ऐतिहासिक पृष्ठ

(23/Mar/2019)

भारत का अंतरिक्ष युग में प्रवेश

शुकदेव प्रसाद
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
‘यदि हमें विकसित, उन्नत राष्ट्रों के मुकाबले उनके सामने आना है, तो हमें बैलगाड़ी को रफ्तार देनी होगी। वस्तुतः धरती के संसाधनों एवं बाह्य अंतरिक्ष के सामान्य एवं व्यापक उपयोगों हेतु हमें अंतरिक्ष प्रौद्यौगिकी में दक्षता प्राप्त करनी ही होगी, अन्यथा हम पीछे रह जाएंगे।’
- डॉ.विक्रम साराभाई
 
भारत में अंतरिक्ष युग के प्रणेता महान विज्ञानी स्व। डॉ। साराभाई का दृढ़ विश्वास था कि आर्थिक तथा सामाजिक प्रगति के इच्छुक विकासोन्मुख देशों के लिए बाह्य अंतरिक्ष के अनेक उपयोग अत्यंत लाभदायक हो सकते हैं। तभी तो उन्होंने थुंबा और श्रीहरिकोटा में राकेटों के प्रक्षेपण केंद्र खोले और राकेटों के विकास पर जोर दिया।
20 नवम्बर, 1967 को भारत ने अंतरिक्ष संबंधी प्रयोगों की दुनिया में प्रवेश किया। थुंबा केंद्र से मात्र 75 मिलीमीटर व्यास वाले अपने सर्वप्रथम एक चरणीय राकेट ‘रोहिणी-75’ का सफल प्रक्षेपण किया गया। यों उस समय इसे खिलौना कह कर इसका मखौल उड़ाया गया था। पर जब त्भ्.75 ने आशातीत परिणाम प्रदर्शित किये तो सभी ने एक स्वर से स्वीकारा कि मात्र आकार ही सब कुछ नहीं है। प्रश्न यह है की तकनीकी रूप से दक्षता प्राप्त कर ली गई है अथवा नहीं। और वह भारत ने प्राप्त कर ली थी।
इस अनुभव के बाद डॉ। साराभाई ने रोहिणी राकेट की विकास शृंखला में RH-100, RH-125, RH-200 एवं RH-300 जैसे राकेटों के विकास का सपना देखा। इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने अपने सिखाये हुए युवा विशेषज्ञों को विभिन्न कामों में लगा दिया। सभी ने अपने दायित्व संभाले और समय पर रोहिणी शृंखला के उपर्युक्त राकेटों का विकास हुआ।
इतना ही नहीं ‘मेनका-1’ और ‘मेनका-2’ तथा ‘सेंतोर’ और RH-560 का विकास किया गया और धीरे-धीरे हमने विकास की कई मंजिलें पार कर लीं।
अंतरिक्ष विज्ञान प्रौद्यौगिकी केंद्र (अब विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र) की डायरी से इस बात का आभास मिलता है कि 1968 में ही 38-40 किलोग्राम भार के भारतीय उपग्रह ‘रोहिणी’ को धरती की लगभग 400 किमी की वृत्तीय कक्षा में स्थापना हेतु उपग्रह प्रक्षेपण राकेट के विकास की बातें सोची जा रही थीं और इस दिशा में यत्न भी किये जा रहे थे, लेकिन प्रायः इसी काल में डॉ। साराभाई ने यह अनुभव कर लिया था की यदि हम भारतीय राकेट तकनीक पर आधारित कृत्रिम उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ने का विचार करेंगे तो इस कार्य में किंचित विलम्ब होने की सम्भावना है अतः उन्होंने यह निर्णय लिया कि क्यों न हम भारतीय उपग्रह दूसरे देशों के सहयोग से अंतरिक्ष में छोड़ें और साथ ही शक्तिशाली राकेट बनाने की दिशा में तेजी से अनुसंधान कार्य किये जायें।
विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, त्रिवेंद्रम में उपग्रह प्रणाली प्रभाग के प्रमुख डॉ.यू.आर.राव के शब्दों में ‘उपग्रहों की उपयोगिता को देखते हुए यह निश्चय किया गया कि तत्कालीन जितनी जल्दी हो सके, हमें उपग्रह निर्माण की दिशा में सक्षम होना चाहिए और इसीलिए जब सोवियत संघ ने भारतीय उपग्रह को अंतरिक्ष में पहुँचाने की रुचि दिखलाई तो हमने उसका स्वागत किया।’
 
सोवियत संघ का दोस्ती भरा हाथ
दरअसल इस कार्य में सोवियत संघ में भारत के राजदूत श्री दुर्गा प्रसाद धर (अब स्वर्गीय) की भी अहम भूमिका थी। शीघ्र ही डॉ। साराभाई और सोवियत संघ के दिल्ली स्थित राजदूत श्री पेगोव के बीच भारत के भावी उपग्रह (जिसका नामकरण आगे चलकर ‘आर्यभट’ किया गया) के निर्माण और प्रक्षेपण संबंधी बुनियादी बातचीत हुई। शुरुआत अच्छी हुई और उसका परिणाम यह रहा की डॉ। साराभाई ने 9 अगस्त 1971 को भारतीय वैज्ञानिकों का एक प्रतिनिधि मंडल मास्को भेजा। इस प्रतिनिधि मंडल (श्री एच.जी.एस.मूर्ति, प्रो.यू.आर.राव, प्रो.सत्य प्रकाश, डॉ.कुलकर्णी) ने सोवियत संघ की विज्ञान अकादमी से विचार विमर्श करके निर्णय लिया की भारत में डिजाइन्ड और निर्मित उपग्रह को सोवियत कास्मोड्रोम से सोवियत राकेट से, अंतरिक्ष में छोड़ा जाये।
इसी बीच दिसंबर 1971 में डॉ। साराभाई का निधन हो गया। फिर डॉ.एम.जी। के.मेनन को ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन’ की जिम्मेदारी सौंपी गयी। डॉ। साराभाई के निधन से इस कार्य में थोड़ी शिथिलता तो जरूर आई थी लेकिन युवा वैज्ञानिकों ने डॉ। साराभाई के छोड़े गए कार्यों को पूरा करने का संकल्प लिया तो फिर काम तेजी से आगे बढ़ गया। फरवरी, 1972 में प्रो.मिलोगिन के नेतृत्व में सोवियत एकेडमी ऑफ साइंसेज का एक प्रतिनिधि मंडल त्रिवेंद्रम आया और यहाँ प्रतिनिधि मंडल ने प्रो.यू.आर.राव तथा उनकी टोली के विशेषज्ञों से उपग्रह निर्माण के तकनीकी मुद्दे पर विचार विमर्श किया और यह तय पाया गया कि भारत का पहला और बड़ा कृत्रिम उपग्रह सोवियत कास्मोड्रोम से वर्ष 1974.1975 के दौरान अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया जाएगा।
आर्यभट परियोजना के कार्यान्वयन के लिए प्रो.यू.आर.राव तथा प्रो.वी.एम.कप्तूनियनकोव क्रमशः भारतीय एवं सोवियत टीमों के निर्देशक नियुक्त किये गए। एक माह के ही भीतर आर्यभट के निर्माण की तकनीकी रपट तैयार की गई और मई, 1972 के पहले हफ्ते में प्रो। मेनन के नेतृत्व में भारतीय वैज्ञानिकों का एक प्रतिनिधि मंडल मास्को रवाना हुआ। विभिन्न मुद्दों पर लगभग एक हफ्ते तक बहस हुई और 10 मई, 1972 को प्रो.एम.जी.के। मेनन और अकादमीशियन केलि ने ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन’ और ‘सोवियत अकादमी आफ साइंसेज’ के बीच हुए एक करार पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के अनुसार भारतीय उपग्रह ‘आर्यभट’ का अंतरिक्ष में छोड़ा जाना तय पाया गया।
 
करार के प्रमुख मुददे
उक्त समझौते में स्पष्ट रूप से कहा गया था : ‘सोवियत समाजवादी जनतंत्र संघ और भारतीय गणराज्य के बीच शांति, मैत्री और सहयोग संधि के मुताबिक, और शांतिपूर्ण उददेश्यों के लिए बाह्य अंतरिक्ष के उपयोग तथा उस क्षेत्र में अनुसंधान के लिए दोनों देशों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य को सोवियत संघ की विज्ञान अकादमी तथा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन दोनों पक्षों के विशेषज्ञों के बीच प्रारंभिक विचार विमर्श के बाद निम्न बातों पर सहमति हुई है।’
  • सोवियत संघ की विज्ञान अकादमी तथा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन भारत में डिजाइन किए गए और निर्मित वैज्ञानिक भू-उपग्रह का प्रक्षेपण क्रियान्वित करेंगे।
  • यह प्रक्षेपण सोवियत संघ के भू-खंड से एक सोवियत प्रक्षेपण यान की सहायता से क्रियान्वित किया जायेगा।
  • संयुक्त परियोजना को अंजाम देने के लिए ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन’ निम्न दायित्व ग्रहण करता हैः
  • स्वीकृत तकनीकी डिजाइन के मुताबिक एक निश्चित अवधि के अन्दर एक भू-उपग्रह तैयार करने के लिए आवश्यक कदम उठाना और
  • मास्को को उपग्रह, आवश्यक सहायक उपकरण, और तकनीकी दस्तावेज पहुँचाना। सोवियत संघ की विज्ञान अकादमी को निम्न दायित्व सौंपे जाते हैं :
  • सोवियत प्रक्षेपण यान और प्रक्षेपण उपकरण की व्यवस्था करना और संयुक्त परियोजना के क्रियान्वयन के लिए आवश्यक परामर्श और तकनीकी सहयोग करना।
  • निर्धारित अवधि के भीतर एक पूर्व निश्चित कक्ष में भू-उपग्रह का पहुँचाया जाना सुनिचित करने के लिए आवश्यक कदम उठाना।
  • सोवियत कास्मोड्रोम से भू-उपग्रह के प्रक्षेपण की तैयारी में भारतीय विशेषज्ञों की भागीदारी सुनिश्चित करना।
  • मास्को से कस्मोड्रोम के प्रक्षेपण स्थल तक भू-उपग्रह और आवश्यक सहायक उपकरणों की डिलीवरी सुनिश्चित करना ;
इस परियोजना के क्रियान्वयन के दौरान वित्तीय साधनों के आदान-प्रदान का कोई प्रावधान नहीं है। प्रत्येक पक्ष ग्रहण किए गए दायित्वों को निभाने का खर्च स्वयं वहन करेगा। इस समझौते पर टिपण्णी करते हुए बाद में प्रो। मूर्ति ने कहा था - ‘हम भारतीय वैज्ञानिकों के लिए उस महान दस्तावेज का हर शब्द अद्भुत था। उस दस्तावेज में हमारे देश का अंतरिक्षीय भविष्य स्पष्ट था।’
 
आर्यभट का निर्माण
निम्न उद्देश्यों की पूर्ति को ध्यान में रखकर आर्यभट परियोजना की आधारशिला रखी गई थी :
  • उपग्रह का अभिकल्पन और उसका निर्माण तथा उस पर आवश्यक वातावरण परीक्षण पूर्णतः भारतीय भारतीय प्रयासों से किए जाए।
  • अंतरिक्ष में अपनी कक्षा में अपने अक्ष पर परिभ्रमण कर रहे उपग्रह की पूर्णरूपेण जांच पड़ताल विधि, क्रमबद्ध तरीके भारतीय वैज्ञानिकों एवं इंजीनियरों द्वारा किया जाए।
  • उपग्रह से रेडियो संपर्कों द्वारा आदान प्रदान हेतु आवश्यक ग्राउंड स्टेशनों का निर्माण, देश के भावी कार्यक्रमों को ध्यान में रखते हुए अत्यंत सतर्कता से भारतीय विशेषज्ञों द्वारा किया जाय।
  • देश की विभिन्न समस्याओं को ध्यान में रखते हुए उपग्रहों के निर्माण हेतु उपयुक्तगूढ़ तकनीकी आधारों का क्रमशः विकास किया जाए।
  • उपग्रह निर्माण के प्रथम प्रयास में भारतीय वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान करने का अवसर प्रदान किया जाए।
  • जब आर्यभट के प्रक्षेपण का समझौता रूस से हो गया तो प्रो। राव ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के अध्यक्ष प्रो। सतीश धवन (अब ‘इसरो की बागडोर प्रो। धवन के हाथों में थी) के सामने आर्यभट परियोजना की रूपरेखा प्रस्तुत की। प्रो। धवन ने अंतर्राष्ट्रीय समझौते को मद्देनज़र रखते हुए प्रो। राव को उक्त परियोजना की एक रपट तैयार करने को कहा। प्रो। राव ने शीघ्र ही रपट तैयार कर दी और अगस्त 1972 में ‘अन्तरिक्ष आयोग’ के समक्ष स्वीकृति के लिए उसे प्रस्तुत किया गया। इस रपट में परियोजना के विभिन्न पक्षों पर विचार किया गया था। उसकी संक्षिप्त रूपरेखा इस प्रकार थी।
  • उपग्रह की तकनीकी प्रणालियों का संक्षिप्त विवरण।
  • विभिन्न प्रयोगशालाओं की स्थापना हेतु लगभग 20ए000 वर्ग फुट तथा स्वच्छ कक्ष हेतु 1000 वर्ग फुट स्थान की आवश्यकता का समुचित विश्लेषण, कुछ तकनीकी कारणों से भारतीय उपग्रह परियोजना की स्थापना हेतु बंगलौर का चयन।
  • तीन करोड़ राशि की आवश्यकता का सिलसिलेवार विश्लेषण।
  • लगभग 150 तकनीकी विशेषज्ञों तथा अन्य कर्मचारियों की आवश्यकता का पूरा ब्यौरा।
  • आवश्यक नई प्रयोगशालाओं, विशेष प्रकार की परीक्षण सुविधाओं की स्थापना का विवरण।
  • परियोजना के कार्यक्रम का पूर्ण विवरण।
  • उपकरणों यंत्रों का विवरण।
अगस्त 1972 में ही अंतरिक्ष आयोग ने आर्यभट परियोजना की रपट को स्वीकृति दे दी और साथ ही परियोजना को शीघ्र ही लागू किये जाने के आदेश भी। तकनीकी कारणों को ध्यान में रखकर पीन्या, बंगलौर में भारतीय उपग्रह परियोजना को साकार करने का निश्चय किया गया। सस्ती जमीन लेकर भवन, प्रयोगशालाएं स्थापित की गईं और कार्य आरंभ हुआ।
11 सितंबर, 1972 को प्रातः सवा 7 बजे परियोजना के श्रीगणेश की एक अनौपचारिक उद्घाटन सभा आयोजित की गई। इस अवसर पर लम्बे चौड़े व्याख्यान नहीं हुए अपितु उपस्थित थोड़े से वैज्ञानिकों -प्रो। राव, श्री वेलोड़ी, श्री एच एस मूर्ति, श्री टी.एन शेषन, श्री पारीख, डॉ। शिव प्रसाद कोस्टा ने मिलकर संकल्प किया कि ‘इन कुटीरों में हम अपना प्यारा नीलवर्ण उपग्रह तैयार करेंगे ....और उपग्रह तकनीक की ऐतिहासिक क्रांति करके दिखाएंगे।’
शनैः शनैः परियोजना के कार्य संपादित होते रहे। उपकरण, कलपुर्जे जरूरत की और चीजें मंगाई गईंर्, आवास और प्रयोगशालाओं का निर्माण बदस्तूर जारी रहा। विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र से लगभग 60 इंजीनियरों और वैज्ञानिकों को यहां पर स्थानांतरित किया गया। देश के प्रमुख दैनिक पत्रों में इंजीनियरों, वैज्ञानिकों एवं तकनीशियनों की आवश्यकता के विज्ञापन निकाले गए। तकनीकी संस्थानों से सीधे संपर्क साधकर मेधावी प्रतिभाओंें को यहाँ लाया गया। लगभग 50 इंटरव्यू बोर्डों द्वारा 250 तकनीकी विशेषज्ञों का चुनाव हुआ जो उपग्रह परियोजनाओं में शामिल किये गए। परियोजना के अंतिम चरण में कर्मचारियों की संख्या लगभग 370 थी।
9 अगस्त, 1972 को इंडियन इंस्टिटयूट ऑफ साइंस बंगलौर में एक मीटिंग बुलाई गई। इसमें देश की विभिन्न प्रयोगशालाओं और विश्वविद्यालयों, वैज्ञानिक प्रतिष्ठानों के प्रख्यात विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं को आमंत्रित किया गया था। मीटिंग का उद्देश्य था उपग्रह के तकनीकी डिजाइन को अंतिम रूप देना। विस्तृत विचार विमर्श के बाद उपग्रह की डिजाइन को अंतिम रूप दिया गया और आए हुए विशेषज्ञों ने इस भावी परियोजना को पूरा करने में अपना भरपूर सहयोग देने का वायदा भी किया।
और इस तरह बंगलौर के निकट पीन्या नामक स्थान पर ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के लगभग 400 युवा वैज्ञानिकों की मेधा और लगन के परिणामस्वरूप लगभग 26 माह की अवधि और 5 करोड़ रुपये की लागत से ‘आर्यभट’ का निर्माण संभव हुआ।
यद्यपि आर्यभट के निर्माण का पूरा दायित्व भारतीय उपग्रह परियोजना, बंगलौर का था फिर भी सोवियत संघ (सौर सेल और गैस सिलेंडर के लिए) तथा अन्य कई भारतीय संस्थानों- हिन्दुस्तान एरोनोटिक्स लिमिटेड (उपग्रह का ढांचा बनाने के लिए) कंट्रोल रेट आफ इंस्पेक्शन इलेक्ट्रानिक्स (विभिन्न प्रकार के निरीक्षणों के लिए), नेशनल एरोनाटिक्स लेबोरेट्री, भारत एरोनाटिक्स, सेन्ट्रल मशीन टूल्स इंस्टीट्यूट, इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्रीज (विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रानिक यांत्रिक उपकरणों हेतु) का सहयोग सराहनीय है, जिनके महत्वपूर्ण योगदानों के बल पर यह योजना सफल हुई।
 
उपग्रह की मास्को रवानगी और प्रक्षेपण
रूसी कास्मोड्रोम में ‘आर्यभट के परीक्षण हेतु बहुत से यंत्रों और उपकरणों की जरूरत थी। अतः इनको प्लाई वुड की पेटियों में बड़ी सावधानी से पैक किया और लगभग 20 टन वजन की 100 पेटियों को बंगलौर से मास्को एयरफोर्स के ए एन-12 भार वाहक जहाज द्वारा 17 मार्च को मास्को रवाना किया गया।
प्रक्षेपण से एक मास पूर्व लगभग 45 वैज्ञानिक एवं इंजीनियर यहाँ से सोवियत कास्मोड्रोम जा चुके थे। जब आर्यभट का माडल और सम्बद्ध उपकरण रूस पहुँच गए तो सर्वप्रथम ‘आर्यभट’ को निकाल कर उसका परीक्षण किया गया। सौभाग्यवश आर्यभट में कोई टूट-फूट नहीं हुई थी। फिर आर्यभट को तीन हिस्सों -बाह्य कवच, धरातल कवच और डेक-प्लेट में अलग किया गया। सौर सेलों को निकाल कर उनका परीक्षण किया गया। उपग्रह के अन्य अवयवों की बड़ी बारीकी से जाँच की गई और सब कुछ सही-सलामत पाए जाने पर उपग्रह के तीनों अवयवों को फिर से मिलाया गया। कम्प्यूटर की मदद से उसकी अंतिम जांच पड़ताल की गई। अब उपग्रह प्रक्षेपण के लिए तैयार था।
13 अप्रैल 1974 को सोवियत राकेट एक रेलगाड़ी में टेक्नॉलॉजिकल पोजीशन पर लाया गया गया। उसकी जाँच की गई। उपयुक्त पाए जाने पर ‘आर्यभट’ को उससे सम्बद्ध कर दिया गया और अब राकेट को प्रक्षेपण टावर पर ले जाया गया। फिर राकेट में ईंधन भरा जाने लगा।
सोवियत कास्मोड्रोम में सोवियत और भारतीय तकनीकी टोलियों ने आर्यभट के सभी परीक्षणों का विश्लेषण किया और 16 अप्रैल 1974 को संयुक्त रूप से यह निर्णय किया गया कि अब ‘आर्यभट को किसी भी समय अंतरिक्ष में छोड़ा जा सकता है। दोनों टोलियों ने प्रक्षेपण कमीशन (प्रो। सतीश धवन, अकादमीशियन पेत्रोव, प्रो.यू.आर.राव, प्रो। कफ्तूनियन कोव ) को अपनी रपट दे दी। 17 अप्रैल को प्रक्षेपण कमीशन की बैठक हुई और यह निर्णय लिया गया की 19 अप्रैल को भारतीय समयानुसार ठीक 1 बजे राकेट द्वारा ‘आर्यभट’ को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया जायेगा।
आर्यभट का प्रक्षेपण भारतीय और सोवियत संघ दोनों ने अभी तक एकदम गोपनीय रखा था। 17 अप्रैल से ही काउंट डाउन शुरू हो गई।
 
आर्यभट का सफल प्रक्षेपण
19 अप्रैल, 1975 का दिन। बियर्स लेक के पास स्थित सोवियत कास्मोड्रोम। काउंट डाउन....दस...नौ...आठ...तीन...दो...एक... और आग उगलता हुआ, तेज गड़गड़ाहट के साथ रुसी राकेट ‘इंटर कास्मॉस’ भारत के प्रथम कृत्रिम उपग्रह ‘आर्यभट’ को लेकर उड़ चला अंतरिक्ष की ओर। उस समय भारतीय समयानुसार ठीक 12 बज कर 52 मिनट और 59ण्11 सेकंड हुए थे। सोवियत कास्मोड्रोम में उपस्थित भारतीय राजदूत डी.पी.धर, प्रो। सतीश धवन, अकादमीशियन पेत्रोव एवं कई अन्य भारतीय-सोवियत विशेषज्ञ रॉकेट को निहार रहे थे। कुछ-कुछ ऐसा ही हाल इधर भी था। दिलों की धड़कन थामे वैज्ञानिक गण भारत के ग्राउंड स्टेशनों-श्रीहरिकोटा और बंगलौर - में बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब यह शुभ समाचार मिलता है कि हमारा पहला उपग्रह धरती की कक्षा में स्थापित हो गया। ठीक 1 बजकर 28 मिनट एवं 59 सेकंड पर आर्यभट ने इंडोनेशिया के ऊपर पृथ्वी की परिक्रमा हेतु अपनी कक्षा में प्रवेश किया। 360 किलोग्राम भार वाला उपग्रह 600 किलोमीटर की ऊँचाई पर अपनी पूर्व निर्धारित कक्षा में स्थापित हो गया।
ठीक 14 घंटे, 37 मिनट, 5 सेकंड के बाद रुसी कास्मोड्रोम में आर्यभट के संकेत मिले और फिर समय के साथ बियर्स लेक, बंगलौर तथा श्रीहरिकोटा के स्टेशनों को आर्यभट के संकेत मिलने लगे। भारतीय और रूसी विज्ञानियों के दलों में खुशियों की लहर उमड़ पड़ी। आकाशवाणी ने सायं 5 बजे समाचार प्रसारित किया : ‘भारत ने पहला उपग्रह ‘आर्यभट’ सोवियत रॉकेट द्वारा ठीक 12 बजकर 59 मिनट, 11 सेकंड पर छोड़ा, जो पृथ्वी का एक चक्कर 96ण्44 मिनट में लगा रहा है।’
वस्तुतः आर्यभट के प्रक्षेपण से भारत ने असली मायने में अंतरिक्ष युग में प्रवेश किया। भारत अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में विश्व का 11वां और प्रथम विकासशील राष्ट्र बन गया। देश के हर कोने से ‘भारतीय उपग्रह परियोजना’ टीम को बधाइयों के सन्देश आने लगे।
राष्ट्रपति ने इस प्रयास को देश और भारतीय विज्ञान की गौरवपूर्ण उपलब्धि बताया। उपग्रह की सक्रिय कार्यकारी अवधि 6 मास की थी और इसके जरिये तीन महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयोग करने थे। लगभग 360 किलोग्राम वजन एवं 26 चपटे हिस्सों वाले आर्यभट के जीवन पोषक तत्वों के संचालन हेतु 45 वाट विद्युत की आवश्यकता थी, जिसकी पूर्ति सौर बैटरियों द्वारा उत्पन्न विद्युत से की जा रही थी। उपग्रह में टाइटेनियम से बने 6 गैस सिलिंडर रखे गए थे। इससे घनीभूत नाइट्रोजन विभिन्न दिशाओं में निकलती थी, जिससे उपग्रह अपनी धुरी पर घूमता था। यह गैस 6 माह तक की अवधि के लिए पर्याप्त थी और इतना ही उपग्रह का जीवन था। आर्यभट पूर्ण रूप से वैज्ञानिक उपग्रह था, जिसके द्वारा एक्स किरण खगोलकी, वायु विज्ञान तथा सौर भौतिकी संबंधी तीन वैज्ञानिक प्रयोग किए जाने थे।
‘एक्स-किरण खगोलकी प्रयोग’ का आयोजन भारतीय उपग्रह केंद्र के निदेशक प्रो.यू.आर। राव तथा डॉ। कस्तूरी रंगन एवं उनके सहयोगियों द्वारा किया गया था। इस प्रयोग द्वारा आकाश गंगा तथा दूसरे तारामंडलों के तारों में एक्स-रे विकिरण की खोज तथा उनकी माप की जानी थी।
‘सौर भौतिकी प्रयोग’ का आयोजन टाटा आधारभूत अनुसंधान संस्थान, बम्बई के प्रो। आर.आर। डेनियल, डॉ.पी.जे। लवकरे ने किया था। इस प्रयोग का उद्देश्यतीव्र सौर-गतिविधियों के समय उर्जावान न्यूट्रान तथा गामा किरणों की खोज करना था।
‘वायु विज्ञान प्रयोग’ का प्रयोजन भौतिक अनुसंधान शाला, अहमदाबाद के प्रो। सत्य प्रकाश, डॉ। सुब्बाराव राव एवं उनके सहयोगियों ने किया था। इस प्रयोग में आयन मंडल के अति तापीय इलेक्ट्रॉनों के उर्जा वर्णक्रम का अध्ययन एवं रात के समय आसमान में बिखरे हुए लायमन अल्फा विकिरण की जानकारी प्राप्त करनी थी। इस प्रायोगिक उपग्रह के विकास, निर्माण एवं प्रक्षेपण से भारतीय वैज्ञानिकों, इंजीनियरों को उपग्रह तकनीक के विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट रूप से समझने का अवसर मिला है।
आर्यभट की सफलता लगभग 400 व्यक्तियों की कड़ी मेहनत का सुखद परिणाम थी। इनमें लगभग 250 वैज्ञानिक एवं इंजीनियर थे जिनकी आयु 30 से 40 वर्ष के आस पास की थी। हमारे ये युवा विज्ञानी, तकनीकीविद् अंतरिक्ष विज्ञान की जटिल समस्याओं को समझने, उनका विश्लेषण करने में पूर्ण समर्थ थे। आर्यभट की सफलता ने भावी अंतरिक्ष कार्यक्रमों का मार्ग प्रशस्त कर दिया। आर्यभट से उपग्रह प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रवेश कर भारतीय इंजीनियरों एवं वैज्ञानिकों ने अपना ध्यान उपग्रहों के व्यावहारिक उपयोगों की ओर केन्द्रित किया।
अंतरिक्ष में सुचारू रूप से परिभ्रमण करने वाले इस उपग्रह के निर्माण से उड़ान तक के सभी तकनीकी पक्षों यथा संरचना, ताप नियंत्रण, विद्युत शक्ति उत्पादन एवं वितरण, टेलीमीटरी, टेलीकमांड, कम्युनिकेशन, संवेदक यंत्र, परिभ्रमण प्रणाली आदि के विकसित करने का सम्यक ज्ञान एवं अनुभव मिला, जिससे नई-नई संभावनाओं के द्वार स्वतः खुल गए।
 
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