विज्ञान समाचार

(25/Jul/2018)

पर्यावरण एवं दुग्ध दिवस

सम्पूर्ण आहार के लिए दूध है न!

इरफान ह्यूमन
 
​१ जून को विश्व दुग्ध दिवस मनाया जाता है। दूध एक अपारदर्शी सफेद रंग का द्रव है जो स्तनपायी प्राणियों की मादाओं के दुग्ध ग्रन्थियों द्वारा निर्मित होता है। वास्तव में दूध एक पूर्ण, स्वच्छ, स्तन ग्रन्थियों का झारण है और पौष्टिकता की दृष्टि से एक मात्र सम्पूर्ण आहार है। साधारणतया दूध में ८५ प्रतिशत जल होता है और शेष भाग में ठोस तत्व यानी खनिज व वसा होती है। गाय-भैंस के अलावा बाज़ार में विभिन्न कंपनियों का पैक्ड दूध भी उपलब्ध होता है। दूध प्रोटीन, कैल्शियम और राइबोफ्लेविन विटामिन बी-२ युक्त होता है, इनके अलावा इसमें विटामिन ए, डी, के और ई सहित फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, आयोडीन व कई खनिज और वसा होती है। दूध में कई एंज़ाइम और कुछ जीवित रक्त कोशिकाएँ भी हो सकती हैं। इंटरनेशनल डेयरी जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक यूनिवर्सिटी ऑफ मायने में किए गए एक शोध से यह बात साबित हो चुकी है कि जो लोग रोजाना कम से कम एक ग्लास दूध पीते हैं, वे उन लोगों की तुलना में हमेशा मानसिक और बौद्धिक तौर पर बेहतर स्थिति में होते हैं, जो दूध का सेवन नहीं करते। हमारे शरीर को लगभग तीस से अधिक तत्वों की आवश्यकता होती है। कोई भी अकेला पेय या ठोस भोज्य पदार्थ प्रकृति में उपलब्ध नहीं है जिससे इन सबको प्राप्त किया जा सके। परन्तु दूध से लगभग सभी पोषक तत्व प्राप्त हो जाते हैं। इसलिए बच्चों के लिए सन्तुलित व पूर्ण भोजन का स्तर दूध को दिया गया है। 
दूध की उत्पादन का लक्ष्य १२वें पंचवर्षीय प्लान (२०१०.२०१७) में बढ़कर २६ण्९५ लाख मैट्रिक टन करने की है जबकि २०१०.११ में हमारी दूध की मांग या जरूरत ३३ण्६९ लाख मैट्रिक टन थी। यह आंकड़े यह दर्शाते हैं कि हमारी पूर्ति माँग से काफी कम है जिसके लिए हमें नस्ल सुधार से लेकर जानवरों के लिए चारा, दाना, पानी और प्रबंधन पर ध्यान देना होगा। अगर स्वादिष्ट खाद्य या पेय पदार्थों की बात की जाए तो खीर, खोआ, रबड़ी, कुल्फी, आईस्क्रीम, दही, पनीर, छेना, चीज़, मक्खन, घी, चाय, लस्सी, मट्ठा, खोआ और इससे बनने वाली मिठाइयां, सभी दूध के बिना सम्भव नहीं हैं।
हमारे देश में गाय, भैंस, भेड़ और बकरी के अतिरिक्त ऊंटनी का दूध (ब्ंउमस उपसा) भी खूब लोकप्रिय है। ऊंटनी का दूध का सेवन से कई रोगों शरीर को फायदा पहुंचाता है, साथ ही यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है। यदि किसी व्यक्ति को दिमाग से संबंधित समस्या है तो यह दूध उसके लिए फायदेमंद रहेगा। एक शोध से भी यह साफ हो चुका है कि ऊंटनी के दूध के सेवन से मंद बुद्धि बच्चों को फायदा मिलता है। बीकानेर का राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र ऊंटनी के दूध से बने कई प्रोडक्ट भी तैयार करता है। ऊंटनी का दूध बच्चों को कुपोषण से बचाता है और इसके नियमित इस्तेमाल से वाले बच्चों का मस्तिष्क सामान्य बच्चों की तुलना में तेज़ी से विकसित होता है, इतना ही नहीं उसकी सोचने-समझने की झमता भी सामान्य से बहुत तेज होती है। ऊंटनी के दूध में भरपूर मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है, जिससे हड्डियाँ मजबूत होती हैं साथ ही इसमें पाया जाने वाला लेक्टोफेरिन नामक तत्व कैंसर से भी लड़ने में मददगार होता है। इसे पीने से खून से टॉक्सिन्स भी दूर होते हैं और यह लिवर को साफ़ करता है और पेट से जुड़ी समस्याओं में आराम पाने के लिए भी ऊंटनी का दूध कारगर हैं। ऊंटनी का दूध डायबिटीज़ रोगियों के लिए रामबाण है क्योंकि ऊंटनी के एक लीटर दूध में ५२ यूनिट इंसुलिन पाई जाती है, जो अन्य पशुओं के दूध में पाई जाने वाली इंसुलिन से काफी अधिक है।
 

हम भी इस माला के मोती

विश्व पर्यावरण दिवस (ॅवतसक मदअपतवदउमदज कंल) पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षण के उद्देश्य से ५ जून को मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने की घोषणा संयुक्त राष्ट्र ने पर्यावरण के प्रति वैश्विक स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक जागृति लाने हेतु वर्ष १९७२ में की थी और ५ जून से १६ जून तक संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन में चर्चा के बाद शुरू किया गया था। इस प्रकार ५ जून, १९७४ को विश्व पर्यावरण दिवस मनाने की शुरूआत की गई। पर्यावरण (म्दअपतवदउमदज) शब्द का निर्माण दो शब्दों से मिल कर बना है, पहला है परि, जिसका अर्थ है हमारे चारों ओर है और दूसरा है आवरण, जिसका अर्थ है चारों ओर से घेरे हुए। पर्यावरण उन सभी भौतिक, रासायनिक एवं जैविक कारकों की समष्टिगत इकाई है जो किसी जीवधारी अथवा पारितंत्रीय आबादी को प्रभावित करते हैं और जीवित बनाए रखने के लिए परिस्थितियों के अनुकूल बनाते हैं और हमारे जीवन की प्रत्येक घटना इसी में सम्पादित होती है। इस प्रकार एक जीवधारी और उसके पर्यावरण के बीच अन्योन्याश्रय का संबंध भी होता है। यदि देखा जाए तो हमारा पर्यावरण पृथ्वी पर मौजूद जीवित और अजीवित घटकों से मिलकर बना है। जैविक संघटकों में पृथ्वी पर जीवित वर्ग से जुड़ी सारी जैव क्रियाएँ और प्रक्रियाएँ आती हैं और अजैविक संघटकों में जीवनरहित तत्व और उनसे जुड़ी प्रक्रियाएँ सम्मिलत रहती हैं। इन घटकों स्वरूप मोतियों से बनी माला के हम भी एक मोती हैं। पर्यावरण केवल प्राकृतिक नहीं होता बल्कि नैसर्गिक पर्यावरण और मानव निर्मित पर्यावरण भी होता है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि पूर्ण रूप से प्राकृतिक पर्यावरण (जिसमें मानव हस्तक्षेप बिल्कुल न हुआ हो) या पूर्ण रूपेण मानव निर्मित पर्यावरण, जिसमें सब कुछ मनुष्य निर्मित हो ऐसा सम्भव नहीं है। विभाजन के बीच एक पारदर्शी परत है, यह परत प्राकृतिक प्रक्रियाओं व दशाओं में मानव हस्तक्षेप की मात्रा की अधिकता और न्यूनता का द्योतक मात्र है। आधुनिक युग में मानव की लालची प्रवृत्ति के कारण कई पर्यावरणीय समस्याएँ खड़ी हो गई हैं और प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन इत्यादि मनुष्य को अपनी जीवनशैली के बारे में पुनर्विचार के साथ पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित कर रहीं है इसी तारतम्य विश्व में पर्यावरण दिवस का आयोजन किया जाता है। पर्यावरण प्रदूषण सामान्यतः मनुष्य के इच्छित अथवा अनिच्छित कार्यों द्वारा पारिस्थितिक तंत्र में अवांक्षित एवं प्रतिकूल परिवर्तनों के परिणाम स्वरूप उत्पन्न होता है जिससे पर्यावरण की गुणवत्ता में हृास होता है और वह मनुष्यों, जीवों तथा पादपों के लिए अवांक्षित तथा अहितकर हो जाता है। प्रदूषण का तात्पर्य वायु, जल या भूमि की भौतिक, रसायनिक या जैविक गुणों में होने वाले ऐसे अनचाहे परिवर्तन हैं जो मनुष्य एवं अन्य जीवधारियों, उनकी जीवन परिस्थितियों, औद्योगिक प्रक्रियाओं एवं सांस्कृतिक धरोहरों के लिये हानिकारक हों।

कई प्रकार के प्रदूषक पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे हैं, जिन्हें दो श्रेणियों में बाटा जा सकता है, पहला निम्नीकरणीय प्रदूषक और दूसरे अनिम्नीकरणीय। निम्नीकरणीय प्रदूषक वह है जिन प्रदूषक पदार्थ का प्राकृतिक क्रियाओं से अपघटन होकर निम्नीकरण हो जाता है, जैसे घरेलू क्रियाओं से निकले जल-मल का अपघटन सूक्ष्मजीव करते हैं। इसी प्रकार चयापचयी क्रियाओं के उपोत्पाद जैसे कार्बन डाई ऑक्साइड, नाइट्रेट्स एवं तापीय प्रदूषण (ज्ीमतउंस चवससनजपवद) से निकली ऊष्मा आदि का उपचार प्रकृति में ही इस प्रकार से हो जाता है कि उनका प्रभाव प्रदूषणकारी नहीं रह जाता। जबकि अनिम्नीकरणीय प्रदूषक वे प्रदूषक पदार्थ होते हैं जिनका प्रकृति में प्राकृतिक विधि से निम्नीकरण नहीं हो सकता, जैसे प्लास्टिक पदार्थ, अनेक रसायन, लम्बी शृंखला वाले डिटर्जेन्ट, काँच, एल्युमिनियम एवं मनुष्य द्वारा निर्मित असंख्य कृत्रिम पदार्थ हैं। इनका हल दो प्रकार से हो सकता है, पहला इनका पुनर्चक्रण और दूसरा इनकी अपेक्षा वैकल्पिक अपघटित होने वाले पदार्थों का उपयोग। पर्यावरण प्रदूषण कई दूरगामी दुष्प्रभाव हो सकते हैं जैसे आणविक विस्फोटों से रेडियोधर्मिता से उत्पन्न होने वाला आनुवांशिक प्रभाव, ग्लोबल वार्मिंग से समुद्री जल स्तर का बढ़ना, ओज़ोन परत की हानि से त्वचा कैंसर के मामलों का बढ़ना, भूक्षरण से कृषि योग्य भूमि को नुकसान पहुंचना। प्रत्यक्ष दुष्प्रभाव की बात करें तो इसमें जल, वायु तथा परिवेश का दूषित होना एवं वनस्पतियों का विनष्ट होना शामिल है, जिससे भविष्य में मनुष्य अनेक नये रोगों से ग्रसित हो सकता है। अतः आज पर्यावरण के प्रति जागरूकता की सख़्त ज़रूरत है।

महासागर को भी जानो

८ जून को विश्व महासागर दिवस मनाया जाता है। पृथ्वी का सबसे अधिक लगभग ७१ प्रतिशत भाग जल से आच्छदित है जो अधिकतर महासागरों और अन्य बड़े जल निकायों का हिस्सा होता है इसके अतिरिक्त भूमिगत, जल वाष्प और बादल के रूप में पाया जाता है। खारे जल के महासागरों में पृथ्वी का कुल ९७ प्रतिशत, हिमनदों और ध्रुवीय बर्फ चोटिओं में २ण्४ प्रतिशत और अन्य स्रोतों जैसे नदियों, झीलों और तालाबों में ०ण्६ प्रतिशत जल पाया जाता है। पृथ्वी पर महासागर जलमंडल का प्रमुख भाग है। यह खारे पानी का विशाल क्षेत्र है। यह पृथ्वी का ७१ प्रतिशत भाग अपने आप से ढके रहता है, जो लगभग ३६ण्१ करोड़ वर्ग किलोमीटर है और जिसका जिसका आधा भाग ३००० मीटर गहरा है। पृथ्वी के प्रमुख महासागरों की बात की जाए तो वे हैं-प्रशान्त महासागर, अन्ध महासागर , उत्तरध्रुवीय महासाग, हिन्द महासागर और दक्षिणध्रुवीय महासागर। ये महासागर धरती की अमूल्य निधि हैं। यदि देखा जाए तो महासागर न सिर्फ हमारी धरती पर जीवन केे प्रतीक हैं और जीवन के प्रथम अंकुर इन महासागरों में फूटें हैं। महासागर पर्यावरण संतुलन में भी अपनी प्रमुख भूमिका निभाते हैं और पृथ्वी की जैवविविधता का असीम भण्डार हैं। विश्व में महासागरोंे और सागरों का क्षेत्रफल ३६७ मिलियन वर्ग किलोमीटर है। 
८ जून, २००९ को पहला विश्व महासागर दिवस मनाया गया। यह दिवस सन १९९२ में रियो डी जनेरियो में हुए पृथ्वी ग्रह नामक फोरम में प्रतिवर्ष विश्व महासागर दिवस मनाने के फैसले के बाद और वर्ष २००८ में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा इस संबंध में आधिकारिक मान्यता दिए जाने के बाद मनाया जाने लगा है। विश्व महासागर दिवस पर हर वर्ष पूरे विश्व में महासागर से जुड़े विषयों में विभिन्न प्रकार के आयोजन किए जाते हैं, जो महासागर के सकारात्मक अैर नकारात्मक पहलुओं के प्रति जागरूकता पैदा करने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। विश्व महासागर दिवस मनाने का प्रमुख कारण विश्व में महासागरों के महत्व और उनके कारण आने वाली चुनौतियों के बारे में दुनिया में जागरूकता पैदा करना है। इसके अतिरिक्त महासागर से जुड़े अन्य पहलुओं जैसे खाद्य सुरक्षा, जैवविविधता, पारिस्थितिक संतुलन, सामुद्रिक संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग, जलवायु परिवर्तन, महासागरीय प्रदूषण आदि पर प्रकाश डालना है। 

आओ किसी की जान बचाएं

१४ जून को विश्व रक्तदान दिवस मनाया जाता है। रक्त यानी ख़्ाून एक शारीरिक तरल (संयोजी ऊतक द्रव) है जो रक्त वाहिनियों के अन्दर विभिन्न अंगों में लगातार बहता रहता है। रक्त वाहिनियों में प्रवाहित होने वाला यह गाढ़ा, कुछ चिपचिपा, लाल रंग का द्रव्य, एक जीवित ऊतक है। यह प्लाज़्मा और रक्त कणों से मिल कर बनता है। प्लाज़्मा वह निर्जीव तरल माध्यम है जिसमें रक्त कण तैरते रहते हैं। प्लाज़्मा के सहारे ही ये कण सारे शरीर में पहुँच पाते हैं और वह प्लाज़्मा ही है जो आँतों से शोषित पोषक तत्वों को शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचाता है और पाचन क्रिया के बाद बने हानिकारक पदार्थों को उत्सर्जी अंगों तक ले जा कर उन्हें फिर साफ़ होने का मौका देता है। रक्त हमारे शरीर के ऊतकों को ऑक्सीजन पहुँचाते हैं, रक्त पोषक तत्वों जैसे ग्लूकोस, अमीनो अम्ल और वसा अम्ल (रक्त में घुलना या प्लाज़्मा प्रोटीन से जुडना जैसे-रक्त लिपिड) का वितरण करता है, यह उत्सर्जी पदार्थों जैसे यूरिया कार्बन, डाई ऑक्साइड, लैक्टिक अम्ल आदि को शरीर से बाहर करता है, रक्त प्रतिरक्षात्मक व संदेशवाहक का कार्य करता है अथार्त हार्मोन्स आदि के संदेश पहुंचाता है, रक्त शरीर पीएच नियंत्रित करता है और शरीर का ताप नियंत्रित करता है साथ ही शरीर के एक अंग से दूसरे अंग तक जल का वितरण रक्त द्वारा ही सम्पन होता है।
रक्तदान में एक स्वस्थ व्यक्ति स्वेच्छा से अपना रक्त किसी ज़रूरतमंद को देता है और रक्त-आधान (ट्रांसफ्यूजन) के लिए उसका उपयोग होता है या फ्रैकशेनेशन नामक प्रक्रिया के जरिये दवा बनायी जाती है। विकसित देशों में, अधिकांश रक्तदाता अवैतनिक स्वयंसेवक होते हैं, जो सामुदायिक आपूर्ति के लिए रक्त दान करते हैं। गरीब देशों में, स्थापित आपूर्ति सीमित हैं और आमतौर पर परिवार या मित्रों के लिए आधान की आवश्यकता होने पर ही रक्त दिया करते हैं। रक्तदान से पूर्व दाताओं का मूल्यांकन किया जाता है ताकि उनके ख़्ाून का उपयोग असुरक्षित न रहे। जांच में एचआईवी और वायरल हैपेटाइटिस जैसी बीमारियों के परीक्षण शामिल हैं जो रक्त-आधान के जरिये संक्रमित हो सकते हैं। दाता से उसके चिकित्सा इतिहास के बारे में भी पूछा जाता है और दाता के स्वास्थ्य पर दान से कोई क्षतिकारक प्रभाव नहीं पड़े, यह सुनिश्चित करने के लिए उसकी एक संक्षिप्त शारीरिक जांच की जाती है। कितनी बार एक दाता रक्त दान कर सकता है यह दिनों और महीनों में भिन्न हो सकता है, यह इस बात पर निर्भर है कि वह क्या दान कर रहा या कर रही है और किस देश में दान दिया-लिया जा रहा है। उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका में एक दाता को पूर्ण रक्त दानों के बीच ८ हफ्ते (५६ दिन) का इंतजार करना पड़ता है, लेकिन प्लेटलेटफेरेसिस दानों के लिए सिर्फ तीन दिनों का। भारत पुरूष ९० दिन और महिलाएँ १२० दिन बाद दोबारा रक्तदान कर सकती हैं। फिलहाल कोई भी स्वस्थ व्यक्ति जिसकी आयु १८ से ६८ वर्ष के बीच हो रक्तदान कर सकता है। इसके लिए व्यक्ति का वज़न ४५ किलोग्राम से अधिक होना चाहिए, रक्त में हिमोग्लोबिन का प्रतिशत १२ प्रतिशत से अधिक होना चाहिए, शरीर का तापमान ९९ण्५ से कम होना चाहिए। दिए जाने वाले रक्त की मात्रा और तरीके अलग-अलग हो सकते है, लेकिन एक आदर्श दान पूरे खून का ४५० मिलीलीटर होता है। इसे मैनुअली या स्वचालित उपकरण से संग्रहित किया जा सकता है। आधान के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले खून के अधिकांश घटक का छोटा जीवन होता है और लगातार आपूर्ति बनाये रखना एक समस्या है। वर्ष २००४ में स्थापित विश्व रक्तदान दिवस का उद्देश्य सुरक्षित रक्त उत्पादों की आवश्यकता के बारे में जागरूकता बढ़ाना और रक्तदाताओं के सुरक्षित जीवन रक्षक रक्त के दान करने के लिए प्रोत्साहित करते हुए आभार व्यक्त करना है। हमे अपने जीवन में रक्तदान अवश्यक करना चाहिए। आपका रक्त किसी का जीवन बचा सकता है।

स्वस्थ षरीर का योग

२१ जून को अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप मनाया जाता है। ‘योग’ शब्द का अर्थ है समाधि अर्थात् चित्त वृत्तियों का निरोध। वैसे ‘योग’ शब्द ‘युजिर योग’ तथा ‘युज संयमने’ धातु से भी निष्पन्न होता है किन्तु तब इस स्थिति में योग शब्द का अर्थ क्रमशः योगफल, जोड़ तथा नियमन होगा। इस दिन का विशेष महत्व यह है कि यह दिन वर्ष का सबसे लंबा दिन भी होता है, दूसरी ओर योग भी मनुष्य को दीर्घ जीवन प्रदान करता है। पहली बार यह दिवस २१ जून, २०१५ को मनाया गया, जिसकी पहल भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने २७ सितम्बर, २०१४ को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण से की थी। ११ दिसम्बर, २०१४ को संयुक्त राष्ट्र में १७७ सदस्यों द्वारा २१ जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को मनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली। प्रधानमंत्री मोदी के इस प्रस्ताव को ९० दिन के अंदर पूर्ण बहुमत से पारित किया गया, जो संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी दिवस प्रस्ताव के लिए सबसे कम समय है।
यदि योग के इतिहास पर दृष्टि डालें तो पाएंगे कि वैदिक संहिताओं के अंतर्गत तपस्वियों तपस (संस्कृत) के बारे में प्राचीन काल से वेदों में (९०० से ५०० बी सी ई) उल्लेख मिलता है, जब कि तापसिक साधनाओं का समावेश प्राचीन वैदिक टिप्पणियों में प्राप्त है। कई मूर्तियाँ जो सामान्य योग या समाधि मुद्रा को प्रदर्शित करती है, सिंधु घाटी सभ्यता (सी.३३००.१७०० बी.सी.ई.) के स्थान पर प्राप्त हुईं है। पुरातत्त्वज्ञ ग्रेगरी पोस्सेह्ल के अनुसार, ये मूर्तियाँ योग के धार्मिक संस्कार के योग से सम्बन्ध को संकेत करती है। यद्यपि इस बात का निर्णयात्मक सबूत नहीं है फिर भी अनेक पंडितों की राय में सिंधु घाटी सभ्यता और योग-ध्यान में सम्बन्ध है।
आज की व्यस्त जीवन शैली के कारण लोग संतोष पाने के लिए योग करते दिखने लगे हैं। योग से न केवल व्यक्ति का तनाव दूर होता है बल्कि मन और मस्तिष्क को भी शांति मिलती है। योग बहुत ही लाभकारी है। योग न केवल हमारे दिमाग, मस्तिष्क को ही ताकत पहुंचाता है। बैठे-बैठे काम करने और आरामपरस्त जीवनशैली के चलते आज बहुत से लोग मोटापे से परेशान दिखते हैं, उनके लिए योग बहुत ही फायदेमंद है। योग के फायदे से आज सब ज्ञात है, जिस वजह से आज योग विदेशों में भी प्रसिद्ध है। विश्व के हर धर्म में ध्यान और धर्मकर्म समाहित है, जिससे शरीर तंदरूस्त और रोगमुक्त रहे, फिर वह चाहें वह योग के रूप में हो नमाज़ के रूप में।

सांख्यिकी की महत्व

प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक एवं सांख्यिकीविद प्रो। प्रशांत चंद्र महालनोबिस के देश को दिए गए उल्लेखनीय योगदान के सम्मान में भारत हर वर्ष उनके जन्मदिन २९ जून को राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस के रूप में मनाता है। आंकड़ों के बिना योजना निर्माण की बात कल्पना से परे है। महत्वपूर्ण आकड़ों के बिना कोई योजना पूरी नहीं हो सकती। किसी भी राष्ट्र की योजना की संरचना में सांख्यिकी का महत्पूर्ण योगदान है। सांख्यिकी सामाजिक, आर्थिक तथा प्राकृतिक समस्याओं के अध्ययन और समाधान में मदद करती है। यह भौतिक तथा सामाजिक विज्ञान को समझाने में भी महत्वपूर्ण है। हमें आभारी होना चाहिए राष्ट्रीय प्रतिदर्शन सर्वेक्षण संगठन के पिता प्रो। प्रशांत चन्द्र महालनोबिस  का जिन्होंने अपने जीवनकाल में सांख्यिकी को ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण कार्य किया। यदि देखा जाए तो पहले की अपेक्षा आज सर्वेक्षण करना और आकड़े जमा करना बहुत आसान हो गया है। कम्प्यूटर युग में आकड़ों का डिजिटिलाइजे़शन हो गया है। आज उपलब्ध साफ़्टवेयर्स की मदद से आँकड़ों का विश्लेषण बहुत कम समय में हो जाता है और कम्प्यूटर की एक क्लिक पर चन्द सेकण्ड में दुनिया के हर क्षेत्र के आंकड़े उपलब्ध हो जाते हैं। 
 
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