सामयिक

(27/Apr/2019)

मृदा को स्वस्थ रखने की आवश्यकता 

डॉ. दिनेष मणि
 
आधुनिक खेती में खाद्यान्न फसलों की बौनीए अर्ध.बौनी व संकर किस्मों, सघन कृषि प्रणाली जैविक खादों के उपयोग में कमी, रासायनिक उर्वरकों का असंतुलित प्रयोग तथा कृषि रसायनों के अत्यधिक प्रयोग का मृदा के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। मृदा में अत्यधिक एवं असंतुलित कृषि रसायनों के प्रयोग से मृदा भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों में भी बदलाव आया है जिसका प्रभाव मृदा पर उगाई जाने वाली फसलों पर पड़ा है। निःसंदेहए उपरोक्त कारकों से कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई है लेकिन कृषि रसायनों का मृदा स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव होने से मृदा उतपादकता कम होती जा रही है। मृदा स्वास्थ्य से आशय है कि मृदा भी भौतिक रासायनिक एवं जैविक दशायें फसलोत्पादन के अनुकूल बनी रहे। टिकाऊ एवं सतत उत्पादन के लिए आवश्यक है कि भूमि को स्वस्थ बनाए रखा जाए जिससे हम वर्तमान जनसंख्या की खाद्यान्न आपूर्ति के साथ.साथ भविष्य की संततियों की आवश्यकता का भी ध्यान रखें।
प्रायः पर्यावरण प्रदूषण की चर्चा करते समय वायु प्रदूषण तथा जल प्रदूषण पर विशेष बल दिया जाता है परंतु मृदा प्रदूषण का प्रायः कम ही उल्लेख होता हैए किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि मृदा कम प्रदूषित है। मृदा प्रदूषित तो है लेकिन मृदा का स्वामी किसान अभी तक उससे अनभिज्ञ है। मृदा को वह अशुद्धियों को शुद्ध बनाने वाली तथा गंधए रंग आदि को दूर करने वाली मानता है। कुछ हद तक उसकी बात सही भी हैए किंतु अधिक अन्न उगाने के लिए मृदा में जिस प्रकार उर्वरकों एवं कीटनाशकों का प्रयोग हो रहा है और सिंचाई करने के लिए जल के जिन दूषित स्रोतों का उपयोग किया जा रहा है उससे मृदा प्रदूषित हुई है और भविष्य में उसके और अधिक प्रदूषित होने की संभावना हैए फिर भी किसान देश की बढ़ती जनसंख्या के लिए अन्नए सब्जियाँए फल.फूल उत्पन्न करने की होड़ में सभी तरह के जल का प्रयोग करने को बाध्य हुआ हैए चाहे वह शहरों का गंदा मल.जल सीवेज हो या रेगिस्तानी क्षेत्रों का खारा जल। वास्तव में सिंचाई के साधनों की कमी के कारण तथा मल.जल के सस्ता पड़ने के कारण किसान इसका उपयोग करता है, यदि इसका एक बार उपयोग करना होता तो बात दूसरी थीए किंतु दूषित जल से बार.बार सिंचाई करने से खेतों की मृदा में अनेक ऐसे पदार्थ संचित होते हैं तो अंततोगत्वा हानिकारक सिद्ध होते हैं।
मृदा एक अति महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। विकास और समृद्धि के मापदंड को तय करते समय वर्तमान समाज के भविष्य की संभावनाओं पर भी विचार किया जाना चाहिए। आज सम्पूर्ण विश्व आधुनिक कृषि पद्धति के गंभीर संकट से प्रभावित है। दोषपूर्ण कृषि क्रियाओं के कारण मृदा के स्वास्थ्य एवं उपजाऊपन में कमी, फसल उत्पादों की गुणवत्ता में कमीए वैश्विक तापन मौसम की विषमतायें एवं उत्पादकता में कमी जैसी समस्यायें सामने आ रही हैं। साथ ही खेती में कृषि रसायनों के अत्यधिक इस्तेमाल से वायुए जल और मृदा प्रदूषण में लगातार वृद्धि हो रही हैए जिसके परिणाम स्वरूप मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
फसलोत्पादन की वृद्धि से सम्बन्धित समस्याएं सर्वत्र विद्यमान हैं। सामान्यतया अच्छी मृदाएं उन देशों में नहीं हैं जिन देशों की जनसंख्या बहुत अधिक है, किन्तु वहाँ उनकी अत्यधिक आवश्यकता है। हरित क्रांति के साथ फसल उत्पादकता में जो वृद्धि हुईए वह अब स्थिर सी हो गई है। सघन खेती के परिणाम स्वरूप उत्पन्न पर्यावरणीय समस्याओं, प्रभावों ने अनेक देशों की उपलब्धियों को शिथिल किया है। पेयजल में नाइट्रेट एवं खाद्य पदार्थों में जीवनाशी अवशेषों की संभावित विद्यमानता जन समुदाय के लिए समस्या बन गई है और वे आधुनिक खेती पर प्रश्न चिह्न बनने लगी है।
सम्पूर्ण विश्व पर्यावरण तथा प्राकृतिक संसाधनों के खतरों को लेकर विशेषकर मृदा तथा जल को लेकर चिंतित है। जो प्रौद्योगिकी पहली दृष्टि में वरदान सिद्ध हुईए वही अब एक प्रकार की विडम्बना को जन्म दे चुकी है। इसने जीवन स्तर को सुधारा किन्तु पर्यावरण की गुणवत्ता में कमी स्पष्ट दिख रही है। किसानों के लिए सिंचाई वरदान प्रतीत हुई जब उसके अनुपजाऊ खेत लहलहाने लगे किन्तु वही सिंचाई कालांतर में अभिशाप बन गई जब चारों ओर ऊसर ही ऊसर बन गए। इसी तरह उर्वरकों तथा पीड़कनाशियों के आने से जहाँ कृषीय उपज में आशातीत वृद्धि हुईए वहीं इनके निरंतर उपयोग ने खतरा उत्पन्न कर दिया। जनसंख्या की बेतहाशा वृद्धि ने मृदा के अधिकाधिक उपयोग के लिए प्रेरित कियाए जिससे मृदा का ह्रास होना शुरू हुआ। आधुनिक कृषि निवेशमयी और प्रौद्योगिकी मय है जिसके फलस्वरूप मृदा आमजन की चिन्ता का विषय बन चुकी है।
पृथ्वी को अन्नपूर्णा कहा गया हैए पृथ्वी की अनेक प्रकार से स्तुतियां की गई हैं और हमारे पूर्वजों ने ध्यान रखा था कि पृथ्वी से उतना ही लिया जाए जितने की आवश्यकता है, उसका अतिदोहन न हो, किन्तु वर्तमान युग में, विशेषकर औद्योगीकरण के फलस्वरूप पृथ्वी के समस्त संसाधनों का निर्ममतापूर्वक दोहन हुआ है। खानों का कोयलाए खनिज सभी अन्तिम सांसें ले रहे हैं। प्रगति के दौर में प्लास्टिक जैसी सामग्री का आविष्कार करके वैज्ञानिकों ने जनता के उपयोग हेतु ऐसा पदार्थ प्रदान किया हैए जिसका अपशिष्ट सदियों तक विघटित न होकर मृदा के पृष्ठ पर पड़ा रह सकता है। स्थिति गंभीर हो चुकी है। जिस तरह पूरे विश्व में नाभिकीय ऊर्जा प्राप्त करने के लिए रिएक्टर लगाए जा रहे हैंए उनके क्षतिग्रस्त होने पर प्रचुर रेडियोधर्मिता चतुर्दिक पर्यावरण को प्रदूषित करती हैए रेडियोएक्टिव धूल में 90sr आइसोटोप रहते हैंए जो पृथ्वी पर धूल के गिरने पर मृदा के कणों से बंध जाते हैं और धीरे.धीरे वनस्पतियों द्वारा अवशोषित होकर पशुओं के शरीर के भीतर पहुँचकर उन्हें रोगग्रस्त कर देते हैं। यह देखा गया है कि 90sr का उद्ग्रहण चूना डाली गई मृदा की तुलना में अम्लीय मृदाओं में ज्यादा होता है।
इस तरह मृदा पर चतुर्दिक मार पड़ी रही है. वायुए जलए रसायनए सबों ने उसे विषाक्त बना दिया है। ऐसा नहीं है कि रूग्ण मृदा स्वस्थ नहीं बन सकती हैए किन्तु इसके लिए विशेष उपचार. दीर्घकालीन प्रबंधन की आवश्यकता होगी। मृदा को रूग्ण रहने भी नहीं दिया जा सकता। उसी से राष्ट्र की जनसंख्या की उदर पूर्ति भी होनी है। अतः मृदा स्वास्थ्य के प्रति सतर्कता की आवश्यकता है। आधुनिक सभ्यता. ष्इस्तेमाल करो और फेंकोष् के कारण मृदा पर सभी प्रकार का प्रदूषण बढ़ा है। उस पर अथाह कूड़ा कचरा लादा जा रहा हैए उसके जल स्रोतों को विषाक्त बनाया जा रहा है। ष्जिओ और जीने दोष् के मंत्र को अपनाये बिना मृदा स्वस्थ नहीं रह सकती और यदि मृदा स्वस्थ नहीं होगी तो वह अपने राष्ट्रवासियों की उदरपूर्ति नहीं कर पायेंगी। मृदा के जीव.जन्तु हमारी ही तरह सांस लेते और जल का उपयोग करते हैं। जलवायु तथा जल दोनों ही प्रदूषित हो चुके हों तो स्वस्थ पादप जीवन या सूक्ष्मजीवों के जीवित रहने की आशा करना व्यर्थ है। स्पष्ट है कि मृदा अस्वस्थ हो चुकी है या हो रही है।
मृदा स्वास्थ्य का एक अन्य पक्ष मृदा का अपरदन भी है। मृदा शैलों के अपक्षय से बनती हैए उसके पूर्ण विकास में हजारों वर्ष लग जाते हैं किन्तु अपरदन एक ऐसा रोग है जिससे मृदा की ऊपरी सतह का इतनी तेजी से निक्षालन होता है जिससे मृदा के सूक्ष्म कण बह जाते हैं और मृदा धीरे.धीरे अनुर्वर हो जाती है। यह भी मृदा रूग्णता ही है। मृदा स्वास्थ्य का अर्थ मृदा में पर्याप्त वातन होनाए उसमें पर्याप्त जल होना तथा पोषक तत्वों का यथेष्ट मात्रा में विद्यमान होना। आज जब वायुमंडल प्रदूषित है तो यह सम्भव नहीं है कि मृदा वायु दूषित न हुई हो क्योंकि वाह्य वायुमंडल से मृदा वायु का निरन्तर आदान.प्रदान होता रहता हैए जिस गति से औद्योगीकरण हुआ हैए उसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम हुआ हैए वायु में कार्बन डाई ऑक्साइड के अलावा सल्फर डाई ऑक्साइडए नाइट्रोजन के ऑक्साइड जैसी विषैली गैसों में वृद्धि। मृदा वायु में पहले से कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा अधिक रहती है जो कभी.कभी पौधों के लिए विषाक्त बन जाती है। वायुमंडल की इन विषैली गैसों के मृदा वायु में सम्मिलित हो जाने से मृदा जीवाणु बुरी तरह से प्रभावित हो सकते हैं।
जल को जीवन कहा गया हैए मृदा जल भी पौधों तथा सूक्ष्म जीवों के लिए उतना ही आवश्यक है जितना मनुष्य के लिए प्राकृतिक जल। चूँकि इस समय पृथ्वी की सतह पर का जल ही नहीं भौम जल भी बुरी तरह से विषैली मात्रा में यौगिकों से युक्त है अतः पेड़.पौधों को उस विषाक्त जल पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
मृदा को स्वच्छ एवं स्वस्थ रखने में मृदा सूक्ष्मजीवों की महती भूमिका है। बहुत हद तक ये मृदा में प्रविष्ट होने वाले कार्बनिक अपशिष्टों का विघटन करके उपयोगी पोषण तैयार करते हैं किन्तु अब ऐसे औद्योगिक या रासायनिक अपशिष्टों को मृदा में इतनी बड़ी मात्रा में डाला जा रहा है कि सूक्ष्मजीव इसे विघटित करने में असमर्थ हैं। स्पष्ट है मृदाएं धीरे.धीरे रूग्ण बनती जा रही हैं। सभ्य मानव को अपनी रूग्णता की ज्यादा परवाह हैए मृदा रूग्णता के विषय में वह सोच भी नहीं पा रहा हैए ऐसी विषम स्थिति में मृदाओं का विशेषकर महानगरों के आसपास की मृदाओं का बुरी तरह से प्रदूषित हो कर रूग्ण या अस्वस्थ होना कोई बड़ी बात नहीं होगी। भविष्य में कृषि भूमि के क्षेत्रफल के बढ़ने की संभावना नगण्य है। अतः फसल उत्पादन में और अधिक वृद्धि प्राकृतिक संसाधनों जैसे मृदा एवं जल तथा कृषि उपादानों के बेहतर प्रबंधन द्वारा ही संभव है। यदि मृदा के प्रदूषण नियंत्रण तथा प्रबंधन पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में भुखमरीए कुपोषण और कुपोषणजनित बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है।
मृदा में कृषि रसायनों के अत्यधिक एवं असंतुलित इस्तेमाल से मृदा के भौतिक रासायनिक एवं जैविक गुणों में बदलाव आया हैए जिसका प्रभाव ऐसी मृदा में उगाई जाने वाली फसलों पर पड़ा है। निःसंदेहए इन कृषि रसायनों के इस्तेमाल से कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई है लेकिन मृदा स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ने से मृदा उत्पादकता कम होती जा रही है। मृदा स्वास्थ्य से आशय है कि मृदा की भौतिकए रासायनिक एवं जैविक दशायें सतत फसलोत्पादन के अनुकूल बनी रहें। सतत उत्पादन के लिए आवश्यक है कि मृदा को स्वस्थ बनाये रखा जाय जिससे हम वर्तमान की जनसंख्या की खाद्यान्न आपूर्ति के साथ.साथ भविष्य की संततियों की आवश्यकता को भी पूरा करने में सक्षम हो सकें।
 
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