विशेष

(19/May/2015)

दूर संचार से सूचना संसार तक

गुणाकर मुळे

जल्दी-जल्दी, तेजी से, तुरंत...।  इन शब्दों का अब हम अधिकाधिक उपय्ाोग करने लगे हैं। ये शब्द संचार व्यवस्था में हो रहे क्रांतिकारी परिवर्तन को सूचित करते हैं। य्ह परिवर्तन पिछले करीब पांच दशकों के अल्पकाल में हुआ है, भारत के आजाद होने के समय से हुआ है। दूर-संचार के साधनों में जितना विकास मानव सभ्यता के पांच हजार वर्षों के लंबे दौर में हुआ उससे कई गुना अधिक पिछले पचास वर्षों में हुआ, मेरे देखते-देखते हुआ।करीब पचास साल पहले की बात है। महाराष्ट्र के अमरावती जिले का सिंदी बुजरूक गांव। मेरा बचपन इसी गांव में गुजरा। गांव में उस समय चौथे दर्जे तक की पाठशाला थी। मिडिल की पढ़ाई के लिए हम छह-सात लड़कों ने तीन किलोमीटर दूर के काकड़ा नामक गांव में जाना आरंभ किया। सुबह नौ बजे अपने गांव से निकलते और सायंकाल को वापस लौटते। रास्ता खेतों में से था और बीच में दो पहाड़ी नाले पार करने पड़ते थे। मन में जंगली जानवरों का थोड़ा भय भी बना रहता था। मगर सुबह जाते समय अक्सर हमें अब्दुल्ला का साथ मिल जाता था। अब्दुल्ला सुबह करीब सात बजे काकड़ा से चलता। उसके कंधे पर बोरे जैसी एक थैली होती और हाथ में होता लंबे डंडेवाला भाला। भाले के साथ घुंघरुओं का एक गुच्छा बंधा हुआ था। अब्दुल्ला की दौड़ चाल के साथ उसके भाले के घुंघरू लगातार बजते रहते और उसके आगमन की सूचना देते थे। अब्दुल्ला हरकारा था, डाकिया था। अब्दुल्ला हमारे गांव के पोस्ट ऑफिस पहुंचता। वहां से वह एक और थैली उठाता और करीब एक किलोमीटर दूर के रेलवे स्टेशन पहुंचता। अब्दुल्ला अपने पास की दो थैलियां स्टेशन मास्टर को सौंप देता और वहां से दो नई थैलियां प्राप्त करता। उनमें से एक थैली वह हमारे गांव के पोस्ट ऑफिस में छोड़ता और दूसरी थैली काकड़ा गांव ले जाता। इस तरह सुबह काकड़ा के मिडिल स्कूल जाने में अब्दुल्ला हमारा प्राय: प्रतिदिन का साथी होता था, संरक्षक होता था। उन दिनों, आज से पचास साल पहले, अब्दुल्ला द्वारा ढोई जाने वाली थैलिय्ाों की डाक ही हमारे गांव को देश के दूसरे गांवों व शहरों से जोड़ती थी। दो-तीन साल में एकाध बार गांव के किसी व्यक्ति के नाम टेलीग्राम आता, तो पहले वह एक किलोमीटर दूर के रेलवे स्टेशन मास्टर के पास पहुंचता मोर्स कोड के जरिए। वहां से किसी रेलवे कर्मचारी के हाथ उसे गांव में पहुंचाया जाता।मेरे बचपन में गांव में, बस, यही थे दूर-संचार व्यवस्था के साधन। हमारे देश में डाक सेवा की शुरुआत 1837 ई. से हुई। पहला डाक टिकट कराची (अब पाकिस्तान) में 1852 ई. में जारी हुआ। भारत में डाक सेवा की बाकायदा 19 वीं सदी के मध्यकाल से हुई। मेरे गांव में डाक सेवा की शुरुआत नजदीक से छोटी रेल लाइन गुजरने पर वर्तमान सदी के आरंभ में हुई। मेरे बचपन में मेरे गांव में न बिजली थी, न ही किसी के घर रेडियो या टेलीफोन। किसी को भी पता नहीं था कि टेलीविजन क्या चीज है। आज मेरे गांव में बिजली है। सौ से भी अधिक घरों में टी.वी. है, करीब दो दर्जन घरों में रंगीन टी.वी. भी! केबल टी.वी. भी आ गया है! पचास से अधिक लोगों के पास अपने टेलीफोन हैं। पचास से अधिक लोग टेलीफोन की ‘वेटिंग लिस्ट’ में हैं। गांव में ही अब टेलीफोन एक्सचेंज की व्यवस्था की गई है। एस.टी.डी. (सबस्क्राइबर ट्रंक डायलिंग) और आई.एस.डी. (इंटरनेशनल सबस्क्राइबर डायलिंग) की सेवाएं भी शुरू होने में अब ज्यादा देर नहीं है। मेरे गांव में अभी तक कोई कम्प्यूटर तो नहीं लगा है, मगर गांव के कुछ विद्यार्थी शहरों में जाकर कम्प्यूटर शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। अतः गांव में कम्प्यूटर के पहुंचने में और उसके देशव्यापी नेटवर्कों से या विश्वव्यापी इंटरनेट से जुड़ने में अब बहुत अधिक समय नहीं लगेगा। मेरा गांव नए दूर संचार माध्यमों के जरिए अब पूरे देश से ही नहीं, सारी दुनिया से जुड़ गया है। लगता है, दूर-संचार के साधनों से समूचा संसार एक छोटे कस्बे के रूप में सिमट गया है। निकट भविष्य में संचार के कई नए शक्तिशाली साधन उपलब्ध होने वाले हैं। आज के और भविष्य के इन उन्नत संचार साधनों के महत्व को ठीक से समझने के लिए अतीत के संचार साधनों की जानकारी काफी सहायक सिद्ध हो सकती है। संचार साधनों की कहानी एक प्रकार से मानव के विकास की कहानी है।सूचनाओं या समाचारों को जल्दी से जल्दी भेजने य्ाा प्राप्त करने के लिए मनुष्य पुरातन काल से ही साधन खोजता आ रहा है। आरंभ में आदि मानव गूंगे जैसी अस्पष्ट बोली और हाथों की हलचलों से अपने मनोभाव व्यक्त करता रहा। फिर धीरे-धीरे बोली या भाषा का जन्म हुआ। तब भी आवाज के जरिए कुछ सौ मीटर तक ही मनुष्य अपनी बात पहुंचा सकता था। हाथों के इशारों से भी वहां तक संदेश प्रेषित किए जाने लगे जहां तक देखा जा सकता है। प्राचीन फारस (ईरान) के शासक द्वारा (500 ई.पू.) ने राजकीय्ा संदेश दूर-दूर तक भेजने के लिए एक नया तरीका खोजा। उपय्ाुक्त अंतराल पर ऊंची मीनारें खड़ी करवा के उन पर दूर तक आवाज लगा सकने वाले गुलाम तैनात कर दिए गए। गुलाम संदेशों को जोर-जोर से बोलकर काफी दूर तक पहुंचा देते थे। रणक्षेत्र के समाचारों को भी प्राचीन काल में कुछ इसी तरह की व्यवस्था के जरिए राजधानी तक पहुंचाया जाता था। कुरूक्षेत्र के मैदान से कौरव-पांडव युद्ध के समाचार कुछ इसी तरह की चौकी दौड़ व्यवस्था के माध्यम से हस्तिनापुर में पहले संजय तक पहुंचते होंगे और फिर उन्हें धृतराष्ट्र को सुनाया जाता होगा। रोमन शासक जूलियस सीजर (102-44 ई.पू.) गॉल लोगों के साथ हुए युद्धों की जानकारी देते हुए लिखता है कि वे लोग किसी महत्वपूर्ण संदेश को एक-दूसरे की ओर जोर-जोर से चिल्लाकर काफी दूर पहुंचा देते थे।
प्राचीन चीन में संदेश भेजने के लिए घड़ियालों या घंटों का इस्तेमाल किया जाता था। घड़ियाल बजाकर बीते पहरों की सूचना देने की प्रथा हमारे देश में भी प्रचलित रही है। अफ्रीका और अमेरिका के आदिवासी अभी हाल तक दूर-संचार के लिए ढोलों का उपयोग करते रहे हैं। ये ढोल पेड़ों के खोखले तनों से बनाए जाते थे और विभिन्न स्वरमान की ध्वनिया पैदा करने के लिए इनमें अलग-अलग आकार के छिद्र बनाए जाते थे। इन ढोलों की लंबाई कभी-कभी चार मीटर तक होती थी। इन्हें हाथ डंडे द्वारा कभी जोर से तो कभी धीमें से पीटकर तरह-तरह की संदेश वाहक ध्वनिय्ाां पैदा की जाती थी। इस तरह के ‘ढोल टेलीग्राफ’ से अफ्रीका में एक कबीले से दूसरे कबीले को या एक गांव से दूसरे गांव को संदेश भेजने की प्रथा सदियों से प्रचलित रही है। उन्नीसवीं सदी के मध्य में दक्षिणी व मध्य अफ्रीका का अन्वेषण करने पहुंचा था, तो उसने ऐसे अनेक ढोल संदेश सुने थे। लिविंगस्टन की खोज में गए अमेरिकी पत्र्ाकार हेनरी मोर्टन स्टेन्ली ने भी इस तरह के कई ढोल संदेश सुने थे। सींग, शंख, तुरही, भोंपू आदि साधनों से विशिष्ट ध्वनिया पैदा करके संदेश प्रसारित करने की व्यवस्थाएं कई देशों में प्रचलित रही हैं।
मगर ध्वनि के माध्यम से संदेश भेजने की अपनी एक सीमा है। ध्वनि की तुलना में प्रकाश की गति बहुत ज्य्ाादा है। वायुमंडल में ध्वनि की गति 332 मीटर (एक तिहाई किलोमीटर) प्रति सेकंड है, जबकि निर्वात में प्रकाश का वेग लगभग तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकंड है। जितनी दूरी से हम ध्वनि को सुन सकते हैं उससे कहीं अधिक गुना दूरी से प्रकाश को देख सकते हैं। दर्पण से परावर्तित प्रकाश पुंज को 25-30 किलोमीटर की दूरी तक देखा जा सकता है। प्रकाश के जरिए करीब दस लाख गुना अधिक तेजी से संदेश भेजे जा सकते हैं। इसलिए प्रकाश के माध्यम से संदेश भेजने के कुछ तरीके प्राचीन काल में ही अस्तित्व में आ गए थे। रात में आग जलाकर और दिन में धुंआ पैदा करके संदेश भेजने की प्रथाएं बहुत पुरानी हैं। अमेरिकी ‘इंडियन’ भी इस संचार प्रणाली का प्रयोग करते थे। ग्रीस के दुःखांत नाटककार ऐश्चिलुस (525-456 ई.पू.) के आगामेम्नोन नाटक की कथा संभाव्य जान पड़ती है। राजा आगामेम्नोन की यूनानी सेना एशिया माइनर के ट्रॉय नगर पर हमला करने के लिए रवाना हुई। उस समय राजा ने रानी क्लितेम्नेस्त्रा से कहा ट्रॉय पर विजय प्राप्त करने और य्ाुद्ध समाप्त होने की सूचना मैं फौरन सबसे पहले तुम्हें भेजूंगा।’
ट्रॉय का पतन रात्रि के समय हुआ। रानी को इसकी सूचना भेजने के लिए राजा ने पहले से ही तैयारी कर रखी थी। एशिया माइनर और ग्रीस के बीच के द्वीपों में जो पहाड़ियां थीं उनमें से सबसे ऊंची 8 चोटियों पर राजा ने अग्नि जलाकर संदेश भेजने वालों को तैनात कर रखा था। ट्रॉय पर विजय के बाद वहां से उसी रात भेजा गया अग्नि संदेश एक-एक पहाड़ी से आगे बढ़ता हुआ रात्रि के अंतिम प्रहर में ग्रीस की राजधानी माइसीने के नजदीक की पहाड़ी पर आकर प्रकट हुआ। माइसीने के राजमहल की छत पर तैनात पहरेदार ने उस अग्नि संदेश को देखा और उसके आगमन की सूचना रानी को दी इस इस तरह ट्राय पर विजय का समाचार करीब 550 किलोमीटर का फासला पार करके उस रात चंद घंटों बाद रानी तक पहुंच गया।
कथा का दुःखांत य्ाह है कि रानी को सबसे पहले मिली उस सूचना का उपयोग करके उसने राजा की हत्या का षड्यंत्र रचा। विजेता राजा अपनी राजधानी में लौटा, तो रानी ने क्रूरता से उसकी हत्या कर दी।
आज से करीब चौबीस सौ साल पहले सिकंदरिया निवासी क्लेओक्सेनेस व देमोक्लेइतोस नामक दो यूनानियों ने एक प्रकार के ‘मशाल टेलीग्राफ’ का आविष्कार किया था। उन्होंने ग्रीक वर्णमाला के 24 अक्षरों को 5 पंक्तियों और 5 स्तंभों को एक वर्ग में स्थापित किया। फिर दो दीवारों में पांच-पांच जलती मशालें रखने की व्यवस्था की। इस तरह जलती मशालों के संयोजन से एक-एक ग्रीक अक्षर को एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक प्रेषित करने की व्य्ावस्था की गई। यह संभवतः इतिहास का पहला टेलीग्राफ कोड था। मगर इस ‘मशाल टेलीग्राफ’ को रात के वक्त और मौसम साफ होने पर ही प्रयोग में लाया जा सकता था, इसलिए इसका प्रचार नहीं हो सका।
अग्नि संदेश भले ही तेजी से भेजे जा सकते हों, मगर इनकी अपनी सीमाएं थीं। इनके माध्यम से पहले से तय की गई बातों के बारे में केवल हां या नहीं जैसे संदेश ही भेजे जा सकते थे अथवा मशाल टेलीग्राफ जैसी योजना से चंद शब्द प्रेषित किए जा सकते थे। इनके जरिए शत्रु के आगमन के बारे में सूचना भेजना तो संभव था, परन्तु शत्रु सेना की संख्या और उसके द्वारा प्रयुक्त हथियारों के बारे में जानकारी देना संभव नहीं था। ऐसी जानकारी संदेश वाहकों द्वारा ही भेजी जा सकती थी।
अभी करीब दो सौ साल पहले तक संदेश भेजने के लिए धावकों और घुड़सवारों का कई देशों में व्यापक उपयोग हुआ है। हमारे देश में मौर्यकाल से इन साधनों का इस्तेमाल होता आ रहा है। मुगलों और मराठों के संदेश वाहक घुड़सवारों के बारे में कई रोमांचक कथाएं पढ़ने-सुनने को मिलती हैं। फारस में घुड़सवारों के जरिए डाक भेजने की व्यवस्था कई सदियों तक चलती रही है। भारत में तुगलक शासनकाल (ईसा की चौदहवीं सदी) में डाक व्यवस्था की जो स्थिति रही है उसकी जानकारी हमें इस्लामी पर्यटक इब्न बतूता के विवरण से मिलती है। वह बताता है कि डाक व्यवस्था दो प्रकार की थी। एक, घोड़ों के जरिए डाक भेजी जाती थी। इसके लिए प्रति चार कोस की दूरी पर सुलतान के घोड़े तैनात रहते थे। दूसरी थी, धावकों की व्यवस्था। एक कोस दूरी को तीन हिस्सों में बांटकर इनमें से प्रत्येक स्थान पर, प्राय: किसी देहात के बाहर, तीन तंबू स्थापित करके वहां धावकों को तैनात किया जाता था। यो धावक अपनी धोती को कसकर बांधते थे और इनके हाथ में करीब एक गज लंबा एक कोड़ा होता था; इस कोड़े के सिरे पर घुंघरू बंधे होते थे। जब धारक अपने डेरे से चलता, तो उसके एक हाथ में चिट्ठी होती थी और दूसरे हाथ में घुँघरूओं वाला कोड़ा, वह अपनी पूरी ताकत के साथ दौड़ता था। जब दूसरे डेरे के धावक घुॅंघरूओं की आवाज सुनते, तो उसके स्वागत की तैयारी में जुट जाते। जब वह डेरे के पास पहुंचता तो वहां एक धावक उससे चिट्ठी लेकर कोड़ा बजाते हुए आगे तेजी से दौड़ पड़ता। इस तरह चिट्ठी अंततः अपने गंतव्य स्थान पर पहुंच जाती। मगर हमें ध्यान में रखना चाहिए कि यह व्यवस्था सरकारी आदेशों को त्वरित भेजने के लिए ही थी, जनसाधारण के उपयोग के लिए नहीं थी। भारत में अपना शासन शुरू करने के बाद अंग्रेजों ने भी यहां घुड़सवारों और धावकों की पुरानी प्रथाओं को अपनाया। टेलीग्राफ की शुरुआत के पहले सरकार धावकों के जरिए ही दूर तक डाक भेजती थी। इन धावकों के पास चिट्ठियां रखने के लिए एक छोटी थैली होती थी।
संचार व्यवस्था में बिजली के उपयोग के पहले संचार के एक और महत्वपूर्ण साधन का आविष्कार हुआ। यह था सेमाफोर! बालचर (स्काउट्स) इस शब्द से परिचित है। सेमाफोर का अर्थ है झंडियों द्वारा संदेश भेजने की प्रणाली। इसका विचार सबसे पहले आंग्ल वैज्ञानिक रॉबर्ट हुक (1635-1703 ई.) ने प्रस्तुत किया था। उन्होंने कहा कि ऊंचे मचानों पर अक्षरों की द्योतक आकृतियों का प्रदर्शन किया जाए और उन्हें दूरबीन से देखा जाए, तो संदेशों को काफी तेजी से दूर तक भेजा जा सकता है। उस समय तक दूरबीन का आविष्कार (1609 ई.) हो चुका था। मगर हुक के प्रस्ताव का उपयोग सीमित रूप में ही हो सका।
सेमाफोर को एक व्यवहारिक व्यवस्था का रूप प्रदान किया फ्रांसीसी इंजीनियर क्लाउद शापे ने, अठारहवीं सदी के अंतिम दशक में। इस व्यवस्था में एक टॉवर की छत पर ऊंचा खंबा खड़ा किया जाता था। फिर उसके सिरे पर एक आड़ा डंडा जोड़कर झंडियों की तरह के दो और छोटे डंडे जोड़े जाते थे। आज के एरियलों जैसी इस व्यवस्था से रोमन वर्णमाला के अक्षरों को सूचित किया जाता था। आड़े लंबे डंडे को चार स्थितियों में रखा जा सकता था: क्षैतिज, खड़ा, दायीं ओर या बायीं ओर 45 डिग्रियों में झुका हुआ। इस बड़े डंडे के सिरे पर जोड़े गए प्रत्येक छोटे डंडे को 8 स्थितियों में रखा जा सकता था। इस प्रकार, कुल 4,88,256 स्थितियों या संकेतों को व्यक्त किया जा सकता था। शापे ने इनमें से सबसे अनुकूल परिस्थितियों का चुनाव करके उनसे संदेश भेजने की व्यवस्था की। सेमाफोर के हत्थे से अक्षरों को सूचित करने के लिए कोड निर्धारित किया जाता था। शापे के इस आविष्कार को उनके एक सहयोगी ने पहली बार सन् 1793 में ‘टेलीग्राफ’ का नाम दिया था।
संसार की पहली सेमाफोर टेलीग्राफ प्रणाली फ्रांस में पेरिस से लिली नगर तक सन् 1794 में शुरू हुई। कुल 230 किलोमीटर के फासले पर स्थित इन दो नगरों के बीच 22 सेमाफोर टॉवर खड़े किए गए थे। उस साल 15 अगस्त को आधे घंटे के भीतर इन दो शहरों के बीच संदेश प्रेषित किया गया था।
इस सेमाफोर प्रणाली को, फ्रांस का अनुकरण करते हुए, यूरोप के कई देशों ने अपनाया। स्वीडेन ने सन् 1795 में और डेनमार्क ने 1802 में इसे अपनाया। उसके बाद स्पेन, इटली, अल्जेरिया और मिस्र ने भी इसे अपनाया। कुछ भिन्न रूप में सन् 1796 में इसे इंग्लैंड में अपनाया गया। भारत भी इससे वंचित नहीं रहा। अंग्रेजों ने सन् 1802 में सेमाफोर प्रणाली के जरिए कलकत्ता को झारखंड क्षेत्र से जोड़ दिया।
अमेरिका में सन् 1800 में बोस्टन और मार्था वाहनयार्ड आइलैंड को (अंतर 104 किलोमीटर) सेमाफोर प्रणाली से जोड़ दिया गया था। सन् 1852 तक फ्रांस में 550 सेमाफोर टॉवरों का नेटवर्क स्थापित हो चुका था। कुल 4800 किलोमीटर दूरी तक फैला यह नेटवर्क पेरिस को फ्रांस के 28 महत्वपूर्ण नगरों से जोड़ता था।
मगर सेमाफोर संचार प्रणाली की भी अपनी कई सीमाएं थीं। बारिश, कुहरे आदि में इसमें बाधाएं पैदा होती थीं। यूरोप के देशों का तेजी से औद्योगिक विकास शुरू हो गया था। रेलमार्ग स्थापित हो रहे थे। इसलिए तेज गति वाले और कम से कम बाधा उपस्थित करने वाले संचार माध्यम की तलाश जारी थी। दरअसल, 18वीं सदी के उत्तरार्ध से ही प्रयोगशालाओं में बिजली पर आधारित नई संचार प्रणाली की खोज शुरू हो गई थी।
सेमाफोर के इस्तेमाल से कई तरह की भ्रांतियां पैदा होती थीं। एक बार की बात है कि इंग्लैंड का सेनापति वेलिंगटन फ्रांस में लड़ाई लड़ रहा था। सेमाफोर से लंदन समाचार पहुंचा कि ‘वेलिंगटन डिफीटेड’ यूनानी वेलिंगटन हार गया’। लोगों में शोक छा गया। मगर वास्तविकता यह थी कि कुहरे के कारण समाचार के अंतिम दो शब्द ‘द फ्रेंच’ दिखाई नहीं दिए थे। ये शब्द कुछ समय्ा बाद लंदन पहुंचे तभी उन्हें सही समाचार मिला कि ‘वेलिंगटन ने फ्रांसीसियो को हरा दिया है’। कुहरे के कारण समाचार का अभिप्राय एकदम उलट ही गया था!
तार के द्वारा बिजली बहुत दूर तक भेजी जा सकती है, इसकी जानकारी अठारहवीं सदी के पूर्वार्ध में मिली। उसके साथ नए-नए उपयोगी आविष्कारों की बाढ़ सी आ गई। बिजली पर आधारित संचार के नए तीव्रगामी साधनों की तलाश भी शुरू हो गई। डेनमार्क के वैज्ञानिक आयर्स्टड (1775—1815) ने सन् 1819 में पता लगाया कि तार में बहती बिजली की धारा कुतुबनुमा (कंपास) की सुई को विचलित करती है। फ्रांसीसी वैज्ञानिक ऐम्पीयर (1775—1836) ने जाना कि तार की कुंडली में से बिजली की धारा को गुजारा जाए, तो वह एक चुंबक की तरह काम करती है। उन्होंने यह भी सुझाया कि आयर्स्टड के प्रयोग का उपयोग करके समाचारों को दूर—दूर तक भेजना संभव हो सकता है। इंग्लैंड के वैज्ञानिक हम्फ्री डेवी (1778—1829) ने पता लगाया कि लोहे के किसी टुकड़े के चारों ओर बिजली का तार लपेटा जाए, तो यह विद्युत चुंबक बन जाता है। विद्युत चुंबक से बनाए गए विद्युत रिले उपकरण बिजली के तारों के जरिए दूर तक संदेश भेजने में बड़े उपयोगी सिद्ध हुए। यूरोप व अमेरिका के कई वैज्ञानिक विद्युत टेलीग्राफ के विकास में जुट गए।
टेलीग्राफ के आरंभिक विकास में रूसी इंजीनियर बैरन फोन शिलिंग का महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने तागे से चुंबक की सुई लटकाई। सुई के साथ कागज का एक गोल टुकड़ा लगा हुआ था जो एक ओर काला और दूसरी ओर सफेद था। तार में बिजली की धारा भेजने पर सुई घूमती थी। काले और सफेद के अंतर के आधार पर संकेत बना लिए गए थे।
टेलीग्राफ की पहली सफल योजना चार्ल्स व्हीटस्टन और उनके सहयोगी विलियम कूक ने तैयार की थी। इन्होंने 20 जुलाई, 1835 को पहली बार तार से समाचार भेजने में सफलता प्राप्त की। उस समय लंदन और बर्मिघंम के बीच रेलवे लाइन खोली जा रही थी। मगर आश्चर्य की बात यह है कि रेलवे अधिकारी व्हीटस्टन और कूक के तार टेलीग्राफ संबंधी प्रयोग से बिलकुल प्रभावित नहीं हुए। उन्होंने इन दोनों अन्वेषकों को अपने तार उखाड़ लेने को कहा!
ग्रेट वेस्टर्न रेल्वे के अधिकारी कुछ अधिक उदार थे। उन्होंने व्हीटस्टन और कूक को 13 मील की दूरी तक तार लगवाने की अनुमति दे दी। प्रयोग सफल रहा। फिर भी तार टेलीग्राफ के प्रति लोगों की रुचि में विशेष वृद्धि नहीं हुई। मगर उसी समय तक ऐसी घटना घटी जिससे तार टेलीग्राफ को एकाएक बहुत महत्व मिल गया। सन् 1844 में स्लफ के नजदीक सॉल्टहिल में एक महिला की हत्या की गई। स्लफ की पुलिस ने लंदन को तार से फौरन समाचार भेजा, सॉल्टहिल में एक महिला की हत्या की गई। स्लफ की पुलिस ने लंदन को तार से फौरन समाचार भेजा, ‘सॉल्टहिल में एक हत्या अभी हुई है। संदिग्ध हत्याकारी व्यक्ति ने लंदन के लिए पहले दर्जे की टिकट खरीदी है और वह उस ट्रेन से जो 7:42 सायं को चलती है स्लफ स्टेशन पर सवार हुआ है। उसकी पोशाक क्वेकर की है, ऊपर से भूरे रंग का लबादा पहने है जो पैरों तक आता है।’
वह संदिग्ध व्यक्ति, जॉन टैनवेल, लंदन पहुंचा तो वहां की पुलिस ने उसका पीछा किया और वह पकड़ा गया। बाद में उसको फांसी हुई। इस घटना से तार से भेजे जाने वाले समाचारों को बड़ा महत्व मिला। मगर तार टेलीग्राफ में अभी काफी सुधार करना आवश्यक था। इसमें सफलता मिली एक ऐसे व्यक्ति को जो खुद वैज्ञानिक नहीं था।
सन् 1832 की बात है। यूरोप से अमेरिका जा रहा एक जहाज अटलांटिक महासागर को पार कर रहा था। उस पर सवार यात्रियों में थे एक अमेरिकी डाक्टर, जो अपने सहयात्रियों को विद्युत चुंबक से संबंधित तरह-तरह के प्रयोग दिखाकर उनका मनोरंजन कर रहे थे। उन यात्रियों में थे करीब चालीस साल के एक चित्रकार सेमुअल मोर्स (1791-1872)। तरूण पत्नी का निधन होने के बाद वे काफी लंबे समय के लिए यूरोप की यात्राओं पर गए थे और अब स्वदेश लौट रहे थे। जहाज पर दिखाए गए विद्युत चुंबक से संबंधित प्रयोगों ने मोर्स को बड़ा प्रभावित किया। उन प्रयोगों को देखकर मोर्स को यकीन हो गया कि बिजली के जरिए दूर-दूर तक संदेश भेजे जा सकते हैं।
अमेरिका पहुंचने पर मोर्स ने टेलीग्राफ मशीन के विकास का काम जोर—शोर से सुरू कर दिया। इसमें उन्हें उनके विद्यार्थी अल्फ्रेड वाइल का काफी सहय्ाोग मिला। विद्युत टेलीग्राफ द्वारा संदेश भेजने का पहला सफल प्रदर्शन न्यूयार्क में 4 सितंबर, 1837 को हुआ। मोर्स ने रोमन अक्षरों के लिए डॉट (.) और डैश (-) के मेल का एक नया कोड भी तैयार किया। इसके लिए उन्होंने गणना करके पता लगाया कि रोमन वर्णमाला के किन अक्षरों का इस्तेमाल अधिक होता है और किन का कम। जैसे, सबसे ज्यादा प्रयुक्त होने वाले रोमन के म् तथा ज् अक्षरों के लिए उन्होंने क्रमशः एक डॉट (.) व एक डेश (-) के कोड निर्धारित किए। इस मोर्स कोड का प्रदर्शन पहली बार 24 जनवरी, 1938 को सम्पन्न हुआ।
मोर्स ने अपनी टेलीग्राफ संचार प्रणाली का पहला व्यवसायिक प्रदर्शन 24 मई, 1844 को वाल्टीमोर को वाशिंगटन से जोड़ने वाली लाइन पर किया। उसके बाद इस विद्युत टेलीग्राफ का खूब तेजी से प्रचार—प्रसार हुआ। आगे की एक दशक की अल्पावधि में ही एक शहर को दूसरे शहर से, एक देश को दूसरे देश से और एक महाद्वीप को दूसरे महाद्वीप से जोड़ने वाली बेशुमार टेलीग्राफ लाइनें बिछ र्गइंं। चंद घंटों के अंदर दूर—दूर तक संदेश व समाचार भेजना संभव हो गया। रेलवे और टेलीग्राफ का आगमन साथ—साथ हुआ, इसलिए आज हमें टेलीग्राफ लाइनें ज्यादातर रेलमार्गों के समांतर जाती हुई दिखाई देती हैं।
टेलीग्राफ की उपयोगिता बढ़ी, तो समुद्री केबल बिछाना भी आवश्य्क हो गया। इस तरह का पहला केबल सन् 1850 में इंग्लिश चैनल में डाला गया, तो इंग्लैंड और फ्रांस के बीच सीधे टेलीफोन संचार संबंध स्थापित हो गए। अटलांटिक महासागर में पहली बार 1858 ई. में केबिल डाला गया, परन्तु एक सुव्यवस्थित समुद्री केबिल संचार प्रणाली 1866 से ही शुरू हो सकी।
भारत में इलाहाबाद और कलकत्ता के बीच पहली टेलीग्राफ लाइन पिछली सदी के छठे दशक के आरंभ में स्थापित हुई। जमीन के रास्ते कलकत्ता को लंदन से जोड़ने वाली टेलीग्राफ लाइन 1870 ई. में शुरू हुई। छठे दशक में जब मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ता था और कभी—कदा महाराष्ट्र के अपने गांव तार भेजता था, तो वह मोर्स कोड वाली टेलीग्राफ प्रणाली से ही गांव से एक किलोमीटर दूर के रेलवे स्टेशन तक पहुंचता था।
टेलीग्राफ के तारों से दुनिया के देश एक दूसरे से जुड़ने लगे, तो उद्योग और व्यापार में भी तेजी से वृद्धि होने लगी। समाचार पत्रों को ताजी खबरें अब तेजी से मिलने लगी। समाचारों और सूचनाओं का प्रसारण बहुत अधिक लोगों तक होने लगा। टेलीग्राफ ने मानव जीवन को बेहद प्रभावित किया।
टेलीग्राफ के करीब तीन दशक बाद टेलीफोन का आविष्कार हुआ। टेलीग्राफ की व्यवसायिक सफलता के बाद कई वैज्ञानिक एक ऐसी विद्युत प्रणाली की खोज में जुट गए जिसमें तांबे के यूनानी कॉपर तारों के माध्यम से वाणी के संकेत दूर तक भेजे जा सकें। इसमें सबसे पहले सफलता मिली अलेक्जेंडर ग्राह्म बेल (1847—1892) को। ब्रिटेन में पैदा हुए बेल अमेरिका में पहुंचकर वहां बोस्टन में बहरों के लिए एक स्कूल चला रहे थे। उनकी दिलचस्पी एक ऐसी विद्युत संचार प्रणाली की खोज करने में थी जिसके जरिए बोली के संकेत दूर तक भेजे जा सकें। अन्य शब्दों में, वह एक ऐसी दूरभाषा व्यवस्था की खोज में जुट गए जिसके वाणी के संकेतों को विद्युत संकेतों में बदला जा सके। अंततः इसमें सफलता मिल गई। विद्युत इंजीनियर थॉमस वाट्सन इस प्रय्ाास में उनके सहयोगी थे।
वह 10 मार्च, 1876 का दिन था। बेल जिस मकान में रहते थे उसकी अटारी में उनकी प्रयोगशाला थी। प्रयोगशाला से 12 मीटर लंबा एक तार नीचे की मंजिल पर पहुंचाया गया। वाट्सन को नीचे खड़ा करके उस दिन बेल अटारी से अपने टेलीफोन यंत्र में बोले ‘मिस्टर वाट्सन, प्लीज कम हियर, आई वांट यू’ (श्रीमान वाट्सन, कृपया यहां आइए, मुझे आपकी जरूरत है) नीचे वाट्सन ने उस संदेश को सुना और वह ऊपर आए।
यह था टेलीफोन से भेजा गया पहला ऐतिहासिक संदेश। बेल ने अपने आविष्कार को पेटेंट किया। वे अपना यह आविष्कार अमेरिका की एक बड़ी टेलीग्राफ कंपनी को बेचना चाहते थे, मगर उस कंपनी को लगा कि टेलीफोन का ज्यादा प्रचार होने की कोई संभावना नहीं है, इसलिए उसने इस नए आविष्कार को खरीदने से इंकार कर दिया। तब बेल ने स्वयं अपने एक कंपनी स्थापित की। आज य्ाह कंपनी एटी एंड टी के नाम से जानी जाती है और दूर-संचार के अपने साधनों के लिए दुनिया भर में मशहूर है। वर्तमान सदी में बेल प्रयोगशालाओं में बहुत महत्वपूर्ण अनुसंधान कारण हुआ है, विशेषकर दूर-संचार के क्षेत्र में। सन् 1948 में ट्रांजिस्टर की खोज एक बेल प्रयोगशाला में ही हुई थी।
टेलीफोन के आविष्कार के बाद अमेरिका और जर्मनी में यह नया संचार साधन बहुत जल्दी लोकप्रिय हो गया। इंग्लैंड में इसे कुछ बाद में अपनाया गया। अमेरिका और जर्मनी में पहली बार हस्तचालित टेलीफोन एक्सचेंजों की स्थापना 1878 ई. में हुई। पहला स्वचालित एक्सचेंज 1892 ई. में कायम हुआ। आजकल सभी जगह इलेक्ट्रॉनिक एक्सचेंज स्थापित हो रहे हैं। इनका नियंत्रण कम्प्यूटर की स्मृति में संचित प्रोग्राम से होता है। बिल भी कम्प्यूटरों से तैयार होते हैं। टेलीफोन आधुनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण और आवश्यक संचारµसाधन बन गया है। इंग्लैंड के वैज्ञानिक जेम्स क्लार्क मैक्सवेल (1831—1869) ने 1865 ई. में विद्युत चुंबकीय् तरंगों की वास्तविकता प्रतिपादित की थी। तब से कई देशों के वैज्ञानिक इन तरंगों के निर्माण और इनके प्रसारण के साधन खोजने में जुट गए। हेनरिख हर्टज (1857—1894) ने 1887 ई. में विद्युत चुंबकीय तरंगें पैदा करने वाला एक जेनरेटर तैय्रार किया। फिर इन तरंगों को ग्रहण करने वाला उपकरण (रिसीवर) भी बनाया गया। पिछली सदी के अंतिम दशक में कई देशों के वैज्ञानिक इन तरंगों से, युनानी ‘बेतार के तार’ से दूर तक संदेश भेजने और उन्हें ग्रहण करने संबंधी प्रयोगों में जुट गए। भारत में इस तरह के आरंभिक प्रयोग जगदीशचंद्र बसु (1858—1937 ई.) ने किए। उन्होंने बेतार के संदेश ग्रहण करने के लिए तार की कमानियों का एक अनुस्पंदक (कोहेरेर) तैयार किया था जो दूसरों के अनुस्पंदकों से बहुत बेहतर था। मगर बसु ने अपने आविष्कारों का पेटेंट नहीं लिया। उन्होंने अपने अनुसंधान कार्यों आगे नहीं बढ़ाया।
जिस समय भारत में आचार्य जगदीशचंद्र बसु अपने प्रयोग कर रहे थे, लगभग उसी समय इटली का एक तरुण युवक गुग्लीएल्मो मारकोनी (1874—1937 ई.) भी इसी प्रकार के प्रयोगों में लगा था। मारकोनी इटली से लंदन चला आया और अपने प्रयोगों में जुटा रहा। सन् 1898 में उसे इंग्लैंड के समुद्रतट से 19 किलीमीटर की दूरी पर स्थित एक जहाज के साथ रेडियो संपर्क स्थापित करने में सफलता मिली। हाल के अनुसंधानों से पता चला है कि मारकोनी ने अपने इन सफल प्रदर्शनों में आचार्य बसु द्वारा विकसित कोहेरेर का उपयोग किया था।
सन् 1899 में मारकोनी 97 किलोमीटर दूर के जहाज तक बेतार संदेश भेजने में सफल हुए। 12 दिसंबर, 1901 मारकोनी के जीवन में चिरस्मरणीय दिन साबित हुआ। उस दिन अटलांटिक महासागर के आरपार पहली बार ‘बेतार के तार’ से समाचार भेजने में सफलता मिली। उस दिन तीन छोटे डॉटों (...) वाला संदेश, जो मोर्स कोड में ए का द्योतक है, महासागर को पार करके आया। इस सफलता के बाद जहाजों और समुद्रतटों के साथ ‘बेतार के तार’ का सम्पर्क स्थापित करने के लिए मारकोनी ने अपनी एक वायरलेस संचार कंपनी स्थापित की। सन् 1909 में मारकोनी को भौतिकी का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।
आरंभ में समुद्र में स्थित जहाजों के साथ संपर्क स्थापित करने के लिए संदेश मोर्स कोड में भेजे जाते थे। सन् 1912 की बात है। टाइटेनिक नामक शानदार यात्री जहाज अटलांटिक महासागर को पार कर रहा था। यह उसकी पहली यात्रा थी और उस पर 1500 यात्री सवार थे। जहाज एक हिमशैल से टकराकर डूब गया। अधिकांश यात्रियों को जहाज के साथ ही जलसमाधि मिली। एक अन्य जहाज को बेतार का संदेश मिला, तो चंद यात्रियों बचाना संभव हुआ। तब से प्रत्येक जहाज पर बेतार की संचार प्रणाली की स्थापना को अनिवार्य बना दिया गया। सन् 1906 में विशिष्ट प्रकार की रेडियो तरंगों से पहली बार शब्दों को प्रसारित करके उन्हें ग्रहण करना संभव हुआ। रेडियो प्रसारण का युग शुरू हो गया। प्रथम महायुद्ध (1914—1918) के दौरान इस क्षेत्र में काफी खोजबीन हुई। मगर जनता के लिए रेडियो प्रसारण महायुद्ध के बाद ही संभव हुआ। भारत में व्यवसायिक रेडिया प्रसारण की शुरुआत 1926 ई. में हुई। सन् 1931 में ऑल इंडिया रेडियो (जिसे अब ‘आकाशवाणी’ कहा जाता है) की स्थापना हुई।
वर्तमान सदी के आरंभ में इलेक्ट्रॉनिकी नामक एक नए विज्ञान का विकास शुरू हुआ। इलेक्ट्रॉनिकी के साधनों से रेडिय्ाो प्रसारण को बेहतर बनाना और रेडियो सेटों को लघु आकार प्रदान करना संभव हुआ। मगर इलेक्ट्रॉनिकी की सबसे महत्वपूर्ण देन है टेलीविजन। जैसा कि आज सभी जानते हैं, टेलीविजन एक ऐसा संचार साधन है जिसके जरिए चलचित्रों को दूर-दूर तक प्रेषित करके वहां उन्हें ग्रहण किया जाता है। टेलीविजन उपकरणों के विकास में अमेरिका और यूरोप के कई वैज्ञानिकों का य्ाोगदान रहा है। परन्तु टेलीविजन चित्र्ा को प्रसारित करने में पहली बार सफलता मिली इंग्लैंड के जॉन लागी वेयर्ड (1888-1943) को। घटना 2 अक्तूबर, 1925 की है। लंदन के जिस मकान में वेयर्ड की प्रयोगशाला थी उसके निचले तल्ले में एक फर्म का ऑफिस था। वेयर्ड ने वहां काम करने वाले एक बच्चे को ऊपर बुलाया। उसे उन्होंने अपने टेलीविजन उपकरण के सामने खड़ा कर दिया। वेयर्ड उस दिन उस बच्चे के चित्र को बगल के कमरे तक प्रेषित कर देने में सफल हुए।
वेयर्ड के उस प्रथम प्रदर्शन के बाद टेलीविजन उपकरणों का बड़ी तेजी से विकास हुआ। जोरीकिन ने सन् 1928 में एक नए किस्म का टेलीविजन कैमरा (आइकोनोस्कोप) बनाया। पहले नियमित टेलीविजन प्रोग्राम का प्रसारण लंदन के अलेक्जेंड्रा पैलेस से 2 नवंबर, 1936 को हुआ। मगर टेलीविजन का तेजी से प्रचार—प्रसार दूसरे महायुद्ध की समाप्ति के बाद ही हो सका। रंगीन टेलीविजन की शुरुआत वर्तमान सदी के छठे दशक में हुई। आज टेलीविजन प्रसारण की जो स्थिति है उसे सभी जानते हैं। संचार उपग्रहों ने टेलीविजन को दुनिया के कोने—कोने तक पहुंचा दिया है। टेलीविजन आज संचार का सबसे शक्तिशाली साधन बन गय्ाा है।
संसार का पहला कृत्रिम उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में सन् 1957 में स्थापित किया गया था। उसके कुछ समय बाद अमेरिका और सोवियत रूस ने अपने संचार उपग्रहों को कक्षाओं में स्थापित करना आरंभ कर दिया। अधिक ऊंची कक्षा में स्थापित उपग्रह धरातल के अधिक क्षेत्र के साथ संचार संबंध स्थापित कर सकता है। यदि उपग्रह को भूमध्यरेखा के करीब 36,000 किलोमीटर ऊपर की वृत्ताकार कक्षा में स्थापित किया जाए, तो वह 24 घंटों में पृथ्वी का एक चक्कर लगाता रहेगा। पृथ्वी भी इतने ही समय में अपनी धुरी पर एक चक्कर लगााती है । इसलिए ऐसा उपग्रह पृथ्वी के एक स्थान से आकाश में हमेशा स्थिर दिखाई देगा। छत्तीस हजार किलोमीटर ऊपर की कक्षा को भूस्थिर य्ाा समकालिक कक्षा का नाम दिया गया है। भूस्थिर कक्षा में स्थापित उपग्रह 36,000 किलोमीटर ऊंचे एक माइक्रोवेव टॉवर का काम करता है। उतनी ऊंचाई से समूचे धरातल के लगभग एक तिहाई भाग के साथ संचार संबंध स्थापित किया जा सकता है। भूस्थिर कक्षा में समान अंतर पर तीन उपग्रह स्थापित कर दिए जाएं, तो लगभग समूचे भूमंडल को संचार संबंधों में जोड़ा जा सकता है।
संसार के कई देशों ने अपने संचार उपग्रह भूस्थिर कक्षा में स्थापित किए है। भारत के एप्पल नामक पहले संचार उपग्रह को सन् 1981 में भूस्थिर कक्षा में स्थापित किया गया था। उसके बाद इन्सैट श्रंृखला के कई भारतीय उपग्रह 36,000 किलोमीटर ऊपर की भूस्थिर कक्षा में स्थापित किए गए। हमारे इन्सैट उपग्रह रेडियो व टेलीविजन कार्यक्रम प्रसारित करते हैं, कई हजार दुतरफा टेलीविजन संबंध स्थापित करते हैं और मौसम की भी जानकारी देते हैं। टेलीविजन की तरह कम्प्यूटर का विकास भी प्रमुखतः दूसरे महायुद्ध के बाद हुआ। कम्प्यूटर केवल गणना और नियंत्रण का ही नहीं, संचार का भी एक शक्तिशाली साधन है। वे दिन लद चुके हैं जब कम्प्यूटर को वातानुकूलित कक्ष में स्थापित एकाकी मूक मशीन समझा जाता था। कम्प्यूटर अब दूर-दूर के अपने कम्प्यूटर साथियों से ‘बातचीत’ कर सकता है, उनके साथ संचार संबंध स्थापित कर सकता है। विभिन्न प्रकार की जाल व्यवस्थाओं (नेटवर्कों) के जरिए कम्प्यूटरों को एक-दूसरे के साथ जोड़ा जाता है। कारोबारी संबंधों, विमान, रेल व होटल आरक्षण बैंकों में निधियों का स्थानांतरण आदि के लिए कम्प्यूटर संचार जाल की व्यवस्थाएं अस्तित्व में आ गई हैं। अब कम्प्यूटर जाल व्यवस्था के जरिए एक शहर की डाक दूसरे शहर भेजी जा सकती है (ई-मेल) कम्प्यूटर नेटवर्क के जरिए अब कई सारे समाचार पत्र और मासिक पत्र-पत्रिकाएं दूर दूर तक कम्प्यूटरों पर उपलब्ध होने लगे हैं। भारत में अब इंटरनेट, निकनेट नामक कई तरह के कम्प्यूटर नेटवर्क स्थापित हो गए हैं।
संसार भर के हजारों नेटवर्कों को एक दूसरे के साथ जोड़ने वाला इंटरनेट नाम का एक विश्वव्यापी नेटवर्क भी अस्तित्व में आ गया है। इंटरनेट ने सारे संसार को संचार संबंधों के महाजाल में बांध दिया है। फिलहाल मोबाइल टेलीफोन की व्यवस्था बड़े शहरों तक ही सीमित है। परन्तु अब वह दिन अधिक दूर नहीं है जब आप अपने व्यक्तिगत मोबाइल टेलीफोन से संसार के किसी भी अन्य स्थान के टेलीफोन से संपर्क स्थापित कर सकेंगे। इसके लिए ग्लोबलस्टार और इरिडियम जैरी कुछ कंपनियां पृथ्वी की निचली कक्षाओं में एक साथ कई दर्जन संचार उपग्रह स्थापित कर रही हैं। यह विश्वव्यापी मोबाइल व्यक्तिगत संचार सेवा इसी साल के सितंबर महीने से शुरू हो जाएगी। इस सेवा के जरिए कोई भी व्यक्ति धरातल के किसी भी स्थान से किसी भी अन्य स्थान के साथ अपने निजी मोबाइल टेलीफोन से संबंध स्थापित करने में समर्थ होगा। ग्राहक किसी भी स्थान पर हो, उसका टेलीफोन नंबर एक ही रहेगा।
निकट भविष्य में कम्प्यूटर नेटवर्क पर आधारित अनेक नई संचार व्यवस्थाएं अस्तित्व में आने जा रही हैं। कम्प्यूटर नेटवर्क की व्यवस्थाएं देश व काल के अंतरालों को समाप्त करके सूचनाओं का अधिक मात्रा में और अधिक तेजी से आदान-प्रदान करने में योगदान करेंगी। मनुष्यों को एक दूसरे के साथ अधिक गहराई से जोड़ेंगी और हमारी आज की कार्य प्रणालियों में अमूल परिवर्तन करेंगी। इन नई शक्तिशाली संचार प्रणालियों के व्यापक समाजिक प्रभावों को, इनके कई सारे खतरों को भी, झेलने के लिए हमें, विशेषकर नई पीढ़ी को, सजग और सचेत रहना होगा।
पिछले पांच दशकों के दौरान संचार साधनों के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन होने के बावजूद संचार की कुछ पुरानी व्यवस्थाएं आज भी प्रचलित हैं। उदाहरण के लिए, संचार के लिए कबूतरों के उपयोग को लीजिए। पुरानी जमाने में समाचार भेजने के लिए कबूतरों का काफी उपयोग होता रहा है, और कुछ हद तक आज भी होता है। जैसे, उड़ीसा की पुलिस ने सन् 1946 में कबूतर सेवा की स्थापना की थी। वे इन कबूतरों का उपयोग दूर दराज के क्षेत्रों से सूचनाएं प्राप्त करने के लिए करते थे। इसी साल सम्पन्न हुए लोकसभा के चुनाव के दौरान भी उड़ीसा की पुलिस ने दूर दराज के क्षेत्रों से कानून व सुरक्षा संबंधी सूचनाएं त्वरित प्राप्त करने के लिए अपने 29 कबूतरों का उपयोग किया। आज एक साथ नए और पुराने संचार साधनों के उपयोग का यह एक अनोखा संगम है।

(‘इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए’ जनवरी 2002)