज्ञासा पर विज्ञान संचारकों एवं विज्ञान लेखकों द्वारा बात की गई। टेलिस्कोप निर्माण और आकाषदर्षन कार्यषाला, विज्ञान मॉडलों एवं प्रयोगों का प्रदर्षन आदि इस समारोह का मुख्य आकर्षण रहे।

‘इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए’ 250वें अंक का विमोचन समारोह आईसेक्ट विवि भोपाल में संपन्न हुआ जो कि विज्ञान-विमर्ष का जरिया बना। इस अवसर पर देष भर के विज्ञान लेखक, विज्ञान संचारक और विज्ञानप्रेमी उपस्थित हुए। समारोह में चार विभिन्न गतिविधियाँ सम्पन्न हुईं जिसमें पत्रिका का विमोचन, नाटक ‘गैलिलियो’ का मंचन, विज्ञान फिल्म प्रदर्षन तथा दो विचार सत्रों में विज्ञान परिचर्चाएं की गईं। पत्रिका का विमोचन मनोज पटैलिया, षरदचंद्र बेहार, इं.अनुज सिन्हा, डॉ.वि.दी. गर्दे, मनमोहन बाला, संतोष चौबे और विनीता चौबे द्वारा किया गया। विमोचन के दौरान संपादक संतोष चौबे ने 250वे अंक तक की इलेक्ट्रॉनिकी प्रकाषन यात्रा पर प्रकाष डाला। उन्होंने कहा कि आरंभ के वर्षों में ही हमने यह महसूस कर लिया था कि सिर्फ सरकारी सहयोग पर निर्भर रहकर कोई पत्रिका सतत रूप से नहीं निकाली जा सकती है। दूसरे इलेक्ट्रॉनिक्स, कम्प्यूटर और दूरसंसार जैसे विषयों पर लिखने वाले लोगों को देष में उँगलियों पर गिना जा सकता था और उनमें से अधिकतर दिल्ली जैसे बड़े षहरों में थे और बहुत व्यस्थ थे। इसलिए लेखकों के साथ हमें नए लेखकों को पैदा भी करना था। हमने इस दिषा में काम करते हुए अपना नेटवर्क तैयार किया। आरंभ के कुछ वर्षों में राष्ट्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार परिषद का सहयोग प्राप्त हुआ, बाद के वर्षों से अब तक इसका प्रसार-प्रचार हमारे नेटवर्क द्वारा हुआ। फलस्वरूप पत्रिका की पाठकीय संख्या तीस हजार हो गई। कभी-कभी प्रकाषन का आँकडा 50 हजार तक पहुँचा। इस अवसर पर मनोज पटेरिया, षरद चंद्र बेहार ने पत्रिका के प्रकाषन के संदर्भ में अपना अनुभव साझा किए।
द्वितीय सत्र में ब्रेख्त द्वारा रचित और संतोष चौबे द्वारा अनूदित नाटक ‘गैलिलियो’ का मंचन रंगकर्मी मनोज नायर के कुषल निर्देषन में हुआ जिसमें अपने एक मित्र सेग्रेड़ो के सवाल ‘‘ईष्वर कहाँ है?’’ के जवाब में गैलिलियो कहता है कि या तो वह सब में है या कहीं नहीं।
ब्रेख्त जैसे महान नाटककार की यह खूबी है कि वे बार-बार अंतस की बात को जनोन्मुखी बनाते है और विज्ञान के बरास्ते कला की ओर मुड़ते हैं। वे बार-बार यह भी साबित करते हैं कि वस्तुतः विज्ञान और कला एक ही तत्व के दो अभिरूप हैं। इस नाटक के अनुवादक भी वस्तुतः इसी परिपाटी के रचनाकार हैं। गैलिलियो और सेग्रेड़ो के संवाद में यह बात उकेरी गई है-
सेग्रेडो    ः    गैलीलियो तुम्हारी बुद्धि क्या पूरी तरह नष्ट हो गई है? क्या तुम बिल्कुल नहीं समझते कि तुम क्या कर रहे हो? अगर जो तुम कह रहे हो वह सच है तो इसका अर्थ है धरती अन्य तारों की तरह सिर्फ एक तारा है, ब्रह्मांड का केन्द्र नहीं।
गैलीलियो    ः    निश्चित ही और इस विशाल ब्रह्मांड अन्य तारे ग्रह और उपग्रह हमारी इस छोटी सी धरती के आसपास चक्कर नहीं लगाते।
सेग्रेडो    ः    तो इस विशाल ब्रह्मांड में सिर्फ ग्रह और तारे हैं? तो ईश्वर कहां है?
गैलीलियो     ः    क्या मतलब?
सेग्रेडो     ः    ईश्वर। ईश्वर कहाँ है?
गैलीलियो     ः    मुझे क्या पता? मैं कोई दार्शनिक थोड़े हूँ। मैं तो गणितज्ञ हूँ।
सेग्रेडो    ः    सबसे पहले तुम एक आदमी हो, और एक आदमी के नाते मैं तुमसे पूछता हूँ ... ईश्वर कहाँ है?
गैलीलियो    ः    या तो वह हम सबमें है ... या कहीं नहीं है।
सेग्रेडो    ः    और यही कहने पर बू्रनो को जिंदा जला दिया गया था।
गैलीलियो    ः    उसने सिर्फ कहा था मैं सिद्ध करके दिखा सकता हूँ।
इसके पूर्व संचालक विनय उपाध्याय ने इसी संदर्भ में अपनी बात रखते हुए कहा- विज्ञान लेखन और विज्ञान जनसंप्रेषण के क्षेत्र में चली आ रही परंपरा से हटकर आईसेक्ट और ‘इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए’ ने नए मानक रचे हैं। इसमें न केवल श्रेष्ठ प्रकाषन की वृहद शंृखला ‘अनुसृजन’ के माध्यम से षुरू की गई बल्कि आईसेक्ट स्टुडियो के माध्यम से रेडियो में विज्ञान पत्रिका और रंगमंच के माध्यम से विज्ञान नाटकों को जन सम्प्रेषण से जोड़ने की पहल की।
तीसरे सत्र में विज्ञान प्रसार द्वारा विज्ञान फिल्मों का प्रदर्षन किया गया। सबीर अब्बास द्वारा निदेर्षित ‘वेनेषिंग वल्चर’ और मेथ्यु रहमान द्वारा निर्देषित ‘साइंस विवाइंड इंडियन मोनोवेषन’ फिल्मों के जरिए पर्यावरण के बिगड़ते संतुलन तथा मोनोमीटर साइंस को रेखांकित किया गया। ‘वेनेषिंग वल्चर’ पर चर्चा करते हुए कपिल तिवारी ने बताया कि हमारी प्राकृति संपदा के संतुलन में गिद्धों का महत्वपूर्ण योगदान है।
चौथा सत्र विज्ञान पर केन्द्रित रहा। इस सत्र में ‘हिन्दी में विज्ञान लेखन: स्थिति और चुनौतियाँ’ तथा ‘विज्ञान का गल्प’ विषय पर परिचर्चा हुई। इन दोनों सत्रों में देवेन्द्र मेवाड़ी, मनमोहन बाला, डॉ. प्रदीप मुखर्जी, पुष्पेन्द्र पाल सिंह, रविषंकर श्रीवास्तव, डॉ. प्रबल राय, डॉ. जाकिर अली ‘रजनीष’, डॉ.गिरिजा षंकर षर्मा, इरफान ह्यूमन, सुभाष चंद्र लखेड़ा, डी.डी.ओझा आदि ने वक्तव्य दिये। विमोचन समारोह के अवसर पर टेलिस्कोप निर्माण और आकाष दर्षन कार्यषाला आयोजित की गई जिसमें विष्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने भाग लिया। आंचलिक विज्ञान केन्द्र द्वारा विज्ञान मॉडलों एवं प्रयोगों का प्रदर्षन, चलित विज्ञान प्रदर्षिनी तथा कम्प्यूटर आधारित गतिविधियों का प्रदर्षन किया गया। इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए के 250वें अंक की यात्रा पर केन्द्रित स्मारिका तथा ए.यू. टाइम्स का विमोचन भी किया गया। समारोह में देष भर से आये विज्ञान लेखक डॉ. मनोज पटेरिया, देवेन्द्र मेवाड़ी, सुभाषचन्द्र लखेड़ा, डॉ. इरफान ह्यूमन, डॉ.डी.डी.ओझा, कपिल त्रिपाठी, डॉ. मनमोहन बाला, मनीष मोहन गोरे, संजय गोस्वामी, राकेश शुक्ला, ओ.पी.शर्मा, धर्मेन्द्र कुमार मेहता, डॉ. जाकिर अली रजनीश, देवव्रत द्विवेदी, राजेन्द्र शर्मा अक्षर, डॉ. अनुराग सीठा, संतोष शुक्ला, डॉ.एन.के. तिवारी, रविशंकर श्रीवास्तव, चक्रेश जैन, डॉ. प्रबल राय, पुष्पेन्द्र पाल सिंह, संतोष कौशिक, डॉ.प्रदीप मुखर्जी, वसंत निरगुणे, कृष्णगोपाल व्यास,  विकास शेंडे, रेखा श्रीवास्तव, एस.पी.सिंह, अनामिका चक्रवर्ती आदि ने भाग लिया। 

ं पिछले पचास वर्षों से कोषिष कर रहा हूँ कि जो लिखूं लोग उसे समझे। मैंने तरह-तरह के प्रयोग किये है इसलिए यह बताना चाहता हूं कि मैं जिस तरह देखता था, समझता था मेरा प्रयास था कि विज्ञान लेखन आम लोगों की भाषा में बता सकूं। मेरे लेखन का सबसे बड़ा मंत्र है कि एक कहे और दूसरा समझे। 

- देवेन्द्र मेवाड़ी
 

भारत में विकास के बावजूद लोग अलग-अलग स्तर पर रह रहे हैं। इतने कम्यूनिकेषन के जमाने में भी गैप है। दो तरह के कल्चर चल रहे हैं, एक तो वे जो वैज्ञानिक विचारधारा रखते हैं, दूसरे वैज्ञानिक विचारधारा नहीं रखते। इन दोनों विचारधाराओं को मिलाना होगा। यदि हम इनको मिला पायेंगे तो विज्ञान ही नहीं समाज बहुत सारी समस्याओं को सुधार पायेंगे।

- मनोज पटेरिया


विज्ञान लेखन के लिए विज्ञान में रुचि जरूरी है और अभ्यास से रुचि बढ़ती है, अनुभव आता है। हर षब्द को जांचे। अनुवाद की भी समस्या है, वैज्ञानिकों के नाम की बात है उसके लिये एक साझा बात जरूरी है। सभी की जुगलबंदी जरूरी है। खेमेबंदी नहीं होना चाहिए।

- प्रदीप मुखर्जी 

मैंने लेखन मिसाइल के बारे में लिखने से षुरू किया। जो साप्ताहिक हिन्दुस्तान में छपता था, ‘इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए’ पत्रिका में मैं पिछले 26 सालों से लिख रहा हूँ। मेरा विष्वास है कि हिन्दी में यदि कोई लिखता है तो हिन्दी में ही सोचे।

- डॉ. मनमोहन बाला

विज्ञान और धर्म दोनों ही मनुष्य की प्रगति के लिए जरूरी है जैसे दूध और मट्ठा दोनों ही स्वास्थ्य के लिए जरूरी होते हैं लेकिन दोनों को मिलाना नहीं चाहिए। हमें विज्ञान लेखन करते समय मौलिकता का ध्यान रखना चाहिए और कॉपी-पेस्ट से बचना चाहिए।

- सुभाष चंद्र लखेड़ा

विज्ञान का लोकप्रियकरण आवष्यक है और यह समय की मांग है। विज्ञान लेखन समाज के लिए उपादेय हो। बाल उपयोगी लेखन की आवष्यकता है। आम आदमी को विज्ञान से जोड़ा जाना चाहिए।

- डी.डी. ओझा

विज्ञान यात्रा कार्यक्रम की लोकप्रियता और विज्ञान के लोकप्रियकरण में बड़ा कदम है। जन सामान्य विज्ञान चेतना जागृत करने में जन-संचार माध्यमों का विषेष योगदान है।

- अनामिका चक्रवर्ती