विज्ञान समाचार


जब दिखेगा सुपरमून और बुद्ध ग्रह

इरफान ह्यूमन

 
इस माह रात के आकाश में सुपरमून के दर्शन किये जा सकते हैं। 19 फरवरी को चन्द्रमा असामान्य रूप से आकार में बड़ा होने के साथ अधिक चमकदार दिखाई देगा, इस घटना को ‘‘सुपरमून’’ के नाम से जाना जाता है। इस खगोलीय घटना के दौरान चाँद, पृथ्वी के सबसे नजदीकी स्थिति में आ जाता है, जिसके परिणामस्वरूप पृथ्वी से चाँद सामान्य दिखने वाले आकार से अधिक बड़ा दिखाई देता है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान समुद्र में ज्वार आने के साथ साथ उन चट्टानों में भी ज्वार आता है। इस कारण भूकंप की घटना होती है, लेकिन इसका कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। हाँ, यह अवश्य है कि जब चन्द्रमा धरती के सबसे करीब होता है, इस कारण सबसे अधिक गुरुत्वीय खिंचाव उत्पन्न होने से यह समुद्र में उच्च ज्वार को जन्म देता है। 
पृथ्वी का चक्कर लगाते समय चन्द्रमा के नजदीकी बिंदु उपभू (पेरीजी) की दूरी सुपरमून वाले दिन 382ए500 किलोमीटर से कम हो जाती है। उपभू चंद्रमा के दीर्घवृत्ताकार पथ  पर वह बिंदु है जहाँ इसकी आकर्षण के केंद्र अर्थात् पृथ्वी के केंद्र से दूरी न्यूनतम होती है। ध्यान रहे पृथ्वी के मध्य से चन्द्रमा के मध्य तक की सामान्य दूरी 382ए500 किलोमीटर या 237ए700 मील होती है। 
चन्द्रमा जब धरती का चक्कर लगाते हुए और अपनी कक्षा में घूमते हुए पृथ्वी के सबसे निकट आ जाता है तो यह सामान्य आकार से 14 प्रतिशत बड़ा और 30 प्रतिशत अधिक चमकदार नज़र आता है, इसे खगोलीय भाषा में ‘‘सुपरमून’’ कहा जाता है। साल भर में 12 से 13 बार पूर्णिमा या नए चाँद दिखने की घटना होती है, जिसमें से मात्र तीन या चार को ही सुपरमून के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। 
उच्चतम बिंदु पर बुद्ध
27 फरवरी को बुद्ध ग्रह (डमतबनतल) अधिकतम पूर्वी दीर्घकरण (ळतमंजमेज म्ंेजमतद म्सवदहंजपवद) पर होगा। बुध ग्रह सूर्य से 18ण्1 डिग्री की सबसे बड़ी पूर्वी बढ़ाव पर पहुँचता है। बुध ग्रह को देखने का यह सबसे अच्छा समय है क्योंकि इस शाम के आकाश में क्षितिज के ऊपर अपने उच्चतम बिंदु पर होगा। सूर्यास्त के बाद पश्चिमी आकाश में बुद्ध ग्रह को नीचे देखा जा सकता है। बुध, सौरमंडल के आठ ग्रहों में सबसे छोटा और सूर्य से निकटतम ग्रह है। इसका परिक्रमण काल लगभग 88 दिन है। पृथ्वी से देखने पर, यह अपनी कक्षा के इर्द-गिर्द 116 दिवसों में घूमता नज़र आता है जो कि ग्रहों में सबसे तेज़ है। बुध को सूर्यास्त के बाद या सूर्योदय से ठीक पहले नग्न आंखो से देखा जा सकता है। 
 
इतिहास में विज्ञान
1 फ़़रवरी विज्ञान के इतिहास में महत्वपूर्ण है। इसी दिन वर्ष 1951 में, पहली चलयमान एक्स-रे तस्वीर का प्रदर्शन किया गया था। वर्ष 1895 में पहली बार जर्मनी के विल्हेल्म कॉनराड रोएंटगेन ने एक्स-रे मशीन बनाई और उन्हीं के नाम पर आज भी जर्मनी में एक्स-रे को रोएंटगेन बिल्ड यानि रोएंटगेन की तस्वीर कहा जाता है। वर्ष 1901 में जब नोबेल पुरस्कार की शुरुआत हुई, तो फिजिक्स का सबसे पहला नोबेल इसी आविष्कार को दिया गया। तब से अब तक बहुत बदली गई है एक्स-रे मशीन। एक्स-किरण या एक्स रे एक प्रकार का विद्युत चुम्बकीय विकिरण है जिसकी तरंगदैर्ध्य 10 से 0ण्01 नैनोमीटर होती है। यह चिकित्सा में निदान के लिये सर्वाधिक प्रयोग की जाती है।
एक्स-रे के अन्य उपयोगों में एक्सरे सूक्ष्मदर्शी उल्लेखनीय है। एक्सरे के तरंगदैर्ध्य प्रकाश के तरंगदैर्ध्यो से सूक्ष्म होते हैं, अतः एक्सरे सूक्ष्मदर्शी को प्रकाश सूक्ष्मदर्शी से अधिक प्रभावशाली होना चाहिए। 1948 में एक्सरे को केंद्रित करने के कर्कपैट्रिक के प्रयत्न अंशतः सफल हुए। इस रीति से तथा अन्य रीतियों से प्रतिबिंब का आवर्धन करने के प्रयत्न अब प्रायोगिक अवस्था पार कर चुके हैं और अनेक निर्माताओं द्वारा निर्मित कई प्रकार के एक्सरे सूक्ष्मदर्शी सुलभ हैं।
एक्स-रे गति विश्लेषण वास्तव में एक्स-किरणों का उपयोग करके वस्तुओं की गति को ट्रैक करने के लिए उपयोग की जाने वाली एक तकनीक है। इसे एक्स-रे बीम के केंद्र में इमेज किया जाता है और एक इमेज इन्टेंसीफायर और उच्च गति वाले कैमरे का उपयोग करके गति रिकॉर्ड किया जाता है, जिससे उच्च गुणवत्ता वाले वीडियो प्राप्त किये जाते हैं। एक्स-रे की सेटिंग्स के आधार पर, यह तकनीक किसी ऑब्जेक्ट में विशिष्ट संरचनाओं की कल्पना कर सकती है, जैसे हड्डियों या उपास्थि। एक्स-रे गति विश्लेषण का उपयोग चाल विश्लेषण करने, संयुक्त गति का विश्लेषण करने, या मुलायम ऊतक द्वारा अस्पष्ट हड्डियों की गति को रिकॉर्ड करने के लिए किया जा सकता है। कंकाल गति को मापने की क्षमता कशेरुकी बायोमेकॅनिक्स, ऊर्जा विज्ञान और मोटर नियंत्रण को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
यही नहीं इसी दिन 1972 में, पहला वैज्ञानिक हस्तचलित कैलक्यूलेटर हेवलेट-पैकार्ड द्वारा पेश किया गया था, जिसका नाम 35 कुंजी पर एचपी-35 रखा गया था। यह पहला ऐसा हस्त चलित कैलक्यूलेटर था जो एक कीस्ट्रोक के साथ लॉगरिदमिक और त्रिकोणमितीय कार्यों को करने में सक्षम था। लाल एलईडी डिस्प्ले 10 अंक मंथिसा और 2 अंकों के एक्सपोनेंट तक वैज्ञानिक नोटेशन दे सकता है। फरवरी 1975 तक (जब मॉडल का उत्पादन बंद कर दिया गया था), 300ए000 कैलक्यूलेटर बेचे गए थे। गणनाओं के लिए संख्याओं और कार्यों को रिवर्स पोलिश नोटेशन (आरपीएन) में दर्ज किया गया था, जिसने एन्टर कुंजी का उपयोग किया लेकिन किसी भी कोष्ठक या = कुंजी की आवश्यकता नहीं थी। यह रिचार्जेबल बैटरी पर चला करता था।
 
प्रकृति का भण्डार
पानी से संतृप्त भूभाग को नम भूमि या आर्द्रभूमि कहते हैं। कई भूभाग वर्षभर आर्द्र रहते हैं और अन्य कुछ विशेष मौसम में आर्द्र रहते हैं। आर्द्रभूमि हमारे पर्यावरण, पारिस्थितिकी और पृथ्वी की जैवविविधता के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और जन्तुओं व वनस्पति को उपयुक्त वातावरण और आवास उपलब्ध कराती है। आर्द्रभमि क्षेत्र भू-जल स्तर को बढ़ाने और उसके भण्डारण के साथ जल को अपने में समेट कर बाढ़ की विभिषिका के ख़्ातरे को भी कम करते हैं। इसी आर्द्रभूमि के प्रति जागरूकता के लिए 2 फ़़रवरी को सम्पूर्ण विश्व में विश्व आर्द्रभूमि दिवस (ॅवतसक ॅमजसंदके क्ंल) मनाया जाता है। ज्ञात रहे दुनिया की आर्द्रभूमि के संरक्षण को लेकर इस दिन वर्ष 1971 में विश्व के विभिन्न देशों ने ईरान के रामसर में एक संघि पर हस्ताक्षर किये थे। नम भूमियों के महत्वपूर्ण कार्यों, मूल्यों और सेवाओं की जानकारी के आभाव में इनके तेजी से नष्ट होने की ओर विश्व का ध्यान आकर्षित करने के लिए रामसर अभिसमय तैयार किया गया था, जिससे जुड़ने वाली सरकारें अपनी आर्द्रभूमि की हानि और उसकी गिरावट के इतिहास को बदलने में मदद के लिए प्रतिबद्धता बनाने की इच्छा व्यक्त की गई। वर्तमान में भारत में 26 रामसर आर्द्रभूमियां अधिसूचित हैं और सरकार ने शुष्क भूमि को भी रामसर आर्द्रभूमियों के अन्तर्गत सम्मिलित किया है। 
आर्द्रभूमियाँ पानी के संरक्षण का एक प्रमुख स्रोत है। ये आर्द्रभूमियाँ बाढ़ नियंत्रण के महत्त्वपूर्ण होती है। आर्द्रभूमि तलछट का काम करती है जिससे बाढ़ में कमी आती है। आर्द्रभूमि पानी को सहेजे रखती है बाढ़ के दौरान आर्द्रभूमियाँ पानी का स्तर कम बनाए रखने में सहायक होती हैं। समुद्री तटरेखा को स्थिर बनाए रखने में भी आर्द्रभूमियाँ का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। ये समुद्र द्वारा होने वाले कटाव से तटबन्ध की रक्षा करती हैं। आर्द्रभूमियाँ समुद्री तूफान और आँधी के प्रभाव को सहन करने की क्षमता रखती हैं। आर्द्रभूमियाँ जैव विविधता संरक्षण के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण हैं और इनकी पारिस्थितिकी सुरक्षा में इन आर्द्रभूमियों की अहम भूमिका है। आर्द्रभूमियाँ बहुत से जीव-जन्तुओं का आश्रय प्रदान करती हैं। आर्द्रभूमियाँ अपने आस-पास बसी मानव बस्तियों के लिये जलावन लकड़ी, फल, वनस्पतियाँ, पौष्टिक चारा और जड़ी-बूटियों की स्रोत होती हैं। 
अपने देश की बात करें तो यहां के अधिकांश वेटलैंड्स गंगा, कावेरी, कृष्णा, गोदावरी और ताप्ती जैसी प्रमुख नदी प्रणालियों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। एशियन वेटलैंड्स कोष (1989) के अनुसार वेटलैंड्स का देश के क्षेत्रफल, नदियों को छोड़कर, में 18ण्4 प्रतिशत हिस्सा है, जिसके 70 प्रतिशत भाग में धान की खेती होती है। भारत में वेटलैंड्स का अनुमानित क्षेत्रफल 4ण्1 मिलियन हेक्टेयर (सिंचित कृषि भूमि, नदियों और धाराओं को छोड़कर) है, जिसमें से 1ण्5 मिलियन हेक्टेयर प्राकृतिक और 2ण्6 मिलियन हेक्टेयर मानव निर्मित है। तटीय वेटलैंड्स का अनुमानित क्षेत्रफल 6750 वर्ग किलोमीटर है और इनमें मुख्यतः मैनग्रोव वनस्पति की बहुतायत है।
आर्द्र भूमियों में हिमालयन वेटलैंड्स, जिसमें लद्दाख एवं जंसकार पेंगांग सो, सो मोराड, चांटऊ, नूरीचान, चूशुल और हैनले मार्सेज, कश्मीर घाटी जिसमें डल, ऐंचर, बूलर, हेगाम, मालगाम, होकेसर और क्रांचू झीलें शामिल हैं, केन्द्रीय हिमालय में नैनीताल, भीमताल, नौकुचीताल और पूर्वी हिमालय में सिक्किम, असम, अरूणाचल प्रदेश, मेघालय, नगालैंड और मणिपुर के अनेक वेटलैंड्स ब्रह्मपुत्र और बराकघाटी के बील्स शामिल हैं। इंडो-गंगेटिक वेटलैंड्स देश के सबसे बड़ी वेटलैंड्स प्रणाली है, जो पश्चिम में सिंधु नदी से लेकर पूर्व में ब्रह्मपुत्र तक फैले हैं। इनमें हिमालय तराई और इंडो-गंगेटिक मैदान के वेटलैंड्स शामिल हैं। तटीय वेटलैंड्स में पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, गोवा, महाराष्ट्र और गुजरात के 7500 किलोमीटर लंबे तट के साथ अंतरूज्वारीय क्षेत्र, वनस्पत्तियां और लैगून आते हैं। सुंदरबन, पश्चिम बंगाल, अंडमान निकोबार द्वीप  समूह के मैंग्रोवन कच्छ की खाड़ी, मन्नार की खाड़ी, लक्षदीप और अंडमान निकोबार द्वीप समूह के अप-तटीय प्रवाल, भित्तियां भी इसमें आती हैं। दक्षिणी वेटलैंड्स में कुछ प्राकृतिक वेटलैंड्स आती हैं।
वर्ष 2011 में सरकार ने आर्द्रभूमि संरक्षण और प्रबंधन अधिनियम 2010 की अधिसूचना जारी की जिसके अन्तर्गत इन्हें छह वर्गांे में विभक्त किया गया है, जो हैं-अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियां, राष्ट्रीय उद्यान और गरान जैसी पर्यावरणीय आर्द्रभूमियां, यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित आर्द्रभूमियां, समुद्रतल से 25000 मीटर से कम ऊंचाई की ऐसी आर्द्रभूमियां जो 500 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल धेरती हों, समुद्रतल से 25000 मीटर से अधिक ऊँचाई किन्तु पांच हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल और ऐसे आर्द्रभूमियां जिनकी पहचान प्राधिकरण ने की हो। भारत सरकार ने वर्ष 1986 के दौरान संबंधित राज्य सरकारों के साथ सहयोग से राष्ट्रीय वेटलैंड संरक्षण कार्यक्रम शुरू किया था। इस कार्यक्रम के अंतर्गत अभी तक पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने 115 वेटलैंड्स की पहचान की गई है, जहां संरक्षण और प्रबंधन पहल की जरूरत है। इस योजना का उद्देश्य देश में वेटलैंड्स के संरक्षण और उनका बुद्धिमतापूर्ण उपयोग करना है, ताकि उनमें और गिरावट आने से रोका जा सके। 
 
रामपत्री और नीम से रिवॉल्वर तक
कैंसर रोगों का एक वर्ग है जिसमें कोशिकाओं का एक समूह सामान्य सीमा से अधिक विभाजन कर अनियंत्रित वृद्धि दर्शाता है। यह रोग आक्रमण रूप से अपने आस-पास के उतकों का विनाश कर फैलता है और कभी-कभी अपररूपांतरण अथवा मेटास्टैसिस रूप से लसिका या रक्त के माध्यम से शरीर के अन्य भागों में फैल जाता है। सामान्यता कैंसर के तीन दुर्दम लक्षण होते हैं, जिन्हें अबुर्द (ट्यूमर) से विभेदित करते हैं। अधिकांश कैंसर एक गाँठ या ट्यूमर बनाते हैं, लेकिन कुछ, जैसे रक्त कैंसर या श्वेतरक्तता (स्मनामउपं) में गाँठ नहीं बनाती। कैंसर के प्रति जागरूकता के लिए 4 फ़रवरी को विश्व कर्कट अर्थात कैंसर दिवस (ॅवतसक ब्ंदबमत क्ंल) मनाया जाता है। 1933 में अंतर्राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण संघ ने स्विट्जरलैंड में जिनेवा में पहली बार विश्व कैंसर दिवस मनाया। 
यदि कैंसर के कारणों पर नज़र डालें तो पाएंगे कि लगभग सभी कैसर रूपांतरित कोशिकाओं के आनुवंशिक पदार्थ में असामान्यताओं के कारण होते हैं, जो कार्सिनोजन या कैंसरजन के कारण हो सकती हैं जैसे तम्बाकू धूम्रपान, विकिरण, रसायन आदि कारक। कैंसर को उत्पन्न करने वाली अन्य आनुवंशिक असामान्यताएं कभी-कभी डीएनए प्रतिकृति में त्रुटि के कारण हो सकती हैं या आनुवंशिक रूप से प्राप्त हो सकती हैं। कैंसर जिनोम के अध्ययन के इस बड़े प्रयास में शोधकर्ताओं की अंतर्राष्ट्रीय टीम कैंसर को जन्म देने वाले बदलावों को समझने की कोशिश कर रही है। कैंसर के बहुत सारे रूप हैं लेकिन उनके कारणों का पता अब भी नहीं है, वैज्ञानिक मानते हैं कि अल्ट्रा वायलेट रेडियेशन आदि डीएनए में बदलाव पैदा कर सकते हैं जो कैंसर का जोखिम बढ़ाता है।
भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक मानव जीवन की रक्षा के लिए कैंसर की दवा बनाने के काम में जुटे हैं, इस कड़ी में उन्होंने रामपत्री पौधे (वनस्पति वैज्ञानिक नाम मिरिस्टिका मालाबारिका) से कैंसर की एक नई दवा बनाई है जो दुनिया भर में कैंसर रोगियों के जीवन की रक्षा करने में मददगार हो सकती है। इससे पहले बार्क कैंसर के कोबाल्ट थेरैपी उपचार के लिए भाभाट्रोन नाम की मशीन भी बना चुका है जिसका इस्तेमाल आज दुनिया के कई देशों में हो रहा है। बार्क द्वारा रामपत्री नामक पौधे के अणुओं से बनाई गई कैंसर की दवा कैंसर रोग के उपचार में क्रांति लाने में सहायक हो सकती है। रामपत्री यानी मिरिस्टिका मालाबारिका को पुलाव और बिरयानी में सुगंध के लिए मसाले के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इससे बनाई गई कैंसर की दवा का परीक्षण चूहों पर किया जा चुका है। यह दवा फेफड़े के कैंसर और बच्चों में होने वाले दुर्लभ प्रकार के कैंसर न्यूरोब्लास्टोमा के उपचार में काफी असरदार साबित हो सकती है। न्यूरोब्लास्टोमा एक ऐसा कैंसर है जिसमें वृक्क ग्रंथियों, गर्दन, सीने और रीढ़ की नर्व कोशिकाओं में कैंसर कोशिकाएं बढ़ने लगती हैं।
हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि नीम की पत्तियों और फूल से मिलने वाले रासायनिक यौगिक निमबोलिड स्तन (ब्रेस्ट) कैंसर के इलाज में प्रभावी रूप से कारगर हो सकता है। वैज्ञानिक चंद्ररैयाह गोडुगू ने कहा कि वे आगे की रिसर्च और क्लीनिकल टेस्ट के लिए धनराशि के वास्ते जैवप्रौद्योगिकी विभाग, आयुष और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी जैसी विभिन्न एजेंसियों से सम्पर्क कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमारे संस्थान के वैज्ञानिकों ने पाया कि निमबोलिड ब्रेस्ट कैंसर वृद्धि को रोकता है। क्लीनिकल टेस्ट में सहायता के लिए आगे की स्टडी की जाएगी। वैज्ञानिकों ने कहा कि हो सकता है कि यह कैंसर की सबसे सस्ती दवा साबित हो क्योंकि नीम के पेड़ भारत में काफी मात्रा में पाए जाते हैं।
लंदन के इंस्टिट्यूट ऑफ कैंसर रिसर्च (आईसीआर) और यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग की टीम ने मिलकर एक नई तकनीक की खोज की है-रिवॉल्वर (रिपीटेड इवोल्यूशन ऑफ कैंसर)। कैंसर के दौरान डीएनए में आए बदलावों के पैटर्न को ये तकनीक रिकॉर्ड करती है और इस जानकारी को भविष्य में होने वाले अनुवांशिक बदलावों को समझने के लिए इस्तेमाल करती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि ट्यूमर में लगातार आते बदलाव कैंसर के इलाज में एक बड़ी चुनौती थी। एक कैंसर ड्रग रेसिस्टेंट हो सकता है यानी कैंसर पर दवाई का असर बंद हो जाता है। इस रिसर्च टीम के प्रमुख डॉक्टर एंड्रिया सोट्टोरिवा ने बताया कि इस तकनीक से उम्मीद है कि डॉक्टर कैंसर के ट्रंप कार्ड को हटाने में कामयाब हो जाएंगे यानी अब तक कैंसर किस तरह बढ़ेगा ये मालूम करना मुश्किल था। उन्होंने कहा कि इस तकनीक से भविष्य में थोड़ा झांकने में मदद मिलेगी और कैंसर की शुरुआती स्टेज पर ही हस्तक्षेप कर सकते हैं। पता लगा सकते हैं कि कैंसर में आगे क्या होने वाला है। इंस्टीट्यूट ऑफ कैंसर रिसर्च के प्रोफेसर पॉल वर्कमैन ने कहा कि कैंसर का विकास हमारे लिए इसके इलाज में सबसे बड़ी चुनौती थी। उन्होंने बताया कि अगर हम पहले ही पता लगा सकें कि ट्यूमर कैसे बढ़ेगा तो ड्रग रेसिस्टेंस होने से पहले ही हम इलाज में जरूरी बदलाव कर सकते हैं यानी कैंसर से एक कदम आगे रहे सकते हैं। आज हम विज्ञान से ना सिफ़र् लोगों को अपनी बीमारियां ठीक करने मदद मिल रही है बल्कि वक्त से पहले ही बीमारी की रोकथाम में भी सहायता हो रही है। ऐसी ही एक शोध हुआ है जिसमें आठ तरह के कैंसर की पहचान आसानी से हो सकेगी। इस एक नए रक्त परीक्षण से आठ तरह के सामान्य कैंसर के शरीर में फैलने और मरीजों के जीवन को जोखिम होने से पहले ही शुरुआती अवस्था में ही पहचान हो सकेगी, जिसे ऑस्ट्रेलिया के शोधकर्ताओं ने विकसित किया है। ऑस्ट्रेलिया के वाल्टर एंड एलिजा हॉल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल रिसर्च ने दावा किया है कि नया परीक्षण अंडाशय, लीवर, पेट, पैंक्रियाज, ऑसोफोगस, आंत, फेफड़ों और स्तन को प्रभावित करने वाले कैंसर का शुरुआत में ही पता लगाने में सक्षम होगा। संस्थान के एसोसिएट प्रोफेसर जेयने टाई ने कहा कि इस परीक्षण में कई ट्यूमर प्रकारों के लिए वन-स्टॉप परीक्षण बनने की संभावना है, जिसे वृहद पैमाने पर स्वीकार किया जाना चाहिए। कैंसर हो जाने पर मरीज के जिं़दा बचने की दर सीधे इससे जुड़ी है कि परीक्षण के दौरान मरीज का कैंसर किस अवस्था में है। जितनी शुरुआती अवस्था में कैंसर का पता चलता है, मरीज़ के बचने की दर भी उतनी ही अधिक होती है। इसका मतलब यह है कि वर्तमान में ऐसे रक्त परीक्षण की अत्यंत ज़रूरत है, जो शुरुआती अवस्था में ही कैंसर की सटीकता से पता लगा सकें। नए रक्त परीक्षण के बारे में साइंस जर्नल में जानकारी प्रकाशित हुई है।
 
भावी विकास का नक्शा
जिस प्रक्रिया द्वारा किसी जनसंख्या में कोई जैविक गुण कम या अधिक हो जाता है उसे प्राकृतिक वरण या प्राकृतिक चयन कहते हैं। यह एक धीमी गति से क्रमशः होने वाली अनयादृच्छिक (नॉन-रैण्डम) प्रक्रिया है। प्राकृतिक वरण ही क्रम-विकास की प्रमुख कार्यविधि है। जिसकी नींव चार्ल्स डार्विन ने रखी थी। प्राकृतिक वरण तंत्र (छंजनतंस ेमसमबजपवद ेलेजमउ) विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक प्रजाति (ैचमबपमे) को पर्यावरण के लिए अनुकूल बनने मे सहायता करता है। प्राकृतिक चयन का सिद्धांत इसकी व्याख्या कर सकता है कि पर्यावरण किस प्रकार प्रजातियों और जनसंख्या के विकास को प्रभावित करता है ताकि वो सबसे उपयुक्त लक्षणों का चयन कर सकें। यही विकास के सिद्धांत का मूलभूत पहलू है। प्राकृतिक चयन का अर्थ उन गुणों से है जो किसी प्रजाति को बचे रहने और प्रजनन मे सहायता करते हैं और इसकी आवृत्ति पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ती रहती है। 12 फ़रवरी को डार्विन दिवस  मनाया जाता है। दुनिया भर में इस दिवस को चार्ल्स डार्विन के जन्मदिन (12.02.1809) के रूप में मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य विज्ञान में डार्विन के योगदान स्पष्ट करने और सामान्य तौर पर विज्ञान को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है।
आनुवंशिक कोडधारी डीएनए की ऐंठनदार सीढ़ी जैसी संरचना होती है, जिसे डबल हेलिक्स संरचना कहते हैं। इसके सहखोजी जेम्स वॉटसन मानते हैं कि आनुवंशिकी भी हर कदम पर डार्विन की ही पुष्टि करती लगती है। जेम्स वॉटसन और फ्रांसिस क्रिक ने वर्ष 1953 मे एक ऐसी खोज की, जिससे चार्ल्स डार्विन द्वारा प्रतिपादित अधिकतर सिद्धांतों की पुष्टि होती है। उन्होंने जीवधारियों के भावी विकास के उस नक्शे को पढ़ने का रासायनिक कोड जान लिया था, जो हर जीवधारी अपनी हर कोशिका में लिये घूमता है। यह नक्शा केवल चार अक्षरों वाले डीएनए कोड के रूप में होता है। अपनी खोज के लिए वर्ष 1962 में दोनो को चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिला। एडवर्ड ऑसबर्न विल्सन आजकल के सबसे जानेमाने विकासवादी वैज्ञानिकों में गिने जाते हैं और वे भी डार्विन आदर करते  हुए कहते हैं कि हर युग का अपना एक मील का पत्थर होता है। पिछले 200 वर्षों के आधुनिक जीवविज्ञान का मेरी दृष्टि में मील का पत्थर है 1859, जब जैविक प्रजातियों की उत्पत्ति के बारे में डार्विन की पुस्तक प्रकाशित हुई थी। दूसरा मील का पत्थर है 1953, जब डीएनए की बनावट के बारे में वॉटसन और क्रिक की खोज प्रकाशित हुई। 
प्राकृतिक विज्ञानी चार्ल्स डार्विन ने क्रमविकास (म्अवसनजपवद) के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। देखा जाए तो आज जो हम सजीव चीजें देखते हैं, डार्विन की उत्पत्ति तथा विविधता को समझने के लिए उनका विकास का सिद्धान्त सर्वश्रेष्ठ माध्यम बन चुका है। उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध पुस्तक जीवजाति का उद्भव (व्तपहपद वि ैचमबपमे) प्रजातियों की उत्पत्ति सामान्य पाठकों पर केंद्रित थी। डार्विन के विकास के सिद्धान्त से यह समझने में मदद मिलती है कि किस प्रकार विभिन्न प्रजातियाँ एक दूसरे के साथ जुङी हुई हैं। स्वस्थतम की उत्तरजीविता एक वाक्यांश है जिसका इस्तेमाल आम तौर पर इसके प्रथम दो प्रस्तावकों ब्रिटिश दार्शनिक हरबर्ट स्पेंसर और चार्ल्स डार्विन, द्वारा इस्तेमाल किए गए सन्दर्भ के अलावा अन्य सन्दर्भों में भी किया जाता है। हरबर्ट स्पेंसर ने सबसे पहले इस वाक्यांश का इस्तेमाल चार्ल्स डार्विन की ‘‘ऑन द ऑरिजिन ऑफ स्पीशीज़’’ को पढ़ने के बाद अपनी प्रिंसिपल्स ऑफ बायोलॉजी (1864) में किया था, जिसमें उन्होंने अपने आर्थिक सिद्धांतों और डार्विन के जैविक सिद्धांतों के बीच समानताएं व्यक्त करते हुए लिखा कि यह स्वस्थतम की उत्तरजीविता है। डार्विन ने स्पेंसर के नए वाक्यांश ‘‘स्वस्थतम की उत्तरजीविता’’ का इस्तेमाल सबसे पहले वर्ष 1869 में प्रकाशित किए गए ‘‘ऑन द ऑरिजिन ऑफ स्पीशीज़’’ के पांचवें संस्करण में ‘‘प्राकृतिक चयन’’ के एक समानार्थी शब्द के रूप में किया था। डार्विन ने इसका मतलब ’’तत्काल, स्थानीय पर्यावरण के लिए बेहतर अनुकूलित’’ के लिए एक रूपक के रूप में किया था। 
 
रेडियो की प्रासंगिकता
रेडियो हमारे जीवन में मनोरंजन का एक अहम साधन है। आवाज की दुनिया मेें रेडिया नायक बनकर उभरा और आज भी अपनी भूमिका को बरकरार रखे हुए है। संचार के माध्यम भले ही बदले हों लेकिन रेडियो ने अपनी प्रासंगिकता को बनाए रखा है। 13 फ़रवरी को विश्व रेडियो दिवस  के रूप में मनाया जाता है। रेडियो दिवस एक ऐसा अवसर है कि हम रेडियो के द्वारा हमारे जीवन में लाए गए बदलावों को याद करें। सामाजिक परिवर्तनों में भी रेडिया अहम रहा है। कई देशों में रेडियों बदलाव के पड़ावों का साक्षी भी रहा है। वर्ष 1923 में रेडियो क्लब ऑफ बॉम्बे (बॉम्बे की मंडली) से प्रसारण शुरू हुआ था। ऑल इंडिया रेडियो और फिर आकाशवाणी के जि़़रये रेडियो ने देश में अपनी महत्वपूर्ण जगह बनाई है।  
यह दिवस रेडियो के अनूठी शक्ति को याद रखने और इसे दुनिया के हर कोने लोकप्रिय बनाने के लिए मूल रूप से स्पेन ऑफ किंगडम द्वारा प्रस्तावित होने के बाद यह यूनेस्को के 36 वें जनरल सम्मेलन में 3 नवंबर, 2011 को घोषित किया गया था। वर्ष 2012 में विश्व रेडियो दिवस के पहले संस्करण के सम्मान में, लाइफलाइन एनर्जी, फ्रंटलाइन एसएमएस, एसओएएस रेडियो और एम्पावरहाउस ने लंदन में एक सेमिनार का आयोजन किया। इतालडियो और इंजीनियरिंग और दूरसंचार संकाय द्वारा इस आयोजन का आयोजन किया गया था। 20 वीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में मार्कोनी द्वारा निर्मित इंटरकांटिनेंटल रेडियो स्टेशन की मेजबानी करने वाले पिसा को पहली इटैलियन शहर के रूप में चुना गया था। 
रेडियो के इतिहास पर नज़र डालने पर पता चलता है कि रेडियो में विज्ञापन की शुरुआत वर्ष 1923 में हुई। इसके बाद ब्रिटेन में बीबीसी और अमेरीका में सीबीएस और एनबीसी जैसे सरकारी रेडियो स्टेशनों की शुरुआत हुई। अमेरीका के पिट्सबर्ग में वर्ष 1920 में पहला रेडियो स्टेशन (केंद्र) खोला गया। भारत में वर्ष 1936 में भारत में ’इम्पेरियल रेडियो ऑफ इंडिया’ की शुरुआत हुई जो आजादी के बाद ऑल इंडिया रेडियो या आकाशवाणी बन गया। वर्ष 1947 में आकाशवाणी के पास छह रेडियो स्टेशन थे और पहुँच ग्यारह प्रतिशत लोगों तक ही थी, लेकिन आज देश की अधिकतम आबादी तक रेडियो की पहुँच हैं। आज देश में एफएम रेडिया धूम मचा रहा है। भारत में वर्ष 2017 तक डिजिटल रेडियो का लक्ष्य तय किया गया था। रेडियो प्रसारण की बात की जाए तो इस दिशा में वैज्ञानिक मारकोनी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता, जिन्होंने वर्ष 1894 में पहला पूर्ण टेलीग्राफी सिस्टम बनाया, जिसे रेडियो कहा गया। रेडिया का विज्ञान प्रसार के साथ सेना एवं नौसेना में भी सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया गया। 
 
हमारे वैज्ञाानिक रमन
28 फरवरी, 1928 को सर सी.वी.रमन ने अपनी खोज रमन प्रभाव (त्ंउंद मिमिबज) की घोषणा की थी। इसी खोज (प्रकाश के प्रकीर्णन पर उत्कृष्ट कार्य के लिये) उन्हें वर्ष 1930 में भौतिकी का प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार दिया गया। आज उनका आविष्कार उनके ही नाम, रामन प्रभाव के नाम से जाना जाता है। वर्ष 1954 में उन्हें भारत सरकार द्वारा भारत रत्न की उपाधि से विभूषित किया गया और वर्ष 1957 में लेनिन शान्ति पुरस्कार से नवाज़ा गया था। इससे पूर्व आप वर्ष 1924 में अनुसंधानों के लिए रॉयल सोसायटी, लंदन के फैलो भी बनाए गए। उनकी इसी खोज दिवस (28 फ़रवरी) को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों को विज्ञान के प्रति आकर्षित व प्रेरित करना तथा जनसाधारण को विज्ञान एवं वैज्ञानिक उपलब्धियों के प्रति सजग बनाना है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से होने वाले लाभों के प्रति समाज में जागरूकता लाने और वैज्ञानिक सोच पैदा करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद (एनसीएसटीसी) तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तत्वावधान में हर साल 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है।
रमन प्रभाव वह है जिसमें एकल तरंग-दैर्ध्य प्रकाश (मोनोक्रोमेटिक) किरणें, जब किसी पारदर्शक माध्यम ठोस, द्रव या गैस से गुजरती है तब इसकी छितराई किरणों का अध्ययन करने पर पता चला कि मूल प्रकाश की किरणों के अलावा स्थिर अंतर पर बहुत कमजोर तीव्रता की किरणें भी उपस्थित होती हैं। इन्हीं किरणों को रमन-किरण भी कहते हैं। यह किरणें माध्यम के कणों के कंपन एवं घूर्णन की वजह से मूल प्रकाश की किरणों में ऊर्जा में लाभ या हानि के होने से उत्पन्न होती हैं। रमन प्रभाव का अनुसंधान की अन्य शाखाओं, औषधि विज्ञान, जीव विज्ञान, भौतिक विज्ञान, खगोल विज्ञान तथा दूरसंचार के क्षेत्र में भी बहुत महत्व है।
सर सीवी रमन और रमन प्रभाव की चर्चा करने से पहले आइए उनके कार्याें पर डालते हैं एक नज़र। सर सीवी रमन कलकत्ता विश्वविद्यालय में वर्ष 1917 में भौतिकी के प्राध्यापक का पद बना तो वहाँ के कुलपति आशुतोष मुखर्जी ने उसे स्वीकार करने के लिए आपको आमंत्रित किया। सर सीवी रमन ने उनका निमंत्रण स्वीकार करके उच्च सरकारी पद से त्याग-पत्र दे दिया। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय में कुछ वर्षों में वस्तुओं में प्रकाश के चलने का अध्ययन किया। उन्होंने अध्ययन किया कि किरणों का पूर्ण समूह बिल्कुल सीधा नहीं चलता है और उसका कुछ भाग अपनी राह बदलकर बिखर जाता है। वर्ष 1921 में सर सीवी रमन विश्वविद्यालयों की कांग्रेस में प्रतिनिधि बन गए आक्सफोर्ड गए। वहां जब अन्य प्रतिनिधि लंदन में दर्शनीय वस्तुओं को देख अपना मनोरंजन कर रहे थे, वह सेंट पाल के गिरजाघर में उसके फुसफुसाते गलियारों का रहस्य समझने में लगे हुए थे। जब वह जलयान से स्वदेश लौट रहे थे, तो आपने भूमध्य सागर के जल में उसका अनोखा नीला व दूधियापन देखा। कलकत्ता विश्वविद्यालय पहुँच कर आपने पार्थिव वस्तुओं में प्रकाश के बिखरने का नियमित अध्ययन शुरु कर दिया। इसके माध्यम से लगभग सात वर्ष उपरांत, आप अपनी उस खोज पर पहुँचें, जो रामन प्रभाव के नाम से विख्यात है। उनका ध्यान वर्ष 1927 में इस बात पर गया कि जब एक्स किरणें प्रकीर्ण होती हैं, तो उनकी तरंग लम्बाइयां बदल जाती हैं। तब प्रश्न उठा कि साधारण प्रकाश में भी ऐसा क्यों नहीं होना चाहिए?
सर सीवी रमन ने पारद आर्क के प्रकाश का स्पेक्ट्रम स्पेक्ट्रोस्कोप में निर्मित किया। इन दोनों के मध्य विभिन्न प्रकार के रासायनिक पदार्थ रखे तथा पारद आर्क के प्रकाश को उनमें से गुजार कर स्पेक्ट्रम बनाए। आपने देखा कि हर एक स्पेक्ट्रम में अन्तर पड़ता है। हर एक पदार्थ अपनी-अपनी प्रकार का अन्तर डालता है। तब श्रेष्ठ स्पेक्ट्रम चित्र तैयार किए गए, उन्हें मापकर तथा गणितीय गणना करके उनकी सैद्धान्तिक व्याख्या की। उन्होंने प्रमाणित किया गया कि यह अन्तर पारद प्रकाश की तरगं लम्बाइयों में परिवर्तित होने के कारण पड़ता है। इस प्रकार रमन प्रभाव का उद्भव सम्भव हुआ। उन्होंने इस खोज की घोषणा 29 फरवरी, 1928 को की थी, जिसे आज हम राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाते हैं।
अतः रमन प्रभाव से स्पष्ट हुआ कि जब कोई एकवर्णी प्रकाश द्रवों और ठोसों से होकर गुजरता है तो उसमें आपतित प्रकाश के साथ अत्यल्प तीव्रता का कुछ अन्य वर्णों का प्रकाश देखने में आता है। यह खोज सर सीवी रामन ने अपनी खोज उत्कृष्ट यंत्रों के आभावों में तब की थी जब काफी पुराने किस्म के यंत्र मौजूद थे। आज रमन प्रभाव ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को बदल दिया है और हर क्षेत्र के वैज्ञानिक रामन प्रभाव के माध्यम से महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयोगों को अंजाम दे रहे हैं। इसके चलते बैक्टीरिया, रासायनिक प्रदूषण और विस्फोटक वस्तुओं आदि का पता आसानी से चल जाता है। आजकल अमेरिकी वैज्ञानिकों ने इसे सिलिकॉन पर भी इस्तेमाल करना आरंभ कर दिया है। ज्ञात रहे ग्लास की अपेक्षा सिलिकॉन पर रामन प्रभाव दस हज़ार गुना ज़्यादा तीव्रता से काम करता है। इससे आर्थिक लाभ तो होता ही है साथ में समय की भी काफी बचत हो सकती है। वैज्ञानिक विकास के साथ आने वाले समय में रमन प्रभाव के और भी उपयोग दृष्टिगोचर हो सकते हैं।
 
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