विज्ञान समाचार

(01/Jul/2014)

जमकर खाएं खाना दूर होगा आपका मोटापा! 

लोगों का बढ़ता हुआ वजन धीरे&धीरे एक वैश्विक समस्या बनता जा रहा है और इसे हल करने के लिए वैज्ञानिक लगातार रिसर्च कर रहे हैं। हाल ही में हुए एक नए रिसर्च में वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि सुबह भरपेट नाश्ता और दोपहर का भरपेट भोजन वजन कम करने में सहायक साबित होता है। कुछ दिन पहले तक कहा जाता था कि दिन में थोड़ा&थोड़ा खाने से वजन कम होता है और खून में शुगर की मात्रा भी नियंत्रित होती है, लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इससे ठीक उलट दावा किया है। डायबिटोलॉजी जनरल में प्रकाशित इस शोध में डच शोधकर्ताओं ने कहा है कि कई बार मता बढ़ टुकड़ों में खाने से लीवर में कोलेस्ट्राल संग्रह की क्षजाती है और इससे कमर में चबब जमा होने लगती है, जबकि दिन में दो बार भरपेट भोजन करने पर ऐसा नहीं होता। यह रिसर्च चेक गणराज्य के एक वैज्ञानिक दल द्वारा 30 से 70 की उम्र वाले टाइप टू डायबिटीज से पीड़ित 54 मरीजों पर किया गया। टाइप टू डायबिटीज पर सामान्यतः संतुलित आहार द्वारा ही नियंत्रण पाया जाता है। सभी मरीजों को बराबर के दो समूहों में बांट दिया गया।

पहले समूह को 12 हफ्तों तक दिन में 6 बार अल्पाहार और दूसरे समूह को समान अवधि में सुबह का भरपेट नाश्ता और दोपहर का भरपेट भोजन दिया गया। इस अवधि के बाद दोनों समूह के आहार नियम को अगले 12 हफ्तों के लिए एक दूसरे से परिवर्तित करा दिया गया। शोध की इस पूरी प्रक्रिया में सामने आया कि किश्तों में अल्पाहार करनेवालों ने जहां 2 से 3 किलोग्राम वजन कम किया वहीं इसकी तुलना में दिन में दो बार भरपेट खानेवालों ने 3 से 7 किलोग्राम वजन कम किया।

 कैंसर का पता लगाएगा डीएनए से बना ये टूल

वैज्ञानिक डीएनए की मदद से एक ऐसा उपकरण तैयार करने की दिशा में काम कर रहे हैं जिसकी मदद से कैंसर का पता और आसानी से और जल्दी लगाया जा सकेगा।डीएनए की मदद से तैयार यह उपकरण कैंसर कोशिकाओं की वजह से शरीर में होने वाले रसायनिक बदलाव का पता लगाएगा। यह उपकरण मुख्य रूप से पीएच में होने वाले उतार&चढ़ाव को मापता है। पीएच शरीर में अम्लीय और क्षारीय स्तर के माप को दिखाता है। कैंसर वाली कोशिकाएं साधारण कोशिकाओं के मुकाबले कम पीएच दर्शाती हैं, जबकि कैंसर कोशिकाओं में बाहर के मुकाबले पीएच का स्तर अंदर ज्यादा होता है।इटली के रोम टोर वरगाटा विष्वविद्यालय के फ्रैंसेस्को रिकी ने बताया कि जीवित प्राणियों में पीएच का बदलाव केवल कुछ भागों में ही हो पाता है। वहीं कनाडा के मोंटरियल विष्वविद्यालय के वेली बेलीसले के मुताबिक डीएनए की मदद से इस तरह के उपकरण बनाए जा सकते हैं। वैज्ञानिकों ने डीएनए कि मदद से ही इस तरह के उपकरण की रूपरेखा तैयार की है जो पीएच के स्तर को माप सके। इस उपकरण का इस्तेमाल इलाज और ट्यूमरयुक्त कोशिकाओं में दवा देने के काम में भी किया जा सकेगा।

कॉफी से बढ़ेगी नेत्र ज्योति

अगर आप कॉफी पीने के शौकीन हैं, तो हर रोज एक कॉफी का सेवन आपकी आंखों के लिए बेहद फायदेमंद हो सकता है। एक विशेषज्ञ के मुताबिक हर रोज एक कप कॉफी का सेवन नजर को कमजोर होने और मोतियाबिंद, अधिक उम्र और मधुमेह के कारण रेटिना को क्षतिग्रस्त होने से बचाता है। ये ऐसी समस्याएं हैं, जिनसे व्यक्ति अंधा भी हो सकता है। कोरनेल विष्वविद्यालय के आहार विज्ञान के प्रोफेसर चांग वाई ली ने कहा, कि कच्ची कॉफी में औसत रूप से एक प्रतिशत कैफीन होता है और सात से नौ प्रतिशत क्लोरोजेनिक अम्ल होता है, जो रेटिना को क्षतिग्रस्त होने से बचाने का एक मजबूत एंटीऑक्सिडेंट है। उन्होंने कहा, कॉफी दुनियाभर का सर्वाधिक लोकप्रिय पेय पदार्थ है और हमें पता है कि यह स्वास्थ्यवर्धक भी हो सकती है। इससे पहले के शोधों में यह भी पता चला है कि कॉफी के सेवन से प्रोटेस्ट कैंसर, मधुमेह, अल्जाइमर और उम्र बढ़ने के साथ उत्पन्न होने वाली बीमारियों का खतरा कम होता है। यह अध्ययन जर्नल ऑफ एग्रीकल्चर एंड फूड केमेस्ट्री में प्रकाशित हुई है। 

बाल्टी को वाशिंग मशीन बना देगी 'वाशिंग बॉल'

धातु की छोटी सी बॉल आपकी कपड़े धोने की बाल्टी को वाशिंग मशीन में बदल सकती है। कोलंबिया के एक छात्र ने 'वाशिंगबॉल` बनाने का विचार पेश कर यह दावा किया है। इन वाशिंगबॉल को बस बाल्टी में डालना होगा और वह किसी अत्याधुनिक वाशिंग मशीन की तरह कपड़ों से धूल का हर कण निकालकर उसे धो देगी। इस विचार को इलेक्ट्रोलक्स डिजाइन लैब प्रतियोगिता के फाइनल के लिए चुना जा चुका है। छात्र जुआन कैमिलो के मुताबिक अब कपड़ों को वाशिंग मशीन में नहीं डालना पड़ेगा, बल्कि वाशिंग मशीन को कपड़ों के बीच रखना होगा। इस 'वाशिंगबॉल` को 'लूना` नाम दिया गया है। इसका आकार 220 मिलीमीटर होगा। यह गोलाकार इलेक्ट्रोस्टैटिक कपड़े धोने की मशीन है। यह भीतर से खोखली होगी, जिसमें थोड़ा सा पानी डालना होगा। इसके बाद अंदर का पानी भाप के कणों में बदल जाएगा, जो इलेक्ट्रोस्टेकली चॉर्ज होंगे। लूना की सतह पर मौजूद छोटे&छोटे छिदों में से भाप निकलेगी। वहीं वाशिंगबॉल में होने वाला कंपन (वाइब्रेशन) कपड़ों को रगड़ने का काम करेगा। इन कंपन और इलेक्ट्रोस्टेकली चॉर्ज भाप की मदद से धूल का हर कण बाहर निकल जाएगा।

टाइम मशीन कराएगी अंतरिक्ष की सैर!

अंतरिक्ष की यात्रा करना हमेशा से मानव की चाहत रही है। इसको लेकर कई तरह के प्रयोग और खोज अब भी जारी है। इसी दिशा में कुछ खगोल शात्रियों ने इलस्ट्रीस नामक एक ऐसा आभासी ब्रह्मांड तैयार किया है जिसमें यात्रा कर आप ब्रह्मांड के सृजन से लेकर अब तक के सफर का लुत्फ उठा सकेंगे। इलस्ट्रीस में सफर करने के दौरान आप अपने मर्जी से समय से आगे या पीछे भी जा सकते हैं और तमाम आकाशगंगाओं की यात्रा कर सकते हैं। इलस्ट्रीस 13 अरब सालों के विकास की कहानी बताता है। दरअसल इलस्ट्रीस एक सुपर कम्प्यूटर प्रोग्राम के तहत काम करता है जिसमें 3 डी तकनीक के जरिए अंतरिक्ष के विकास की कहानी प्रदर्शित होती है। इसमें सफर के दौरान ऐसा महसूस होता है कि आप सच में किसी और कालखंड में आ गए हैं और उसके साथ यात्रा कर रहे हैं। कम्प्यूटर के इस प्रोग्राम में 8000 सीपीयू एक साथ काम करते हैं। अगर एक आम सीपीयू इस प्रोग्राम का गणना में लगे तो उसे 2000 साल से भी ज्यादा का समय लग सकता है। किसी टाइम मशीन की तरह इस कम्प्यूटर के जरिए अंतरिक्ष की यात्रा बिग बैंग के 12 करोड़ साल बाद शुरू होती है और वर्तमान समय एक पहुंचती है। इस दौरान आकाशगंगा और दूसरी कई तारा समूहों की यात्रा भी की जा सकती है।

सर्जरी के बिना भी लगेगा पेसमेकर

भारतीय मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक ने नया, बेहद छोटा, बिना तार वाला और बेहतर पेसमेकर बनाया है, जिसे बिना सर्जरी के भी मनुष्य के दिल में लगाया जा सकता है। पिछले साल से चल रहे मानव परीक्षण के दौरान 32 से ज्यादा मरीजों के दिल में इसे लगाया जा चुका है और वह बेहद अच्छे तरीके से काम कर रहा है। सैन फ्रांसिस्को में दिल की बीमारियों से संबंधित अंतराष्ट्रीय सम्मेलन में इस अध्ययन की रिपोर्ट सार्वजनिक की गई। अमेरिका के माउंट सिनाई हॉस्पिटल के वैज्ञानिक विवेक रेड्डी ने इस 'नैनोस्टिम` नामक पेसमेकर को विकसित किया है। विवेक के मुताबिक जांघ के ऊपरी हिस्से के पास स्थित रक्तवाहिनी के जरिए लीडलेस पेसमेकर को शरीर के अंदर डाला जाता है, फिर धीरे&धीरे इसे हृदय में पहुंचा दिया जाता है। दिल की घड़कनें धीमी होने पर पेसमेकर की जरूरत पड़ती है। इस बीमारी को मंदस्पंदन यानी ब्रैडीकार्डिया कहते हैं। पेसमेकर इलेक्ट्रिक सिग्नल भेजकर धड़कनों को ठीक कर देता है। परंपरागत पेसमेकर में दिल के बाहर एक बैटरी होती है और इसमें से निकले तार (लीड) दिल के अंदर पहुंचाए जाते हैं। बैटरी से ऊर्जा पाकर यह तार ही दिल में इलेक्ट्रिक सिग्नल भेजकर धड़कनों की रफ्तार को ठीक करता है। परंपरागत पेसमेकर को सर्जरी के जरिए लगाया जाता है। वही 'नैनोस्टिम` का आकार पुराने पेसमेकर से 10 गुना कम होता है। इसके सीधे दिल में लगाया जाता है, जिससे यह ज्यादा कारगर साबित होता है। इसमें किसी तरह का कोई तार नहीं होता है, जिसके चलते इसे लीडलेस पेसमेकर भी कहते हैं।

मंगल के सफर पर जाएंगे 44 भारतीय

मंगल ग्रह पर एक तरह के सफर के लिए जाने के 705 अकांक्षियों में 44 भारतीय के नाम शामिल हैं। यह सफर 2024 में होना है। नीदरलैंड स्थित गैर सरकारी संगठन 'मार्स वन` ने ऐलान किया कि दुनिया भर के 353 लोगों के नाम मंगल पर सबसे पहले बसने वालों के चयन कार्यक्रम से हटा दिए गए। 'जिंदगी में एक बार के अवसर` नामक इस कार्यक्रम में शामिल लोगों की संख्या अब 705 रह गई है। इनमें 44 भारतीय शामिल हैं। भारतीय लोगों में 27 पुरुष और 17 महिलाएं है। मंगल पर जाने के इच्छुक लोग दिल्ली, हैदराबाद, मुंबई, कोलकाता, पुणे और तिरुवनंतपुरम जैसे शहरों से हैं। इस सफर के लिए 140 से अधिक देशों के लोगों ने आवेदन किया था। पहले चरण में 20,000 से अधिक भारतीय नागरिकों के आवेदन आए थे। अब शेष बचे लोगों का साक्षात्कार 'मार्स वन` की चयन टीम लेगी। संगठन के मुख्य चिकित्सा अधिकारी नोरबर्ट क्राफ्ट ने कहा, 'हम अगले चरण की शुरुआत को लेकर उत्साहित है। इस दौर में हम अपने उन उम्मीदवारों को बेहतर ढंग से समझा सकेंगे जो इस तरह के साहसी सफर पर जाने के आकांक्षी हैं।` 'मंगल पर जाने वाले आकांक्षियों को अपना ज्ञान, बुद्धि, अनुकूलता और व्यक्तित्व का प्रदर्शन करना होगा।` पिछले साल दिसंबर में मार्स वन ने लाख से अधिक आवेदकों में से 62 भारतीय सहित 1058 लोगों का चयन किया था। मार्स वन ने इन आवेदकों से मार्च, 2014 तक तक कुछ कार्य सौंपे थे। इनमें 418 पुरुष और 287 महिलाएं सफल हुए हैं। अब इन लोगों को इंटरव्यू के लिए बुलाया जाएगा। 

 ज्यादा जीते हैं छोटे कद के इंसान!

अगर आप अपने छेटे कद के कारण अपमानित महसूस करते हैं तो आपके लिए एक अच्छी खबर है। दरअसल एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि छोटे कद के इंसान ज्यादा लंबा जीवन बिताते हैं। जापानी पुरुषों पर हुए इस अध्ययन में यह पता चला है कि छोटे इंसानों के जीन ज्यादा रक्षात्मक होते हैं। इस कारण उनके शरीर का आकार तो छोटा होता है, लेकिन जिदंगी लंबी हो जाती है। छोटे कद के इंसानों के खून में चीनी की मात्रा कम रहती है और उन्हें कैंसर होने का भी खतरा कम होता है। हवाई विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. ब्रैड्ले वीलकॉक्स ने बताया कि शरीर का आकार एफओएक्सओ3 नाम के एक जीन पर निर्भर करता है जो लगभग सभी प्रजातियों में दीर्घजीवन के लिए भी जरूरी है।

 अपने आप ठीक हो जाएगी मोबाइल की टूटी क्रीन!  

वैज्ञानिकों ने एक ऐसा नए प्लास्टिक तैयार किया है जो अपनी टूट&फूट की 'ख़ुद ही मरम्मत` कर लेगा यानी अगर आपके मोबाइल फ़ोन की क्रीन टूट जाए या फिर आपका टेनिस रैकेट टूट जाए, तो वह अपनी मरम्मत ख़ुद ही कर लेगा। यह पॉलीमर तीन सेंटीमीटर चौड़ी दरारों को ख़ुद ही भर देगा, यह खोज ख़ून के जमने की प्रक्रिया से प्रेरित है। इसमें सूक्ष्म नलिकाओं यानी कोशिकाओं का एक जाल होता है, जो दरार वाली जगह को भरने के लिए ज़रूरी रसायन पहुँचाता है। इसे तैयार किया है यूनिवर्सिटी ऑफ़ इलिनॉय के इंजीनियरों ने। इस खोज को 'साइंस` नाम की विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। वैज्ञानिक पिछले कई दशकों से ऐसे प्लास्टिक की कल्पना कर रहे हैं, जो इंसानी त्वचा की तरह अपने घाव ख़ुद भर सके। इससे पानी की पाइप और कार की बोनट में आई दरार अपने आप बंद हो जाएगी। सैटेलाइट अपने नुक़सान की ख़ुद मरम्मत कर सकेंगे। लैपटॉप और मोबाइल फ़ोन की टूटी हुई इलेक्ट्रॉनिक चिप अपनी समस्याएं अपने आप सुलझा लेंगी।

मरम्मत में सक्षम : इसमें पहली बड़ी सफलता यूनिवर्सिटी ऑफ़ इलिनॉय को 2001 में मिली थी। प्रोफ़ेसर स्कॉट व्हाइट और उनके साथियों ने एक पॉलीमर में सूक्ष्म कैप्सूलों को मिलाया। जिनमें मरम्मत में काम आने वाला ौव भरा हुआ था। जब भी इस पदार्थ में दरार आती थी तो रसायन का स्राव होता था और दरारें भर जाती थी। यह छोटे&मोटे नुक़सान को अपने आप ठीक करने में सक्षम है लेकिन बड़े नुक़सान के मामले में अलग –ष्टिकोण की ज़रूरत है।

प्रोफ़ेसर स्कॉट व्हाइट : हाल में ऐसा कंक्रीट, पानी से बचाव करने वाली परत और इलेक्ट्रिकल सर्किट बनाए गए हैं जो ख़ुद की मरम्मत करने में सक्षम हैं। हालांकि 'साइंस` के मुताबिक़ इस तरह के प्लास्टिक या पॉलीमर भी केवल छोटी&मोटी दरारों को ही ठीक कर सकते हैं। प्रोफ़ेसर व्हाइट कहते हैं, ''यह छोटे&मोटे नुक़सान को अपने आप ठीक करने में सक्षम है लेकिन बड़े नुक़सान के मामले में अलग –ष्टिकोण की ज़रूरत है।" यही वजह है कि बड़ी टूट&फूट को ठीक करने के लिए प्रोफ़ेसर व्हाइट और उनकी टीम ने इंसानी शिराओं और धमनियों से प्रेरित एक नए तरह का नलिका तंत्र डिजाइन किया है।

मज़बूत संरचना : इसमें टूट&फूट वाली जगह पर सूक्ष्म नलिकाओं का एक नेटवर्क मरम्मत करने वाले रसायन ले जाता है. इसमें रसायन दो अलग&अलग धाराओं से आते हैं। यह रसायन दो चरणों में दरारों को भरता है। इसके तहत पहले दरार में गाढ़ा तरल पदार्थ भरा जाता हैं। यही पदार्थ बाद में सख्त होकर सूख जाता है और मज़बूत संरचना बनाता है। अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि 35 मिलीमीटर से अधिक मोटी दरार को 20 मिनट में भरा जा सकता है और तीन घंटे के अंदर प्रभावित मशीन को फिर से काम में लाया जा सकता है। परीक्षणों से पता चला है कि टूटी हुई वस्तु को 62 फ़ीसदी तक दुरुस्त किया जा सकता है। इस नए पदार्थ के निर्माण से भविष्य के उन पॉलीमरों का रास्ता साफ़ होगा। जो बंदूक की गोली, बम या रॉकेट से हुई क्षति की मरम्मत ख़ुद कर सके। 

बिजली कड़कने की वजह सौर आंधी

एक अध्ययन के मुताबिक़ सूरज पर होने वाली गतिविधियों की वज़ह से धरती पर बिजली गिरती है। वैज्ञानिकों ने अध्ययन में पाया है कि तेज़ गति के सौर कणों का झोंका जब वायुमंडल में प्रवेश करता है तो बिजली बोल्ट की संख्या बढ़ जाती है। यह शोध इनवायरनमेंटल रिसर्च लेटर्स नाम के जर्नल में प्रकाशित हुआ है। अब जबकि सूरज पर होने वाली गतिविधियों पर सैटेलाइट के द्वारा बारीकी से नज़र रखी जाती है इसलिए यह संभव है कि सौर कणों की ख़तरनाक आंधी के धरती के वायुमंडल से टकराए जाने का पूर्वानुमान लगाया जा सके।

प्रभाव : यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के प्रमुख शोधकर्ता डॉ क्रिस स्कॉट ने कहा, 'बिजली काफ़ी ख़तरनाक होती है। हर साल 24 हज़ार लोग बिजली के आघात से मारे जाते हैं. इसलिए सौर कणों की आंधी की कोई भी पूर्व चेतावनी काफ़ी उपयोगी साबित होगी।'

सौर आंधी : सौर कणों की आंधी के धरती के वातावरण में प्रवेश करने के साथ ही उत्तरी धुव पर प्रकाश फैल सकता है, लेकिन शोध बताता है कि कैसे ये मौसम को भी प्रभावित कर सकता है।

डॉ स्कॉट ने कहा, 'सौर आंधी लगातार एक जैसी नहीं रहती, यह तेज़ और धीमी होती रहती है. चूंकि सूरज घूमता रहता है इसलिए ये धाराएँ एक दूसरे का पीछा करती रहती हैं इसके चलते यदि तेज़ सौर आंधी के पीछे धीमी सौर आंधी है तो इससे सौर कणों की सघनता बढ़ जाती है।` वैज्ञानिकों ने पाया कि जब सौर कणों की आंधी की गति और प्रबलता बढ़ती है तो बिजली गिरने की दर भी बढ़ जाती है। शोधकर्ता दल ने कहा, 'सौर कणों के धरती के वातावरण से टकराने के बाद एक महीने तक मौसम अशांत रह सकता है।` प्रक्रिया : शोधकर्ताओं ने उत्तरी यूरोप के आंकड़ों का इस्तेमाल करके यह पाया कि 400 दिनों में 321 बिजली गिरने की घटना की तुलना में तेज़ गति वाले सौर आंधी के बाद 400 दिनों में औसतन 422 बिजली गिरने की घटना हुई।

उत्तरी ध्रुवीय प्रकाश : डॉ स्कॉट ने कहा, 'यह चौंकाने वाला परिणाम था क्योंकि पहले यह सोचा गया था कि सौर आंधी में बढ़ोत्तरी का उल्टा असर होगा।` शोधकर्ता दल इसकी प्रक्रिया को लेकर वास्तव में आष्वस्त नहीं है लेकिन उन्होंने कहा कि सौर कण बादलों में प्रवेश करके विद्युत ऊर्जा को बिजली में तब्दील कर देता है। हालांकि इसकी प्रक्रिया से संबंधी सवालों के जवाब अभी भी अधूरे हैं। लेकिन सौर कणों के पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करने से संबंधी बहुत सी जानकारियां मौजूद हैं जो सौर आंधी की भविष्यवाणी करने में मदद कर सकती हैं अध्ययन के आंकड़े यूरोप में इकट्ठे किए गए है लेकिन शोधकर्ताओं का मानना है कि इसका प्रभाव विश्वव्यापी होगा।