ऐतिहासिक पृष्ठ

(24/May/2018)

दिक् और काल के सजग प्रहरी

शुकदेव प्रसाद

खगोल भौतिकी जगत के पर्याय बन चुके ब्रिटिश विज्ञानी स्टीफन विलियम हॉकिंग की यशस्विता उनके जीवनकाल में ही इतनी शिखरस्थ हो चुकी थी कि उन्हें बीसवीं शती की मानवीय मेघा के चरमोत्कर्ष महाविज्ञानी प्रो। अल्बर्ट आइंस्टाइन के समकक्ष माने जाने लगा था। उनकी विश्वविश्रुति के दो कारण हैं। एक तो यह कि ‘दिक्’ और ‘काल’ की गूढ़ बातें आम श्रोता/पाठक के पल्ले नहीं पड़तीं, उन्हें समझने के लिए भौतिकी, गणित और खगोल का आधारिक ज्ञान वांछनीय है। जैसा कि आइंस्टाइन का सापेक्षता का सिद्धांत भी अपनी गूढ़ता के कारण आम आदमी की समझ के परे था, जटिलता के गूढ़ आवरण में लिपटे इसी सिद्धांत ने आइंस्टाइन को युग पुरुष बना दिया। हॉकिंग का भी कार्यक्षेत्र ब्रह्मांड की रहस्यमयी गुत्थियों को सुलझाने की दिशा में एक अग्रगामी चरण है जो समय से पर्याप्त आगे है, अतः आम जिज्ञासुओं के लिए नितांत अग्राह्य। ब्रह्मांड की अनसुलझी गुत्थियों के संदर्भ में हॉकिंग का गहन और गूढ़ चिंतन न समझ पाने पर भी वे विश्व जनसमुदाय के आकर्षण का केन्द्र बन चुके थे और लोकप्रियता के चरम शिखर पर पहुंच चुके थे। उनकी पुस्तक ‘समय का सूक्ष्म इतिहास’ जब छप कर बाजार में आयी तो इसने बिक्री के सारे रिकार्ड तोड़ दिए। मडोना का सेक्स अलबम भी उसके सामने फीका पड़ गया। अब तक यह पुस्तक विश्व की चालीस भाषाओं में अनूदित हो चुकी है और यह अब तक प्रकाशित बिन पढ़ी बेस्ट सेलर है।
    उनकी लोकप्रियता का दूसरा कारण कदाचित उनकी अपंगता थी। चलने-फिरने, बोल सकने में नितांत अशक्त व्यक्ति इतना जटिल चिंतन भी कर सकता है, यह जिज्ञासा लोगों को सहज ही हॉकिंग की ओर उन्मुख करती है। इक्कीस वर्ष (१९६३) की अल्पवय में (जन्म ८ जनवरी, १९४२ ;आक्सफोर्ड) हॉकिंग एक असाध्य रोग से ग्रस्त हो गए थे, जिसे चिकित्सा विज्ञान की भाषा में एमियोट्राफिक लेटरल स्कलेरोसिस (ए.एल.एस.) कहते हैं। तब डाक्टरों ने घोषणा की थी कि वे मात्र तीन वर्ष तक बमुश्किल अपने जीवन की डोर खींच सकते हैं। कोई काम कर पाना नितांत असंभव है। लेकिन नहीं, दृढ़ इच्छा शक्ति और संकल्प के धनी हॉकिंग ने चिकित्सकों की भविष्यवाणी को झुठला दिया और उन्होंने ७६ वर्षों का सुदीर्घ जीवन जिया (निधन, १४ मार्च, २०१८) और अपार यशस्विता अर्जित की। और इस प्रकार वह चिकित्सकों के लिए एक पहेली और भौतिकी तथा खगोल जगत के पर्याय बन गए। जिजीविषा और कुछ कर गुजरने की तमन्ना क्या नहीं कर सकती? स्टीफन हॉकिंग अपने जीवनकाल में ही एक जीवंत किंवदंती बन चुके थे।
    ए.एल.एस. का शिकार होकर हॉकिंग विकलांग हो गये थे। उनके चेहरे की कुछ मांसपेशियां हिलती थीं। बाएं हाथ की मात्र एक अंगुली काम करती थी। व्हील चेयर पर बैठे हॉकिंग अपनी एक अंगुली के सहारे एक-एक शब्द खोजते और कुर्सी से जुड़े कम्प्यूटर से अपना काम करते थे। १९८५ में निमोनिया ने जब उन्हें आक्रांत किया तो डाक्टरों ने किसी तरह उनकी जान तो बचा ली लेकिन वाणी सर्वदा के लिए विलुप्त हो गयी और उसके बाद वे वायस सिंथेसाइजर के द्वारा ही शब्दालाप करते थे। प्राकृतिक अभिशाप को झुठलाते हुए हॉकिंग अपने ब्रह्मांडीय संसार में लीन थे और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में गणित के लुकासियन चेयर पर आचार्य के रूप में १९७९ से २००९ तक प्रतिष्ठ रहे जिस कुर्सी पर कभी न्यूटन महान (१६६३) आसीन थे। एक लंबे अरसे के अंतराल के बाद जनवरी २००१ में हॉकिंग भारत की वैज्ञानिक यात्रा पर पुनः पधारे। पहले टाटा आधारभूत अनुसंधान संस्थान मुंबई द्वारा आयोजित ‘स्ट्रिंग-२००१’ नामक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्होंने भौतिकी के सर्वथा नूतन तथा रोमांचक अध्याय ‘स्ट्रिंग सिद्धांत’ पर व्याख्यान दिये। मुंबई में अपने स्पीच सिंथेसाइजर के द्वारा उन्होंने दो व्याख्यान दिये जिनके विषय थे - ‘संक्षेप में हमारा ब्रह्मांड’ और ‘भविष्य में विज्ञान’। व्याख्यान के पहले विषय पर उन्होंने इसी शीर्षक से एक और विश्वविश्रुत पुस्तक भी लिखी है। फिर वे सेंटर फॉर फिलासफी एंड फाउंडेशन ऑफ साइंस, नई दिल्ली के आमंत्रण पर दिल्ली पधारे जहां उन्हें ‘अल्बर्ट आइंस्टाइन व्याख्यान-२००१’ देना था। सीरी फोर्ट सभागार में, उन्होंने ‘भविष्य कथन : ज्योतिष से कृष्ण विवर तक’ शीर्षक से अपना व्याख्यान दिया। कहते हैं कि इतना व्यापक जनसमूह इससे पूर्व दिल्ली में किसी भी वैज्ञानिक व्याख्यान को सुनने के लिए उत्कंठित नहीं हुआ था। व्याख्यान सुनने या हॉकिंग को देखने?

हॉकिंग का ब्रह्मांड

हॉकिंग का वैयक्तिक संसार तो मात्र एक व्हील चेयर तक सीमित था लेकिन उनका वैचारिक संसार असीमित। उन्होंने ब्रह्मांडीय मॉडल की परिकल्पना अपने ढंग से की है। उनके चिंतन के नव आयाम हैं- हमारा ब्रह्मांड कैसे निर्मित हुआ, इसका कभी अंत भी होगा, यदि होगा तो कैसे?
    हॉकिंग महाविज्ञानी आइंस्टाइन के सापेक्षवाद की व्याख्या करते हुए घोषित करते हैं कि दिक् और काल का आरंभ महाविस्फोट से हुआ और इसकी परिणति कृष्ण विवर में होगी। जार्ज गैमो द्वारा प्रतिपादित (१९४८) और फ्रेड हॉयल द्वारा नामित महाधमाका सिद्धांत कहता है कि आज से प्रायः १५ अरब वर्ष पूर्व महाधमाके के रूप में हमारे ब्रह्मांड की शुरुआत हुई, जब समूची द्रव्यराशि अत्यंत सूक्ष्म बिंदु स्वरूप थी। इसी महाविस्फोट के साथ ब्रह्मांड का प्रसार हुआ अर्थात् हमारा ब्रह्मांड १५ अरब वर्ष पुराना है। हॉकिंग कहते हैं कि महाविस्फोट के पूर्व समय का कोई अस्तित्व नहीं था। वस्तुतः हम उससे पीछे नहीं झांक सकते। समय की यदि शुरुआत हुई है तो उसका अंत भी होगा। तो क्या ब्रह्मांड की उत्पत्ति के साथ उद्भूत काल की समाप्ति ब्रह्मांड की समाप्ति के साथ होगी?
    यहाँ पर भारतीय वैज्ञानिक डॉ। सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर भौतिकीविदों की मदद करते हैं। किसी भी तारे के जीवन में एक ऐसा काल आता है जब तारे का समस्त हाइड्रोजन अथवा उसका नाभिकीय ईंधन समाप्त हो जाता है तो वह मृत्यु की ओर अग्रसर होता है अर्थात् सिकुड़ना आरंभ करता है। ऐसे में यदि उसका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के १.४४ गुने तक (चन्द्रशेखर सीमा) है तो वह सिकुड़कर श्वेत वामन बन जाएगा और यदि उसका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के १.४४ गुने से २ गुने तक है तो वह न्यूट्रान तारा बन जाएगा और यदि उसका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के दुगुने से अधिक है तो वह निरंतर सिकुड़ता चला जाएगा और अंततोगत्वा एक बिंदु के रूप में परिवर्तित हो जाएगा। उसका घनत्व इतना प्रबल होता है, उसका गुरुत्व इतना प्रबल होता है कि उसमें से प्रकाश की किरणें भी नहीं निकल सकती है। तारों की यह परिणति कृष्ण विवर ;ठसंबा भ्वसमद्ध कहलाती है। उसकी परिसीमा घटना क्षितिज कहलाती है। प्रो। हॉकिंग बताते हैं कि घटना क्षितिज से होकर कोई भी वस्तु या व्यक्ति असीम घनत्व के क्षेत्र में और साथ ही समय की समाप्ति में पहुंच जाएगा।
तारों के अवसान पर चंद्रशेखर का कार्य जग प्रसिद्ध है। हॉकिंग ने डॉ. रोजर पेनरोज (ब्रिटिश भौतिकशास्त्री) के साथ मिलकर एक शोध पत्र तैयार किया जिसमें इस समस्या पर विचार किया गया कि आखिर उस समय क्या होता है जब विशालकाय तारों की चरम परिणति ब्लैकहोल के रूप में होती है। आइंस्टाइन के सापेक्षवाद में भी कुछ ऐसा ही अनुमान लगाने की चेष्टा की गई थी। हॉकिंग ने निष्कर्ष दिया कि तारों का अवसान एक अत्यंत सघन बिंदु के रूप में आकर एकत्र होना चाहिए। इस बिंदु पर घनत्व असीम होगा, जहां भौतिकी के सारे नियम समाप्त हो जाएंगे। हॉकिंग ने ही सबसे पहली बार निष्कर्ष दिया था कि ब्लैक होल पूरी तरह काले नहीं होते। इन्हें काला इसलिए समझा गया कि अपने प्रबल गुरुत्वाकर्षण के नाते ये अपने चारों ओर की द्रव्यराशि को अपने में समाहित कर लेते हैं।
    हॉकिंग बिग-बैंग थियरी के प्रबल समर्थक रहे हैं। १९६५ में अपनी पीएच-डी। थीसिस की तैयारी के दौरान उन्होंने ब्रिटिश भौतिकीविद् डॉ. रोजर पेनरोज का एक आलेख पढ़ा जिसमें उन्होंने स्थापित किया था कि गुरुत्व के अधीन नक्षत्र अपने अवसानकाल में आकस्मिक रूप से शून्य आयतन और असीम घनत्व प्राप्त कर लेते हैं। भौतिकी में इस स्थिति को एकत्व कहते हैं। हॉकिंग ने इसी को अपने चिंतन का आधार बनाया। फिर १९७० में हॉकिंग और पेनरोज ने निष्कर्ष निकाला कि आइंस्टाइन के ‘सामान्य सापेक्षता सिद्धांत’ की मांग है कि ब्रह्मांड का आरंभ एकत्व में होना चाहिए जिसे आज बिग बैंग के रूप में जाना जाता है और जिसका अंत ब्लैक होल के रूप में होता है।
    हॉकिंग को उनके जीवनकाल में ही ‘जीवंत आइंस्टाइन’ की संज्ञा से अभिहित किया जाने लगा था। कदाचित इसका कारण यह है कि उन्होंने आइंस्टाइन के चिंतन को विस्तार दिया है। हॉकिंग ने इस प्रश्न पर गंभीर चिंतन किया है कि सापेक्षता सिद्धांत के परिणाम क्या हो सकते हैं? उन्होंने जो निष्कर्ष निकाले, उनमें एक विचार ब्लैक होल का था जिन्हें हम प्रबल गुरुत्वाकर्षण के सिंकहोल भी कह सकते हैं। इसकी भविष्यवाणी सापेक्षवाद में हुई लेकिन आइंस्टाइन ने इसे कभी नहीं स्वीकारा, यद्यपि ब्रह्मांड में अनेक कृष्ण विवरों का अस्तित्व सिद्ध हो चुका है जिनका द्रव्यमान लाखों सूर्यों के द्रव्यमान से भी अधिक होता है।
    हॉकिंग ने अनुभव किया कि ब्रह्मांड को पूरी तरह से समझने के लिए सामान्य गुरुत्वाकर्षण (सापेक्षवाद) को क्वांटम सिद्धांत से जोड़ना होगा। इस एकीकरण के परिणामस्वरूप उन्होंने बताया कि ब्लैक होल पूरी तरह से काले नहीं होते अपितु वे भी कुछ विकिरण उत्सर्जित करते हैं जो वाष्पित होकर अदृश्य हो जाता है। यह खोज हॉकिंग की सबसे बड़ी देन है। अब तो भौतिकीविद् इसे ‘हॉकिंग विकिरण’ की संज्ञा भी देने लगे हैं।

क्या है स्ट्रिंग सिद्धांत?

आधुनिक भतिकी के दो आधार हैं। एक तो मैक्स प्लैंक का क्वांटम सिद्धांत और दूसरा आइंस्टाइन का सामान्य सापेक्षता सिद्धांत लेकिन दोनों का कोई तालमेल नहीं है। आइंस्टाइन एक ऐसे सिद्धांत की परिकल्पना करते थे जो सभी परिस्थितियों में सामान्य रूप से लागू हो। आइंस्टाइन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत (१९१६) का उद्देश्य प्रमुखतः यांत्रिकी तथा गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांतों का एकीकरण था किंतु प्रकृति में केवल यही दो बल नहीं होते अपितु दो और बलों - वैद्युत चुम्बकीय बल और नाभिकीय बलों का भी अस्तित्व है। आइंस्टाइन ने अपने जीवन के अंतिम ३० वर्ष सभी प्राकृतिक बलों के लिए एकीकृत क्षेत्र सिद्धांत  का निर्माण करने में बिताए किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली।
    स्ट्रिंग सिद्धांत भौतिकी का एक नव्य चरण है और आइंस्टाइन की परिकल्पना को साकार करने की दिशा में अग्रगामी चरण है क्योंकि यह क्वांटम सिद्धांत और सापेक्षता के सिद्धांत को एकीकृत करके देखता है। इस सिद्धांत को भौतिक घटनाओं में विद्यमान सभी मूलभूत कणों और प्राकृतिक बलों को एकीकृत करने के लिए सबसे अनुकूलतम सिद्धांत समझा जा रहा है।
    इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन आदि मूलभूत कणों को पहले बिंदु सदृश पदार्थ समझा जाता था लेकिन अब माना जा रहा है कि मूलभूत कण तंतु (डोरी, रस्सी) की तरह हैं और ब्रह्मांड तंतुओं/तंत्रियों से भरा पड़ा है। ये ऊर्जा के कांपते, हिचकोले खाते धागे हैं अर्थात् इनमंें स्पंदन होता है और स्पंदन की विभिन्न अवस्थाओं से इलेक्ट्रॉन और क्वार्क आदि की व्याख्या की जा सकती है। यह उत्साहजनक है कि स्ट्रिंग सिद्धांत से जिस एक स्पंदन की गणना की गई थी, वह गुरुत्वाकर्षण से उपजी पाई गई, फलतः पहली बार गुरुत्वाकर्षण को क्वांटम बल के बराबर और संयुक्त पाया गया। स्ट्रिंग सिद्धांत के अनुसार सभी क्रियाएं या तो स्ट्रिंगों के टूटने से होती हैं अथवा उनके संयुक्त होने से और इससे पदार्थों की प्रकृति को समझना कहीं सरल है। 
    हॉकिंग इसी दिशा में सचेष्ट थे कि सापेक्षवाद और क्वांटम यांत्रिकी के सम्मिलन से क्या आदि ब्रह्मांडीय परिस्थितियों का ज्ञान हो सकता है? आइंस्टाइन ने एकीकृत सिद्धांत के विकास हेतु अपने जीवन के अंतिम तीन दशक बिताए लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। अब भौतिकी की नई दिशाएं पुनः एकीकरण की ओर उन्मुख हो रही हैं और जिस नए और रोमांचक सिद्धांत का जन्म हो रहा है, उसे स्ट्रिंग सिद्धांत कहा जा रहा है। इस नए सिद्धांत का आधार स्ट्रिंग है जो ऊर्जा या द्रव्य नहीं है अपितु ऐसे तत्व हैं जिनसे ये निर्मित हुए हैं। तो क्या स्ट्रिंग सिद्धांत सभी चीजों का सिद्धांत बन जायेगा? वैज्ञानिकों को आशा है कि थियरी ऑफ एवरीथिंग बीसवीं शती के दो आधारों - सापेक्षता और क्वांटम यांत्रिकी का एकीकरण कर देगी। वस्तुतः सापेक्षवाद से गुरुत्वाकर्षण की व्याख्या की जाती रही है और क्वांटम सिद्धांत द्रव्य के मूलभूत गुणों की व्याख्या करता है। आदि ब्रह्मांड को समझने के लिए जब सब कुछ अकल्पनीय रूप से एकदम सूक्ष्म था, गुरुत्वाकर्षण का एक संयुक्त क्वांटम सिद्धांत वांछनीय है। हॉकिंग आशावादी थे कि निश्चय ही ऐसे सिद्धांत का प्रतिपादन हो जाएगा, तो क्या इसे हॉकिंग का ही सिद्धांत माना जाएगा?
स्ट्रिंग सिद्धांत से ब्रह्मांड की प्रकृति को सहजता से समझा जा सकता है। प्रो। हॉकिंग भी इससे सहमत थे। वे कहते थे कि यह संभव है लेकिन हमें सीखना होगा कि उसकी व्याख्याओं को कैसे समझाया जाये? 

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