विज्ञान समाचार

(01/Aug/2014)

अब खुद रिपेयर होंगे डैमेज दांत

ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक ईजाद की है, जिससे दांत की सड़न के बाद ड्रिलिंग और फीलिंग जैसे झमेलों से हमें छुटकारा मिल सकता है। हर साल दुनिया भर में तकरीबन 2.3 बिलियन लोगों को दांतों की समस्या से जूझना पड़ता है। ब्रिटिश रिसर्चरों ने एक ऐसी तकनीक का आविष्कार किया है, जिससे सड़े हुए कैविटी वाले दांत अब खुद-ब-खुद रिपेयर हो जाएंगे। यह शोध लंदन के किंग्स कॉलेज में किया गया, जहां इस नेचरल रिपेयर के लिए इलेक्ट्रिकल करंट का इस्तेमाल किया गया। इस ट्रीटमेंट की खोज करने वाले वैज्ञानिकों की मानें तो यह अनोखा ट्रीटमेंट 3 वर्षों के भीतर आम लोगों तक पहुंच जाएगा। इस ट्रीटमेंट को दो हिस्सों में बांटा गया है। पहले स्टेप में दांत के बाहरी लेवल इनामेल पर मौजूद सड़न को हटाया जाता है और दूसरे स्टेप में डैमेज दांत के भीतरी हिस्से में हल्की सी इलेक्ट्रिक करंट की मदद से मिनरल डाल दिया जाता है। सबसे अच्छी बात यह है कि यह प्रॉसेस मौजूदा प्रॉसेस की तरह तकलीफदेह नहीं है, जिसमें कैविटी भरने से पहले दांत के ऊपर इंजेक्शन लगाया जाता है और फिर क्लीनिंग प्रॉसेस में भी दर्द से जूझना पड़ता है। दांतों के पल्स और नसों को देखने के लिए इलेक्ट्रिक टूल का इस्तेमाल वैसे तो पहले से ही किया जाता रहा है, लेकिन इस नए डिवाइस में न्यूनतम करंट जैसी सुविधा है। इस तकनीक को इलेक्ट्रिकली एक्सलरेटेड एंड इनहैन्स रिमिनरलाइजेशन नाम दिया गया है। ट्रीटमेंट का इस नए तरीके में ड्रिल करने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि इस प्रॉसेस में दांतों के अंदर कैल्शियम और फॉस्फेट मिनरल डाल दिया जाता है, जो नैचरल तरीके से दांत को रिपेयर करने में मदद करता है।

भूलने की बीमारी की वजह और इलाज दोनों मिले

अब आप कुछ नहीं भूलेंगे। भूलने की बीमारी का कारण और इसके इलाज का तरीका दोनों डॉक्टरों ने ढूंढ लिया है। डॉक्टरों ने मानव शरीर में पाए जाने वाले जीन एमएमपी-9 को भूलने की बीमारी की वजह बताई। स्टडी के अनुसार, अगर इंसान की बॉडी से यह जीन बाहर निकाल लिया जाए तो न केवल ब्लड वेसेल्स ठीक हो जाते हैं, बल्कि याददाश्त की शक्ति और सुनने की क्षमता भी बेहतर होने लगती है। गंगाराम अस्पताल और अमेरिका के ल्यूसविले स्कूल ऑफ मेडिसिन ने मिलकर स्टडी की। जर्नल ऑफ मॉल्युकूलर बायलॉजी रिपोर्ट्स के मई 2014 के अंक में इस स्टडी को प्रकाशित किया गया है। हेड रिसर्चर गंगाराम अस्पताल की डॉक्टर सीमा भार्गव के अनुसार अल्जाइमर्स, पार्किंसन, डिमेंशिया जैसी बीमारी की वजह से लोग भूलते हैं। लेकिन मानव शरीर में होमोसास्टेनीमिया नामक एक इंजाइम होता है, जब यह बढ़ जाता है तो ब्लड मोटा होने लगता है। इससे ब्लड आर्टरीज़ ब्लॉक होने लगती हैं। इसकी वजह से ब्रेन स्ट्रोक या हार्ट अटैक होने का खतरा बढ़ता है लोगों की सुनने की क्षमता भी कम होने लगती है। दुनिया भर में अब तक डॉक्टर इतना ही पता लगा पाए थे कि यह होमोसास्टेनीमिया इंजाइम की वजह से ऐसी बीमारी होती है, लेकिन यह क्यों होता है और क्या कारण है इससे अनजान थे। डॉक्टर सीमा के अनुसार इस रिसर्च में पहली बार बीमारी की वजह एमएमपी-9जीन को ढूंढ लिया है। हमने स्टडी में पाया कि जिन चूहों में डबल नॉक तकनीक से यह जीन बाहर निकाल लिया गया, उनके ब्लड वेसेल्स में ब्लड का फ्लो बढ़ गया और सुनने की क्षमता ठीक होने लगी। उनकी भूलने की बीमारी में भी सुधार हो गया। अब फार्मा कंपनी को जीन इनहेबिटर बनानी चाहिए, ताकि बॉडी से जीन निकाला जा सके। डॉक्टर कहते हैं कि जब होमोसास्टेनीमिया हाइपर हो जाता है, तो इसका इलाज आसान नहीं होता। आमतौर पर इसके लिए विटामिन बी-12 जैसे सप्लिमेंट्स या रेड मीट और मछली खाने की सलाह दी जाती है। लेकिन कई महीने के इलाज के बाद भी यह जल्दी ठीक नहीं होता है। इस वक्त दुनिया में 45-90 साल के 45 पर्सेंट लोग कम सुनने की बीमारी से पीड़ित हैं। खासकर औरतों में कम सुनने की यह बीमारी काफी है। अब यह जीन बॉडी से निकाल लिया जाए तो बीमारी का इलाज संभव हो जाएगा।

स्मार्टफोन पहचानेगा त्वचा कैंसर

अब एक स्मार्टफोन कैंसर जैसी घातक बीमारी का पता लगा सकता है। लेकिन, यह कोई आम स्मार्टफोन नहीं है। इस स्मार्टफोन की कीमत है करीब 24 हजार रुपए। यह उपकरण संभावित कैंसर की पहचान और उसका विश्लेषण करने में सक्षम होगा। मोबाइल ओसीटी एक ऐसा उपकरण है, जिसमें तस्वीरें लेने के लिए एक स्मार्टफोन, एक लेंस और प्लास्टिक हैंडल होता है।  स्मार्टफोन से ली गईं तस्वीरें उपयोगकर्ता द्वारा जांची जाती हैं और इसके बाद एक पेशेवर द्वारा पुनर्निरक्षण के लिए इन्हें अपलोड किया जाता है। इस उपकरण से हरे रंग का प्रकाश निकलता है, जो कैंसर की कोशिकाओं को अलग रंग में दिखाता है। इसमें लगा बड़ा लेंस त्वचा पर संभावित कैंसर और रक्त आपूर्ति की जगहों की तस्वीर लेता है। पेशेवर विश्लेषणकर्ताओं द्वारा इन त्रिआयामी तस्वीरों का विश्लेषण किया जाता है। मोबाइल ओसीटी के सीईओ एरियल बेरी के अनुसार, 'हम चाहते हैं कि इस उपकरण से दुनिया के किसी भी कोने में स्थित कोई भी व्यक्ति इन तस्वीरों को ले सके और उनका विश्लेषण किया जा सके। हमारा मकसद है कि लोग अपनी जिंदगी को सुरक्षित रख सकें।'

यह अलमारी बिना ढूंढे निकाल देगी कपड़े

अब आपको अपने कपड़े ढूंढने के लिए ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। एक ऐसी अलमारी बन चुकी है, जो एक क्लिक करने से आपके हाथ में पसंद वाले कपड़े पकड़ा देगी। जी हां, यह कोई कल्पना नहीं है बल्कि हकीकत है। इसमें आप अपने कपड़ों को आराम से रख सकते हैं और इसे स्मार्टफोन और टैबलेट के जरिए हैंडल कर सकते है। इस अलमारी के अंदर नॉर्मल अलमारी से ज्यादा जगह होगी और ज्यादा कपड़े रखे जा सकते हैं। इस अलमारी के अंदर एक ऑटोमैटिक रेल मशीन लगी होती है, जिस पर ज्यादा कपड़े टांगें जा सकते हैं। इसे इटली के डिजाइनर अमांडा ने तैयार किया है।

यह कॉन्सेप्ट सबसे पहले 1995 में आई एक हॉलिवुड फिल्म 'क्लूलेस` से लिया गया है, जिसमें कपड़े खोजने के लिए कम्प्यूटर सिस्टम जुड़ा होता है। असल में कपड़े रखने से पहले कपड़ों की टैबलेट और स्मार्टफोन के जरिए फोटो खिंची जाती है। अलमारी में लगी ऑटोमैटिक रेल मशीन में एक सेंसर लगा होता है, जिसका कनेक्शन स्मार्टफोन से होता है। जब ओनर अपने स्मार्टफोन या टैबलेट के जरिए एक निश्चित कपड़ा खोजने के लिए क्लिक करता है तो सेंसर यह जानकारी दे देता है कि कपड़ा कहां रखा गया है। सेंसर में लगी ऑटोमैटिक रेल घूमती है और कपड़ों को ओनर के सामने पेश कर देती है। इस अलमारी की बेसिक कॉस्ट 2 लाख 32 हजार रुपए है और इसके डबल मॉडल की कॉस्ट 3 लाख 44 हजार रुपये है।

माइक्रोवेव हेलमेट फौरन भांप लेगा 'स्ट्रोक'

स्वीडन के वैज्ञानिकों के अनुसार उन्होंने एक ऐसा हेलमेट तैयार किया है जो ये तुंत पता लगा सकता है कि मरीज़ को 'स्ट्रोक` यानी पक्षाघात हुआ था या नहीं। वैज्ञानिकों ने बताया कि इस हेलमेट की मदद से 'स्ट्रोक` के लक्षणों को पहचानने और इसका इलाज करने में तेजी आ सकती है। इससे मरीज के ठीक होने की संभावना कई गुना बढ़ जाएगी। ये हेलमेट अपनी सूक्ष्म तरंगों की मदद से ये पता करता है किमस्तिष्क के किसी हिस्से में रक्त वाहिका से ख़ून का रिसाव तो नहीं हो रहा या खून का थक्का तो मौजूद नहीं। ये उपकरण बनाने वाले स्वीडन के वैज्ञानिकों ने 45 मरीजों पर इसका परीक्षण किया, जो सफल रहा। अब वैज्ञानिकों ने तय किया है कि वे एंबुलेंसकर्मियों के दल को इसका परीक्षण करने का मौका देंगे।

'स्ट्रोक` की स्थिति में इस बात की सख्त जरूरत होती है कि डॉक्टर बिना एक पल गंवाए फौरन इलाज शुरू करे। इलाज में लगने वाला समय काफी मायने रखता है क्योंकि तुंत इलाज से मस्तिष्क को होने वाले नुकसान को सीमित किया जा सकता है। 'स्ट्रोक` के बाद अस्पताल पहुंचने और इलाज शुरू होने में चार घंटे से ज्यादा वक्त लगने पर मस्तिष्क के उत्तक नष्ट होने लगते हैं। मरीज का बेहतर इलाज करने के लिए डॉक्टर सबसे पहले ये जानने की कोशिश करता है कि कहीं इस 'स्ट्रोक' का कारण रक्त नलिकाओं में ख़ून का रिसाव या नलिका का खून के थक्के से बंद होना तो नहीं।

कम्प्यूटराइज्ड टोमोग्राफी (सीटी) स्कैन से रक्त स्राव या थक्के का पता चल तो जाता है लेकिन मरीज के इमरजेंसी वार्ड में भतब होने के बावजूद इसकी व्यवस्था करने में कुछ समय लग जाता है। ऐसी नाजुक स्थिति में इलाज में आने वाला किसी तरह का भी विलंब मरीज के लिए जानलेवा साबित होता है। इलाज की प्रक्रिया को तेज करने के लिए स्वीडन के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा मोबाइल डिवाइस, माइक्रोवेव हेलमेट, तैयार किया जो 'स्ट्रोक` के फौरन बाद मरीज के अस्पताल पहुंचने के पहले रास्ते में ही इस्तेमाल किया जा सकता है। मस्तिष्क के भीतर किस तरह की प्रक्रिया चल रही है, ये जानने के लिए यह हेलमेट माइक्रोवेव संकेतों का इस्तेमाल करता है. ये तरंगें वैसी ही हैं जो माइक्रोवेव अवन या मोबाइल फोन में होती हैं, लेकिन ये उनके मुकाबले कमजोर होती हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि उपकरण पर अभी और काम करने की जरूरत है, लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि भविष्य में ये काफी उपयोगी साबित हो सकता है।

उन्होंने 'ट्रंजैक्सन ऑन बायोमेडिकल इंजीनियरिंग` पत्रिका को बताया कि डॉक्टरों को 'स्ट्रोक` के मरीजों का इलाज करने के लिए माइक्रोवेव हेलमेट के साथ ही, दूसरे डायग्नोस्टिक तरीकों का इस्तेमाल करने की भी जरूरत पड़ सकती है। ब्रिटेन के 'स्ट्रोक` एसोसिएशन के डॉक्टर शमीम कादिर ने कहा, 'जब व्यक्ति को लकवा मारता है तो मस्तिष्क को ऑक्सीजन की कमी होने लगती है। इससे मस्तिष्क के प्रभावित हिस्से में कोशिकाएं मरने लगती हैं। ऐसे में यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि जितनी जल्दी हो सके स्ट्रोक का पता लगाया जाए और इलाज शुरू हो।'

आपके अनुसार 'वैसे यह शोध अभी अपने पहले चरण में ही है, लेकिन यह बताता है कि माइक्रोवेव आधारित प्रणाली सस्ती और सुलभ हो सकती है। इससे 'स्ट्रोक' के प्रकार को तुंत पहचानने और उसका जल्द से जल्द इलाज करने में मदद करती है।` उनके मुताबिक़, 'जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी 'स्ट्रोक` का पता लगाने और इलाज करने से 'स्ट्रोक` के जानलेवा प्रभावों में कमी लाई जा सकती है। इससे मरीज जल्दी ठीक हो जाते हैं। क्योंकि इस बीमारी में समय गंवाना, जान गंवाने के बराबर होता है।'

नासा लांच करेगा उड़न तश्तरी

अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा एक ऐसा अंतरिक्ष यान लांच करने जा रही है जो देखने में एकदम उड़न तश्तरी की तरह दिखता है। क़रीब आधी से अधिक शताब्दी से ये विशिष्ट आकार लोगों की सबसे लोकप्रिय कल्पनाओं में शामिल रहा है। तो फिर अपनी कल्पना को सच में देखने के लिए तैयार हो जाइए। जल्द ही डिस्क के आकार की आकृति आसमान पर मंडराती हुई दिखेंगी। नासा उड़नतश्तरी के आकार के लो-डेंसिटी सुपरसोनिक डेसिलेरेटर (एलडीएसडी) के परीक्षण की तैयारी कर रहा है। अंतरिक्ष एजेंसी को उम्मीद है कि एक दिन ये यान मंगल ग्रह पर लैंड करेगा।

एलडीएसडी का परीक्षण जून की शुरुआत में हवाई में होना था लेकिन खराब मौसम के कारण ऐसा नहीं हो सका। अब नासा इसके लिए वैकल्पिक विंडो की तलाश में जुटा है। उड़न तश्तरी के आकार के यानों को 'फॉरबिडेन प्लैनेट` और 'द डे दि अर्थ स्टुड स्टिल` जैसी साइंस फिक्शन फ़िल्मों में दिखाया गया था। उड़नतश्तरी लोगों के दिलोदिमाग पर छाई हुई है और अब ये एक 'आइकन` बन गई है।

जब से यूएफ़ओ (उड़ती हुई अनजान चीज) विशेषज्ञों ने इस तरह की आकृति की तस्दीक की है, तब से डिजाइनरों ने इस आकृति को पूरी तरह अपना लिया है। ब्राजील के समकालीन कला संग्रहालय से लेकर फ़ोन और केतली जैसे घरेलू उपकरणों को इस आकृति में ढाला गया। नॉर्थम्प्टन विष्वविद्यालय में साइंस फैंटेसी और पापुलर कल्चर के विशेषज्ञ माइकल स्टार कहते हैं, 'ये एक यूनीवर्सल रूपक बन गया है।` वैसे तो डिस्क के आकार की चीजें आसमान में हमेशा से दिखती रही हैं, लेकिन उड़नतश्तरी को आम लोगों के बीचउस समय मान्यता मिली जब 24 जून, 1947 को पायलट केनेथ ऑर्नेल्ड ने बताया कि उन्होंने वाशिंगटन प्रांत में माउंट रैनियर के पास नौ चमकीले यूएफ़ओ देखे। ऑर्नेल्ड ने बताया कि ये यूएफ़ओ तश्तरी के आकार के थे। इस ख़बर को अख़बारों में काफ़ी जगह मिली और जल्दी ही समाचार पत्रों ने 'उड़न तश्तरी` शब्द को गढ़ लिया। जल्द ही रॉसवैल और न्यू मैक्सिको सहित कई स्थानों पर इस तरह के यान दिखाई देने की ख़बरें आईं। माइकल स्टार बताते हैं कि इस तरह की उड़न तश्तरियां पश्चिमी लोगों की कल्पना में आने की एक वजह ये थी कि उन्हें अपने कम्युनिस्ट शत्रुओं से हमले का ख़तरा था।

स्विटज़रलैंड के मनोचिकित्सक कार्ल जुंग उड़न तश्तरियों के आकार को बौद्ध और हिंदू धर्म के धार्मिक चिन्ह 'मंडल` से प्रेरित बताते हैं। स्टार बताते हैं कि पचास के दशक में साइंस फिक्शन में इस आकार को अपनाने की एक प्रमुख वजह ये रही थी इसका फ़िल्मांकन करना बेहद आसान था। स्टार बताते हैं, 'आपको बस एक प्लेट और एक डोरी की ज़रूरत है. व्यावहारिक नज़रिए से ये कमाल का है।'

षेफ़ील्ड हैलम यूनिवर्सिटी के डेविड क्लार्क ने अपने जीवन के तीन दशक यूएफ़ओ के अध्ययन में बिताए हैं। क्लार्क बताते हैं, 'या तो एलियंस ने अपने विमान के लिए एक ऐसा डिज़ाइन तैयार किया जो हमारी दुनिया की फ़िल्मों के लिहाज़ से फ़िट था या फिर कुछ और ही चल रहा था।' लेकिन डिस्क के आकार की उड़न तश्तरियों को दुनिया भर की सरकारों और सेना ने कोरी कल्पना नहीं माना। उदाहरण के लिए जर्मनी के इंजीनियर जॉर्ज क्लेन ने सीआईए को बताया कि उन्होंने एक नाज़ी उड़न तश्तरी के लिए काम किया। सैद्धान्तिक रूप से ये आकार एयरोडायनमिक्स के लिहाज़ से सटीक है। अंतरिक्ष वैज्ञानिक मैगी एडरिन पोकोक ने बताया, 'अगर ये हॉरिज़ॉटली हवा के साथ चल रहा है तो बहुत अधिक वायु प्रतिरोध नहीं होना चाहिए।` समस्या सिर्फ संचालन प्रणाली को लेकर है। ऐसे में नासा के इंजीनियरों को उम्मीद है कि एलडीएसडी का परीक्षण सफल होगा।

 क्या मोबाइल नपुंसक बना सकता है?

शोधकर्ताओं का कहना है कि मोबाइल फ़ोन से शुक्राणु की संख्या पर खतरे को जानने के लिए अभी और अधिक अध्ययन की ज़रूरत है। एक्सेटर विश्वविद्यालय की ओर से किए गए तथ्यों के अध्ययन में कहा गया था कि जेब में मोबाइल फ़ोन रखने से शुक्राणुओं की संख्या और उनकी गति प्रभावित होती है। हालांकि एक शुक्राणु वैज्ञानिक का कहना है कि इसके प्रमाण अब भी अपूर्ण हैं और उनका फ़ोन अब भी उनकी जेब में ही रहता है। एनवायरमेंट इंटरनेशनल जर्नल में प्रकाशित हुए इस अध्ययन में कहा गया है कि विद्युत चुम्बकीय विकिरण को शुक्राणुओं की संख्या कम होने के लिए ज़िम्मेदार माना जाना चाहिए।

इसके अंतर्गत 1,492 लोगों के शुक्राणुओं की गुणवत्ता के 10 अलग-अलग शोधों का विश्लेषण किया गया। इनमें मोबाइल फ़ोन के विकिरण के संपर्क में आने वाले शुक्राणुओं के प्रयोगशाला में परीक्षण और प्रजनन क्लीनिक में पुरुषों के द्वारा भरी जानी वाली प्रश्नावली भी शामिल थी। प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर फियोना मैथ्यूज ने बीबीसी को बताया कि इन सबमें से एक में ही मोबाइल फ़ोन के संपर्क और कमज़ोर गुणवत्ता वाले शुक्राणुओं में संबंध का पता चला है।

उन्होंने कहा, 'अध्ययन से जो संदेश निकल के आ रहे हैं वह यह है कि मोबाइल फ़ोन के उपयोग के साथ उसी अनुपात में शुक्राणु की गतिशीलता में गिरावट आती है, यह गिरावट आठ प्रतिशत तक है।` 'मुझे लगता है कि आम आदमी को घबराने की ज़रूरत नहीं है. यदि आपको अपनी प्रजनन शक्ति को लेकर संभावित दिक्कत के बारे में जानकारी है तो आप इसे एक और ध्यान देने योग्य मुद्दा मान सकते हैं। जैसे आप अपने खाने में बदलाव लाते हैं वैसे ही फ़ोन रखने की जगह बदलने के बारे में भी सोच सकते हैं।` उन्होंने प्रमाण की गुणवत्ता के संबंध में अन्य वैज्ञानिकों की आलोचना को स्वीकार किया और 'साफ़ तौर पर और अधिक शोध किए जाने` की बात कही। डॉक्टर मैथ्यूज के अनुसार, 'यह दिलचस्प है, लेकिन हम बिल्कुल यह नहीं कह रहे हैं कि अपनी जेब में फ़ोन रखने वाला हर कोई नपुंसक हो जाएगा।` हालांकि शुक्राणु मोबाइल फ़ोन के कारण कैसे क्षतिग्रस्त हो सकता है, यह स्पष्ट नहीं है।

एक विचार यह है कि फ़ोन से निकलने वाले विद्युत चुम्बकीय विकिरण शुक्राणु उत्पादन के चक्र में खलल डालते हैं या डीएनए को नुक़सान पहुंचाते हैं। एक अन्य विचार यह है कि सीधे फ़ोन से या विकिरण के माध्यम से निकलने वाली गमब शुक्राणु को प्रभावित कर सकती है। शुक्राणुओं पर शोध करने वाले शेफील्ड विश्वविद्यालय के डॉक्टर एलन पैकी इससे संतुष्ट नहीं हैं और उन्होंने कहा कि इसके प्रमाण की गुणवत्ता ख़राब है और वह अपनी फ़ोन रखने की जगह नहीं बदलने वाले। उन्होंने बताया, 'पैंट की जेब में मोबाइल फ़ोन रखना कुछ समय के लिए इसलिए चिंता का विषय रहा है कि इससे वीर्य की गुणवत्ता और पुरुषों की प्रजनन क्षमता प्रभावित हो सकती है।`

वह कहते हैं कि आज तक किए गए शोधों में ज्यादा गुंजाइश नहीं है। या तो उन्होंने एक बर्तन में शुक्राणुओं करेडियोधमब किरणों के सामने रखा या फिर आदमी के फ़ोन इस्तेमाल करने की आदतों के आधार पर अनुमान लगा लिए, बगैर अन्य चीज़ों- जैसे कि उसकी जीवनशैली पर ध्यान दिए बिना. 'दरअसल हमें ज़रूरत महामारी विज्ञान के सलीके के अध्ययन की ज़रूरत है जिसमें मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल के साथ ही जीवनशैली और आदतों का भी हिसाब रखा जाए।` 'और तब तक मैं अपना फ़ोन अपनी पैंट की दाहिनी जेब में ही रखता रहूंगा।'

ब्रेन पर लगी चोट तो बन गया जीनियस

हादसा अगर हासिल में बदल जाए तो इससे अच्छा क्या होगा! कभी-कभी कुदरत के करिश्मे से ऐसा मुमकिन होता है, जैसा कि एक अमेरिकी शख्स के साथ हुआ। साइंटिस्ट भी हैरान हैं और यह पता लगाने की कोशिश में जुटे हैं कि कैसे इस व्यक्ति के दिमाग में लगी चोट ने उसे मैथेमेटिक्स का जीनियस बना दिया। उन्हें इस दिशा में कुछ कामयाबी भी मिली है। इस दिलचस्प घटना पर 'लाइव साइंस` में एक रिपोर्ट छपी है। साइंटिस्ट्स ने कहा है कि इसके पीछे वजह यह लगती है कि चोट के बाद हेड के क्राउन के पिछले हिस्से में एक खास एरिया, जिसे पराइटल कॉर्टेक्स कहते हैं, ज्यादा एक्टिव हो गया। दरअसल, जैसन पैडगेट उस वक्त तक टैकोमा (वॉशिंगटन) का एक साधारण-सा फनबचर सेल्समैन था जब तक उसके साथ हादसा पेश नहीं आया था। सन् 2002 की बात है जब एक दिन एक बार के बाहर जैसन पर दो लोगों ने गंभीर रूप से हमला किया। घटना में जैसन के दिमाग पर गहरी चोट लगी, वहीं उसकी किडनी भी जख्मी हो गई। चोटों से उबरने के बाद भी उसे आघात के बाद होने वाले स्ट्रेस डिसऑर्डर ने घेर लिया। आमतौर पर यह एक मनोवैज्ञानिक कंडिशन है जो वॉर वेटरन्स के साथ पेश आती है। लेकिन ज्यों-ज्यों वक्त बीतता गया, जैसन पैडगेट ने महसूस किया कि अब वह दुनिया को अलग तरीके से देखने लगा है। उसे ऐसा लगने लगा कि हर चीज ज्यॉमेट्रिकल शेप में ढली है। उसे एकाएक तरह-तरह के जटिल ज्यॉमेट्रिकल शेप बनाने आ गए।

जैसे ही जैसन की इस गणितीय काबिलियत और उसे हासिल करने के तरीके के बारे में लोगों ने जाना, ब्रेन साइंटिस्टों की इस बात में काफी दिलचस्पी पैदा हो गई कि आखिर उसके ब्रेन के साथ ऐसा क्या हुआ जो वह सामान्य से अद्भुत क्षमता वाला शख्स बन गया। रिसर्च शुरू कर दी गई। यूनिवर्सिटी ऑफ मायामी के प्रोफेसर बेरिट ब्रोगार्ड और उनके सहयोगियों ने जैसन के ब्रेन की स्टडी करने के लिए उसकी डत्प् (मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग) भी कराई। स्कैन से पता चला कि हमले के बाद जैसन के ब्रेन में लेफ्ट पराइटल कॉर्टेक्स ज्यादा उत्तेजित हो गया, जिससे यह चमत्कार मुमकिन हुआ। यही नहीं, वैज्ञानिक इस नतीजे पर भी पहुंचे कि जैसन जैसी क्षमता हर शख्स के ब्रेन में सुसुप्त हालत में हो सकती है। एक भौतिक विज्ञानी जैसन की खूबी से अभिभूत हो गया। जैसन के दिन बदल गए। उसने जैसन को कॉलेज जॉइन करने को राजी किया, जहां उसने नंबर थिअरी की स्टडी शुरू कर दी।

शनि के इस उपग्रह पर दिखा जादुई द्वीप

खगोलविदों ने शनि के उपग्रह टाइटन पर दूसरे सबसे बड़े समुौ लीगिया मेयर में एक चमकदार, भूगर्भिक वस्तु की खोज की है, जो दिखाई देने के बाद गायब हो गई। टाइटन से लटकी दिखने वाली इस वस्तु की तस्वीर नासा के कैसिनी मिशन रडार द्वारा उतारी गई थी।

इसी जगह की हालांकि जब कुछ दिनों बाद तस्वीर उतारी गई, तो उसमें कुछ नहीं दिखा। वैज्ञानिक इसे 'अस्थायी आकृति` बता रहे हैं, वहीं खगोलविदों ने मजाक में इसे 'जादुई द्वीप` कहा है। टाइटन के उत्तरी गोलार्ध में गतिशील और भूगर्भीय प्रक्रियाओं का यह पहला अवलोकन हो सकता है।

अमेरिका के कॉर्नेल विष्वविद्यालय के जैसन हॉफगार्टनर ने कहा कि यह खोज बताता है कि टाइटन के उत्तरी गोलार्ध के ौव्य स्थिर और अपरिवर्तनीय नहीं हैं, बल्कि इनमें परिवर्तन होता रहता है। हॉफगार्टनर कहते हैं कि जादुई द्वीप के कारणों के बारे में हमें ठीक-ठीक नहीं पता, लेकिन हम इसके बारे में आगे अध्ययन करना चाहेंगे। शनि के ज्ञात 62 उपग्रहों में टाइटन सबसे बड़ा है, जिसमें ढेर सारे झील और समुौ हैं। इस भूगर्भिक आकृति की खोज के लिए खगोलविद फ्लिपिंग की पुरानी तकनीक को अपनाते हैं। कैसिनी अंतरिक्षयान ने अमेरिका के कैलिफोर्निया इंस्टीटÎूट ऑफ टेक्नोलॉजी को 10 जुलाई 2013 को छाया प्रसंस्करण के लिए सामग्री भेजी थी।

कुछ दिनों बाद हॉफगार्टनर और उनके सहयोगी परिवर्तन देखने के लिए पुरानी और प्रसंस्कृत नई तस्वीरों के बीच अंतर पता करते हैं। क्षुौग्रह, धूमकेतु और तीसरी दुनिया की खोज के लिए यह विधि लंबे समय से प्रचलन में है। हॉफगार्टनर कहते हैं कि फ्लिपिंग से परिवर्तन का पता आसानी से चल जाता है। जुलाई 2013 के अवलोकन के पहले लीगिया मेयर के इस क्षेत्र में कोई आकृति नहीं थी। यह निष्कर्ष पत्रिका 'नेचर जियोसाइंस` में प्रकाशित हुआ है।

सूरज से भी ज्यादा गर्म था ब्रह्मांड

खगोलषात्रियों ने उस बिंदु का पता लगा लिया है, जहाँ से ब्रह्मांड 11 अरब वर्ष पहले ठंडा होना षुरू हुआ था। इससे पहले तक ब्रह्मांड का तापमान आष्चर्यजनक रूप से 13 हजार डिग्री सेल्षियस था। यह तापमान सूरज की सतह के तापमान से भी अधिक है।

स्विनबर्न यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नॉलॉजी के षोधकर्ताओं की अंतराष्ट्रीय टीम ने पाया कि करीब 11 अरब वर्ष पहले ब्रह्मांड का तापमान धीरे-धीरे घटना षुरू हुआ। षोधकर्ताओं ने आकाषगंगाओं के बीच मौजूद गैसों के अध्ययन से तीन-चार अरब वर्ष पूर्व ब्रह्मांड के तापमान का पता लगाया। ब्रह्मांड के विकास के इन षुरुआती वर्षों में कई सक्रिय आकाषगंगाएं गर्म होना षुरू हो गई थीं और जिससे आसपास के वातावरण का तापमान बढ़ने लगा था।

यूनिवर्सिटी के एस्ट्रोफिजिक्स एंड सुपरकंप्यूटिंग में प्रमुख षोधकर्ता एलिसा बोएरा के अनुसार हालांकि 11 अरब वर्ष पहले ब्रह्मांड का तापमान बढ़ना रुक गया था और वह धीरे-धीरे ठंडा होने लगा था। उन्होंने कहा आकाषगंगाओं के बीच मौजूद गैस का अध्ययन ब्रह्मांड का इतिहास जानने का अच्छा माध्यम है। इससे हमें ब्रह्मांड को प्रभावित करने वाली बड़ी घटनाओं, विकास के विभिन्न चरणों के दौरान तापमान और उसके संघटकों के संबंध में बड़ी जानकारियां मिलती है। षोध के दौरान बोएरा ने धरती के वायुमंडल द्वारा छोड़ी जाने वाली नीली रोषनी यानी पराबैगनी किरणों का अध्ययन किया। ब्रह्मांड के विकास के काफी बाद में पराबैंगनी किरणों का प्रवेष हुआ, जिससे तापमान में अंतर को समझने में सहायता मिली।