विशेष

(04/Apr/2015)

राष्ट्रीय विज्ञान मेला लखनऊ

आंचलिक विज्ञान नगरी, लखनऊ में पांच दिवसीय ‘‘5वां राष्ट्रीय विज्ञान मेला एवं प्रतियोगिता-2015’’ का आयोजन 4 से 8 फ़रवरी, 2015 तक विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के विज्ञान प्रसार और राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद् द्वारा दूरदर्षन, आकाशवाणी, यूनिसेफ, लखनऊ विश्वविद्यालय के पर्यावरण षिक्षा केंद्र, एमेटी यूनिवर्सिटी, बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद, उ.प्र. और सोसाइटी ऑफ अर्थ साइंटिस्ट के सहयोग से किया गया, जिसका उद्घाटन मुख्य अतिथि प्रख्यात फ़िल्मकार पद्मश्री मुजफ़्फ़र अली ने विज्ञान प्रसार के निदेषक डॉ. आर. गोपीचंद्रन और देश के अनेक वैज्ञानिकों, विज्ञान संचारकों और फ़िल्मकारों की उपस्थिति में किया। इस पांच दिवसीय विज्ञान चलचित्र मेले में 152 प्रविष्टियों में से चयनित 64 फिल्मों का प्रदर्षन किया गया। प्रथम दिवस पर पंजाब के विज्ञान और तकनीकी की ऐतिहासिक यात्रा को ‘‘फ़्यूज़न-हिस्टोरिकल जरनी ऑफ़ साइंस एण्ड टेक्नॉलॉजी इन पंजाब’’, एचआईवी पीड़ितों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण को ‘एचआईवी’ फ़िल्मों में प्रदर्षित किया गया। मैंग्रूव वनों, रेडियो दूरबीन और सांपों के रोचक संसार की झलक भी फिल्मों के माध्यम से देखने को मिली। फिल्म अंडे का फंडा समारोह का खास आकर्षण रही। यहीं एक फिल्म के माध्यम से जाना गया कि जब हम सो जाते है तो क्या होता है। एटम का प्रयोग शांति के क्षेत्र में कैसे किया जाता है, इसकी जानकारी भी समारोह में प्रदर्षित फिल्मों के माध्यम से मिली। गैर प्रतियोगी वर्ग में यूनिसेफ द्वारा निर्मित फिल्म ‘पहेली की सहेली’ का प्रदर्षन किया गया। यह फिल्म किशोरियों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर आधारित थी। द्वितीय दिवस पर फ़िल्म ‘बीटी ब्रैंजल-सेफ़र बेटर एफोरडेबिल’ का प्रदर्शन किया गया। कम कैलोरी की इस सब्जी में प्रोटीन, कार्बाेहाइड्रेड और फाइबर की प्रचुरता रहती है। फ़िल्म में बैंगन के आनुवांशिक उत्पादन की कहानी को दर्शाया गया। फ़िल्म ‘मैथेमैजिक (खुदबुद्द खेल विज्ञान) में खेल-खेल’ में गणित को सिखाने की पद्वति को प्रदर्शित करने का प्रयास किया गया है। वास्तव में खुदबुद्द गणित सिखाने का एक प्रयोग है, जिसमें रचनात्मक क्रियाकलापों का सहारा लिया जाता है। फ़िल्म ‘मेरे आंगन के पक्षी’ में पर्यावरण में आए बदलाव की वजह से आए खतरों को प्रदर्शित करने का प्रयास किया गया है। इन बदलाव की वजह से पक्षियों को किन प्रतिकूल परिस्थितियों से निपटना पड़ता है। समारोह में उर्दू भाषा की फ़िल्म ‘पैगाम’ में जंगलों को बचाने का संदेश दिया गया है। फिल्म ‘वैनिशिंग वल्चर’ में तेज़ी से लुप्त हो रहे गिद्धों को बचाने के प्रति सचेत किया गया है। ़िफल्म ‘विज्ञान से ध्यान की ओर’ में पुरातन भारतीय विज्ञान ध्यान और आध्यात्म के महत्व को निरूपित करने का प्रयास किया गया है। फ़िल्म ‘विसर्जन’ में दिखाया गया है कि दुर्गापूजा जैसे धार्मिक पर्व के बाद नदियों में मूर्ति विसर्जन करने का क्या दुष्परिणाम होता है। फ़िल्म ‘ड्राप बाई ड्राप’ में दिखाया गया है कि पानी की एक-एक बूंद को बचाकर कैसे हम सुरक्षित कल का सपना साकार कर सकते हैं। ऐनीमेटेड फ़िल्म ‘गप्पी’ में एक मछली की गंगा नदी की यात्रा को दर्शाया गया है। ऐनीमेटेड फ़िल्म ‘द पलाइट’ में यह दर्शाने का प्रयास किया है कि वर्तमान के हालातों में आने वाला कल कैसा होगा। इसके साथ फ़िल्म ‘इंसेक्ट्स एैट ग्लो’, ‘कैन क्राउड सोर्सिंग डिस्कवर न्यू ड्रग’, ‘कम एलाँगविद हरिया’, ‘मदर वॉस्प’, ‘अंडर द सिलिका डस्ट’, ‘वेस्ट मैनेजमेंट अर्थक्वेक सेफ’, ‘पॉवर शोअर’ व मॉन्युमेंटल साइंस’ का प्रदर्शन भी किया गया। इस चलचित्र मेले में गैर प्रतियोगी वर्ग और माइक गनटन के निर्देशन में बीबीसी टेलीविज़न, डिस्कवरी चैनल व फ्रेंच चैनल द्वारा निर्मित फ़िल्म ‘लाइफ हिस्ट्री’ का प्रदर्शन किया गया। तृतीय दिवस पर फ़िल्म ‘आओ चले सुनहरे कल की ओर’ में किसानों को संदेश दिया गया है कि वे आने वाले भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए कम से कम रसायनिक खाद्य का प्रयोग करें। फ़िल्म ‘भारत-द रिवाइवल ऑफ वाटरमिल्स’ में ग्रामीण क्षेत्र में बिजली निर्माण की कहानी को प्रदर्शित किया गया है। फ़िल्म ‘हाउ कैन एडवांस कम्प्यूूटिंग इम्प्रूव अवर लाइव्स’ में शीर्षक के अनुरूप यह दर्शाने का प्रयास किया गया है कि दैनिक जीवन में कम्प्यूटर का प्रयोग कर कैसे हम अपने जीवन स्तर को विकसित कर सकते हैं। फ़िल्म ‘इंनोविजन’ देश के इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र तथा उन उत्साही युवाओं की कहानी है, जो हर पल कुछ नया करना चाहते हैं।

देश में कम बजट में पब्लिक परिवहन उपलब्ध कराना आज भी टेढ़ी खीर है। ऐसे में विकल्प के रूप में सौर कार की संकल्पना को फिल्म ‘लार्ज मेाश पर्स सीईंग’ में दिखाया गया है। फ़िल्म ‘लिविंग विद एलीफेंटस’ में दर्शाने का प्रयास किया गया है कि वास्तव में हाथी हमारे साथी हैं। फ़िल्म ‘टेकेबिलिटी’ में एक ऐसे युवक की कहानी है, जिसने अपनी शारीरिक विकलांगता से लोहा लेने का हौसला रखा और एक कार को कुछ ऐसे डिजाइन किया कि एक पैर में दुर्बलता होने के बाद भी उसे संचालित करने में किसी भी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े। वहीं, फ़िल्म टीनोवेशन भाग 1ए 2 व 3 में आज के युवाओं द्वारा सृजित जनोपयोगी अनुसंधानों पर प्रकाश डाला गया। फ़िल्म ‘द लाइवस्टॉक लीजेंड’, ‘द स्टोंरी ऑफ बीटी ब्रैंजल इन इंडिया’, ‘ब्रीड ऑफ वेल्थ’, ‘डीएनए ऐज डियेक्टिव’, ‘फ्लोइंग फॉरएवर’, ‘लार्ज मेश पर्स सेनिंग’, ‘पोस्ट चेंज’, ‘द शाइनिंग स्टार ऑफ द ईस्ट’ और ‘रिंग द चेंजस’ का प्रदर्शन मुख्य रूप से किया गया। यहीं डॉ. जे वी नार्लीकर की फ़िल्म ‘धूमकेतु’ और नेशनल जियोग्राफ़िक चैनल की फ़िल्म ‘साइंस ऑफ स्टूपिड’ का प्रदर्शन भी ग़ैर प्रतियोगिता वर्ग किया गया। चतुर्थ दिवस पर फ़िल्म ‘ह्यूमन आइलैंड’ में मानसिक विकार की बीमारी ऑटिज़्म पीड़ित बच्चे के सामने आने वाली चुनौती और सफलता की कहानी को प्रदर्शित किया। ‘लव स्टोरी ऑफ टू इलेक्ट्रॉन्स’ में दर्शाया है कि इलेक्ट्रानों के मिलने पर किस प्रकार की वैज्ञानिक घटनाएं होती हैं। ‘हाउ डू आई सी साइंस’ विज्ञान व विज्ञान पहलुओं को देखने के दृष्टिकोण को उजागर करती है। ‘इन द सर्च ऑफ रियल साइंस’ उन छात्रों की कहानी है, जो विज्ञान के किताबी पक्ष को यथार्थ की धरातल पर उतारने की रूचि रखते है। ‘माई एक्सपेरिमेंट्स’ में एक छात्र के वैज्ञानिक प्रयोग को दर्शाया गया है। विज्ञान के सरल और सकारात्मक प्रयोग को इसमें प्रदर्शित किया गया है। ‘माई किचेन साइंस’ में दर्शाया गया है कि विज्ञान सिर्फ़ लैब का विषय नहीं है, हमारे रसोईघर में भी इसकी बहुत उपयोगिता है। ‘साइंस बिहाइंड मिरेकल्स’ में उन तथ्यों की वैज्ञानिक प्रमाणिकता को दर्शाया गया है, जिसे एक वर्ग चमत्कार मानता है। इसी प्रकार फ़िल्म ‘यू टर्न टू दि नेचर’ ने फास्ट फूड के दुष्प्रभावों की ओर संकेत कर गुणवत्ता पूर्ण खानपान के प्रति सचेत किया। प्रतियोगिता वर्ग में ही फ़िल्म ‘ए जर्नी थ्रू स्पेस एंड टाइम’, ‘ग्लो टू सरवाइव’, ‘रैपन’, ‘मेटानोइया’ का प्रदर्शन भी किया गया। इसी दिन गै़र प्रतियोगी वर्ग में वर्ष 1983 में निर्मित सत्येंद्र बोस निर्देशित फ़िल्म ‘काया पलट’, मर्फी की फ़िल्म ‘द स्टोरी ऑफ वन’ और शूलिंगिन व जार्डन नीलेज वॉक निर्देशित फिल्म हाउ टू ग्रो ए प्लांट का प्रदर्शन भी विशेष रूप से किया गया। उद्घाटन के अवसर पर आंचलिक विज्ञान नगरी के परियोजना समायोजक डॉ. उमेश कुमार ने अतिथियों का स्वागत किया। इस अवसर पर यूनिसेफ-उत्तर प्रदेष की प्रमुख नीलोफर पोरजंद, प्रसिद्ध फैषन डिजाइनर मीरा अली, कलाकार और वैज्ञानिक डॉ. अनिल कुमार रस्तोगी, राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद् से सम्बद्ध राष्ट्रीय विज्ञान केन्द्र के निदेषक डॉ. रामा षर्मा आदि ने अपने विचार व्यक्त किये। समापन समारोह के मुख्य अतिथि जाने माने कलाकार और फ़िल्मकार चन्द्र प्रकाश द्विवेदी के साथ विशिष्ट अतिथि सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ और फ़िल्मकार शरद दत्त ने शिरकत की। इससे पूर्व स्वागत भाषण निमिष कपूर ने कहा कि फ़िल्में जनाकर्षण का सबसे प्रभावषाली माध्यम हैं और फ़िल्मोत्सव का उद्देश्य ही ऐसी फ़िल्मों के माध्यम से लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करना है और इसमे हम सफल हुए हैं। कार्यक्रम के अन्त में डॉ. उमेश कुमार द्वारा धन्यवाद ज्ञापित किया गया। इस पांच कार्यक्रम के दौरान नव फ़िल्मकारों के लिए कार्यशाला का आयोजन किया गया। यहीं विज्ञान संवाद कार्यक्रम में विज्ञान प्रसार सहित देश के प्रख्यात वैज्ञानिकों, विज्ञान संचारों और फ़िल्मकारों ने सम्बोधित कर अपने अनुभवों का आदान प्रदान किया। इस राष्ट्रीय विज्ञान मेला और प्रतियोगिता में ए श्रेणी, सामान्य दर्शकों के लिए वैज्ञानिक अभिरूचि उत्पन्न करने वाली 60 मिनट तक की लोकप्रिय विज्ञान फिल्में शामिल की गईं थीं। इसी प्रकार से बी श्रेणी में 6 से 12 वर्ष के बच्चों के लिए वैज्ञानिक अभिरूचि उत्पन्न करने वाली लोकप्रिय विज्ञान फ़िल्मों को शामिल किया गया, जिनकी अवधि 60 मिनट से कम रही। सी श्रेणी सामान्य दर्शकों के लिए विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवोचार पर विज्ञान फ़िल्म के लिए थी, जिनकी अवधि 60 मिनट से अधिक न रही हो। इन तीनों ही श्रेणी में गोल्डन बीवर पुरस्कार के रूप में एक लाख रुपए, सिल्वर बीवर पुरस्कार में 50 हजार तथा ब्रोंज बीवर पुरस्कार में 30 हजार रुपए व ट्राफी एवं प्रमाण पत्र दिया गया। डी श्रेणी में सामान्य दर्शकों के लिए विज्ञान पर फ़िल्म या पत्रकारिता डिग्री और डिप्लोमा कर रहे विद्यार्थियों की फ़िल्मों को शामिल किया गया। जबकि ई श्रेणी में कक्षा 6 से 12 तक के विद्यार्थियों द्वारा निर्मित फिल्म विद्यार्थी समुदाय के लिए रही। इस श्रेणी में उनको ‘मैं विज्ञान को किस रूप में देखता हूं’ विषय पर फ़िल्म बनाना था। दोनों ही श्रेणियों के लिए तय किया गया कि इसमें शामिल फिल्में 30 मिनट से अधिक की नहीं होंगी। ई तथा डी श्रेणी में गोल्डन बीवर पुरस्कार के रूप में 50 हजार रुपए, सिल्वर बीवर पुरस्कार में 30 हजार तथा ब्रोंज बीवर पुरस्कार में 20 हजार रुपए व ट्राफी एवं प्रमाण पत्र प्रदान किया गया। यहीं तकनीकी उत्कृष्ठता हेतु ट्राफी एवं प्रमाण पत्र के साथ 20 हजार रुपए का पुरस्कार चार विधाओं में दिया गया, जिसमें सिनेमेटोग्राफ़ी, संपादन, ग्राफ़िक्स, एनीमेशन व विशेष प्रभाव और ध्वनि रिकॉर्डिंग और संरचना के लिए विज्ञान फ़िल्म निर्माताओं को पुरस्कृत किया गया। यहीं 40 हजार रुपए का विशेष जूरी पुरस्कार भी प्रदान किया गया।


67, अन्टा, निकट मोहनी स्कूल, शाहजहाँपुर-242001
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