ऐतिहासिक पृष्ठ

(25/Jul/2018)

वंगारी मथाई

एक जिंदगी पेड़ों के नाम

नोबेल पुरस्कार समादृत अप्रतिम पर्यावरण विज्ञानी

शुकदेव प्रसाद
 
नोबेल पुरस्कारों के साथ एक विसंगति है। वर्ष 1901 से आरंभ नोबेल पुरस्कार भौतिकी, रसायन, कार्यिकी (चिकित्सा) के निमित्त तो हैं लेकिन नोबेल प्रतिष्ठान गणित को कोेई श्रेय नहीं देता है। यह अपने आप में विस्मयकारी है क्योंकि गणित विद्या तो सारे विज्ञानों की पटरानी है। गणित विद्या न होती तो आज न राकेट होते, न मिसाइलें होतीं, न कम्प्यूटर और न ही संचार क्रांति का पदार्पण होता। बहरहाल, नोबेल पुरस्कार चयन समिति अर्थशास्त्र को भी मान्यता देती है, साहित्य और शांति के लिए पुरस्कार के प्रावधान तो इनके उन्मेष काल ;1901द्ध से ही हैं। 
आगे चलकर देखा गया कि नोबेल शांति पुरस्कारों की कोटि में पर्यावरण संरक्षण को भी अहमियत दी जानी लगी, कदाचित पर्यावरण की बदहाली से भयाक्रांत मानवता की चीख-पुकार ने नोबेल समिति को उद्वेलित किया हो तभी तो एक साधारण सी कीनियाई महिला, जो कभी पौधरोपण के लिए महिलाओं को कुछ शिलिंग देती थी, ने कालांतर में ;2004द्ध नोबेल की बुलंदियों का संस्पर्श किया। उस साधारण सी महिला ने वस्तुतः पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में, अपनी धरती की हरीतिमा बचाने के उपक्रम में असाधारण कार्य किए थे और इस प्रकार वंगारी मथाई को नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त करने वाली प्रथम अफ्रीकी नारी-रत्न होने का गौरव मिला।
नोबेल समिति ने इन शब्दों में उसकी प्रशस्ति की- ‘सुस्थिर विकास ;ैनेजंपदंइसम कमअमसवचउमदजद्धए लोकतंत्र और शांति के क्षेत्र में उसके योगदानों हेतु।’ यह क्षण कीनिया ही नहीं अपितु समग्र अफ्रीकी जनों के लिए अत्यंत गौरवशाली था।
आगे चलकर अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति अल्गोर और आई.पी.सी.सी। ;प्दजमतहवअमतदउमदजंस च्ंदमस वद ब्सपउंजम ब्ींदहमद्ध को संयुक्त रूप से पर्यावरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदानों हेतु नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया। यह दीगर बात है कि हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने को लेकर आई.पी.सी.सी। की रपट विवादास्पद हो चली और नोबेल पुरस्कार भी संशय के घेरे में आ गया और उस पर प्रश्न चिह्न उठने लगे। 
1 अप्रैल, 1940 को कीनिया में जन्मी वंगारी का जीवन संघर्षों की गाथा है और दुनिया के तमाम मजलूमों के लिए प्रेरणा स्रोत भी। उसने 1964 में अमेरिका के बेनेडिक्टाइन कॉलिज से जीव विज्ञान में बी.एससी। की, तदुपरांत 1966 में पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय से जीव विज्ञान में मास्टर डिग्री हासिल की। शीघ्र ही यूनीवर्सिटी कॉलिज ऑफ नैरोबी में जंतु विज्ञान के एक आचार्य के साथ अनुसंधान सहायक के रूप में उसकी नियुक्ति हो गई लेकिन जब वह नौकरी के लिए विश्वविद्यालय पहुँची तब उसे जानकारी मिली कि यह नौकरी तो किसी और को दी जा चुकी है। कदाचित ऐसा उसके महिला और आदिवासी होने के कारण हुआ, वंगारी ऐसा मानती थी। दो महीनों तक वह नौकरी पाने के लिए भाग दौड़ करती रही, फिर उसे आशा की किरण नज़र आई जब गीसेन यूनीवर्सिटी, जर्मनी के प्रोफेसर रीनहोल्ड हॉफमैन ने यूनीवर्सिटी कॉलेज ऑफ नैरोबी के स्कूल ऑफ वेटेरीनरी मेडिसिन में अनुसंधान सहायक की नौकरी की पेशकश की। प्रोफेसर हॉफमैन की प्रेरणा से डाक्टोरेट की डिग्री हासिल करने के लिए वह गीसेन विश्वविद्यालय, जर्मनी गई। उसने गीसेन और म्युनिख दोनों विश्वविद्यालयों में शोध अध्ययन किया। 1969 की वसंत में अपना अध्ययन और शोध कार्य जारी रखने के लिए नैरोबी लौट आयी। यूनीवर्सिटी कॉलेज ऑफ नैरोबी में सहायक प्राध्यापक के रूप में उसने अपना अध्यापन जारी रखा और आजीविका का उपार्जन भी। 1971 में उसने यूनीवर्सिटी कॉलेज ऑफ नैरोबी (आगे चलकर नैरोबी विश्वविद्यालय) से पशु शारीरिकी में डाक्टोरेट की उपाधि अर्जित की और इस प्रकार उसे पीएच.-डी। करने वाली पहली पूर्वी-अफ्रीकी महिला होने का श्रेय मिला। 1974 में विश्वविद्यालय में वह शारीरिकी ;।दंजवउलद्ध की वरिष्ठ प्रवक्ता, फिर 1976 में पशु शारीरिकी ;टमजमतपदंतल ।दंजवउलद्ध विभाग की अध्यक्ष और अगले ही वर्ष एसोसिएट प्रोफेसर बनीं। ऐसे उच्च पदों पर आसीन होने वाली वंगारी नैरोबी की प्रथम महिला थी। 
नैरोबी विश्वविद्यालय में अध्यापन करने के साथ-साथ वंगारी का कई सामाजिक संगठनों से भी जुड़ाव हो गया और यहीं से उसकी जिंदगी ने नई करवट ली जिससे उसने प्रसिद्धि के शिखरों को पा लिया। सारी दुनिया में उसकी यशः कीर्ति फैली और उसकी जिंदगी उसके जीवन काल में ही एक पुरा कथा बन गई। न भूतो।
सत्तरादि के आरंभ में वह कीनिया रेड क्रॉस सोसायटी की नैरोबी शाखा की सदस्य बन गयी और 1973 में वह इसकी निदेशक बन गयी। वह कीनिया एसोसिएशन ऑफ यूनीवर्सिटी वीमेन की सदस्य तो थी और जब 1974 में वहाँ पर पर्यावरण संपर्क केंद्र की स्थापना की गयी तो उसे इसकी सदस्यता ग्रहण करने का आग्रह किया गया तथा आगे चलकर वह उसकी अध्यक्ष भी बन गयी। उक्त केंद्र ने यूनेप ;न्दपजमक छंजपवदे म्दअपतवदउमदज च्तवहतंउउम.न्छम्च्द्ध के कार्यक्रमों में गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका सुनिश्चित की।
1972 में जब स्टॉकहोम में प्रो.मारिस स्ट्रांग की अध्यक्षता में संयुक्त राष्ट्र मानव पर्यावरण सम्मेलन ;न्दपजमक छंजपवदे ब्वदमितमदबम वद जीम भ्नउंद म्दअपतवदउमदजद्ध आहूत किया गया तो इसी के बाद यू.एन.ई.पी। का मुख्यालय नैरोबी में स्थापित किया गया।
मथाई ने एन.सी.डब्ल्यू। के। ;छंजपवदंस ब्वनदबपस वि ॅवउमद वि ज्ञमदलंद्ध को भी ज्वाइन किया और नाना स्वैच्छिक संगठनों से जुड़ने के बाद उसने महसूस किया कि कीनिया की अधिकांश समस्याओं की जडें पर्यावरणीय क्षति से संबिंधत हैं।
1977 में उसने एन.सी.डब्ल्यू.के। की एक मीटिंग में बदलते पर्यावरण और धरती की बदहाली को लेकर अपनी दुष्चिंता प्रकट की और वृक्षारोपण पर जोर दिया जिसे उक्त कौंसिल का भरपूर समर्थन प्राप्त हुआ। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर 5 जून, 1977 को एन.सी.डब्ल्यू.के। ने जुलूस की शक्ल में कीनियात्ता इंटरनेशनल कांफ्रेंस सेंटर, नैरोबी से शहर से बाहर स्थित कामुकंुजी पार्क तक की यात्रा की और ऐतिहासिक सामुदायिक जन प्रतिनिधियों के सम्मान में सात पेड़ रोपे। यहीं से ‘ग्रीन बेल्ट मूवमेंट’ की आधारशिला निर्मित हुई। मथाई ने अफ्रीका की महिलाओं को पूरे देश में, आसपास के जंगलों में वृक्षारोपण के लिए प्रेरित किया और इसके लिए वह हर पौधरोपण के लिए महिलाओं को कुछ पैसे देने के लिए भी राजी हो गयी और एक दिन उसकी मेहनत रंग लायी, अफ्रीका की तस्वीर बदली, धरती की हरीतिमा वापस लौट आयी और प्रकृति सहचरी, पर्यावरण की अप्रतिम अनुरागी वंगारी ने नोबेल की बुलंदियों को संस्पर्श किया।
वंगारी मथाई ने जिस ग्रीन बेल्ट आंदोलन की कीनिया में आधारशिला रखी थी, उसके कार्यकर्ताओं ने अफ्रीका में प्रायः दो से तीन करोड़ पेड़ लगाए। इतना ही नहीं, कीनिया में 1980 से लेकर 1990 तक जंगलों को साफ करने के सरकार समर्थित अभियान के खिलाफ भी उसने आवाज उठायी। इस प्रकार पर्यावरण संरक्षण के प्रति वैश्विक चेतना जाग्रत करने में मथाई ने अप्रतिम भूमिका निभायी और कीनिया की धरती से पर्यावरण संरक्षण का एक संदेश सारी दुनिया में गूंजा। अब तक वंगारी मथाई अफ्रीकी जनमानस में खासी लोकप्रिय हो चुकी थी, सो राजनीति में भी उसका प्रवेश हुआ। वर्ष 2002 में वह सांसद चुनी गई और कीनिया की सरकार में जनवरी, 2003 में पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधान मंत्रालय में सहायक मंत्री बनी और इस पद पर नवंबर 2005 तक आसीन रहकर पर्यावरण की अलख जगायी।
वंगारी मथाई लंबे अरसे से कैंसर ग्रस्त थी। अंततोगत्वा 71 वर्ष की वय में वह जिंदगी की जंग हार गयी और 25 सितंबर, 2011 को प्रकृति सहचरी, ग्रीन बेल्ट आंदोलन की संस्थापिका, महिला अधिकारों के प्रति जुझारू नेत्री ने दुनिया से विदा ली। यद्यपि प्रो। वंगारी मथाई हमारे बीच अब नहीं हैं, फिर भी उनकी संघर्षगाथा हमारे लिए सतत प्रेरणा पुंज है। ऐसे नारी-रत्नों पर सारी मानवता को गर्व और तोष है। 

वंगारी मथाई : प्रमुख कृतियाँ

स द ग्रीन बेल्ट मूवमेंट : शेयरिंग द एप्रोच एंड द एक्सपीरिएंस ;1985द्ध  स द बाटम इज़ हेवी टू : इवन विद द ग्रीन बेल्ट मूवमेंटः द फिफ्थ एडिनबर्ग मेडल एड्रेस ;1994द्ध स बॉटल नेक्स ऑव डिवेलपमेंट इन एफ्रीका ;1995द्ध  स द कैनोपी ऑव होप : माई लाइफ कैम्पेनिंग फॉर एफ्रिका, वीमेन एंड द इनविरान्मंेट ;2002द्ध स अनबाउड : ए मेमॉयर ;2006द्ध स रिक्लेमिंग राइटस एंड रिर्सोसेज वीमेन, पावर्टी एंड इनविरान्मेंट ;2007द्ध स रेनवाटर हारवेस्टिंग ;2008द्ध स स्टेट ऑव वर्ल्ड्स माइनारटीज ;2008द्ध स द चैलेंज फॉर एफ्रिका ;2009द्ध  स रिप्लेनेशिंग द अर्थ ;2010द्ध
 

वंगारी मथाई को मिले पुरस्कार-सम्मान

स राइट लिवलीहुड एवार्ड (वैकल्पिक नोबेल पुरस्कार), 1984  स बेटर वर्ल्ड सोसाइटी एवार्ड, 1986 स ग्लोबल 500 रोल ऑव आनर, 1987 स गोल्डमैन इनविरान्मेंटल प्राइज, 1991 स द हंगर प्रोजेक्ट्स एफ्रिका प्राइज़ फॉर लीडरशिप,1991 स एडिनबर्ग मेडल (विज्ञान के द्वारा मानवता के सर्वोत्तम अवदान हेतु), 1993 स जोन एडम्स लीडरशिप एवार्ड, 1993 स बेनेडिक्टाइन कॉलिज ऑफरएमुस मेडल, 1993 स द गोल्डेन आर्क एवार्ड, 2001 स द जुलिएट होलिस्टर एवार्ड,1994 स ग्लोबल इनविरान्मेंट एवार्ड, 2003 स जे। स्टर्लिंग मोर्टन एवार्ड, 2004 स कंजर्वेशन सांइटिस्ट एवार्ड, कोलंबिया विश्वविद्यालय, 2004 स पेट्रा केली प्राइज, 2004 स सोफाई प्राइज, 2004 स नोबेल शांति पुरस्कार,2004 स लीज़न डि’ ऑनर, 2006 स वर्ल्ड सिटीजन एवार्ड, 2007 स इंदिरा गांधी पुरस्कार,2007 स क्रास ऑव द आर्डर ऑफ सेंट बेनेडिक्ट, 2002 स एलिजाबेथ ब्लैकवेल एवार्ड, होबर्ट और विलियम स्मिथ कालिजों की ओर से, 2008 स एन ए ए सी पी इमेज एवार्ड - चेयरमैन्स एवार्ड (एल्गोर के साथ), 2009  स ग्रैंड कार्डन ऑव द आर्डर ऑव द राइजिंग सन ऑव जापान, 2009 स द निकोल्स-चांसलर्स मेडल, वैंडरबिल्ट विश्वविद्यालय, 2011 
 
 
sdprasad24oct@yahoo.com