ऐतिहासिक पृष्ठ

(29/Aug/2017)

राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी नीति

शुकदेव प्रसाद


भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीय विकास की बात जब भी उठती है तो हमारे जहन में निःसंदेह नेहरू का नाम उभर कर आता है, भारत के वैज्ञानिक विकास में जिनका अपरितिम योगदान भुलाया नहीं जा सकता है। सही अर्थों में नेहरू भारत में वैज्ञानिक क्रांति के अग्रदूत एवं वैज्ञानिक संस्कृति के पर्याय कहे जा सकते हैं। उन्हीं की व्यक्तिगत रूझान एवं पहल पर देश भर में राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं का जाल फैलाया गया और अनुसंधान एवं विज्ञान कार्यक्रमों का आधारभूत ढांचा तैयार किया गया।
वस्तुतः नेहरू उन थोड़े से राजनायकों में से एक थे, जिनकी विज्ञान में गहरी आस्था थी। देश की तरक्की के लिए वे विज्ञान को बुनियादी भी समझते थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि अंग्रेजों की लूट-खसोट के बाद कंगाल हो चुके भारत की दरिद्रता विज्ञान से ही दूर हो सकती है। उनका यह भी मानना था कि भारत का विकास और उसकी प्रगति विज्ञान पर ही निर्भर है और उसके द्वारा ही देश की सारी आवश्यकताएं पूरी की जा सकती हैं।
इस दिशा में नेहरू का एक क्रांतिकारी कदम था - देश के लिए विज्ञान नीति का निर्धारण। १९५८ में भारत सरकार के विज्ञान नीति संबंधी प्रस्ताव को प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा था - ‘भारत सरकार ने इस बात का निश्चय किया है कि देश की विज्ञान नीति का उद्देश्य वैज्ञानिक वातावरण का निर्माण करना, विज्ञान के सैद्धांतिक, व्यावहारिक, शैक्षणिक सभी पहलुओं को विकसित करना, उनको बढ़ावा देना और उनको स्थायित्व प्रदान करना है और इसके लिए सभी उचित तरीके अपनाए हैं।’ कहना न होगा कि सारे संसार के लिए यह सर्वप्रथम उदाहरण था, जब किसी देश की संसद ने विज्ञान नीति का प्रस्ताव पारित किया हो।
‘हममें से ज्यादातर लोग राजनीति में इतने डूबे रहते हैं कि जिंदगी की बेहतरीन और ज्यादा अहम् चीजों पर गौर ही नहीं कर पाते। विज्ञान ऐसी ही एक चीज है। विज्ञान इस युग की आत्मा है। भविष्य विज्ञान का है और उनका है जो विज्ञान से मित्रता रखेंगे और इंसान को ऊँचा उठाने में विज्ञान की मदद करेंगे।’

(भारतीय विज्ञान कांग्रेस के रजत जयंती अधिवेशन के अवसर पर नेहरू के उद्गार, ३ जनवरी, १९३८, कलकत्ता)


ऐसी थी पं। नेहरू की विज्ञान के प्रति गहरी आस्था। नेहरू का मानना था कि समूची मनुष्य जाति के भविष्य और विज्ञान में गहन अंतर्सम्बन्ध है। नेहरू सदैव यह मानकर चलते थे कि ‘नया हिंदुस्तान’ आजादी मिलने के बाद साइंस और टेक्नॉलॉजी की बुनियाद पर तरक्की करेगा।
तभी तो उन्होंने आजादी के पहले ही घोषित किया था - ‘हमें मुल्क के बाशिंदों के लिए रोटी जुटानी है। उनके लिए कपड़ा, घर, तालीम और इलाज का इंतजाम करना है। इस देश में हम जल्दी से जल्दी किस तरह विज्ञान को भूखे हिंदुस्तान की खिदमत के काम में लगा सकते हैं, यह हम सबको मिलकर सोचना है। मुझे उम्मीद है कि इस मसले पर साइंस कांग्रेस गौर करेगी और उसके लिए सरकार का मुंह न ताकेगी।’

(भारतीय विज्ञान कांग्रेस में नेहरू का अध्यक्षीय भाषण, ३ जनवरी, १९४७)

और आजादी मिलते ही उन्होंने एलान किया था - ‘बाकी सब कुछ रुका रहे, पर खेती नहीं इंतजार कर सकती।’ क्योंकि नेहरू के शब्दों में ‘दरअसल एक भूखे इंसान के लिए या बहुत गरीब मुल्क के लिए आजादी का कोई मतलब नहीं है। इसलिए हमें उत्पादन बढ़ाना है।’

(आकाशवाणी से नेहरू का संदेश, १८ जनवरी, १९४८)

एक ओर तो नेहरू ने खेती में वैज्ञानिक तरीकों के इस्तेमाल से उपज बढ़ाने की चेष्टा की ताकि लोगों को भरपेट रोटी मिल सके तो दूसरी ओर उन्होंने यह कोशिश की कि विज्ञान भारतीय जन जीवन का अभिन्न अंग बन जाए ताकि वैज्ञानिक प्रगति की दौड़ में भारत पीछे न रहे और शीघ्र से शीघ्र विकास की ओर अग्रसर हो जाए। इसके लिए उन्होंने देश में वैज्ञानिक अनुसंधान का माहौल बनाने के लिए देशव्यापी राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं का जाल फैलाया, साथ ही देश के लिए एक विज्ञान नीति जरूरी समझी।
यह निर्विवाद है कि स्वाधीन भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की आधारशिला रखने और उसका आधारभूत ढांचा खड़ा करने में नेहरू का अप्रतिम योग है। नेहरू के बाद जिन्होंने देश की बागडोर संभाली, उन्होंने मात्र उसमें थोड़ा-मोड़ा संशोधन ही किया, लेकिन नीतिगत मूल अवधारणाओं की रूपरेखा नेहरू ने ही निर्मित की थी, जो व्यापक परिप्रेक्ष्य में आज भी प्रासंगिक है। अतः ‘यह स्वाभाविक है कि अन्य क्षेत्रों की ही भांति विज्ञान और प्रौद्योगिकी का नेहरू मॉडल, आज भी हमारा ध्यानाकर्षण करता है।’
भारत के लिए ‘विज्ञान नीति’ का निर्धारण करते समय या देश में वैज्ञानिक विकास का ढांचा निर्मित करते समय नेहरू के मस्तिष्क में एक बात बहुत साफ थी :
‘भारत के संदर्भ में दो बातें हैं, एक तो यह अत्यंत निर्धन अल्पविकिसत राष्ट्र है और सामरिक क्षमताओं में भी कमजोर है, साथ ही यह एक बड़ी ताकत भी है। इन दोनों तथ्यों से देश के प्राथमिक उद्देश्यों का निर्धारण होता है। ये उद्देश्य इस प्रकार हैं - पहले तो देश की जनसंख्या का जीवन स्तर उन्नत करना होगा और वह भी समान रूप से, दूसरे इसको राष्ट्रीय सुरक्षा प्रदान करनी होगी और उस सीमा तक इसे करना होगा कि अपने आकार और महत्व की दृष्टि से शक्ति समीकरणों की विश्व संरचना में अपनी भागीदारी निभा सके।’
दूसरे स्तर की जो आवश्यकताएं हैं, उनकी जड़ें भारत में तीव्र औद्योगीकरण में निहित हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा, विश्व मंच पर भूमिका स्तर, निर्धनता का निवारण, रहन-सहन के स्तरों के उन्नयन के संदर्भ में भारत के राष्ट्रीय उद्देश्यों पर ध्यान देते हुए संगत यह है कि भारत की औद्योगिक रणनीति का उद्देश्य आत्मनिर्भर औद्योगिक प्रणाली का निर्माण करना है।
यद्यपि आत्मनिर्भर औद्योगिक प्रणाली भारत का दूरगामी लक्ष्य हो सकता है लेकिन निकट भविष्य में पूरे किए जाने वाले उद्देश्य दूसरी तरह के हैं। स्वदेशी तकनीकी के आधार पर निर्मित औद्योगिक प्रणाली वाकई एक आदर्श होगी लेकिन पूंजीगत आधार देश में अनुसंधान और विकास क्षमताओं की कमी के कारण ऐसा कर पाने में बहुत विलम्ब होगा और वक्त भी बहुत लगेगा जबकि अपने औद्योगिक कार्यक्रमों के जरिए इन्हें गतिशील बनाने के लिए हम प्रतीक्षा नहीं कर सकते।
तदनुसार आवश्यक औद्योगीकरण की व्यापक परिधि को देखते हुए भारत को स्वतंत्र तकनीकी आयात पर भरोसा करना होगा। जहां संगत हो, वहां ऐसी प्रौद्योगिकी की लाइसेंसिंग भी करनी होगी, जहाँ आवश्यक हो वहाँ विदेशी पूंजी निवेश की भी अनुमति दी जा सकती है। लेकिन लाइसेंस प्राप्त तकनीकी आयात और विदेशी पूंजी निवेश की शर्तें आत्मनिर्भर औद्योगिक संरचना के निर्माण संबंधी भारत के दूरगामी उद्देश्यों के अनुरूप होनी चाहिए। 

विज्ञान नीति १९५८ का संकल्प 

राष्ट्रीय विकास हेतु वैज्ञानिक अनुसंधानों के संगठन एवं निर्देशन हेतु वैज्ञानिक अनुसंधान एवं प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित मंत्रालय की स्थापना (१९५१) करने वाला भारत प्रथम राष्ट्र था। जिस उत्साह के साथ मंत्रालय ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के समर्थन का कार्य अपने हाथ में लिया, उसके बाद अनुसंधान एवं विकास के लिए स्थापित प्रयोगशालाओं एवं विज्ञान, प्रौद्योगिकी तथा उद्योगों संबंधी विभिन्न परामर्श समितियों में वैज्ञानिकों एवं प्रौद्योगिकीविदों की भागीदारी एवं प्रतिनिधित्व का हाथ है। इसके अतिरिक्त देश के आर्थिक एवं सामाजिक परिवर्तनों में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की भूमिका की चर्चा हर पंचवर्षीय योजना के घोषणापत्र में बड़ी प्रमुखता से की जाती रही है। इस दिशा में भारतीय संसद द्वारा १९५८ में विज्ञान नीति का अपनाया जाना सबसे बड़ा एवं महत्वपूर्ण चरण था।
विज्ञान नीति का संकल्प ४ मार्च, १९५८ को घोषित किया गया और विज्ञान नीति के वक्तव्य को देश के प्रथम प्रधानमंत्री स्व। पं। जवाहर लाल नेहरू ने लोकसभा में १३ मार्च, १९५८ को पढ़ा। विज्ञान नीति निम्न घोषणाएं करती है :

  • राष्ट्रीय समृद्धि की कुँजी, लोगों के उत्साह के अतिरिक्त, आधुनिक युग में तीन कारकों-प्रौद्योगिकी, कच्चे माल और पूंजी के प्रभाव संयोग में निहित है, जिनमें पहला कारक सबसे महत्वूपर्ण है, नई वैज्ञानिक तकनीकों के सृजन और उनके अपनाए जाने से वास्तव में, प्राकृतिक संसाधनों की कमी पूरी की जा सकती है और पूंजी की मांग घटाई जा सकती है। लेकिन विज्ञान के अध्ययन और इसके अनुप्रयोग से ही प्रौद्योगिकी विकसित होगी।
  • व्यापक पैमाने पर विज्ञान का तीव्र संवर्धन और देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए इसका उपयोग समकालीन विश्व का प्रभावी रूप है। यह मनुष्य जाति के इतिहास में पहली बार संभव हुआ है कि विज्ञान के मामलों में समस्त राष्ट्रों में आम आदमी के रहन-सहन स्तर, सामाजिक तथा सांस्कृतिक आवश्यकताओं को तरजीह दी गई है, जबकि कभी जनसंख्या के अत्यंत छोटे से हिस्से के लोगों तक ही ऐसी प्राथमिकताएं सीमित थीं। विज्ञान ने संस्कृति को उस सीमा तक बढ़ाया और विस्तारित किया है, जितना आज से पहले कभी संभव नहीं था। इससे न केवल मनुष्य के आर्थिक जगत में अमूल परिवर्तन हुआ, बल्कि इसका और गहन महत्व है कि इसने विचार के लिए नए उपस्कर प्रदान किए हैं और मनुष्य के क्षितिज का विस्तार किया है। इस तरह इसने आधारभूत जीवन मूल्यों को भी प्रभावित किया है, सभ्यता को नई जीवनी शक्ति आौर गतिशीलता प्रदान की है।
  • समुदाय के हर व्यक्ति की उचित वस्तुओं, सांस्कृतिक आवश्यकताओं और सेवाओं की आपूर्ति वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विधियों तथा वैज्ञानिक ज्ञान के उपयोग के ही द्वारा की जा सकती है और यह इस विचार की प्रतिश्रुति है कि एक कल्याणकारी राज्य की संकल्पना पनप चुकी है। आधुनिक विश्व का सामान्य लक्षण है कि औद्योगीकरण की मात्रा, वैज्ञानिक कामकाजों में किए गए प्रयासों और प्रयुक्त किए गए संसाधनों के संदर्भ में, एक कल्याणकारी राज्य के व्यावहारिक अनुभवों की दिशा में हुई प्रगित देश-देश में काफी भिन्न है।
  • राष्ट्र का वैभव और समृद्धि औद्योगीकरण के द्वारा अपने लोगों और आर्थिक संसाधनों के प्रभावी उपयोग पर निर्भर है। औद्योगीकरण के लिए मानव शक्ति का उपयोग विज्ञान की शिक्षा, तकनीकी कौशलों में प्रशिक्षण की मांग करता है। उद्योग लोगों की महती आकांक्षाओं की आपूर्ति की संभावनाओं के द्वार खोलता है। भारत में मानव शक्ति के रूप में मौजूद प्रभूत संसाधन प्रशिक्षित और शिक्षित होने पर आधुनिक विश्व में एक परिसम्पत्ति सिद्ध हो सकता है।
  • प्रतिस्थापनों के लिए, या सही अर्थों में, कौशल के द्वारा विज्ञान और प्रौद्योगिकी कच्चे मालों का अभाव दूर कर सकती है। उसी राष्ट्र का औद्योगीकरण करते समय, संयंत्र और मशीनरी तथा उच्च वेतनमान वाले कार्मिक एवं तकनीकी परामर्शदाताओं के रूप में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के आयात में काफी ऊंची कीमतें चुकानी पड़ती हैं। औद्योगीकरण के प्रारम्भिक एवं संक्रमण शक्ति में पूंजी का जो खिंचाव है, उसे शीघ्र एवं व्यापक पैमाने पर देश में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का विकास काफी कम कर सकता है।
  • इस शती के आरम्भ से ही सदैव वर्धनशील गति से विज्ञान ने तरक्की की है, अतः उन्नत और पिछड़े राष्ट्रों के बीच की खाई अधिक से अधिक होती गई है। विज्ञान के विकास की राह में अधिक शक्तिशाली साधनों को अपना कर अपने हर संभव प्रयास को सामने लाकर ही इस खाई को कम किया जा सकता है। वैदुष्य, मौलिक चिंतन और महान विरासत की परम्परा वाले भारत जैसे महान देश का सहज दायित्व है कि पूरे मन से विज्ञान की यात्रा में भाग ले, जो कि आज संभवतः मनुष्य जाति का महानतम उद्यम है।
  • तदनुसार, भारत सरकार ने निश्चय किया है कि उसकी विज्ञान नीति के निम्न उद्देश्य होंगे :
  1. विज्ञान के संवर्धन और इसके सभी पहलुओं - सैद्धांतिक, व्यावहारिक और शैक्षिक में अनुसंधान को समुचित तरीके से तीव्र करना, विकसित करना और उन्हें स्थायित्व प्रदान करना।
  2. देश के अंदर उच्चतम गुणवत्ता वाले अनुसंधान वैज्ञानिकों की उपलब्धता को सुनिश्चित करना और राष्ट्र के शक्ति के महत्वपूर्ण घटक के रूप में उनके कार्यों को मान्यता देना।
  3. वैज्ञानिक एवं तकनीकी कार्मिकों के प्रशिक्षण के कार्यक्रम को हर संभव गतिशीलता के साथ उस समुचित स्तर पर प्रारम्भ करना और प्रोत्साहित करना जिससे कि विज्ञान और शिक्षा, कृषि और उद्योग तथा प्रतिरक्षा के मामलों में वे देश की जरूरतों को पूरा कर सकें।
  4. इस बात को सुनिश्चित करना कि पुरूषों और महिलाओं की सृजनात्मक प्रतिभा को प्रोत्साहन दिया जा रहा है और वैज्ञानिक गतिविधियों में उसे पूर्ण विस्तार मिल रहा है।
  5. शैक्षणिक स्वातंत्र्य के वातावरण में, नए ज्ञान की खोज के लिए, ज्ञान के अर्जन एवं उसके प्रसार के व्यक्तिगत पहल को प्रोत्साहित करना।
  6. और सामान्यतः, वैज्ञानिक ज्ञान के अर्जन एवं उसके संप्रयोग से जो सभी लाभ हो सकते हैं, उन्हें देश के लोगों के लिए संरक्षित करना।

भारत सरकार ने यह निश्चय किया है कि वैज्ञानिक को बेहतर सेवाएं मुहैया कराकर और उसी अनुरूप उन्हें सम्मान जनक स्थान देकर नीतियों के निर्धारण में वैज्ञानिकों को सम्मिलित करके, और समय-समय यथा आवश्यक ऐसे अन्य उपायों को अपना कर इन उद्देश्यों को पूरा किया जाएगा।

आधारभूत अनुसंधान

भारत के सुदीर्घ इतिहास में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी दोनों में इसकी एक विशिष्ट परंपरा रही है। गणित, खगोल विद्या, रसायन एवं वैज्ञानिक कौशल के अन्य क्षेत्रों में भारतीय वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण मौलिक गवेषणाएं की हैं। भारत में औपनिवेशिक काल के पूर्व की कुछ शतियों में अलबत्ता इस दिशा में कुछ व्यवधान आया था। फिर भी, आजादी के पूर्व जे.सी.बसु, सी.वी.रामन्, एस.एन.बसु, मेघनाद साहा, बीरबल साहनी, श्रीनिवास रामानुजन, पी.सी.महलनबीस, होमी भामा, विक्रम साराभाई, एस.चन्द्रशेखर प्रभृति वैज्ञानिकों के अवतरण से भारतीय विज्ञान में पुनर्जागरण हुआ। यह जानना महत्वपूर्ण है कि इनकी महान खोजें देश के उच्च शिक्षा केन्द्रों में की गई थीं और ये सभी आधारभूत रूझान के दायरे में की गई थीं।
आजादी के बाद के काल में मौलिक अनुसंधानों को काफी प्रोत्साहन दिया गया। ऐसे कई संस्थानों को समर्थन दिया गया और कई संस्थान खोले भी गए। ऐसे प्रमुख संस्थान हैं -टाटा आधारभूत अनुसंधान संस्थान, बम्बई ;ज्ंजं प्देजपजनजम वि थ्नदकंउमदजंस त्मेमंतबीए ज्प्थ्त्द्ध, (वस्तुतः भारत के परमाणु कार्यक्रमों का श्रीगणेश यहीं हुआ)। अहमदाबाद स्थित भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला ;च्ीलेपबंस त्मेमंतबी स्ंइवतंजवतलए च्त्स्द्ध, यहाँ पर भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम पुष्पित और पल्लवित हुए। कलकत्ता स्थित, साहा इंस्टिट्यूट ऑफ न्यूक्यिलर फिजिक्स, बंगलौर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स; कलकत्ता स्थित इंडियन एसोसिएशन फॉर दि एडवांस्मेंट ऑफ साइंस और बोस इंस्टीट्यूट; लखनऊ स्थित बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पोलियो बाटनी, देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी; बंगलौर स्थित रामन् रिसर्च इंस्टीट्यूट; मद्रास स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिक्स; दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ इम्यूनोलॉजी आदि संस्थानों के उदय से देश में मौलिक अनुसंधानों को बल और त्वरण मिला। इन संस्थानों को परमाणु ऊर्जा/अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभागों की ओर से अनुदान/आर्थिक सहयोग मिलता रहा है। इसी तरह सी.एस.आई.आर.द्वारा संचालित प्रयोगशालाओं में पूर्णतः अथवा पर्याप्त मात्रा में आधारभूत मौलिक अनुसंधानों पर बल दिया जाता रहा है।
छठीं योजना में आधारभूत अनुसंधानों के समर्थन एवं उन्हें बल प्रदान करने की आवश्यकताओं पर खासा महत्व दिया गया। खासकर विश्वविद्यालयों में गिरते शोध स्तरों को पुनः त्वरित करने की जरूरत महसूस की गई जो कि पहले ध्यान न दिए जाने के कारण ह्रासित हो गया है। राष्ट्रीय जैव प्रौद्योगिकी बोर्ड, परमाणु ऊर्जा विभाग, अंतरिक्ष विभाग, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद्, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् (आई.सी.ए.आर.), भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद् (आई.सी.एम.आर.) जैसी एजेन्सियों के समर्थन से देश में आधारभूत अनुसंधानों को गति मिली है। मैसूर में (३-७ जनवरी, १९८२) आयोजित भारतीय विज्ञान कांग्रेस ने अपनी चर्चा के लिए केन्द्रीय विषय रखा - ‘आधारभूत अनुसंधान : विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के आत्मनिर्भर आधार का अभिन्न घटक’। अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रो.एम.जी.के। मेनन ने कहा - ‘आत्मनिर्भरता राष्ट्रीय प्रतिबद्धता एवं राजनीतिक अभिलाषा की मांग करती है और प्रौद्योगिकी नीति, प्रबंध एवं तकनीकी कौशल जैसे कई पक्षों का सम्मिलन चाहती है। लेकिन एक बात साफ है कि आज के विश्व में, जिसमें अर्थव्यवस्था और जीवनशैली वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रगति से प्रभावी होती जा रही है, आत्मनिर्भरता का मुख्य तत्व विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का आत्मनिर्भर आधार होना चाहिए और यह रूप बिना महत्वपूर्ण आधारभूत अनुसंधान के नहीं निर्मित किया जा सकता है।’
‘विकासशील देशों में आधारभूत अनुसंधानों की भूमिका’ पर नई दिल्ली में फरवरी १९८२ में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में बोलते हुए श्रीमती गांधी ने महसूस किया कि आत्मनिर्भरता सभी देशों के लिए आवश्यक है खासकर भारत जैसे देश के लिए जिसकी समस्याएं बहुत प्रचुर हैं और जिन्हें आर्थिक अथवा बौद्धिक बाह्य सहायताओं से सुलझाया जा सकता है। विज्ञान एवं तकनीकी योजनाओं के केन्द्र में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य होना चाहिए। आत्मनिर्भरता का तात्पर्य यह कतई नहीं है कि चीज हम स्वयं बनाएं बल्कि ऐसा कर पाने की सक्षमता हासिल करने से है ताकि जरूरत पड़ने पर ऐसा कर सकें।’
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने लोकसभा में १० अप्रैल, १९८६ को आम आदमी के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा - ‘हमारे वैज्ञानिकों के पीछे उनकी खासी उपलब्धियां हैं। उन्होंने हमें आधारभूत क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता प्रदान की है। चाहे वह खाद्य हो, अथवा प्रतिरक्षा के निश्चित रणनीतिक क्षेत्र हों, या अंतरिक्ष अथवा नाभिकीय विज्ञान, उन्होंने यह दिखा दिया है कि यहां भी चुनौतियां हैं, वे उन्हें स्वीकारने को तैयार हैं और अवसर तथा पूरा समर्थन दिए जाने पर वे भारत को आगे ले जाने की क्षमता रखते हैं।’
पूर्व प्रधानमंत्री ने अपने अभिभाषण में राष्ट्रीय टेक्नॉलॉजी मिशन की स्थापना की बात की, जो पेयजलापूर्ति, दुग्ध उत्पादन, साक्षरता, दूरसंचार, टीकाकरण, खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता आदि लक्ष्यों की प्राप्ति को लेकर गठित की गई थी। १९८५ में सैम पित्रोदा के निर्देशन में गठित उक्त मिशन काफी कामयाब रहा है।
सातवीं योजना में विज्ञान संबंधी योजनाओं पर पुनर्विचार किया गया और ऐसी चेष्टा की गई कि योजनाओं, वैज्ञानिक प्रयोग का समाज पर सीधे प्रभाव पड़ सके।

प्रौद्योगिकी नीति घोषणापत्र 

भारतीय विज्ञान कांग्रेस के तिरुपति अधिवेशन में स्व। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने ३ जनवरी, १९८३ को भारत सरकार के प्रौद्योगिकी नीति की घोषणा की, जिसके उद्देश्य इस प्रकार हैं -

  1. प्रौद्योगिक दक्षता और आत्मनिर्भरता प्राप्त करना, विशेष रूप से सुरक्षा की दृष्टि से तथा अन्य महत्वपूर्ण और नाजुक क्षेत्रों में सुभेद्यता को कम करना, स्वदेशी संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना।
  2. समाज के सब स्तरों के लोगों को अधिकतम मात्रा में लाभदायक एवं संतोषप्रद रोजगार उपलब्ध कराना, स्त्रियों एवं समाज के कमजोर वर्गों को रोजगार दिलाने पर जोर देना।
  3. परम्परागत दस्तकारियों और हस्तकौशल का उपयोग करना जिससे वे व्यावसायिक रूप से लाभदायी बन सकें।
  4. बड़े पैमाने पर उत्पादन हेतु प्रौद्योगिकियों और जनता की उत्पादन तकनीकी का समुचित समन्वयन।
  5. न्यूनतम पंूजी से अधिकतम विकास कार्य।
  6. इस्तेमाल की जा रही बेकार तकनीकों का पता लगाना और उपकरण तथा प्रौद्योगिकी दोनों के आधुनिकीकरण की व्यवस्था करना।
  7. ऐसी प्रौद्योगिकियां विकसित करना, जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लाभदायक हों, विशेष रूप से वे प्रौद्योगिकियां जिनमें निर्यात संभावनाएं हों।
  8. बेहतर दक्षता से तथा वर्तमान क्षमताओं का और अधिक उपयोग करके तेजी से उत्पादन बढ़ाना, साथ ही निष्पादन और उत्पादन की गुणवत्ता व विश्वसनीयता बढ़ाना।
  9. ऊर्जा, विशेष रूप से परम्परागत ऊर्जा की मांग को कम करना।
  10. पर्यावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करना, पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना और प्राकृतिक विकास स्थलों की गुणवत्ता में सुधार करना, और
  11. व्यर्थ पदार्थों को पुनः चक्र में लाना ;त्मबलबसमद्ध तथा उपोत्पादों ;ठल च्तवकनबजद्ध का पूर्ण उपयोग करना।

जब से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी नीति के प्रस्ताव भारत सरकार ने पास किए हैं, तब से देखा जाए तो विकास कार्यों में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के प्रभाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होते हैं।

  • भारत एक प्रथम श्रेणी की वैज्ञानिक अधः संरचना ;प्दतिं ैजतनबजनतमद्ध स्थापित करने में सफल रहा है जिसमें शैक्षणिक, अनुसंधान एवं विकास संस्थान भी सम्मिलित हैं।
  • भारत में संसार की तुलना में अपेक्षाकृत तीसरे अथवा चौथे वैज्ञानिक एवं तकनीकी मानव शक्ति का विकास हुआ।
  • अद्यः संरचनाओं तथा मानव शक्ति का उद्योग के साथ होने वाले क्रियाकलाप कुछ हद तक सीमित रहे।
  • अनुसंधान एवं विकास अधःसंरचना के प्रयास की दिशा आयात प्रतिस्थापन तथा निर्यात संवर्धन की तरफ निर्देशित थी। इन दोनों ही माध्यमों से यह चेष्टा की गई कि ऐसी वस्तुओं, जिनका उत्पादन यूरोप और अमेरिका में हो रहा है, उत्पादन के लिए स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकसित की जाए।

नई प्रौद्योगिकी नीति के संदर्भ में १९९३ में एक मसौदा तैयार किया गया जिसमें प्रौद्योगिकी के अधिकाधिक सम्प्रयोग, प्रौद्योगिकी के विभिन्न तरीकों और उपकरणों की समाज के सभी वर्गों तक पहुँच, आधारभूत सुविधाओं के विस्तार, पारंपरिक शिल्पों को श्रेष्ठतर बनाने और प्रौद्योगिकियों में अंतर्राष्ट्रीय स्तरों के अनुरूप सुधार लाने पर जोर दिया गया है।

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