विज्ञान समाचार

(26/Nov/2018)

स्वास्थ्य के लिए आधुनिक तकनीक उपलब्ध

अंग्रेज़ी में एक प्रचलित कहावत है ‘हेल्थ इज़ वेल्थ’ अर्थात स्वास्थ्य ही धन है। अगर व्यक्ति स्वस्थ नहीं तो धन का कोई अर्थ नहीं। अगर हम एक सार्वभौमिक दृष्टिकोण की बात करें तो अपने आपको स्वस्थ कहने का यह अर्थ होता है कि हम अपने जीवन में आनेवाली सभी सामाजिक, शारीरिक और भावनात्मक चुनौतियों का प्रबंधन करने में सफलतापूर्वक सक्षम हों। आज के समय मे अपने आपको स्वस्थ रखने के ढेर सारी आधुनिक तकनीक उपलब्ध हैं। लेकिन ये सारी उतनी अधिक कारगर नहीं हैं। दूसरे तकनीकी युग में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और अधिक बढ़ रहीं हैं और लोग समय से पहले बूढ़े हो रहे हैं। ‘विज्ञान इस माह’ स्तम्भ में इस बार आप लोकप्रिय पेय कॉफ़ी के बारे में जानेंगे कि किस तरह से इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट हमें कैंसर रोग तक से लड़ने में मदद कर सकते हैं, एंटीऑक्सीडेंट की शक्ति ही हमें वृद्धावस्था की ओर बढ़ने से रोकती है। इस दिशा में शाकाहार अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए एक स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन-मस्तिष्क का निर्माण करता है। आलेख के अंत में मानक का महत्व और मानक ब्यूरो द्वारा मानकों का पालन करने वाली वस्तुओं के उपयोग पर बल दिया गया है।

शाकाहार और मानसिक संतुलन बनाता है बेहतर कल

1 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय काफी दिवस (प्दजमतदंजपवदंस बविमिम कंल) मनाया जाता है। इस दिवस की शुरूआत 1 अक्टूबर, 2015 से इंटरनेशनल काफ़ी ऑर्गेनाइज़ेश द्वारा की गई थी। विश्व के कई देशों में राष्ट्रीय काफ़ी दिवस मनाने की भी परम्परा है। भारत सहित मैक्सिको, ऑस्टे्रलिया, आस्ट्रिया, बेल्जियम, कनाडा, इंग्लैण्ड, इथोपिया व इंगरी में 28 सितम्बर को राष्ट्रीय काफ़ी दिवस मनाया जाता है। यही नहीं 1 अक्टूबर को जापान और श्रीलंका, चीन, 6 मई को डेनमार्ग, 24 मई को ब्राज़ील, 27 जून को कोलम्बिया, 22 अगस्त को पेरू, 12 सितम्बर को कोस्टा रिका, 19 सितम्बर को आयरलैण्ड, 20 सितम्बर को मंगोलिया, 28 सितम्बर को स्वीटज़रलैण्ड आदि में भी राष्ट्रीय काफ़ी दिवस मनाया जाता है।
पेय कॉफ़ी, कॉफी के पेड़ के भुने हुए बीजों से बनाया जाता है। कॉफी कई प्रकार की होती है। इसमें एस्प्रेसो काफ़ी को बनाने के लिये, कड़क ब्लैक कॉफी को एक एस्प्रेसो मशीन में भाप को गहरे-सिके हुए तेज़ गंध वाले कॉफ़ी के दानों के बीच से निकालकर तैयार किया जाता है। इसकी सतह पर सुनहरे-भूरे क्रीम के (झाग) होते हैं। कैपेचीनो काफ़ी गरम दूध और दूध की क्रीम की समान मात्रा से मिलकर बनती है। कैफै लैट्टे (इतालवी में लैट्टे का अर्थ दूध होता है) में एक भाग एस्प्रेसो का एक और तीन भाग गर्म दूध होता है। फ्रैपी काफ़ी ठंडी एस्प्रेसो होती है, जिसे बफ़र् के साथ एक लंबे गिलास में पेश किया जाता है। दक्षिण भारतीय फिल्टर कॉफ़ी को दरदरी पिसी हुई, हल्की गहरी सिंकी हुई कॉफी अरेबिका से बनाया जाता है। मोचा या मोचाचिनो, कैपेचिनो और कैफे लैट्टे का मिश्रण है जिसमें चॉकलेट सिरप या पाउडर मिलाया जाता है। यह कई प्रकार में उपलब्ध होती है। ब्लैक कॉफी टपकाकर तैयार की गई छनी हुई या फ्रेंच प्रेस शैली की कॉफ़ी है जो बिना दूध मिलाए सीधे परोसी जाती है। आइस्ड कॉफ़ी में सामान्य कॉफ़ी को बफ़र् के साथ और कभी-कभी दूध और शक्कर मिलाकर परोसा जाता है। गर्मागर्म कॉफी का एक प्याला दिमाग़ को तरोताज़ा कर देता है। बारिश और सर्दी के मौसम में तो यह खासतौर पर अच्छी लगती है। दोस्तों के साथ गपशप का मजा भी बढ़ा देती है। वहीं इसके फायदों पर भी अक्सर रिसर्च होती रहती है। ग्रीन कॉफी एंटीऑक्सीडेंट का ज़बरदस्त स्रोत है। ओआरएसी यानि ऑक्सीजन रेडिकल एबजॉरबेंस केपेसिटी एक ऐसा तरीक़ा होता है जिससे एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा की जाँच की जाती है। जब ग्रीन कॉफी की बीन्स की जांच की गई तो पाया गया कि इसमें एंटीऑक्सीडेंट अधिक मात्रा में है। हाल ही के अध्ययन में पता चला है कि ये कैंसर जैसी ख़्ातरनाक बीमारियों को भी रोकने में कारगर है। दरअसल ये कैंसर के सेल को बनने से रोकती है। एक अध्ययन में पाया गया है कि कैफीन का सेवन प्रतिदिन कॉफी के रूप में करने से कैंसर की संभावना 18 प्रतिशत कम हो जाती है। कैफीन में एंटी इंफ्लैमेटरी एवं एंटीऑक्सीडेंट गुण के कारण प्रोस्टेट कैंसर, एंडोमेट्रियल कैंसर, मेलानोमा, स्किन कैंसर एवं लिवर कैंसर से बचाने में मदद करता है। कैफ़ीन को वैज्ञानिक रूप से मेथिल थियोब्रोमीन के नाम से जाना जाता है। यह क्षारीय (ंंंसांसवपक) प्रकृति का होता है। यह एक प्राकृतिक पदार्थ है जो कॉफी बीन्स, चाय, कोला सहित 60 से अधिक पेड़ों की पत्तियों, बीजों एवं फलों से प्राप्त किया जाता है। चार वर्षों तक लगातार एक कप से अधिक कैफीन युक्त कॉफी का सेवन करने से पुरुष एवं महिलाओं में टाइप 2 डायबिटीज की संभावना 11 प्रतिशत तक कम हो जाती है। इसके अलावा चार हफ़्तों तक लगातार अधिक कैफीन का सेवन करने से शरीर में इंसुलिन की सांद्रता बढ़ती है जिससे कि डायबिटीज़ रोग के लक्षण कम होते हैं।
ग्रीन कॉफी चयापचय (मेटाबॉलिज़्म) दर को बढ़ाती है जो कि आपकी दिनचर्या को पूरा करने में ऊर्जा देता है। कॉफी वज़न कम करने में भी मददगार है क्योंकि इसमें चयापचय दर को बढ़ाने की क्षमता होती है। इसी के साथ पहले से मौजूदा फैट को भी कम करता है। ग्रीन कॉफी को पीने से आपका मूड तो अच्छा हो ही जाता है और ये आपके दिमाग़ को भी तेज़ करता है। ये आपके दिमाग़ की गतिविधियों, प्रतिक्रिया, याददाश्त, सतर्कता को तेज़ करता है। ऐसा कौन सा व्यक्ति है जो जवां दिखना नहीं चाहता है, हर कोई अपनी बढ़ती उम्र को रोकना चाहता है। ग्रीन कॉफ़ी इस मामले में काफी मददगार है। जी हाँ ये उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा कर देती है। कॉफ़ी के बीन्स को भूना नहीं जाता है, इसका कच्चे रूप में ही सेवन किया जाता है। इसलिए इसमें सामान्य कॉफ़ी की तुलना में कैफ़ीन की मात्रा कम होती है। हालांकि कैफ़ीन वज़न कम करने में मदद करता है और आपके एकाग्रता में सुधार लाता है। लेकिन इसका ज़्यादा सेवन करना आपके स्वास्थ के लिए हानिकारक हो सकता है। कैफ़ीन एक ऐसा उत्तेजक पदार्थ है जो शरीर को सक्रिय रखने एवं बहुत सी बीमारियों के इलाज में दवा के रूप में उपयोग किया जाता है लेकिन इसका अत्यधिक मात्रा में सेवन करने से इसका नुकसान भी हो सकता है। इसको मस्तिष्क के लिए अच्छा माना जाता है लेकिन कैफ़ीन के लत से व्यक्ति को परेशानी हो सकती है। कैफ़ीन के अत्यधिक सेवन से चिंता, घबराहट, बेचैनी, कँपकपी, दिल की धड़कन बढ़ना एवं नींद आने में परेशानी हो सकती है। आवश्यकता से अधिक कैफ़ीन का सेवन करने से सिर दर्द, माइग्रेन, हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएँ भी हो सकती हैं। गर्भवती महिलाओं को अधिक कैफ़ीन का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि कैफ़ीन आसानी से गर्भनाल से गुज़र सकता है जिससे गर्भपात और कम वज़न के शिशु के जन्म की संभावना बनी रहती है। यदि आप किसी दवा का सेवन कर रहे हों तो उस दौरान कैफ़ीन का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि यह कुछ दवाओं के प्रभाव को ख़्ात्म कर देता है। कैफ़ीन अनिद्रा की बीमारी को अधिक बढ़ा सकता है जिसके कारण दिन भर थकान बनी रह सकती है और नींद भी गड़बड़ हो सकती है।

जीना इसी का नाम है

1 अक्टूबर को अन्तर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस (प्दजमतदंजपवदंस क्ंल वि व्सकमत च्मतेवदे) की। जीवन और मृत्यु एक अटल सत्य है। यदि जीवन है तो मृत्यु भी निश्चिित है, लेकिन बुजुर्गों के जीवन को खुशहाल बनाने और उनके प्रति हमारी जिम्मेदारियों पर बल प्रदान करते हुए उन्हें एहसास दिलाया जाए कि बुजुर्गों के प्रति होने वाले उम्र के आधार पर भेदभाव और नकारात्मक दृष्टिकोण एवं उन पर इससे होने वाले हानिकारक दुष्प्रभाव की चुनौतियों के खिलाफ भी लोग लामबंद हैं, तो उनका शेष जीवन ख़्ाुशहाल बीतेगा।
वृद्धावस्था जीवन की उस अवस्था को कहते हैं जिसमें उम्र मानव जीवन की औसत काल के समीप या उससे अधिक हो जाती है। वृद्धावस्था एक धीरे-धीरे आने वाली अवस्था है जो कि स्वभाविक व प्राकृतिक घटना है। किसी जीव में समय के साथ होने वाले आयु परिवर्तनों को वृद्धावस्था (।हपदह) या उम्र का बढ़ना कहते हैं। जीव विज्ञान की भाषा में बूढ़ा होना उम्र बढ़ने की एक दशा या प्रक्रिया है। जीवकोषीय बुढ़ापा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमे पृथक कोशिकाएं कल्चर में बंटने की सीमित क्षमता का प्रदर्शन करती हैं (हेफिलिक लिमिट, जिसे 1961 में लिओनार्ड हेफिलिक द्वारा खोजा गया था), जबकि जीवों की उम्र बढ़ने को ओर्गेनिज्मल बुढ़ापा कहते हैं। पूर्ण नवीनीकरण की अवधि के बाद (मनुष्यों में 20 से 30 वर्ष की आयु में), ओर्गेनिज्मल बुढ़ापे को तनाव के प्रति प्रतिक्रिया देने की क्षमता में कमी, होम्योस्टेटिक असंतुलन और बीमारियों के बढ़ते ख़्ातरे द्वारा पहचाना जा सकता है। अपरिवर्तनीय शृंखला के ये परिवर्तन अनिवार्य रूप से मृत्यु के रूप में समाप्त होते हैं। कुछ शोधकर्ता (विशेष रूप से बायोगेरोंटोलॉजिस्ट) बुढ़ापे को एक रोग मान रहे हैं। चूंकि उम्र पर प्रभाव डालने वाले जीन खोजे जा चुके हैं, इसलिए वृद्धावस्था को भी तेज़ी से दूसरे आनुवांशिक प्रभावों की तरह संभावित उपचार योग्य स्थितियाँ माना जा रहा है।
मनुष्यों और अन्य जानवरों में, जीवकोषीय बुढ़ापे को प्रत्येक कोशिका चक्र में टेलोमेयर घटाने के लिए जि़म्मेदार ठहराया गया है, जब टेलोमेयर बहुत कम रह जाते हैं तो कोशिकाएँ मर जाती हैं। इसलिए हेफिलिक की भविष्यवाणी के अनुसार, टेलोमेयर की लंबाई एक ‘आणविक घड़ी’ है। टेलोमेयर की लंबाई अमर कोशिकाओं (जैसे रोगाणु कोशिकाओं और केराटिनोसाईट कोशिकाओं में, किन्तु त्वचा की अन्य कोशिकाओं में नहीं) में टेलोमेयर एंजाइम द्वारा कायम रहती है। 
वैज्ञानिकों के अनुसार प्रयोगशाला में नश्वर कोशिका रेखाओं को उनके टेलोमेयर जीनों को सक्रिय करके अमर किया जा सकता है, जो सभी कोशिकाओं में पाया जाता है किन्तु कुछ विशेष प्रकार की कोशिकाओं में ही सक्रिय रहता है। कैंसर कोशिकाओं में अमर हो कर बिना किसी सीमा के कई गुना संख्या बढ़ने का गुण होना आवश्यक है। कैंसर कारकों के प्रति यह महत्वपूर्ण प्रक्रिया कैंसर के 85 प्रतिशत मामलों में लागू होती है, जिसमें उत्परिवर्तन द्वारा टेलोमेयर जीनों का पुर्नसक्रियण होता है। चूंकि यह उत्परिवर्तन दुर्लभ है, अतः टेलोमेयर घड़ी को कैंसर के खिलाफ रक्षात्मक तंत्र के रूप में देखा जा सकता है। अनुसंधान दर्शाता है कि यह घड़ी प्रत्येक कोशिका के नाभिक में स्थित होनी चाहिए और ऐसी सूचनाएँ मिली हैं कि मनुष्य के गुणसूत्रों के 23वें जोड़े के पहले या चौथे गुणसूत्रों के जीनों में दीर्घायु घड़ी स्थित हो सकती है।
मनुष्यों में उम्र का बढ़ना शारीरिक, मानसिक और सामाजिक परिवर्तन की एक बहुआयामी प्रक्रिया को दर्शाता है। अनुसंधानों से ज्ञात हुआ है कि जीवन के अंतिम दौर में भी शारीरिक, मानसिक और सामाजिक तरक्की और विकास की संभावनाएं मौजूद रहती हैं। उम्र का बढ़ना सभी मानव समाजों का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है जो जैविक बदलाव को दर्शाता है, लेकिन इसके साथ यह सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराओं को भी दर्शाता है। वृद्धजनों की आबादी के बारे में कभी-कभी मतभेद रहे हैं। कभी-कभी इस आबादी का विभाजन युवा बुजुर्गों (65.74), प्रौढ़ बुजुर्गों (75.84) और अत्यधिक बूढ़े बुजुर्गों (85़) के बीच किया जाता है। हालांकि, इस में समस्या यह है कि कालानुक्रमिक उम्र कार्यात्मक उम्र के साथ पूरी तरह से जुड़ी हुई नहीं है अर्थात ऐसा हो सकता है कि दो लोगों की आयु समान हो किन्तु उनकी मानसिक तथा शारीरिक क्षमताएँ अलग हों। उम्र वर्गीकृत करने के लिए प्रत्येक देश, सरकार और गैर सरकारी संगठन के पास विभिन्न तरीके हैं। 
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आकड़ों पर दृष्टि डालें तो पाएंगे कि आज दुनिया में लगभग छह सौ मिलियन लोग साठ वर्ष की आयु के हैं। यह कुल संख्या, वर्ष 2025 तक दोगुनी हो जाएगी तथा यह संख्या वर्ष 2050 तक लगभग दो अरब हो जाएगी। इनमें से अधिकांश लोग विकासशील देशों में होंगे, जिनकी दशा दयनीय होगी। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों को विस्तृत परामर्श जारी किया है जो प्राथमिक तौर पर ऐसे अपराधों जिसमें की वरिष्ठ नागरिकों के विरूद्ध अपराध भी शामिल है कि रोकथाम, खोजबीन, पंजीकरण, जाँच, और अभियोजन के लिए जि़म्मेदार है। गृह मामलों के मंत्रालय ने अपने परामर्श में राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों को सलाह दी है कि वो वृद्ध लोगों के खिलाफ हर तरह की उपेक्षा, ग़लत व्यवहार और हिंसा से सुरक्षा के तरीके सुनिश्चित करें। इस तरह के तरीकों में वरिष्ठ नागरिकों की पहचान करना, उनकी सुरक्षा के लिए पुलिस को संवेदनशील बनाना, वृद्ध लोगों को सुरक्षा देना, बीट अधिकारी का वृद्ध लोगों के घर जाकर निरंतर हालचाल लेना, वरिष्ठ नागरिकों के लिए निःशुल्क सहायता नंबर जारी करना, वरिष्ठ नागरिक सुरक्षा प्रकोष्ठ का गठन करना, उनके घरों में काम करने वाले नौकरों आदि की जांच करना शामिल है। 

जो कई जोखिम कम करता है

1 अक्टूबर को विश्व शाकाहार दिवस (ॅवतसक अमहमजंतपंद कंल) मनाया जा रहा है। हम जानते हैं कि इंसान सर्वभक्षी होते हैं, मांस और शाकाहारी खाद्य पचाने की मानव क्षमता पर यह आधारित है। तर्क दिया जाता है कि शरीर रचना की दृष्टि से मनुष्य शाकाहारियों के अधिक समान हैं, क्योंकि इनकी लंबी आंत होती है, जो अन्य सर्वभक्षियों और मांसाहारियों में नहीं होती हैं। पोषण संबंधी विशेषज्ञों का मानना है कि प्रारंभिक होमिनिड्स ने तीन से चार मिलियन वर्ष पहले भारी जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप मांस खाने की प्रवृत्ति विकसित की, जब जंगल सूख गये और उनकी जगह खुले घास के मैदानों ने ले लिया, तब शिकार तथा सफाई के अवसर खुल गये।
शाकाहार की बात करें तो इसमें वे सभी चीजें शामिल हैं जो वनस्पति आधारित हैं, पेड़ पौधों से मिलती हैं एवं पशुओं से मिलने वाली चीजें जिनमें कोई प्राणी जन्म नहीं ले सकता। इसके अतिरिक्त शाकाहार में और कोई चीज शामिल नहीं है। इस परिभाषा की मदद से शाकाहार का निर्धारण किया जा सकता है। उदाहरण के लिये दूध, शहद आदि से बच्चे नहीं होते जबकि अंडे जिसे कुछ तथाकथित बुद्धजीवी शाकाहारी कहते हैं, उनसे बच्चे जन्म लेते हैं। अतः अंडे मांसाहार है। प्याज और लहसुन शाकाहार हैं किन्तु ये बदबू करते हैं अतः इन्हें खुशी के अवसरों पर प्रयोग नहीं किया जाता। आज विश्व के अन्य देशों के लोग शाकाहार के फ़ायदे जानकर इसको अपनाने लगे हैं। हमारी भारतीय संस्कृति में हमेशा से ही शाकाहार पर बल दिया गया है। शरीर पर शाकाहार के सकारात्मक परिणामों को देखते हुए दुनिया भर में लोगों ने अब माँसाहार से किनारा करना शुरू कर दिया है।
वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि शाकाहार फेफड़े और कोलोरेक्टल कैंसर के जोखिम को कम करता है। आजकल टाइप-दो मधुमेह अधिक आम होता जा रहा है और लोग मोटापे से ग्रस्त होते जा रहे हैं। इस दिशा में शाकाहार भोजन इसे रोकने के लिए काफी प्रभावी है। शाकाहार में ऐसे आहार जिसमें पानी की मात्रा अधिक होती है, उसको खाने से एंटीऑक्सीडेंट और विटामिन्स प्राप्त होते हैं जिससे हमारी त्वचा हमेशा आकर्षक बनी रहती है। यही नहीं शाकाहारी भोजन को पचाने में शरीर की कम ऊर्जा ख़्ार्च करना पड़ती है, वरना जो लोग मांसाहार खाते हैं उन्हें पशु की चर्बी में जमे प्रोटीन को पचाने में अधिक ऊर्जा ख़्ार्च करना पड़ती है। शाकाहार में साबुत अनाज और सब्जि़यों में फ़ाइबर पाया जाता है जो कि पेट की अनेक समस्याएँ ठीक करता है। अतः देखा जाए तो शाकाहार के फ़ायदे ही फ़ायदे हैं।
अमेरिकन डाएटिक एसोसिएशन और कनाडा के आहारविदों का मानना है कि जीवन के सभी चरणों में अच्छी तरह से योजनाबद्ध शाकाहारी आहार स्वास्थ्यप्रद, पर्याप्त पोषक है और कुछ बीमारियों की रोकथाम और इलाज के लिए स्वास्थ्य के फायदे प्रदान करता है। अध्ययनों से ज्ञात होता है कि मांसाहारियों की तुलना में हृदय रोग शाकाहारी पुरुषों में 30 प्रतिशत कम और शाकाहारी महिलाओं में 20 प्रतिशत कम हुआ करते हैं। सब्जियों, अनाज, बादाम आदि, सोया दूध, अंडे और डेयरी उत्पादों में शरीर के भरण-पोषण के लिए आवश्यक पोषक तत्व, प्रोटीन और अमीनो एसिड हुआ करते हैं। शाकाहारी आहार में संतृप्त वसा, कोलेस्ट्रॉल और प्राणी प्रोटीन का स्तर कम होता है और कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, मैग्नीशियम, पोटेशियम, फोलेट और विटामिन सी व ई जैसे एंटीऑक्सीडेंट तथा फाइटोकेमिकल्स का स्तर उच्चतर होता है।
शाकाहारी निम्न शारीरिक मास इंडेक्स, कोलेस्ट्रॉल का निम्न स्तर, निम्न रक्तचाप प्रवृत्त होते हैं और इनमें हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह टाइप 2, गुर्दे की बीमारी, अस्थि-सुषिरता (ऑस्टियोपोरोसिस), अल्ज़ाइमर जैसे मनोभ्रंश और अन्य बीमारियाँ कम हुआ करती हैं। ख़्ाासकर चर्बीदार भारी मांस को भोजन-नलिका, जिगर, मलाशय और फेफड़ों के कैंसर के बढ़ते ख़्ातरे के साथ सीधे तौर पर जुड़ा पाया गया है। अन्य अध्ययनों के अनुसार प्रमस्तिष्कवाहिकीय (बमतमइतवअंेबनसंत) बीमारी, पेट के कैंसर, मलाशय कैंसर, स्तन कैंसर या प्रोस्टेट कैंसर से होने वाली मृत्यु के मामले में शाकाहारी और मांसाहारियों के बीच में कोई उल्लेखनीय अंतर नहीं है। हालाँकि शाकाहारियों के नमूने कम थे और उनमें पूर्व-धूम्रपान करने वाले ऐसे लोग शामिल रहे जिन्होंने पिछले पाँच साल में अपना भोजन बदला है। सवेंथ द एडवेंटिस्ट्स के शाकाहारियों और मांसाहारियों के एक ग्रुप के बीच तुलना करने पर शाकाहारियों में अवसाद कम पाया गया और उन्हें बेहतर मूड वाला पाया गया। 

बहुत महत्वपूर्ण है पशुधन

विश्व पशु दिवस (ॅवतसक ंदपउंस कंल) का आयोजन 4 अक्टूबर को किया जाता है। लुप्तप्राय प्रजातियों की दुर्दशा उजाकर करने के लिए उपाय के रूप में इस दिवस की शुरूआत फ़्लोरेंस, इटली में पारिस्थिति विज्ञानशास्त्रियों के एक सम्मेलन में वर्ष 1931 में प्रारम्भ की गई और असीसी के सेंट फ्रांसिस के जन्मदिवस के रूप में मनाने का फैसला लिया गया।
यदि पशुधन की बात की जाए तो पशु आमतौर पर जीविका अथवा लाभ के लिए पाले जाते हैं। पशुओं को पालना (पशु-पालन) आधुनिक कृषि का एक महत्वपूर्ण भाग है। पशुपालन कई सभ्यताओं में किया जाता रहा है, यह शिकारी-संग्राहक से कृषि की ओर जीवनशैली के अवस्थांतर को दर्शाता है। पशुओं को पालने-पोसने का इतिहास सभ्यता के अवस्थांतर को दर्शाता है जहां समुदायों ने शिकारी-संग्राहक जीवनशैली से कृषि की ओर जाकर स्थिर हो जाने का निर्णय लिया। पशुओं को पालतू कहा जाता है जब उनका प्रजनन तथा जीवन अवस्थाएँ मनुष्यों के द्वारा संचालित होती हैं। समय के साथ, पशुधन का सामूहिक व्यवहार, जीवन चक्र, तथा शरीर क्रिया विज्ञान मौलिक रूप से बदल गया है। कई आधुनिक फार्म पशु अब जंगली जीवन के लिए अनुपयुक्त हो चुके हैं। कुत्तों को पूर्वी एशिया में लगभग 15ए000 वर्ष पूर्व पालतू बनाया गया था, बकरियाँ तथा भेड़ें लगभग 8000 वर्ष ई.पू। एशिया में पालतू बनायी गयी थीं। शूकर अथवा सूअर 8000 वर्ष ई.पू। पहले मध्य एशिया व चीन में पालतू बनाये गए थे। घोड़े को पालतू बनाये जाने के सबसे प्राचीन प्रमाण लगभग 4000 ई.पू। से समय से प्राप्त होते हैं।
प्राचीन अंग्रेजी स्रोत, जैसे बाइबल के किंग जेम्स संस्करण, में पशुधन को कैटल (मवेशी) द्वारा इंगित किया जाता है न कि डीयर (हिरन) के द्वारा, इस शब्द का प्रयोग ऐसे जंगली पशुओं के लिए किया जाता था जो किसी के स्वामित्व में नहीं होते थे। शब्द कैटल की उत्पत्ति मध्यकालीन अंग्रेजी शब्द चौटल से हुई है, जिसका अर्थ सभी प्रकार की व्यक्तिगत चल संपत्तियों से है, जिसमें पशुधन सम्मिलित है, तथा जो अचल भूमि-संपत्ति से अलग है (वास्तविक संपत्ति)। बाद में अंग्रेजी में, कभी-कभी छोटे पशुधन को स्माल कैटल भी कहा जाता था तथा जिसका चल-संपत्ति अथवा भूमि के अभिप्राय में प्रयोग होता था तथा जो भूमि के क्रय अथवा विक्रय किये जाने पर स्वतः ही हस्तांतरित नहीं हो जाती थी। आज, शब्द मवेशी का अर्थ, बिना किसी विशेषक के, आमतौर से पालतू गोवंशीय पशु होता है। 
यदि देखा जाए तो पशुओं के हित के लिए हमारे देश में कई ग़ैर सरकारी संगठन काम करते हैं लेकिन दशा में कोई विशेष परिवर्तन नहीं दिख रहा है। इस दिशा में काम कम और राजनीति ज़्यादा हो रही है। आज सड़कों पर एकाएक गायों की संख्या में तेज़ी से ईज़ाफ़ा हुआ है और सड़कों पर बैठी गायों को प्रतिदिन वाहन रौंद रहे हैं और मृत पशु सड़कों के आसपास सड़ांध का कारण बन रहे हैं।

तन केे साथ स्वस्थ मन

10 अक्टूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस (ॅवतसक उमदजंस ीमंसजी कंल) के रूप में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य बेहत्तर मानसिक स्वास्थ्य के लिए मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता प्रसारित एवं सहयोग प्रदान करना है। मानसिक स्वास्थ्य के लिए विश्व संघ ने वर्ष 1992 में जागरूकता दिवस स्थापित किया था और तब से विश्व भर में लोग विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मना रहे हैं। दुनिया भर में मानसिक विकार खराब स्वास्थ्य-अस्वास्थ्य और विकलांगता का प्रमुख कारण हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व स्तर पर लगभग 450 मिलियन लोग मानसिक विकार से पीडि़त हैं। विश्व में चार लोगों में से एक व्यक्ति अपने जीवन के किसी मोड़ पर मानसिक विकार या तंत्रिका संबंधी विकारों से प्रभावित होता है। भारत में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण, वर्ष 2015.16 के अनुमान के अनुसार अठारह वर्ष से अधिक आयु वर्ग के व्यक्तियों में मानसिक अस्वस्थताध्विकृति 10ण्6 प्रतिशत है। 
यदि देखा जाए तो मानसिक तनाव कोई आधुनिक समस्या नहीं है। सदियों पूर्व भी लोग मानसिक अवसादग्रस्त रहते थे। इतिहास पर दृष्टि डालें तो मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक स्कूल शिक्षिका डोरोथिया डिक्स (1808.1887) ने अपने पूरे जीवन उन लोगों की सहायता के लिए प्रचार किया जो मानसिक बीमारी से पीडि़त थे। उस दौर को मानसिक स्वच्छता आन्दोलन के रूप में जाना जाता है। 20 वीं सदी की शुरुआत में, क्लिफर्ड बीयर्स ने राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य समिति की स्थापना की और संयुक्त राज्य में प्रथम आउट पेशेंट मानसिक स्वास्थ्य क्लिनिक खोला।
आज भागदौड़ की जीवनशैली के बीच अधिकांशतः मानसिक तनाव पनपते हुए दिखाई देने लगा है। मानसिक स्वास्थ्य या तो संज्ञानात्मक अथवा भावनात्मक सलामती के स्तर का वर्णन करता है या फिर किसी मानसिक विकार की अनुपस्थिति को दर्शाता है। विलियम स्वीटज़र पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने मानसिक स्वास्थ्य को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया था, जिसे सकारात्मक मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के कार्यों के समकालीन दृष्टिकोण के अग्रदूत के रूप में देखा जा सकता है। अमेरिकी मनोरोग एसोसिएशन के तेरहवें संस्थापक इसाक रे ने मानसिक स्वास्थ्य को एक कला के रूप में परिभाषित किया है जिसका कार्य है ऐसी घटनाओं और प्रभावों के खिलाफ मस्तिष्क को संरक्षित करना जो इसकी ऊर्जा, गुणवत्ता या विकास को बाधित या नष्ट कर सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, एक स्वस्थ मानसिक संतुलन के लिए किये जाने वाले उपाय इस प्रकार होना चाहिए- शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार द्वारा, आवश्यक विश्राम द्वारा मानसिक दुरावस्था और शारीरिक विकारों को दूर किया जाना, बच्चों के प्रति ममता, सद्भाव, सहानुभूति, प्रोत्साहन और विश्वास का भाव प्रदर्शित किया जाना, व्यक्तित्व के विकास में बाधा रहित किया जाना, बच्चों में हीनभावना का निवारण करना, वंशानुगत विकारों को दूर करने के लिए विवाह तथा संतानोत्पत्ति संबंधी योजना का अनुपालन करना और पूर्णतः स्वस्थ स्त्री-पुरुषों द्वारा स्वस्थ बच्चों की उत्पत्ति पर ध्यान देना।

उद्देश्य के लिए परिपूर्ण मानक

14 अक्टूबर विश्व मानक दिवस (ॅवतसक ेजंदकंतक कंल) मनाया जाता है। किसी मानक (ैजंदकंतके) का अर्थ ऐसे दस्तावेज से होता है, जो अपेक्षाओं, विशिष्टताओं और मार्गनिर्देशों की जानकारी उपलब्ध कराता है, जिसके उपयोग से पता चलता है कि कोई सामग्री, उत्पाद, प्रक्रिया अपने उद्देश्य के लिए कितनी परिपूर्ण है।
वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के लिए मानकीकरण की आवश्यकताओं के प्रति जागरूकता के उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष 14 अक्टूबर को आईईसी (अंतर्राष्ट्रीय विद्युत तकनीकी आयोग), आईटीयू (अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ) और आईएसओ (अंतर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन) के सदस्य देशों द्वारा विश्व मानक दिवस मनाया जाता है। इस दिन अन्तर्राष्ट्रीय मानकों के रूप में स्वैच्छिक तकनीकी सहमतियां बनाने वाले विशेषज्ञों के पारस्परिक तथा सहयोगपूर्ण प्रयासों को सम्मानित किया जाता है। पहला मानक दिवस वर्ष 1970 में मनाया गया था। भारतीय मानक ब्यूरो भारत में राष्ट्रीय मानव निर्धारित करने वाली संस्था है, जिसकी स्थापना वर्ष 1947 में हुई थी।
विश्व मानक दिवस पर सभी उत्पादों में मानकों का पालन करने का आह्वान किया गया। भारतीय मानक ब्यूरो ने सभी लोगों से मानकों का पालन करने वाली वस्तुओं क उपयोग पर बल दिया जाता है। अंतरराष्ट्रीय मानक सहज और समग्र स्मार्ट शहरी विकास की सहायता करेंगे। यूँ कहें कि किसी भी स्मार्ट शहर में दी जाने वाली सेवाएँ तब तक सही मायने में स्मार्ट नहीं बन सकतीं, जब तक वहाँ दी जाने वाली सेवाओं में मानकों का पालन न किया जाए। वहीं, बीआइएस के निदेशक एसके सहाना ने बताया कि 14 अक्तूबर 1946 को 25 देशों के प्रतिनिधियों ने पहली बार एकत्र होकर विश्वस्तर पर मानकों के अनुपालन के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (आइएसओ) की स्थापना की। भारतीय मानक ब्यूरो लोगों को लगातार मानकों का पालन करने वाली वस्तुओं व सेवाओं के प्रयोग की प्रेरणा दे रहा है। साथ ही, औद्योगिक इकाइयों व अन्य निर्माताओं बीआइएस के अनुरूप कार्य करने का दबाव बना रहा है। 
 
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