संपादकीय

(03/Feb/2018)

प्राचीन भारत की विज्ञान परंपरा

धर्म, दर्शन और साहित्य की समृद्ध परंपरा के साथ भारत में विज्ञान और वैज्ञानिक चिंतन की भी अपनी परंपरा है और वर्तमान समय में शायद उसके पुनः अन्वेषण की सबसे ज्यादा ज़्ारूरत है। आइये भारत की विविध परंपराओं में से उदाहरण के तौर पर हम इस वैज्ञानिक परंपरा पर दृष्टिपात करते हैं।

विज्ञान का सामान्य अर्थ समझा जाता है ‘पश्चिमी विज्ञान’ जिसने अनेक अद्भुत आविष्कारों और टेक्नॉलॉजिकल यंत्रों को जन्म दिया है। किन्तु आधारभूत वैज्ञानिक सिद्धांत और तकनीक प्राचीन काल में भी मौजूद थे और विज्ञान के विकास में पूर्व का महत्वपूर्ण योगदान है। सभ्यता की अनेक निधियाँ पूर्व से मिली हैं।

भारत में प्रारंभिक विज्ञान की दो प्रमुख धाराएँ थीं- प्रथम, गणित और खगोल शास्त्र तथा द्वितीय, औषध विज्ञान। आपस्तम्बकृत ‘सल्वसूत्र’ में पाइथागोरस के प्रमेयों तथा अन्य कई विशिष्ट प्रश्नों का सामान्य विवरण है। ‘सल्वसूत्र’ का प्रणयन पाइथागोरस के बाद के समय में हुआ था, किन्तु उसके विशिष्ट सूत्र निश्चय ही यूनानी नहीं, भारतीय हैं। वे प्राचीन प्रयोगसिद्ध अंकीय आविष्कार हैं जिनके आधार पर बाद में ज्यामितीय प्रमेय बने या प्रमेय के आधार पर विकसित विशिष्ट हिन्दू प्रयोग हैं, यह इतना स्पष्ट नहीं है। संक्षेप में इतना कहना ही काफी है कि हमारे यहाँ गणित में हिन्दुओं की महत्वपूर्ण मौलिक उपलब्धियाँ हैं। स्थानिक अंकों का महत्वपूर्ण आविष्कार तथा ‘शून्य’ के लिए संकेत भारतीय योगदान है। खगोलशास्त्र में हमारे यहाँ पांच सिद्धांत, पैतामह, वसिष्ठ, सूर्य, पौलिष और रोमक हैं, और यह परम्परा अटूट रही है- आर्यभट्ट (पांचवीं शताब्दी ईसवी), वराहमिहिर (छठी शताब्दी), ब्रह्म गुप्त (छठी और सातवीं शताब्दी), महावीर (नवीं शताब्दी), श्रीधर (दसवीं शताब्दी), भास्कर (बारहवीं शताब्दी)।

औषधविज्ञान का उदय बहुत पहले हुआ। बुद्ध के युग में, आत्रेय तक्षशिला में अध्यापक थे और उनसे अपेक्षाकृत कम उम्र समकालीन सुश्रुत काशी (अथवा बनारस) में शिक्षक थे। बाद में विज्ञानियों ने शल्यचिकित्सा पर जोर दिया- अण्डकोष में आंत उतरने, पेड़ू चीरकर बच्चा पैदा करने, मूत्राशय की पथरी, मोतियाबिन्द की शल्यचिकित्साएँ प्रचलित हुईं। शल्यक्रिया के 121 भिन्न औजारों का वर्णन मिलता है। मलेरिया और मच्छरों का सम्बन्ध मालूम किया जा चुका था और मधुमेह के रोगियों के मूत्र में शर्करा की उपस्थिति मालूम थी। कश्मीर में जन्मे और कनिष्क के समय में जीवित (120-162 ईसवी) चरक ने आत्रेय के एक शिष्य अग्निवेश के आधार पर एक ग्रंथ की रचना की। वाग्भट्ट (पिता और पुत्र) तथा माधवकर व वृन्द इस क्षेत्र के अन्य व्यक्ति थे।

दिल्ली का लौह-स्तंभ लगभग 400 ईसवी में खड़ा किया गया था। इसकी ऊंचाई 28 फुट से अधिक है तथा आधार का व्यास 16.4 इंच है जो कम होते-होते 12.04 इंच हो जाता है। यह विशुद्ध, जंग न खाने वाले लोहे का बना है। इसे वे कैसे बना सके? सुल्तानगंज की बुद्ध की मूर्ति विशुद्ध तांबे की दो परतों से बनी है जो साढ़े सात फुट ऊंचे और एक टन भारी एक अन्तर्भाग पर मढ़ी गई है। ये इंजीनियरिंग के कौशल के आश्चर्यजनक नमूने हैं।
संस्कृत व्याकरण का विकास ग्रीक व्याकरण से पहले हुआ था। यास्क ने वेदों की व्युत्पत्तिविषयक टीका ‘निरुक्त’ लिखी। यह पाणिनि-काल से पहले, 500-700 ईसा पूर्व के आसपास की है। भाषा विज्ञान और व्याकरण में पाणिनि का नाम सर्वोपरि है। वे छठी सदी ईसा पूर्व के उत्तरार्द्ध में हुए थे। पाणिनि ने यास्क और शौनक को अपना अग्रज माना है। उनकी ‘अष्टाध्यायी’ एक दीर्घकालीन भाषा विज्ञानी विकास का शीर्षबिन्दु है। पाणिनि ने नियमों को स्वीकार और अपवादों को व्यक्त किया है। उनकी अष्टाध्यायी में लगभग 4000 सूत्र हैं। केवल एक लेखक अकस्मात् इनका आविष्कार करके दूसरों पर लाद नहीं सकता था। यह शताब्दियों का विकास है और पाणिनि परम्परागत व्याकरण को अन्तिम रूप प्रदान करने वाले वैयाकरण थे। उनकी कृति में अनेक अग्रजों के नाम हैं। अपनी शुद्धता और विस्तार के कारण ही वे अपने अग्रजों से आगे बढ़ गए।

पतंजलि के अनुसार, पाणिनि की कृति भली प्रकार सम्पादित एक महान ग्रन्थ है। कात्यायन ने अपनी टिप्पणियों ‘वार्त्तिक’ का प्रणयन पाणिनि के सूत्रों के तुरन्त बाद किया था और उनकी व्याख्या पतंजलि ने अपने ‘महाभाष्य’ (दूसरी शताब्दी ईसापूर्व) में की थी। भाषाविज्ञान का सम्पूर्ण विकास 600-1000 ईसा पूर्व में हुआ था। भाषाविज्ञान जैसे कठिन विषय का इतने प्राचीन काल में इतना अधिक विकास सदा विस्मयजनक रहेगा। इससे यही मालूम होता है कि अत्यघिक प्राचीन भारत के बारे में हमारा ऐतिहासिक ज्ञान असम्पूर्ण है- इस महान काल की आंशिक झांकी हमें केवल पुरातत्व से मिल सकती है।
भाषाविज्ञान के उत्तरकालीन विकास में ‘कातंत्र’ के रचयिता सर्ववर्मन (300 ईसवी), चन्द्रगोमिन (600 ईसवी), ‘वाक्यपदीय’ के रचयिता भर्तृहरि (सातवीं शताब्दी ईसवी) के नाम शीर्षस्थ हैं। ‘वाक्यपदीय’ में भाषाविज्ञान या व्याकरण से अधिक जोर भाषा के दर्शन पर दिया गया है। जयादित्य और वामन ने पाणिनि पर एक पाठ्यपुस्तक ‘काशिकावृत्ति’ की रचना की। 1625 के लगभग भट्टोजि दीक्षित ने ‘सिद्धांतकौमुदी’ का प्रकाशन किया; यह पाणिनि के ग्रन्थ का सार-संक्षेप है।
संस्कृत के वैयाकरणों ने सर्वप्रथम शब्द-रूपों का विश्लेषण किया, धातु और प्रत्यय का अन्तर समझा, प्रत्यय के कार्य निश्चित किए, और कुल मिलाकर इतने अधिक शुद्ध और सम्पूर्ण व्याकरण का निर्माण किया कि उसका सानी किसी दूसरे देश में पाना असंभव है। प्रोफेसर वेबर का कथन है कि ‘‘पाणिनि के व्याकरण में भाषा की जड़ों तथा उसके शब्दों की रचना की खोज पूरी गहराई के साथ की गई है, इसलिए वह अन्य सभी देशों के व्याकरणों में श्रेष्ठ है।’’
यह कोई संयोग नहीं कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जब भारतीय दर्शन और सांस्कृतिक मूल्यों की पुनः स्थापना हो रही थी उसी समय सर सी.वी.रामन ने भौतिकी की अपनी महत्वपूर्ण खोज की और भारत के पहले नोबल पुरस्कार प्राप्त करने वाले वैज्ञानिक बने। वर्तमान में भारत विज्ञान और तकनीक के कई क्षेत्रों में विश्व के शीर्षस्थ देशों में गिना जाता है और मूलभूत विज्ञान में प्रगति के लिये एक व्यग्रता देश में देखी जाती है। सामाजिक विज्ञान तथा प्राकृतिक विज्ञान के बीच भी संवाद की गहरी कोशिश जारी है। यदि हमें विश्व में एक स्वतंत्र और शक्तिशाली देश के रूप में स्थान बनाना है, जहाँ हमारे धर्म, संस्कृति और ज्ञान की रक्षा हो सके और वह सतत प्रवहमान रह सके, तो हमें विज्ञान और तकनीक के विकास की भी उतनी ही चिंता करना पड़ेगी जितनी कला और संस्कृति की। न सिर्फ ये, बल्कि विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टि की इस ताकत को आम लोगों तक भी पहुँचाना होगा और यह काम उनकी ही भाषा में होगा।

 

                                    संतोष चौबे
                                         (संपादक)