विज्ञान समाचार

(03/Jun/2019)

जब दिखेंगे हैली धूमकेतु के अवशेष

इरफॉन ह्यूमन
 
इस माह 6 व 7 मई को एटा एक्वारिड्स उल्का वर्षा की घटना घटित होगी। एटा एक्वरिड्स एक औसत से ऊपर की उल्का वर्षा है, जो अपने चरम पर 60 मीटर प्रति घंटे तक का उल्कापात करने में सक्षम है। इस खगोलीय घटना की अधिकांश गतिविधि रात्रि आकाष के दक्षिणी गोलार्ध में देखी जाती है। उत्तरी गोलार्ध में इनकी दर प्रति घंटा लगभग 30 उल्का तक पहुँच सकती है। यह उल्का वर्षा हैली धूमकेतु ( द्वारा छोड़े गए धूल कणों द्वारा निर्मित है, जो प्राचीन काल से जाना और देखा जाता रहा है। यह उल्का वर्षा 19 अप्रैल से 28 मई तक प्रतिवर्ष चलती है। लेकिन इस साल 6 मई की रात से षुरू होकर 7 मई की सुबह तक अपने चरम पर होगी, तब आकाष में टूटते तारों का एक अच्छा दृष्य प्रकट होगा। इस उल्का वर्षा का सर्वश्रेष्ठ दृश्य आधी रात के बाद किसी अंधेरे स्थान से अधिक स्पष्टता से दिखाई देगा। हैली की उल्काएं नक्षत्र कुंभ राशि से विकरित होती प्रतीत होंगी, लेकिन ये रात्रि आकाश में कहीं भी दिखाई दे सकती हैं।
18 मई को नील चन्द्र यानी ब्लू मून (ठसनम उववद) की घटना घटित होगी। तब चंद्रमा सूर्य की तरह पृथ्वी के विपरीत दिशा में स्थित होगा और सूर्य मुख पूरी तरह से प्रकाषमान होगा। यह चरण 21:11 यूटीसी पर होगा। इस विषेष पूर्णिमा को प्रारंभिक अमेरिकी जनजातियों द्वारा पूर्ण पुष्प चंद्रमा के रूप में जाना जाता था क्योंकि यह वर्ष का वह समय होता था जब बसंत में फूल बहुतायत में दिखाई देते थे। इस चंद्रमा को विष्व के कई हिस्सों में पूर्ण मकई रोपण चंद्रमा और दुग्ध चंद्रमा (डपसा उववद) के रूप में भी जाना जाता है। चूंकि इस बार यह इस ऋतु में चार पूर्ण चंद्रमाओं में से तीसरा है, इसलिए इसे नील चन्द्र के रूप में जाना गया है। यह दुर्लभ कैलेंडर घटना केवल कुछ वर्षों में एक बार घटित होती है, जो नील चन्द्र जैसे शब्द को जन्म देती है। जब हर 29:53 दिनों में पूर्ण चंद्रमा होते हैं तो आमतौर पर वर्ष के प्रत्येक ऋतु में केवल तीन पूर्ण चंद्रमा होते हैं, लेकिन कभी-कभी एक ऋतु में चार पूर्ण चंद्रमा होते हैं। ऐसे अतिरिक्त पूर्णिमा के चन्द्रमा को ऋतु का नील चन्द्र के रूप में जाना जाता है। शब्द नील चन्द्र (ब्लू मून) का संबंध चंद्रमा के नीले रंग से नहीं है। ब्लू मून लाल, नारंगी या पीले या सफेेेद रंग का हो सकता है। 
नील चन्द्र या ब्लू मून पूर्णिमा के दिन घटित होने वाली एक घटना है। या तो एक ऋतु की चार पूर्णिमाओं में से तीसरी या फिर कलेंडर के अनुसार एक महीने की दूसरी पूर्णिमा की रात को प्रकट होने वाला चंद्रमा ब्लू मून कहलाता है अर्थात यदि कलेंडर में एक महीने में दो पूर्णिमाएँ हों तो दूसरी पूर्णिमा के चंद्रमा को ब्लू मून कहते हैं। वास्तव में ब्लू मून की पूर्णिमा को परंपरागत रूप से अतिरिक्त पूर्णिमा (ज्ीम मगजतं निसस उववद) कहा जाता है, जब एक वर्ष में आमतौर पर 12 की बजाय 13 पूर्णिमाएँ होती हैं। ब्लू मून की घटना प्रत्येक दो या तीन साल में, मेटोनिक चक्र (डमजवदपब बलबसम) के हर 19 सालों में 7 बार होती है अर्थात नील चन्द्र औसतन हर 2.7 साल में एक बार होता हैं।
यदि इस घटना की तह तक जाएं तो पाएंगे कि एक चंद्रमास की अवधि 29.53 दिन होती है। एक वर्ष में लगभग 365.24 दिन होते हैं। 365.24 दिनों को 29.53 दिन से विभाजित करने पर एक वर्ष में लगभग 12.37 चंद्रमास प्राप्त होते हैं। व्यापक रूप से इस्तेमाल किए जाने वाले ग्रेगोरीयन कैलेंडर में, एक वर्ष में 12 महीने और आम तौर पर हर महीने एक पूर्णिमा होती है। अतः प्रत्येक कैलेंडर वर्ष में 12 पूर्ण चंद्रमासों के अतिरिक्त भी लगभग 11 दिन अधिक होते हैं। हर वर्ष इन अतिरिक्त 11 दिनों को जमा करने पर, हर दो या तीन वर्षों में एक अतिरिक्त पूर्णिमा होती है। अतिरिक्त पूर्णिमा, अनिवार्य रूप से चार ऋतुओं में से एक में होती है, उस ऋतु में सामान्य रूप से तीन के बजाय चार पूर्णिमाएँ होती हैं। इस तरह एक नील चन्द्र की प्राप्ति होती है। पिछली बार यह घटना 21 मई, 2016 को घटित हुई थी। यदि इस बार आप इस खगोलीय घटना को देखने से चूक गये तो अगली बार आपको इसे देखने के लिए 22 अगस्त, 2021 का इंतेज़ार करना पड़ेगा।
 
माह की खोजः
10 मई, 1752 को बेंजामिन फ्रैंकलिन ने पहली बार अपनी बिजली की छड़ या फ्रेंकलिन छड़ अर्थात तडि़त चालक (स्पहीजपदह त्वंक) का परीक्षण किया था। उन्होंने बिजली की छड़ के साथ बाईफोकल्स, लोहे की भट्टी का चूल्हा फ्रैंकलिन स्टोव, एक गाड़ी के ओडोमीटर और ग्लास आर्मोनिका आदि का आविष्कार भी किया। बेंजामिन फ्रैंकलिन एक प्रसिद्ध लेखक और मुद्रक, व्यंग्यकार, राजनीतिक विचारक, राजनीतिज्ञ, वैज्ञानिक, आविष्कारक, नागरिक कार्यकर्ता और राजनयिक थे। एक वैज्ञानिक के रूप में, बिजली के सम्बन्ध में अपनी खोजों और सिद्धांतों के लिए वे प्रबोधन और भौतिक विज्ञान के इतिहास में एक प्रमुख शख्सियत के रूप मे अंकित हैं। बेंजामिन फ्रेंकलिन द्वारा आविष्कृत लाइटिंग कंडक्टर से मकानों पर बिजली गिरने से होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है। तडि़त चालक मे धातु की बनी एक छड़ होती है और इस छड़ का ऊपरी नुकीला सिरा मकान की छत के ऊपर रहता हैं जबकि दूसरा सिरा जमीन में गाड़ दिया जाता है। जब तडि़त बादल मकान के ऊपर से जाते है, तब तडि़त विद्युत मकान से ना टकराकर उस छड़ के द्वारा ज़मीन में चली जाती है। बेंजामिन फ्रैंकलिन के विषय में चर्चित है कि उन्होंने हमेषा मानवहित में कार्य करने की सोची और कभी भी अपने आविष्कारों का पेटेंट नहीं करवाया क्योंकि वह चाहते थे कि उनकी खोजों का आम लोग निःषुल्क इस्तेमाल कर सकें। 
 
अंतरिक्ष युद्ध की आहट
स्टार वॉर्स जॉर्ज लूकस द्वारा कल्पित एक महाकाव्यात्मक अंतरिक्ष ओपेरा का फ्रैन्चाइज़ है, जिस पर बनी पहली फिल्म मूलतः 25 मई, 1977 को 20जी सेंचुरी फॉक्स के सौजन्य से रिलीज़ हुई और विश्वव्यापी पॉप संस्कृति की अदभुत घटना बन गई। स्टारवॉर्स की रिलीज़ से इस फि़ल्म की शृंखला की शुरुआत हुई। दो उत्तर भागों ‘‘द एम्पायर स्ट्राइकस बैक’’ 21 मई, 1980 को रिलीज़ हुई और ‘‘रिटर्न ऑफ द जेडी’’ 25 मई, 1983 को रिलीज हुई। वर्ष 1997 में, स्टार वॉर्स के रिलीज़ होने की 20वीं वर्षगांठ पर उसके तदनुरूप लुकास ने तीनों फिल्मों के विशेष संस्करण सिनेमाघरों के लिए रिलीज किए गये। इन प्रसारणों में मूल फिल्मों में अनेक फेरबदल पेश किए गए, मुख्यरूप से स्पेशल एफ़ेक्ट के कारण, जिसे ऐसे दृश्य पैदा किए जो मूल फिल्मों के निर्माण के समय संभव नहीं था। इन्हीं यादों को ताज़ा करने के लिए 4 मई को स्टार वार्स दिवस (ैजंत ॅंते क्ंल) मनाया जाता है। यदि विज्ञान कथाओं की बात की जाए तो एक जाना पहचाना नाम है स्टार वार्स, जिस पर आधारित उपन्यास इस विषय पर बनी फिल्म के रिलीज़ से काफ़ी पहले ही लिखी जा चुका था। वर्ष 1976 में औपन्यासिक रूपांतरण के साथ स्टार वॉर्स एलेन डीन फॉस्टर लिखित ‘‘घोस्ट और लुकास’’ को जिसके लिए प्रशंसित किया गया, फॉस्टर के वर्ष 1978 में प्रकाशित उपन्यास ‘‘स्प्लिंटर ऑफ द माइंड्स आई एक्स्पैंडेड यूनिवर्स’’ की रिलीज़ होने वाली पहली कृति थी। मार्वेल कॉमिक्स ने वर्ष 1977 से 1986 तक स्टार वॉर्स कॉमिक बुक शृंखला और रूपांतरण प्रकाशित किए। स्टार वार्स की आहट उस दिन से महसूस की गई जब चीन ने अपनी तुंगफुंग मिसाइल से अपने ही एक मौसम उपग्रह को मार गिराया था। यह उपग्रह उस समय पृथ्वी 860 किलोमीटर की दूरी पर था। अमेरिका ने चीन के इस परीक्षण पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि इससे अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ फिर शुरू हो सकती है। 
इस दिषा में चीन ने वर्ष 2007 में उपग्रह रोधी (एसैट) परीक्षण कर इस दिषा में अपने क़दम और मज़बूत किये हैं। वर्तमान में उपग्रहों को जाम करने की क्षमता चीन के पास है और अब वह पूर्ण स्पेक्ट्रम क्षमता विकसित करने की ओर बढ़ रहा है। टोही विमानों, संचार उपग्रहों को नुकसान पहुंचाने पर भी उसका ध्यान है। इस दिशा में चीन के लगातार प्रयास और उपग्रह प्रतिरोधी हथियारों के परीक्षण से स्वयं अमेरिका भी चिंतित है। अमेरिका ने भी 13 सितम्बर, 1985 को अपना अन्तिम उपग्रह भेदी परीक्षण किया था। इसके बाद इस पर इसलिए रोक लगा दी गई कि नष्ट होने वाले उपग्रह के टुकड़े दूसरे उपग्रहों को क्षति पहुंचा सकते हैं। हालांकि अमेरिका ने जंगी जहाज़ यूएसएस लेक एरी ने कुछ वर्ष पहले ‘एसएम-3’ प्रक्षेपास्त्र से स्काई लैब की तरह पृथ्वी की ओर आ रहे उसके जासूसी उपग्रह को तीन मिनट के अन्दर पृथ्वी से 133 मील ऊपर ध्वस्त कर दिया था। चीन ने 11 जनवरी, 2007 को अंतरिक्ष में मौजूद अपने मौसमी उपग्रह को इसी तरह प्रक्षेपास्त्र से निशाना बनाया था। इससे वह अमेरिका व तत्कालीन सोवियत संघ के बाद ऐसा कारनामा दिखाने वाला तीसरा देश हो गया। ज्ञात रहे कि रूस भी ऐसे प्रयोग करने में सक्षम है, तो क्या भला वह पीछे रह सकता है! ऐसे में यही लगता है कि सामूहिक विनाश के हथियारों को अंतरिक्ष में जाने की होड़ बढ़ने की ही संभावना अधिक है। अंतरिक्ष में इस तरह के प्रयोग से लगता है कि यह एक तरह की महत्वाकांक्षा है, जो जमीन, जल और आकाश से निकलकर अब अंतरिक्ष की ओर कदम बढ़ा रही है। इससे आंकलन किया जा रहा है कि कौन कितनी दूर मार कर सकता है। माना तो यह भी जाता है कि किसी समय तो अंतरिक्ष युद्ध की तैयारी भी हो गई थी। लेकिन सोवियत संघ के विभाजन के बाद यह योजना अपने आप ठण्डी पड़ गई। अब चीन ने संचार उपग्रहों को ठप करने की क्षमता हासिल करके भविष्य के सभी युद्धों की प्रमुख प्रौद्योगिकी को विकसित कर लिया है। 
हमारे देष के पास भी उपग्रहों को मार गिराने की क्षमता है, लेकिन उसने जान-बूझकर इस दिशा में कदम नहीं बढ़ाया है, क्योंकि वह अंतरिक्ष के शान्तिपूर्ण उपयोग के लिए संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर चुका है। जो भी हो, स्टार वार्स फिलहाल तो एक कहानी है, लेकिन आज विष्व के बिगड़ते हालात देखकर लगता है कि इसे हक़ीकत बनते देर नहीं लगेगी, इस दिषा में सभी देषों को धैर्य और समझदारी से काम लेना होगा। 
ना खाना भी बेहतर है
खुद को पसंदीदा खाना खाने से रोकना बड़ा कठिन काम होता है। हालांकि सेहत के प्रति समझदार दिखने वाले लोग अक्सर अपना मन मारते दिखते हैं। वैसे कभी-कभी खाना ना खाना भी हमारी सेहत के लिए बेहतर होता है, इस बात को हमारे पूर्वज अच्छी तरह समझते थे। धार्मिक एवं आध्यात्मिक साधना के रूप में प्रागैतिहासिक काल से ही उपवास का प्रचलन है और हिन्दु हो या मुस्लिम सभी धर्मों में उपवास और रोज़ा को सेहत के लिए अच्छा बताया गया है। कुछ या सभी भोजन, पेय या दोनो के लिये बिना कुछ अवधि तक रहना उपवास (थ्ंेजपदह) कहलाता है। उपवास पूर्ण या आंशिक हो सकता है। यह एक दिन की अवधि से लेकर एक माह तक का हो सकता है। 
6 मई को अन्तर्राष्ट्रीय आहार रहित दिवस (प्दजमतदंजपवदंस दव कपमज कंल) मनाया जाता है, जिसकी षुरूआत 90 के दशक में एक ब्रिटिश महिला मैरी इवांस ने की थीं। पहला आहार रहित दिवस यूके में वर्ष 1992 में मनाया गया था इसके बाद यह पूरे विश्व में मनाया जाने लगा। देखा गया है कि एक बार भोजन ग्रहण करने पर कुछ घंटों तक जो शरीर को खाए हुए आहार से शक्ति मिलती रहती है, किंतु उसके पश्चात् शरीर में संचित आहार के अवयवों-प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और वसा का शरीर उपयोग करने लगता है। वसा और कार्बोहाइड्रेट परिश्रम करने की शक्ति उत्पन्न करते हैं। प्रोटीन का काम शरीर के टूटे-फूटे भागों का पुनर्निर्माण करना है। किंतु जब उपवास लंबा या अधिक काल तक होता है तो शक्ति उत्पादन के लिए शरीर प्रोटीन का भी उपयोग करता है। इस प्रकार प्रोटीन ऊतक निर्माण (टिशू फॉर्मेशन) और शक्ति-उत्पादन दोनों काम करता है। 
मानव शरीर में कार्बोहाइड्रेट दो रूपों में वर्तमान रहता है- ग्लूकोस, जो रक्त में प्रवाहित होता रहता है और गलाइकोजेन, जो पेशियों और यकृत में संचित रहता है। साधारणतया कार्बोहाइड्रेट शरीर प्रतिदिन के भोजन से मिलता है। उपवास की अवस्था में जब रक्त का ग्लूकोस खर्च हो जाता है तब संचित ग्लाइकोजेन ग्लूकोस में परिणत होकर रक्त में जाता रहता है। उपवास की अवस्था में यह संचित कार्बोहाइड्रेट दो चार दिनों में ही समाप्त हो जाता है, तब कार्बोहाइड्रेट का काम वसा को करना पड़ता है और साथ ही प्रोटीन को भी इस कार्य में सहायता करनी पड़ती है। मानव शरीर में वसा विशेष मात्रा में त्वचा के नीचे तथा कलाओं में संचित रहती है। स्थूल शरीर में वसा की अधिक मात्रा रहती है। शरीर को दैनिक कार्याें में और उष्मा के लिए कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन, तीनों पदार्थों की आवश्यकता होती है, जो उसको अपने आहार से प्राप्त होते हैं। आहार से उपलब्ध वसा यकृत में जाती है और वहाँ पर रासायनिक प्रतिक्रियाओं में वसाम्ल और ऐसिटो-ऐसीटिक-अम्ल में परिवर्तित होकर रक्त में प्रवाहित होती है तथा शरीर को शक्ति और उष्मा प्रदान रकती है। उपवास की अवस्था में शरीर की संचित वसा का यकृत द्वारा इसी प्रकार उपयोग किया जाता है। यह संचित वसा कुछ सप्ताहों तक कार्बोहाइड्रेट का भी स्थान ग्रहण कर सकती है। अंतर केवल यह है कि जब शरीर को आहार से कार्बोहाइड्रेट मिलता रहता है तब ऐसिटो-ऐसीटिक-अम्ल यकृत द्वारा उतनी ही मात्रा में संचालित होता है जितनी की आवश्यकता शरीर को होती है। कार्बोहाइड्रेट की अनुपस्थिति में इस अम्ल का उत्पादन विशेष तथा अधिक होता है और उसका कुछ अंश मूत्र में आने लगता है। इस अंश को कीटोन कहते हैं कीटोन का मूत्र में पाया जाना शरीर में कार्बोहाइड्रेट की कमी का चिह्न है और उसका अर्थ यह होता है कि कार्बोहाइड्रेट का कार्य अब संचित वसा को करना पड़ रहा है। यह उपवास की प्रारंभावस्था में होता है। 
विज्ञान कहता है कि अच्छी सेहत और बेहतर पाचनतंत्र के लिए उपवास या रोज़ा ज़रूरी है। सही तरीके से और सीमित संख्या में उपवास करना आपकी सेहत के लिए फायदेमंद होता है। डेली टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक इंसानों पर उपवास का सकारात्मक असर होता है। इंस्टीट्यूट लैबोरटी ऑफ न्यूरोसाइंस के प्रोफेसर के मुताबिक अगर आप कम कैलोरी का सेवन करेंगे तो इससे आपके दिमाग को मदद मिलेगी। उन्होंने बताया फास्ट बेशक फायदेमंद है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप खाना ही छोड़ दें। शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन में प्रमाणित किया है कि सप्ताह में दो दिन खाने से परहेज करेंगे तो आपकी उम्र में इजाफा होगा। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजिंग के शोधकर्ताओं ने अध्ययन में पाया है कि सप्ताह में दो दिन का उपवास लंबी उम्र पाने की चाबी है। इतना ही नहीं उपवास रखने से अल्जाइमर और पार्किंगसन जैसी दिमागी बीमारियों से भी बचा जा सकता है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक जब शरीर सीमित मात्रा में कैलोरी लेता है तो दिमाग में मौजूद केमिकल मैसेंजर में इजाफा होता है। हालांकि यह बात पहले से प्रमाणित थी कि चूहों में कैलोरी की सीमित मात्रा उनकी जिंदगी को लंबा करती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि चूहों की तरह ही इंसान पर भी इसका एक जैसा असर होगा।
 
शरीर के निजी अंगों के प्रति
जननांग स्वायत्तता को लेकर आज दुनिया के हर देष से समय-समय पर आवाजे़ उठने लगी हैं। जननांग स्वायत्तता को विषेषतः पुरूष-स्त्री ख़्ातना से जोड़कर देखा जाता है। इस प्रथा के विरूद्ध जर्मनी द्वारा 7 मई, 2013 को एक अभियान प्रारम्भ किया गया था। इस तिथि को इसलिए चुना गया है क्योंकि 7 मई, 2012 को कोलोन (जर्मनी) के जिला न्यायालय ने वहांं पहली बार न्याय के तहत घोषणा की गई कि पुरूष बच्चों का ख़्ातना किसी हमले के समान है। 7 मई को विष्व व्यापी जननांग स्वायत्तता दिवस मनाया जाता है। 
पुरूषों का ख़्ातना उनके शिश्न की अग्रत्वचा को पूरी तरह या आंशिक रूप से हटा देने की प्रक्रिया है। मानव शिश्न जैविक ऊतक के तीन स्तंभों से मिल कर बनता है। पृष्ठीय पक्ष पर दो कोर्पस कैवर्नोसा एक दूसरे के साथ-साथ तथा एक कोर्पस स्पोंजिओसम उदर पक्ष (।इकवउपदंस ेपकम) पर इन दोनों के बीच स्थित होता है। कोर्पस स्पोंजिओसम का वृहत और गोलाकार सिरा शिश्नमुंड में परिणित होता है जो अग्रत्वचा द्वारा सुरक्षित रहता है। अग्रत्वचा एक ढीली त्वचा की संरचना है। शिश्न के निचली ओर का वह क्षेत्र जहाँ से अग्रत्वचा जुड़ी रहती है अग्रत्वचा का बंध (फेरुनुलम) कहलाता है। 
देखा जाए तो ख़्ातना एक प्राचीन प्रथा है जिसके प्रारंभिक चित्रण गुफा चित्रों और प्राचीन मिस्र की कब्रों में भी मिलते हैं। यहूदी संप्रदाय में पुरूषों का धार्मिक ख़्ातना ईश्वर का आदेश माना जाता है। यहूदी कानून के अनुसार खतना एक मित्ज्वा असेह  है और यह यहूदी के रूप में जन्म लेने वाले पुरूषों और यहूदी धर्म में धर्मांतरित होने वाले उन पुरूषों के लिये अनिवार्य है। इसे केवल तभी टाला जा सकता है जब इससे बच्चे के जीवन या स्वास्थ्य पर कोई ख़्ातरा हो। सामान्यतः यह कार्य एक मोहेल द्वारा जन्म के आठवें दिन ब्रित मिलाह नामक एक आयोजन में किया जाता है, जिसका हिब्रू अर्थ ‘‘खतने का रिवाज़’’ है। मुस्लमानों में यह व्यापक रूप से प्रचलित है और अक्सर इसे सुन्नत या सुन्नाह कहा जाता है। शिशुओं और किषोरों का ख़्ातना भारत सहित मुस्लिम देषों के अतिरिक्त संयुक्त राज्य अमेरीका, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, न्यूजीलैण्ड के अंग्रेजी-भाषी क्षेत्रों और कम व्यापक रूप से यूनाइटेड किंगडम में भी अपनाया जाता है। इस बात की व्याख्या करने वाले अनेक अनुमान हैं कि वर्ष 1900 के आस-पास संयुक्त राज्य अमेरीका में शिशुओं के ख़्ातने को क्यों स्वीकार किया गया। विषेषज्ञ मानते हैं कि बीमारियों के जीवाणु सिद्धांत ने मानव शरीर को अनेक ख़्ातरनाक जीवाणुओं के लिये वाहन के रूप में चित्रित किया गया, जिससे लोग जीवाणुओं के 
प्रति भयभीत और धूल-मिट्टी तथा शरीर से निकलने वाले पदार्थों के प्रति आशंकित हो गये थे। विषेषज्ञों का कहना है कि ख़्ातना किए गए पुरुषों में संक्रमण का जोखिम कम होता है क्योंकि लिंग की आगे की त्वचा के बिना कीटाणुओं के पनपने के लिए नमी का वातावरण नहीं मिल पाता। संयुक्त राष्ट्र के विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) एचआईवी/एड्स पर जॉइन्ट यूनाईटेड नेशन्स प्रोग्राम और सेंटर्स फॉर डिसीज़ कण्ट्रोल एण्ड प्रीवेंशन का मत हैं कि प्रमाण इस बात की ओर संकेत करते हैं कि पुरूषों में ख़्ातना करना शिश्न-योनि यौन संबंध के दौरान पुरूषों द्वारा एचआईवी अभिग्रहण के ख़्ातरे को लक्षणीय रूप से कम कर देता है, लेकिन यह भी कहते हैं कि ख़्ातना केवल आंशिक सुरक्षा प्रदान करता है ना कि इसे एचआईवी के प्रसार को रोकने के लिये प्रयुक्त अन्य अवरोधों के विकल्प के रूप में समझना चाहिये। आज ख़्ातने के लिए सर्जन का सहरा लिया जा रहा है, क्योंकि नीम-हकीमों से ख़्ातना करवाना ख़्ातरे से खाली नहीं होता। भारत में ख़्ातना के समय दावत आदि आयोजित करने का रिवाज़ अब लगभग समाप्त हो गया है, लेकिन अन्य कई देषों में ख़्ातना प्रथा को समाहरोपूर्वक मनाया जाता है। दक्षिण अफ्रीका में किशोरों की देखभाल करने वालों को अमाखानकाथा कहा जाता है, जबकि पारंपरिक सर्जन को इंगसिबी कहते हैं। ये लोग अपने गीत और नृत्य के माध्यम से नए लड़कों को अपनी परंपरा बरकरार रखने और उसका सम्मान करने का संदेश देते हैं। असुरक्षित ढंग से ख़्ातना करने के कारण कई किशोरों की मौत हो चुकी है, इन मौतों के बाद उन पारंपरिक सर्जनों पर शिकंजा कसने की मांग उठ रही है जो ये सर्जरी करते हैं, क्योंकि अधकचरे ऑपरेशनों के चलते सैकड़ों लोग अस्पतालों में भर्ती हो चुके हैं। 
आज पूरी दुनिया में महिलाओं के ख़्ातना पर विवाद है। सभ्य समाज में स्त्री जननांग स्वायत्तता की बात की जाए तो स्त्री ख़्ातना को विष्व में एक घिनौने सामाजिक/धार्मिक कृत के रूप में देखा जा रहा है। 8 मई, 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के चार मंत्रालयों से महिलाओं के ख़्ातना पर उनकी राय मांगी थी। महिलाओं के जननांग के ख़्ातना अर्थात अंगभंग की प्रथा एशिया और अफ्रीका के बहुत से देशों में व्याप्त है, ख़्ाासकर बोहरा समुदाय में। ज्ञातव्य हो कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा मंत्रालयों की राय मांगने से कुछ दिन पहले अमेरिका के डेट्रायट में एक डॉक्टर को एक महिला का ख़्ातना करने के आरोप में नौकरी से निकाल दिया गया था। आम तौर पर महिलाओं का ख़्ातना करते समय उन्हें बेहोश या प्रभावित इलाज के लिए सुन्न नहीं किया जाता और न ही कोई डॉक्टर निगरानी के लिए मौजूद होता है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार अफ्रीका और एशिया के करीब 30 देशों में 20 करोड़ से अधिक लड़कियों का ख़्ातना हो चुका है। भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने इसे महिलाओं के लैंगिक आधार पर भेदभाव बताया है। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में इस पर कानूनन रोक भी है।
 
सूचना और दूरसंचार में
संचार का इतिहास प्रागैतिहासिक काल से आरम्भ होता है। संचार के अन्तर्गत तुच्छ विचार-विनिमय से लेकर शास्त्रार्थ एवं जनसंचार सब आते हैं। कोई 200ए000 वर्ष पूर्व मानव-वाणी के प्रादुर्भाव के साथ मानव संचार में एक क्रान्ति आयी थी। लगभग 30ए000 वर्ष पूर्व प्रतीकों का विकास हुआ एवं लगभग 7000 ईसापूर्व लिपि और लेखन का विकास हुआ। इनकी तुलना में पिछली कुछ शताब्दियों में ही दूरसंचार के क्षेत्र में बहुत अधिक विकास हुआ है। 17 मई को विष्व दूरसंचार दिवस (ॅवतसक पदवितउंजपवद ेवबपमजल कंल) एवं विष्व सूचना समाज दिवस (ॅवतसक प्दवितउंजपवद ैवबपमजल क्ंल) मनाया जाता है। विश्व दूरसंचार दिवस 17 मई को मनाया जाता है। यह दिन 17 मई 1865 को अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ की स्थापना की स्मृति में विश्व दूरसंचार दिवस के रूप में जाना जाता था। वर्ष 1973 में मैलेगा-टोर्रीमोलिनोन्स में एक सम्मेलन के दौरान इसे घोषित किया गया। इस दिन का मुख्य उद्देश्य इंटरनेट और नई प्रौद्योगिकियों द्वारा लाया गया सामाजिक परिवर्तनों की वैश्विक जागरूकता बढ़ाने के लिए है।
यह दिवस अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ (आईटीयू) की स्थापना और वर्ष 1865 में पहले अंतर्राष्ट्रीय टेलीग्राफ समझौते पर हस्ताक्षर होने की स्मृति में मनाया जाता है। इस दिन का मुख्य उद्देश्य इंटरनेट, टेलीफोन और टेलीविजन के द्वारा तकनीकी दूरियों को कम करना और आपसी संचार सम्पर्क को बढ़ाना भी है। आधुनिक युग में फोन, मोबाइल और इंटरनेट लोगों की प्रथम आवश्यकता बन गये हैं। इसके बिना जीवन की कल्पना करना बहुत ही मुश्किल हो चुका है। आज यह इंसान के व्यक्तिगत जीवन से लेकर व्यावसायिक जीवन में पूरी तक प्रवेश कर चुका है। पहले जहाँ किसी से संपर्क साधने के लिए लोगों को काफी मशक्कत करनी पड़ती थी, वहीं आज मोबाइल और इंटरनेट ने इसे बहुत ही आसान बना दिया है। व्यक्ति कुछ ही सेकेंड में बेहद असानी से दोस्तों, परिवार और सगे संबधियों से संपर्क साध सकता है। यह दूरसंचार की क्रांति है, जिसकी बदौलत भारत जैसे कुछ विकासशील देशों की गिनती भी विश्व के कुछ ऐसे देशों में होती है, जिनकी अर्थव्यवस्था तेजी से रफ्तार पकड़ रही है। ‘विश्व दूरसंचार दिवस’ मनाने की परंपरा 17 मई, 1865 में शुरू हुई थी, लेकिन आधुनिक समय में इसकी शुरुआत 1969 में हुई। तभी से पूरे विश्व में इसे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इसके साथ नवम्बर, 2006 में टर्की में आयोजित पूर्णाधिकारी कांफ्रेंस में यह भी निर्णय लिया गया था कि ‘विश्व दूरसंचार’ एवं ‘सूचना’ एवं ‘सोसाइटी दिवस’, तीनों को एक साथ मनाया जाए। 
दूरसंचार के लोकप्रिय अर्थ में हमेशा बिजली के संकेत शामिल रहे हैं और आजकल लोगों ने डाक या दूरसंचार के किसी भी अन्य कच्चे तरीके को इसके अर्थ से बाहर रखा है। इसलिए, भारतीय दूरसंचार के इतिहास को टेलीग्राफ की शुरूआत के साथ प्रारंभ किया जा सकता है। भारत में डाक और दूरसंचार क्षेत्रों में एक धीमी और असहज शुरुआत हुई थी। 1850 में, पहली प्रायोगिक बिजली तार लाइन डायमंड हार्बर और कोलकाता के बीच शुरू की गई थी। 1851 में, इसे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए खोला गया था। डाक और टेलीग्राफ विभाग उस समय लोक निर्माण विभाग के एक छोटे कोने में था। उत्तर में कोलकाता (कलकत्ता) और पेशावर को आगरा सहित और मुंबई (बॉम्बे) को सिंदवा घाट्स के जरिए दक्षिण में चेन्नई, यहां तक कि ऊटकमंड और बंगलोर के साथ जोड़ने वाली 4000 मील (6400 किमी) की टेलीग्राफ लाइनों का निर्माण नवंबर 1853 में शुरू किया गया। भारत में टेलीग्राफ और टेलीफोन का बीड़ा उठाने वाले डॉ। विलियम शौनेस्सी लोक निर्माण विभाग में काम करते थे। वे इस पूरी अवधि के दौरान दूरसंचार के विकास की दिशा में काम करते रहे। 1854 में एक अलग विभाग खोला गया, जब टेलीग्राफ सुविधाओं को जनता के लिए खोला गया था।
पारिस्थितिक संतुलन की आवश्यकता
जैव-विविधता या जैविक-विविधता जीवों के बीच पायी जाने वाली विभिन्नता है जोकि प्रजातियों में, प्रजातियों के बीच और उनकी पारितंत्रों की विविधता को भी समाहित करती है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यानी युएनईपी के अनुसार जैवविविधता विशिष्टतया अनुवांशिक, प्रजाति तथा पारिस्थितिकि तंत्र के विविधता का स्तर मापता है। जैव विविधता किसी जैविक तंत्र के स्वास्थ्य का सूचक है। जैव-विविधता शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम वाल्टर जी। रासन ने 1985 में किया था। अन्तर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस (22 मई को मनाया जाता है। वर्ष 2010 को जैव विविधता का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष, घोषित किया गया था। जैव-विविधता तीन प्रकार की हैं-आनुवंशिक विविधता, प्रजातीय विविधताय तथा पारितंत्र विविधता। प्रजातियों में पायी जाने वाली आनुवंशिक विभिन्नता को आनुवंशिक विविधता के नाम से जाना जाता है। प्रजातियों में पायी जाने वाली विभिन्नता को प्रजातीय विविधता के नाम से जाना जाता है। पारितंत्र विविधता पृथ्वी पर पायी जाने वाली पारितंत्रों में उस विभिन्नता को कहते हैं जिसमें प्रजातियों का निवास होता है। जैव-विविधता पारितंत्र को स्थिरता प्रदान कर पारिस्थितिक संतुलन को बरकरार रखती है। पौधे तथा जन्तु एक दूसरे से खाद्य शृंखला तथा खाद्य जाल द्वारा जुड़े होते हैं। एक प्रजाति की विलुप्ति दूसरे के जीवन को प्रभावित करती है। आज मानव की लालची प्रवृत्ति के चलते सम्पूर्ण हमारी जैवविविधता ख़्ातरे में पड़ गई है। संपूर्ण विश्व में पौधों की लगभग 60,000 प्रजातियाँ तथा जन्तुओं की 2,000 प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर खड़ी हैं। यद्यपि इसमें से ज़्यादातर प्रजातियाँ पौधों की हैं पर इसमें कुछ प्रजातियाँ जन्तुओं की भी हैं। इनमें 343 मछलियाँ, 50 जलथलचारी, 170 सरीसृप, 1,355 अकेशरुकी, 1,037 पक्षियाँ तथा 497 स्तनपायी शामिल हैं। अतः पर्यावरण एवं पारिस्थितिक संतुलन, प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, सूखा, भू-स्खलन आदि से मुक्ति के लिये जैव-विविधता का संरक्षण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
 
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