विज्ञान समाचार

(01/Oct/2014)

दिल के अंदर ही बन जाएगा पेसमेकर  

अपने ही शरीर में खुद का पेसमेकर तैयार करने की कल्पना जल्द ही हक़ीक़त में बदल सकती है। वैज्ञानिकों ने सुअरों में इसके कामयाब प्रयोग किए हैं। वैज्ञानिकों ने हृदय की कोशिकाओं में एक जीन डालकर उन्हें पेसमेकर कोशिका में बदल दिया। लॉस एंजेलिस के सिडार्स-सिनाई हार्ट इंस्टीटÎूट के वैज्ञानिकों के अनुसार 'जैविक पेसमेकर एक बीमारी का प्रभावी ढंग से इलाज करने में` कामयाब रहा है। ब्रिटिश हार्ट फ़ाउंडेशन के अनुसार साइंस ट्रंसलेशनल मेडिसिन में प्रकाशित शोध को प्रयोग में आने में 'अभी बहुत समय लगेगा।` शोधकर्ताओं ने ऐसे सुअरों में एक जीन को डाला जिन्हें हृदयगति धीमी रहने की बीमारी थी। इस जीन थैरेपी ने करोड़ों की संख्या में मौजूद दिल की मांसपेशियों में से कुछ को बहुत दुर्लभ उन विशेष कोशिकाओं में बदल दिया जो दिल की धड़कन को एक समान रखती हैं।

शोध दल का नेतृत्व करने वाले डॉक्टर एडुआर्डे मार्बन ने कहा, 'पहली बार हम एक जैविक पेसमेकर तैयार करने में कामयाब हुए हैं जिसमें कम से कम बाहरी दखल दिया गया है। इससे यह भी पता चला है कि जैविक पेसमेकर रोज़मर्रा की ज़िंदगी का बोझ उठा सकता है।` पारंपरिक पेसमेकर एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण होता है जिसे छाती के अंदर लगाया जाता है और ये अनियमित हृदयगति को नियंत्रित करता है।  

आवाज़ से चिड़िया पहचानेगा सॉफ्टवेयर 

वैज्ञानिकों ने एक ऐसा अति उन्नत सॉफ्टवेयर तैयार किया है जो आवाज़ पहचानकर बता देगा कि ये किस पक्षी की आवाज़ है। वैज्ञानिकों ने इस सॉफ्टवेयर में अलग-अलग पक्षियों की रिकॉर्ड की गई आवाज़ का इस्तेमाल किया है। उन आवाज़ों का भी इस्तेमाल किया है जब कई चिड़ियां समूह में होती हैं और एक साथ चहचहा रही होती हैं। डॉक्टर डेन स्टोवेल के अनुसार, ''चिड़ियों की कई मौजूदा प्रजातियों की आवाज़ की रिकॉर्डिंग्स को सुनकर और कम्प्यूटर की मदद से मैं ये बताने में सक्षम था कि ये अमुक आवाज़ किस पक्षी की है।`` यह तकनीक 'फीचर लर्निंग` तकनीक कहलाती है जिसमें गणित के सवालों को हल करने की विधि का इस्तेमाल किया जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, अपने आप काम करने वाली यह प्रणाली अक्सर बेहतर परिणाम देती है। इस तकनीक को हज़ारों चिड़ियों की आवाज़ पर आज़माया गया। इनमें ब्रिटिश लाइब्रेरी साउंड आर्काइव से लिए गए नमूने भी शामिल हैं। डॉक्टर स्टोवेल कहते हैं, ''चिड़ियों का गाना बेहद जटिल होता है। यहां तक कि उनकी जो सबसे साधारण आवाज़ होती है, वह भी बड़ी जटिल होती है क्योंकि वो सुनने में एक जैसी ही लगती है।`` डॉक्टर स्टोवेल अब एक ऐसी तकनीक पर काम कर रहे हैं जो शायद ये बता दे कि दो परिंदों के बीच क्या रिश्ता है।  

पृथ्वी पर कार्बन डाईऑक्साइड कम करती हैं चीटियां! 

चींटियों की खिल्ली उसके छोटे आकार पर हर किसी ने उड़ाई होगी, लेकिन यह जानकर आश्चर्य होगा कि वातावरण में मौजूद कार्बन डाईऑक्साइड को कम कर पृथ्वी को रहने योग्य बनाने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण है। एक अध्ययन निष्कर्ष के मुताबिक, चीटियां खनिज क्षय के सबसे शक्तिशाली जैविक घटकों में से एक हैं। वायुमंडल में मौजूद कार्बन डाईऑक्साइड को कैल्शियम और मैग्नीशिय सलिकेट द्वारा कार्बेनेट में बदल दिया जाता है। इस प्रकार वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड में कमी होती है। अमेरिका के एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी के रोनाल्ड डॉर्न ने कहा कि कैल्शियम और मैग्नीशियम सिलिकेट के विघटन से वायुमंडल में मौजूद कार्बन डाईऑक्साइड में धीरे-धीरे कमी आती है, क्योंकि यह लाइमस्टोन और डोलोमाइट में बदल जाती है। चीटियां इस प्रतिक्रिया को 300 गुणा ज्यादा बढ़ा देती हैं। चीटियां कैल्शियम-मैग्नीशियम के अजैविक विघटन (बायोलॉजिकली इनहांस वेदरिंग) को बढ़ाने में सहायता करती हैं। चीटियां किस प्रकार खनिजों से प्रतिक्रिया करती हैं, इसे समझकर वायुमंडलीय कार्बन डाईऑक्साइड घटाने में सहायता मिल सकती है। यह अध्ययन पत्रिका 'जियोलॉजी` में प्रकाशित हुआ है।

सिलिकेट द्वारा कार्बेनेट में बदल दिया जाता है। इस प्रकार वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड में कमी होती है। अमेरिका के एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी के रोनाल्ड डॉर्न ने कहा कि कैल्शियम और मैग्नीशियम सिलिकेट के विघटन से वायुमंडल में मौजूद कार्बन डाईऑक्साइड में धीरे-धीरे कमी आती है, क्योंकि यह लाइमस्टोन और डोलोमाइट में बदल जाती है। चीटियां इस प्रतिक्रिया को 300 गुणा ज्यादा बढ़ा देती हैं। चीटियां कैल्शियम-मैग्नीशियम के अजैविक विघटन (बायोलॉजिकली इनहांस वेदरिंग) को बढ़ाने में सहायता करती हैं। चीटियां किस प्रकार खनिजों से प्रतिक्रिया करती हैं, इसे समझकर वायुमंडलीय कार्बन डाईऑक्साइड घटाने में सहायता मिल सकती है। यह अध्ययन पत्रिका 'जियोलॉजी` में प्रकाशित हुआ है।  

                                          मेमोरी कार्ड में अश्लीलता का पता लगाता है कुत्ता! 

अमेरिका के रोड आइलैंड में बच्चों के खिलाफ इंटरनेट अपराध को रोकने वाले कार्यबल का एक गोल्डन लैब्राडोर (कुत्ता) बाल अश्लीलता को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। थोरू नामक यह कुत्ता थंब ड्राइव (यूएसवी ड्राइव) में बच्चों से संबंधित अश्लील सामग्री को धातु की एक कैबिनेट में छिपाकर रहे संदिग्ध को गिरफ्तार कराने में पुलिस की मदद कर चुका है। प्रोविडेंस जर्नल की रपट के मुताबिक, थोरू के प्रशिक्षक जासूस एडम ह्यूस्टन ने कहा कि अगर कोई मेमोरी कार्ड हो, तो वह सूंघकर पता लगा सकता है। उसे हार्ड ड्राइव, थंब ड्राइव और अन्य कम्प्यूटर उपकरण को सूंघकर पता लगाने का प्रशिक्षण दिया गया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, बच्चों से संबंधित अश्लील सामग्री को किसी छोटे उपकरण के माध्यम से ले जाने वाले व्यक्ति को भी वह उसके गंध से पकड़ सकता है, जो सामान्यतया पुलिस को नजर नहीं आ पाती।  

षुगर लेवल बताएगा गूगल का स्मार्ट कॉन्टैक्ट लेंस  

इस साल जनवरी में गूगल की ओर से एक ऐसा स्मार्ट लेंस तैयार करने की जानकारी मिली थी, जिससे आंसू के जरिए डायबीटीज़ का पता लगाए जाने की बात सामने आई थे। अब इस अनोखी तकनीक ने एक अहम स्टेप ले लिया है। गूगल के इस 'स्मार्ट कॉन्टेक्ट लेंस` के लिए नोवार्टिस (स्विस फ़ार्मासूटिकल कंपनी) के ऐल्कॉन आई केयर डिविजन के साथ करार हो चुका है। हेल्थ और फिटनेस से जुड़ी कंपनियों के लिए यह लेटेस्ट अनाउंसमेंट है। आपको बता दें कि इस नई तकनीक को तब लाया गया था जब 'गूगल ग्लास` को लाने वालों में जुड़े ईरानी-अमेरिकी बाबक परविज़ ने कंपनी को छोड़कर अमेज़ॉन जॉइन कर ली। कंपनी उनके जाने के बाद अगले ही दिन इस तकनीक को लेकर आई। गूगल का 'गूगल ग्` इसे डिवेलप कर रहा था। यह स्मार्टलेंस खास तौर से भारत जैसे देश के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण खोज है, जहां करीब 65 मिलियन लोग डायबीटीज़ के मरीज हैं। उम्मीद की जा रही है कि मरीजों का यह संख्या साल 2030 तक बढ़कर करीब 100 मिलियन तक पहुंच सकती है और ऐसी स्थिति में यह स्मार्ट कॉन्टैक्ट लेंस उन मरीजों के लिए एक वरदान की तरह ही साबित होगा। इस प्रॉजेक्ट के को-फाउंडर बाबक परविज़ और ब्रेन ओटिस के अनुसार, इस नई तकनीक का आविष्कार शुगर लेवल पता करने के तकलीफदेह प्रॉसेस से छुटकारा पाने के लिए किया गया है। इस स्मार्ट कॉन्टैक्ट लेंस में बेहद सूक्ष्म ग्लूकोज़ सेंसर और वायरलेस चिप लगा होगा, जिससे ग्लूकोज़ लेवल की जानकारी मिलेगी और यह सब सॉफ्ट कॉन्टैक्ट लेंस के दो लेयर के बीच मौजूद होगा। यह आम कॉन्टैक्ट लेंस की तरह पहना जा सकेगा।

एसी से कंट्रोल होगा एक शहर

दुबई एक ऐसे शहर को बनाने की तैयारी में है, जसका तापमान एसी से संचालित किया जा सकेगा। यह कोई छोटी-मोटी जगह नहीं होगी, बल्कि 48 मिलियन स्क्वायर फीट के एरिया को कवर करेगा, जहां पार्क, होटेल, हेल्थ रिसॉर्ट, थिएटर्स जैसी छोटी-बड़ी हर सुविधाएं मौजूद होंगी। इसे आप दुनिया का सबसे बड़ा मॉल भी कह सकते हैं। वैसे भी दुबई अपने सबसे बड़े इनडोर शॉपिंग कॉम्प्लेक्स के लिए प्रसिद्ध है। कहा जा रहा है कि अब अपने इस 'मॉल ऑफ द वर्ल्ड` की भव्यता और जगमगाहट को लेकर और भी अधिक चर्चा में रहेगा। इसे बनाने वाले दुबई के डिवेलपर शेख मोहम्मद बिन राशिद अल-मख़तुम का कहना है कि इस प्रॉजेक्ट के अंतर्गत इस मॉल में सबसे बड़ा इनडोर थीम पार्क होगा। यहां कांच का बना गुंबद होगा, जिसे सदब के मौसम में खोल दिया जाएगा। टहलने के लिए 7 किलोमीटर लंबा रास्ता बना होगा और यह सब गर्मियों में एयर कंडीशन से कवर रहेगा।` डिवेलपर का कहना है कि उनका मकसद केवल सीज़नल टूरिज़म तक सीमित नहीं है, बल्कि टूरिज़म पर बेस्ड इस शहर को पूरे साल के लिए एक अट्रैक्टिव डेस्टिनेशन के तौर पर पेश करना इनका लक्ष्य है। उम्मीद की जा रही है कि इस नए मिशन से दुनिया भर से करीब 180 मिलियन विज़िटर्स को हर साल दुबई की ओर खींचा जा सकेगा।  

अब मानव निर्मित दूध बनाएगा आपकी सेहत

एक ऐसी दुनिया का कल्पना कीजिए जहां दुग्ध न सिर्फ कृत्रिम रूप से उत्पादित हो बल्कि यह लैक्टोस एवं कोलेस्ट्रोल से मुक्त हो। अमेरिका के तीन बायो-इंजीनियर यही सपना देख रहे हैं तथा वे काऊ फ्री मिल्क परियोजना की कार्ययोजना भी तैयार करने में जुटे हुए हैं। मुफ्री नाम की कंपनी के संस्थापक रियान पांड्या, पेरूमल गांधी एवं इशा वातार को उम्मीद है कि कि इस क्रांतिकारी काऊ फ्री मिल्क की पहली खेप अगले वर्ष तक तैयार हो जाएगी। कंपनी का उद्देश्य न सिर्फ कृत्रिम दुग्ध उत्पादित करना है बल्कि कंपनी यह भी चाहती है कि यह दुग्ध लैक्टोस से मुक्त हो ताकि लैक्टोस की खुराक न सहन करने वाले लोग भी इसका उपयोग कर सकें। वैज्ञानिक दुग्ध के लिए पशुओं के ऊपर निर्भरता भी कम करना चाहते हैं और उनका यह कदम इसी दिशा में एक प्रयास है। वैज्ञानिकों के दल का विश्वास है कि यीस्ट कल्चर में उपस्थित दुग्ध के प्रमुख तत्वों की सहायता से वे ऐसा दुग्ध तैयार कर लेंगे जिसे लोग पसंद करेंगे। वैज्ञानिकों का दावा है कि आने वाले सौ वर्षों में दुनिया की जनसंख्या जिस पैमाने पर पहुंच जाएगी उससे दुग्ध उपलब्ध कराने में यह तकनीक काफी कारगर होगी। उनके आकलन के अनुसार जुलाई 2015 तक वे इसका उत्पादन शुरू कर देंगे। 

19 हजार जींस पैदा करते हैं प्रोटीन  

एक नए रिसर्च में वैज्ञानिकों ने पाया है कि मनुष्य में प्रोटीन पैदा करने वाले जीसों की कुल संख्या 19,000 से अधिक है। हाल में बताई गई जीसों की कुल संख्या से यह 1,700 कम है, जबकि प्रारंभिक अनुमानों में इसकी संख्या 1,00,000 बताई गई थी। अध्ययन के मुताबिक, इन अधिकांश जींसों के पूर्वज 5 करोड़ साल पहले नरवानर गण (सीएनआईओ) के आधारभूत अनुसंधान के उपनिदेशक अलफांसो वैलेसिया के अनुसार मैं इसे सिकुड़ता हुआ मानव जीनोम कहती हूं। प्रोटीन का कोडिंग हिस्सा (प्रोटीन पैदा करने वाला) निरंतर बढ़ता  रहा है। कुछ साल पहले तक कोई यह सोच भी नहीं सकता था कि ये जींस इतनी कम संख्या में होते हुए भी कैसे इतना जटिल काम कर सकते हैं। कौन सा जींस वास्तव में प्रोटीन पैदा करता है जानने के लिए मानव प्रोटीन की माप के मद्देनजर शोधकर्ताओं ने बड़े पैमाने पर सात मानव स्पेक्ट्रोमेट्री अध्ययन (मानव के 50 उत्तकों) से तथ्यों को एकीकृत किया। 1,700 वैसे जींस का पता चला, जिनके बारे में ज्ञात था कि वे प्रोटीन पैदा करते हैं, लेकिन वास्तव में कई कारणों से ऐसा नहीं पाया गया।

जसका तापमान एसी से संचालित किया जा सकेगा। यह कोई छोटी-मोटी जगह नहीं होगी, बल्कि 48 मिलियन स्क्वायर फीट के एरिया को कवर करेगा, जहां पार्क, होटेल, हेल्थ रिसॉर्ट, थिएटर्स जैसी छोटी-बड़ी हर सुविधाएं मौजूद होंगी। इसे आप दुनिया का सबसे बड़ा मॉल भी कह सकते हैं। वैसे भी दुबई अपने सबसे बड़े इनडोर शॉपिंग कॉम्प्लेक्स के लिए प्रसिद्ध है। कहा जा रहा है कि अब अपने इस 'मॉल ऑफ द वर्ल्ड` की भव्यता और जगमगाहट को लेकर और भी अधिक चर्चा में रहेगा। इसे बनाने वाले दुबई के डिवेलपर शेख मोहम्मद बिन राशिद अल-मख़तुम का कहना है कि इस प्रॉजेक्ट के अंतर्गत इस मॉल में सबसे बड़ा इनडोर थीम पार्क होगा। यहां कांच का बना गुंबद होगा, जिसे सदब के मौसम में खोल दिया जाएगा। टहलने के लिए 7 किलोमीटर लंबा रास्ता बना होगा और यह सब गर्मियों में एयर कंडीशन से कवर रहेगा।` डिवेलपर का कहना है कि उनका मकसद केवल सीज़नल टूरिज़म तक सीमित नहीं है, बल्कि टूरिज़म पर बेस्ड इस शहर को पूरे साल के लिए एक अट्रैक्टिव डेस्टिनेशन के तौर पर पेश करना इनका लक्ष्य है। उम्मीद की जा रही है कि इस नए मिशन से दुनिया भर से करीब 180 मिलियन विज़िटर्स को हर साल दुबई की ओर खींचा जा सकेगा।     

 ग्लोबल वार्मिंग से बढ़ रही अंटार्कटिक की बर्फ

पृथ्वी का तापमान बढ़ने से दक्षिणी ध्रुव पर मौजूद अंटार्कटिक समुद की सतह पर जमी बर्फ पिघल नहीं रही बल्कि इसमें लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। इस साल की शुरूआत तक ग्लोबल वार्मिंग को अंटार्कटिक के पश्चिमी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का जिम्मेदार ठहराया जा रहा था। लेकिन इस सप्ताह के आंकड़ों के मुताबिक, अंटार्कटिक समुद पर बिछी बर्फ की चादर का दायरा अपने औसत से बढ़ कर 1,312,000 किमी हो गया है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि बर्फ में वृद्धि की प्रमुख वजह बर्फ की निचली परतों का पिघलना है। यह पानी सतह पर आकर फिर जम जाता है जिससे बर्फ का दायरा बढ़ रहा है।  नेशनल स्नो एंड आइस डाटा सेंटर के निदेशक मार्क सेरेज के अनुसार इसका पहला कारण दक्षिणी महासागर के संचालन की प्रकृति है। उच्च दक्षिणी अक्षाषो पर पानी गर्म होकर ऊपर उठता है और उसकी जगह बर्फीला पानी लेता जाता है। इससे बर्फ का नुकसान नहीं होता। हालांकि नासा के वैज्ञानिक वाल्ट मिअर के अनुसार जलवायु परिवर्तन का ऑकलन करने के दौरान हम देखते हैं कि अंटार्कटिक सागर पर बिछी बर्फ का दायरा बढ़ना उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना आकर्टिक सागर की बर्फ पिघलना है।

पिछले साल रॉयल नीदरलैड्स मौसम विज्ञान संस्थान की टीम ने पता लगाया था कि अंटार्कटिक बर्फ से पिघलने वाले पानी का घनत्व समुद के खारे पानी से काफी कम है। इसका अर्थ यह हुआ कि गर्मियों के मौसम में बर्फ से पिघला पानी ऊपरी सतह पर ही जम जाता है। उत्तरी अमेरिका, ग्रीनलैंड और यूरेशिया के चारों तरफ समुद की सतह पर बिछी बर्फ की मोटाई में पिछले 30 साल में काफी कमी आई है। अंटार्कटिका की बर्फ पूर्वानुमानों के विपरीत पांच हजार साल पहले से ही अस्थिर रही है। गत मई में हुए एक शोध के मुताबिक, बीस हजार से नौ हजार वर्ष पूर्व के दौरान आठ अलग-अलग कालखंडों में बर्फ के पिघलने से समुद के जल में वृद्धि हुई। वहीं नासा के शोधकर्ताओं का मानना है कि जिस गति से दोनों ध्रुवों पर बर्फ पिघल रही है, उससे समुदों का जलस्तर चार से 12 फीट तक बढ़ सकता है।

मस्तिष्क चिप लगाई, लकवाग्रस्थ  हाथ में हुई हलचल

आए दिन तकनीक के ऐसे कारनामें सामने आते हैं जिन्हें देखकर हर कोई वाह-वाह कर उठता है। अमेरिका के ओरियो स्टेट यूनिवर्सिटी वेक्सनर मेडिकल सेंटर और धर्मार्थ ट्रस्ट बैटेले मेमोरियल इंस्टीट्यूट के संयुक्त प्रयासों से शोधकर्ताओं ने लकवाग्रस्थ व्यक्ति के हाथों में हलचल पैदा कर दी, वह भी उसके मस्तिष्क के पूर्ण नियंत्रण के साथ। 23 वर्षीय इयान बर्कहार्ट का शरीर चार साल पहले लकवाग्रस्थ हो गया था। इसके बाद से ही वह अपने हाथों का इस्तेमाल करने में अक्षम हो गया था। शोधकर्ताओं ने एक बेहद छोटे चिप न्यूरोब्रिज को इयान के मस्तिष्क में लगाकर इस कारनामे को अंजाम दिया। यह न्यूरोब्रिज प्रभावित क्षेत्र को पार करते हुए मस्तिष्क के संकेतों को सीधे इयान की मांसपेशियों तक पहुंचा देता है। न्यूरोब्रिज को तैयार करने में वैज्ञानिकों को दस साल का वक्त लगा। इयान के हाथ को इस इलाज के लिए तैयार करने में भी लंबा वक्त लगा और फिर तीन घंटे के ऑपरेशन के जरिए चिप को उसके दिमाग में लगा दिया गया। इयान ने कहा, व्यूह एक स्वप्निल सा अनुभव हैं। मैं यह स्वीकार कर चुका था कि अब मैं कभी अपने हाथ का इस्तेमाल नहीं कर सकूंगा। संभव है कि आने वाली सदी में मनुष्य मस्तिष्क में चिप लगाकर अपनी मेमोरी कैपेसिटी बढ़ा सके। कहीं ज्यादा तेजी से गणनाएं कर सके। ऐसे चिप या साधन मनुष्य को स्मार्ट रोबोट या कम्प्यूटर से कहीं ज्यादा स्मार्ट बना देंगे। तमाम चिप्स की मदद से हमारा अपना शरीर सीधे इंटरनेट, संचार के साधनों या मशीनों से जुड़कर उनसे व्यवहार करने और कमांड के आदान-प्रदान में सक्षम हो सकेगा।

पुराने कंकाल से पता चला,  क्यों होता है बुखार!

अत्याधुनिक 'शॉटगन` तकनीक के जरिए शोधकर्ताओं ने मियादी बुखार के लिए जिम्मेदार विषाणुओं का जिनोम प्राप्त कर लिया है। उल्लेखनीय है कि किसी जीवाणु का जिनोम उससे उत्पन्न रोग के निदान की खोज करने में सहायक होता है। शोधकर्ताओं ने इटली के एक मध्यकालीन गांव से मिली 700 साल पुराने मानव कंकाल से मियादी बुखार पैदा करने वाले जीवाणु ब्रुसीला मेलिटेंसिस का जिनोम खोज निकाला। मियादी बुखार या ब्रुसिलोसिस मनुष्यों व मवेशियों में ब्रुसीलोसिस संक्रमण के लिए जिम्मेदार है। शोधकर्ताओं के अनुसार, मियादी बुखार फैलाने वाले ये जीवाणु जिसे गेरिडू-1 भी कहते हैं, मौजूदा समय में मियादी बुखार के लिए जिम्मेदार जीवाणुओं (ईथर) से काफी हद तक संबंधित हैं। ईथर की पहचान 1961 में इटली में की गई थी, और इटली में ही मियादी बुखार पैदा करने वाले दो अन्य जीवाणुओं की पहचान 2006 और 2007 में की गई थी।

इटली के तटीय इलाके पर स्थित द्वीप सरडिनीया के गेरीडू से मिले एक मध्यकालीन पुरुष के कंकाल से प्राप्त गुणसूत्रों (डीएनए) की संरचना का अध्ययन करने के लिए वैज्ञानिकों ने जिस तकनीक का इस्तेमाल किया, उसी को 'शॉटगन मेटाजिनोमिक्स` कहते हैं। ब्रिटेन के कोवेंट्री स्थित वारविक मेडिकल स्कूल के माइक्रोबियल जिनोमिक्स के प्राध्यापक मार्क पालेन कहते हैं कि साधारणतया जब आप मानवों या जानवरों के अवशेषों में कैल्सिफाइ (चूने जैसा) सामग्री देखते हैं, तो आपका दिमाग सीधे तपेदिक (टीबी) की तरफ जाता है, क्योंकि यह संक्रमण कैल्सिफिकेशन का एक मुख्य कारण है। लेकिन इसकी बजाय हम ब्रुसीला पाने पर हैरान थे। ब्रूसीला मेलिटेंसिस जीवाणु मनुष्यों और मवेशियों में मियादी बुखार का संक्रमण फैलाते हैं। मानवों में यह बीमारी दूषित दुग्ध पदार्थ खाने या संक्रमित जीवों से भी होता है। शोध पत्रिका 'एमबायो` में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, भूमध्य क्षेत्रों में यह बीमारी अभी भी होती है। पालेन की टीम अब इस तकनीक का हंगरी और मिस्र की ममी समेत कई अन्य नमूनों पर इस्तेमाल कर रही है।

सूंघ कर भी ले पाएंगे इन्सुलिन

डायबिटीज के मरीजों को इंजेक्शन के जरिए बार-बार इन्सुलिन लेने के दर्द से छुटकारा मिल जाएगा। अमेरिका के द फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन ने हाल ही में नए इनहेलर 'अफ्रेजा` को मंजूरी दी है, जिससे सांसों के जरिए इन्सुलिन लेना संभव हो जाएगा। इसकी बिक्री अभी सिर्फ अमेरिका में होगी और इसे सिर्फ डायबिटीज-1 या डायबिटीज-2 से पीड़ित वयस्कों को बेचा जा सकेगा। इस दवा को विकसित करने वाली कंपनी मेनकाइंड के मुताबिक वर्षों के क्लीनिकल शोध के बाद मिली एफडीए  की मंजूरी डायबिटीज का इलाज आसान बनाने की दिशा में बढ़ा कदम है। इनहेलर के जरिए इन्सुलिन लेने के लिए फेफड़ों का स्वस्थ होना बेहद जरूरी है। इसलिए इस दवा पर चेतावनी लिखी होगी कि अस्थमा और फेफड़े के संक्रमण के मरीज इसका इस्तेमाल न करें।

मेनकाइंड कंपनी ने पहले भी ऐसा इनहेलर बनाया था पर आकार में बड़ा होने के कारण यह असफल हो गया था। वहीं इसक इस्तेमाल से फेफड़े के कैंसर के खतरे की आशंका भी जताई गई थी। पर नया इन्हेलर पुराने का विकसित रूप है और आकार में भी सिर्फ सीटी जितना बड़ा है। इसलिए इसका इस्तेमाल बेहद आसान होगा। मरीजों को हर बार खाने से पहले इन्सुलिन इनहेल करना होगा। वहीं खाने की शुरुआत के 20 मिनट बाद भी इसे लेना होगा। जिन मरीजों को खाने के समय इन्सुलिन की जरूरत होती है, उनके लिए यह काफी फायदेमंद होगा।                                                           

 कार खुद ढूंढ लेगी पार्किंग  

कुछ समय पहले तक यह किसी कॉमिक बुक या किसी फिल्म की काल्पनिक कहानी जैसी बात लगती थी। लेकिन आधुनिक समय में तैयार हो रही रोबोट कार खुद अपने लिए उम्दा सी पार्किंग की जगह तलाश लिया करेगी। तब जबकि कार में कोई नहीं बैठा हो, यह खास तरह की कार अपने आप ही बहुत धीमी गति में संभल कर आगे बढ़ते हुए अपने लिए पार्किंग की जगह तलाश लेगी। यही नहीं, आसपास से गुजर रहे लोगों को भी इससे दिक्कत नहीं होगी, क्योंकि रोबोट कार इस बात का भी ख्याल रख सकती है कि कब और कितने फासले पर कोई गुजर रहा है और उसे रास्ता देना चाहिए। इस तकनीक को स्वीडन की कार निर्माता कंपनी वालेओ ने तैयार किया है। फिलहाल कार पर टेस्ट जारी हैं लेकिन उम्मीद की जा रही है कि आने वाले छह साल में यह कार बाजार में होगी। बाजार में कुछ ऑटोमेटिक कारें पहले से ही मौजूद हैं जो खास तरह की परिस्थितियों में खुद ही चल सकती हैं।

जैसे मर्सिडीज की सीएलएस कूप दुर्घटना की स्थिति में ड्राइवर के नियंत्रण खो देने पर खुद ही ब्रेक लगा लेती है। बीएमडब्ल्यू के कुछ मॉडल भी ड्राइवर को पहले से चेतावनी दे देते हैं कि ट्रैफिक जाम की स्थिति में वे ऑटोमैटिक पायलट मोड में जा सकते हैं।

कारों के स्पेयर पार्ट्स की कंपनी वालेओ के आरएंडडी विभाग के निदेशक गियोम देवोशेले भी मानते हैं कि इस तरह की काफी सारी तकनीक तो पहले से ही बाजार में मौजूद है। लेकिन साथ ही वह कहते हैं, हम इस समय टर्निंग प्वाइंट पर हैं।रडार और डिटेक्शन कैमरा तकनीक में तेजी से हो रही प्रगति से अब कारों को यह पता चल जाता है कि उनके आसपास क्या हो रहा है। उनमें फिट कंप्यूटर परिस्थिति को समझने और प्रतिक्रिया करने में उनकी मदद करता है। पार्ट्स बनाने वाली कंपनी बॉश के मार्केटिंग डायरेक्टर फ्रांक काजेनावे मानते हैं कि कारों में तकनीक के इस विकास से सड़क दुर्घटनाओं में कमी आएगी, क्योंकि 90 फीसदी दुर्घटनाएं इंसानी गलती के कारण होती हैं।