सामयिक

(16/Mar/2019)

जलवायु परिवर्तन समस्या और समाधान

डॉ. दिनेष मणि
 
 
आज विश्वस्तरीय जलवायु परिवर्तन से सम्पूर्ण विश्व चिंतित है, शहरों के तेज गति से फैलाव से उसका असर और गहरा हो रहा है। विशेषकर भारत के सभी महानगर एवं छोटे शहर भी शहरीकरण से प्रभावित होते दिखाई दे रहे हैं। जलवायु परिवर्तन से सागर के किनारों पर बसे महानगरों में बाढ़ का खतरा हमेशा बना रहता है, ऋतु में बदलाव के कारण तापमान में वृद्धि हो रही है, जिससे ग्लेशियर पिघल रहे हैं तथा महासागरीय जल स्तर में वृद्धि हो रही है।
पृथ्वी के उद्भव से लेकर आज तक इसमें निरंतर परिवर्तन हो रहा है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। यह कभी तीव्र तो कभी मंद गति से होता है। कुछ परिवर्तन लाभकारी होते हैं, तो कुछ हानिकारक। स्मरण रहे, मानव पर प्रभाव डालने वाले तत्वों में जलवायु सर्वाधिक और प्रभावशाली है, क्योंकि यह पर्यावरण के अन्य कारकों को भी नियंत्रित करता है। सभ्यता के आरम्भ और उद्भव में जहाँ तक आर्थिक विकास का सम्बन्ध रहा है, जलवायु एक शक्तिशाली तत्व है।
मौसम के प्रमुख तत्वों- वायुदाब, तापमान, आर्द्रता, वर्षा तथा सौर प्रकाश की लम्बी अवधि के औसतीकरण (तीस वर्ष या अधिक)को उस स्थान की जलवायु कहते हैं, जो उस स्थान की भौगोलिक स्थिति (अक्षांश एवं ऊंचाई), सौर प्रकाश, ऊष्मा, हवाएं, वायुराशि, जल थल के आवंटन, पर्वत, महासागरीय धाराओं, निम्न तथा उच्च दाब पट्टियों, अवदाब एवं तूफान द्वारा नियंत्रित होती है।
करोड़ों वर्षों पूर्व जब पृथ्वी का निर्माण हुआ था, तब वह एक तपता हुआ गोला थी। धीरे-धीरे उस तपते हुए गोले से सागर, महाद्वीपों आदि का निर्माण हुआ। साथ ही पृथ्वी पर अनुकूल जलवायु ने मानव जीवन तथा अन्य जीव सृष्टि को जीवन दिया जिसमें तरह-तरह के जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, विभिन्न वनस्पतियाँ और इन सबका जीवन-जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, विभिन्न वनस्पतियाँ और इन सबका जीवन-अस्तित्व कायम रखने वाली प्रकृति का निर्माण हुआ। जलवायु पर्यावरण को विभिन्न प्रकार से प्रभावित करती है। प्राकृतिक वनस्पतियाँ, जीव-जन्तु तथा मनुष्य के कार्य कलाप पूर्णतः जलवायु की अवस्था पर ही निर्भर करते हैं। जिन फसलों से मनुष्य को भोजन प्राप्त होता है वे सभी अलग-अलग प्रकार की जलवायु पर निर्भर होती है। प्रत्येक फसल के लिये उचित तापमान, पर्याप्त वर्षा, धूप, मिट्टी मे उपलब्ध नमी आदि का पर्याप्त मात्रा में होना आवश्यक है। जलवायु के आधार पर ही प्राकृतिक वनस्पतियों का निर्धारण होता है, और इस पर ही मानव जीवन निर्भर करता है।
मनुष्य जीवन के प्रारम्भ में जल निर्मल था, वायु स्वच्छ थी, भूमि शुद्ध थी एवं मनुष्य के विचार भी शुद्ध थे। हरी-भरी इस प्रकृति में सभी जीव-जंतु तथा पेड़-पौधे बड़ी स्वच्छंदता से पनपते थे। चारों दिशाओं में ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ का वातावरण था, तथा प्रकृति भली-भांति पूर्णतः संतुलित थी। किन्तु जैसे-जैसे समय बीता, मानव ने विकास किया और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु उसने शुद्ध जल, शुद्ध वायु तथा अन्य नैसर्गिक संसाधनों का भरपूर उपभोग किया है। मनुष्य की हर आवश्यकता का समाधान निसर्ग ने किया, किन्तु बदले में मनुष्य ने प्रदूषण जैसी कभी भी खत्म न होने वाली समस्या पैदा कर दी है। जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, भूमि प्रदूषण, औद्योगिक प्रदूषण, विकिरण प्रदूषण रूपी दैत्यों ने पृथ्वी की जलवायु को पूर्णतः बदल दिया है। 
दुनिया भर में कहीं सुनामी की मार तो कहीं तूफान का कहर, कहीं खूब बारिश तो कहीं वर्षा के लिए हाहाकार, खाड़ी की बर्फबारी, स्पेन में शोलों की बारिश- इन सभी को जलवायु परिवर्तन की ही देन माना जा रहा है तथा सृष्टि के विनाश की ओर बढ़ते कदम अर्थात् महाप्रलय के रूप में देखा जा रहा है।
 
वैश्विक तापन और जलवायु परिवर्तन में अन्तर
प्रायः वैश्विक तापन और जलवायु परिवर्तन का एक ही अर्थ लगाया जाता है, परन्तु वास्तव में दोनों ही क्रियाएं अलग-अलग है। कार्बन डाई ऑक्साइड एवं कुछ अन्य गैसों की वायुमंडल में तेजी से वृद्धि हो रही है, जो सूर्य से आने वाली विकिरणों का अवशोषण कर लेती है और उन्हें वायुमण्डलीय परत के बाहर नहीं जाने देती हैं जिसके परिणामस्वरूप वायुमंडल के औसत तापमान में तेजी से वृद्धि हो रही है। इस क्रिया को वैश्विक तापन कहते हैं। दूसरी ओर वैश्विक तापन के कारण पृथ्वी के मौसम में असाधारण बदलाव हो रहा है, जैसे अतिवृष्टि, सूखा, बाढ़, धूल भरे तूफान, इत्यादि जिसे जलवायु परिवर्तन कहा जाता है।
जलवायु किसी स्थान के दीर्घकालीन वातावरण की दशा को व्यक्त करती है। जलवायु परिवर्तन के कारण अनेक पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकीय समस्यायें उत्पन्न हो रही है जिनका प्रभाव जनजीवन एवं सम्पूर्ण मानवता पर पड़ रहा है। विकास की दौड़ में हम यह भूल गए हैं कि हमारा भविष्य पर्यावरण अनुरक्षण पर निर्भर करता है।
किसी स्थान विशेष की औसत मौसमी दशाओं को जलवायु कहा जाता है, जबकि किसी स्थान विशेष की दैनिक वायुमण्डलीय दशाओं को मौसम कहा जाता है। इस तरह किसी स्थान की जलवायु एक तत्व से नहीं अपितु कई तत्वों द्वारा निर्धारित होती है। यथा- वर्षा, तापक्रम, आर्द्रता, आदि। इन सभी जलवायु तत्वों की मात्रा गहनता एवं वितरण में ऋतु अनुसार महत्वपूर्ण परिवर्तन होते रहते हैं। चूँकि धरातल पर एक क्षेत्र की मौसमी दशाएं दूसरे स्थान की मौसमी दशाओं से भिन्न होती है अतः एक क्षेत्र की जलवायु दूसरे क्षेत्र की जलवायु से पूर्णतया भिन्न होती है, इसीलिए जितने स्थल होंगे उतने प्रकार की जलवायु का वर्गीकरण सरल नहीं है।
इसी तरह कोई ऐसा निश्चित मापदण्ड नहीं है जिसके आधार पर एक निश्चित रेखा द्वारा धरातल पर जलवायु प्रदेशों का निर्धारण हो सके, क्योंकि एक सीमा के बाद अग्रसर होने पर एक जलवायु प्रदेश के लक्षण समाप्त होने लगते हैं, जबकि दूसरे जलवायु प्रदेश के लक्षण शुरू हो जाते हैं। इसलिए दो जलवायु प्रदेशों के बीच एक संक्रमण जलवायु क्षेत्र भी पाया जाता है। वस्तुतः जलवायु प्रदेश का निर्धारण कुछ विशेष उद्देश्यों के लिए ही संतोषजनक एवं उचित होता है।
मौसम भले क्षण-क्षण बदले किन्तु जलवायु बदलने में हजारों क्या लाखों वर्ष लग जाते हैं। इसलिए जब मौसम की बात चलती है तो हम उतने चौकन्ने नहीं होते जितने कि बदलती जलवायु को लेकर। जलवायु किसी जीवधारी के समूचे वंश को प्रभावित कर सकती है और जलवायु में होने वाले परिवर्तन जीव-जन्तुओं के समूचे वंशों को समाप्त कर सकते हैं।
किसी स्थान का मौसम ही अन्ततः उस स्थान या क्षेत्र की जलवायु का निर्माण करता है। वैसे जलवायु परिवर्तन कोई नवीन घटना नहीं है। प्रकृति में ऐसे परिवर्तन लाखों वर्षों से होते रहे है, जिनकी अब स्मृति ही शेष है, किन्तु ये परिवर्तन यह बताते हैं कि प्रकृति के ऊपर किसी का वश नहीं है उसकी अपनी कार्य शैली है। वह सदय भी है और क्रूर भी।
जलवायु को नियंत्रित करने वाले दो प्रमुख कारक होते हैं- ताप तथा वर्षा। ताप का स्रोत सूर्य है। सूर्य पृथ्वी से अनन्त दूरी पर है किन्तु वह पृथ्वी को अपने विकिरणों से कभी तप्त बनाता है तो कभी शीतल।
वर्षा भी सूर्य के द्वारा नियंत्रित होती है। सूर्य के आतप से पृथ्वी के तीन चौथाई भाग में फैले महासागर जब गर्म होते हैं तो उनका पानी वाष्प बनकर वायुमण्डल में बादल के रूप में मंडरा कर वर्षा करता है। वर्षा के कारण पृथ्वी के ताप में कमी आती है।
भारत की जलवायु मानसूनी वर्षा से व्यापक रूप से प्रभावित होती है। मानसून से बहुतेरे लोगों पर प्रभाव पड़ता है। भारतीय कृषि मुख्यतः मानसून पर ही निर्भर होती है। मानसून के आने में कुछ दिनों की देरी से देश की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव की आशंका बनी रहती है। अच्छी वर्षा का सीधा संबंध अर्थव्यवस्था की बेहतरी से होता है। कमजोर मानसून अथवा वर्षा का अभाव अर्थात सूखा, कृषि को चौपट कर देता हे। इससे न केवल देश में खाद्यान्न और अन्य खाद्य पदार्थों का अभाव पैदा हो जाता है बल्कि हमारा आर्थिक विकास भी बाधित होता है।
भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून वैश्विक जलवायु तंत्र का एक प्रमुख घटक है। भारत में हर साल जितनी वर्षा होती है उसका अधिकांश भाग दक्षिण पश्चिम (ग्रीष्मकालीन) मानसून से आता है जो जून से सितम्बर के बीच पड़ता है। साल-दर-साल इनमें तरह-तरह की विभिन्नता (यानी मानक विभिन्नता) दिखाई देती है। इसी का नतीजा है कि अखिल भारतीय स्तर पर ग्रीष्मकालीन मानूसन की वर्षा कुल औसत लगभग 89 संेटीमीटर के दस प्रतिशत के बराबर है। ऐतिहासिक रिकार्ड से साबित होता है कि 68 प्रतिशत से अधिक मानसून सामान्य रहने के आसार कम होते है। लेकिन अगर इसमें दस प्रतिशत की कमी हुई तो अनावृष्टि (अकाल) हो सकता है।
 
वायुमण्डल और जलवायु
पृथ्वी का वायुमण्डल ही पृथ्वी के तापमान को एक सीमा के भीतर बनाये रखने के लिए जिम्मेदार है। यदि पृथ्वी का वायुमण्डल नहीं होता तो पृथ्वी का तापमान बहुत कम होता और पृथ्वी पर बर्फ ही बर्फ होती। तब तरल रूप में पानी भी न होता। इसका अर्थ यही हुआ कि पृथ्वी पर किसी प्रकार के जीवन की सम्भावना भी नहीं रहती। पृथ्वी के वायुमण्डल में कई ऐसे पदार्थ हैं जो सूर्य से पृथ्वी की ओर आने वाली ऊर्जा को आसानी से आने देते हैं, फलतः इस ऊर्जा से पृथ्वी पर की सारी वस्तुएं गरम होती रहती हैं। फिर वे वस्तुएं तापीय ऊर्जा उत्सर्जित करती हैं। यह ऊर्जा मुख्यतः अवरक्त विकिरण के रूप में होती है।
 
समुद्र और जलवायु
समुद्र उष्मा को संचित करके उसे पृथ्वी के चारों ओर गतिमान करते हैं। इस तरह वे जलवायु को रूप देते हैं। समुद्र गैसों के विशेष रूप से कार्बन डाई ऑक्साइड के प्रमुख स्रोत होने के साथ ही संग्रह भी हैं। यह कार्बन डाई ऑक्साइड जलवायु को प्रभावित करती है। वस्तुतः समुद्र तथा वायुमण्डल मिलकर पृथ्वी के जलवायु तंत्र की रचना करते है। पृथ्वी समुद्रों की अपेक्षा जल्दी गर्म और जल्दी ठंडी हो जाती है, किन्तु समुद्र दीर्घकाल तक उष्मा ग्रहण करते हैं और संचित उष्मा को दीर्घकाल तक बाहर निकालते रहते हैं। अतः जब पृथ्वी की सतह सूर्य द्वारा गरमाती है या ठंडी होती है तो पृथ्वी पर ताप परिवर्तन समुद्रों की अपेक्षा ज्यादा और अधिक तेजी से होता है।
जब समुद्र का कोई भाग अधिक गर्म या शीतल हो जाता है, तो उसे पृथ्वी की अपेक्षा सामान्य स्थिति पर पहुँचने में काफी समय लगता है। यही कारण है कि समुद्र तटों पर जलवायु उतनी तीक्ष्ण नहीं होती जितनी कि भीतरी भू-भाग में महाद्वीपी क्षेत्रों में।
सौर ऊर्जा, पादप प्रजातियों या वायुमण्डल में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से वायुमण्डल, समुद्री तन्त्र का ताप तथा परिसंचारण पैटर्न बदलता है। समुद्री धाराएं भी तटीय क्षेत्रों की जलवायु पर प्रभाव डालती हैं। समुद्रों का जल प्रबल धाराओं के द्वारा निरंतर गतिशील बना रहता है। सतही धाराएं पवन प्रेरित होती हैं, यद्यपि पृथ्वी के परिभ्रमण तथा महाद्वीपों की उपस्थिति का भी प्रभाव पड़ता है। किन्तु समुद्र की गहराइयों में उष्मन तथा शीतलन एवं वर्षा तथा वाष्पन के कारण, घनत्व में अन्तर के कारण धाराएं चलती हैं।
सागरीय धाराएं उष्मा का वहन करके जलवायु को प्रभावित करती हैं। क्षैतिज धाराएं जो उत्तर से दक्षिण की दिशा में गति करती है, वे उष्ण या शीतल जल को हजारों किलोमीटर दूर तक ले जाती है। इस तरह विस्थापित जलवायु को गर्म या ठंडा करके उस भूभाग को भी ठंडा या गर्म कर सकता है, जिसके ऊपर यह वायु चलती है।
 
जलवायु पर अक्षांश का प्रभाव
अक्षांश अर्थात् विषुवत रेखा से दूरी का किसी स्थान की जलवायु पर प्रभाव पड़ता है। जो स्थान विषुवत रेखा के जितना निकट होगा, वह उतना ही गर्म होगा जो स्थान विषुवत रेखा से जितनी अधिक दूरी पर होगा, वह उतना ही ठंडा होगा। यही कारण है कि ध्रुवों की जलवायु अत्यधिक ठंडी होती है। किन्तु अक्षांश के अलावा समुद्र तल से ऊँचाई समुद्र से निकटता तथा वानस्पतिक आच्छादन का भी जलवायु पर प्रभाव पड़ता है। हम जितनी ही ऊँचाई पर जाते हैं, ताप घटता जाता है। ऐसा अनुमान है कि ऊँचाई में सौ मीटर की वृद्धि से ताप छः डिग्री से। की कमी आती है, इसीलिए विषुवत रेखा के निकट तमिलनाडु में जलवायु उष्ण कटिबंधीय है- गर्म तथा नम होती है किन्तु यदि हम किसी पहाड़ी स्थान पर चले जायं तो जलवायु ठंडी तथा सुहावनी होगी। किन्तु इसके अपवाद भी हैं जैसे लद्दाख जो अत्यधिक ऊँचाई पर स्थित है, किन्तु यहां पर ग्रीष्म ऋतु गर्म रहती है- कारण कि यह प्लेटो पर स्थित है- सूर्य की ऊर्जा ताप को बढ़ाती है, किन्तु रातें ठंडी होती हैं।
वैश्विक तापन एवं मानसून वर्षा
वायु के तापमान में वृद्धि होने से उसकी आर्द्रता धारण करने की क्षमता में वृद्धि होती है, जिससे वायु पहले की तुलना में अधिक जलवाष्प को धारण कर लेती है, दक्षिण-पश्चिम मानसून सागरों के ऊपर से आती है जहां ग्रहण करने के लिए पर्याप्त जलवाष्प होती है। अधिक जल धारण करने की क्षमता एवं अधिक जल की उपलब्धता अधिक वर्षा की संभावनाओं को बढ़ा देती है। यदि अनुकूल वर्षा दशाएं उपलब्ध हों तो अधिक जलवाष्प युक्त हवाएं असाधारण रूप से अधिक वर्षा कर देती हैं।
जलवायु परिवर्तन किसी अचानक आई विपदा की भांति प्रभावी न होकर धीरे-धीरे पृथ्वी और यहाँ रहने वाले जीवों के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अनेक समस्याओं को जन्म देती है। जलवायु परिवर्तन का आशय तापमान, बारिश, हवा, नमी जैसे जलवायुवीय घटकों में दीर्घकाल के दौरान होने वाले परिवर्तनों से है। जलवायु परिवर्तन का तात्पर्य उन बदलावों से है जिन्हें हम लगातार अनुभव कर रहे हैं।
अब इस बात में कोई दो राय नहीं रह है कि जलवायु में बदलाव हो रहा है और मानवीय गतिविधियाँ इसका एक कारण हैं। आज उन संकेतों को झुठलाना संभव नहीं है जो हमारी पृथ्वी की बेचैनी को व्यक्त कर रहे हैं। आईपीसीसी (इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज) सहित अनेक वैश्विक संस्थाओं की रिपोर्टों ने जलवायु परिवर्तन की पुष्टि की है। इस रिपोर्ट से यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो चुकी है कि पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ता जा रहा है। सन् 1961 तथा 1990 के बीच पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 14 डिग्री सेल्सियस था। वर्ष 1998 में यह 0ण्52 डिग्री सेल्सियस अधिक यानी 14ण्52 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था। जलवायु बदलाव का वैश्विक संकट लगातार बढ़ रहा है।
निश्चित तौर पर, हम पिछले किसी भी कालखंड की तुलना में एक बेहतर व भौतिकतावादी दुनिया में रहते हैं लेकिन यह नई दुनिया हमें पर्यावरण के दोहन की कीमत पर मिली है। यह विडंबना ही है कि जब मानव समाज विकसित नहीं था तब पर्यावरण प्रदूषित नहीं था और आज हम विकास की ओर कदम बढ़ा रहे हैं तो पर्यावरण भी दिनोंदिन प्रदूषित होता जा रहा है। इस समय विकसित देशों की चमक और उनकी उपभोक्तावादी दृष्टिकोण को अपनाने की होड़ में, प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ने लगा है जिससे समस्त पर्यावरण प्रभावित हो रहा है। वास्तव में विकास बुरा नहीं लेकिन उसके हित अपनाए जाने वाला तरीका पर्यावरण हितैषी नहीं है। इसलिए मानव को प्रकृति के दोहन करने की नीतियों को बदलना होगा तभी वह जलवायु परिवर्तन की समस्या से उभर सकेगा।
 
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