ऐतिहासिक पृष्ठ

(19/Aug/2017)

नेहरू का उदय और भारतीय विज्ञान पर उनका प्रभाव

शुकदेव प्रसाद
 
भारतीय विज्ञान का नेहरू युग वस्तुतः भारतीय विज्ञान के उत्कर्ष का युग कहा जा सकता है। स्वाधीनता की संधि बेला में भारतीय राजनीतिक क्षितिज पर पंडित जवाहर लाल नेहरू उदित हुए और उन्होंने विज्ञान के मूलभूत और सम्प्रयुक्त प्रौद्योगिकियों के अनुसंधान कार्यों को त्वरित किया, निर्णय लेने की प्रक्रिया में वैज्ञानिकों की भागीदारी को आवश्यक माना, भारतीय विज्ञान की समुन्नति में इसे नया मोड़ माना जा सकता है। राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं का देशव्यापी जाल, राष्ट्रीय विज्ञान नीति और भारी उद्योगों की स्थापना आदि नेहरू के मौलिक उद्भाव हैं जिनसे भारतीय विज्ञान में तेजी से अनुसंधान आरम्भ हुए और उससे एक सुदृढ़ आधारशिला निर्मित हुई, जो कि भावी शोधकर्ताओं के लिए पथप्रदर्शक की भूमिका निभाने में सक्षम थी।
 
नेहरू का मानना था कि भविष्य में उन्हीं के साथ है जो विज्ञान को बढ़ावा देते हैं और वैज्ञानिकों से मित्रता रखते हैं। वस्तुतः नेहरू विज्ञान और प्रौद्योगिकी को भारतीय जन-जीवन और भारतीय संस्कृति का अभिन्न और अनिवार्य अंग बना देना चाहते थे। सच यही है कि नेहरू स्वाधीन भारत में वैज्ञानिक क्रांति के अग्रदूत और वैज्ञानिक संस्कृति के जनक थे। उन्हीं के अथक प्रयासों की आधारशिला पर ही आज वैज्ञानिक भारत का भव्य प्रासाद निर्मित हो सका है। वर्तमान भारत में वैज्ञानिक ज्ञान के प्रसार और प्रौद्योगिक विस्तार का जो ढांचा निर्मित हो पाया है, उसकी समूची आयोजना भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने तैयार की थी। आजादी के पूर्व तक अंग्रेजों की यही चेष्टा और मंशा रही कि भारत उनके लिए कच्चे माल का आपूर्तिकर्त्ता तथा ब्रिटिश निर्माताओं के उत्पादनों का उपभोक्ता बना रहे। इस नाते ब्रिटिशकालीन भारत में ऐसे उद्योग पनपने ही नहीं दिए गए जो आत्मनिर्भरता की ओर भारत की गतिशीलता में अपनी कोई भूमिका निबाहें और इसी नाते जब-जब देशवासियों ने औद्योगिक तानाबाना बुना तो उन्हें कदम-कदम पर मुसीबतें झेलनी पड़ीं फिर भी भारत शनैः-शनैः विकास की राहें खोजता रहा। उद्योग ही नहीं, शिक्षा, अनुसंधान आदि सभी क्षेत्रों में भारतवासियों की न तो सराहना ही की जाती थी और न कोई प्रोत्साहन मिलता था। लेकिन जब, १९४७ में ब्रिटिश उपनिवेश का ध्वंस हो गया तो भारत ने आजादी की नई हवा में सांस ली और विकास के लिए अपने पंख पसारे। ऐसी संक्रमण बेला में महान् स्वप्नदर्शी नेहरू ने देश में औद्योगिक विस्तार का ताना-बाना बुना और आजाद भारत में औद्योगिक क्रांति के बीज बोए। नए-नए उद्योगों को उन्होंने न सिर्फ प्रश्रय दिया, अपितु देश में वैज्ञानिक शिक्षा और अनुसंधान का खासा माहौल भी बनाने की हर संभव चेष्टा की। उन्होंने देश में विज्ञान की जो अलख जगायी, उससे जो ‘साइंटिफिक टेम्पो’ बना, वह निरन्तर आगे बढ़ता ही गया और दो दशकों के अन्दर ही विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर खासी धाक जम गयी।
 
वैज्ञानिक क्रांति के अग्रदूत नेहरू
 
नेहरू जानते थे कि अंग्रेजों की लूट-खसोट, प्राकृतिक संपदाओं के अंधाधुंध दोहन, छिन्न-भिन्न अर्थव्यवस्था की विरासतों के साथ भारत को अपनी मंजिल पानी है। अतः बिना औद्योगिक प्रसार के दरिद्र भारत विकास कर ही नहीं सकता, इसलिए उन्होंने इसके लिए ठोस ढांचा निर्मित किया। विज्ञान के देशव्यापी विस्तार के लिए सबसे पहले ‘वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद’ ;ब्वनदबपस वि ैबपमदजपपिब ंदक प्दकनेजतपंस त्मेमंतबी . ब्ैप्त्द्ध की स्थापना की गई, जिसके प्रथम निदेशक थे प्रो। शांति स्वरूप भटनागर और पंडित नेहरू अध्यक्ष थे। सी.एस.आई.आर। के अन्तर्गत देश भर में ‘राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं’ ;छंजपवदंस स्ंइवतंजवतपमेद्ध की शृंखला फैलायी गई। पंडित नेहरू ने वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं को ‘विज्ञान मन्दिरों’ की संज्ञा दी थी।
१९३९ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पंडित जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में एक ‘राष्ट्रीय योजना समिति’ का गठन किया था। समिति ने देश के आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लिए योजना बनाने हेतु देश के गणमान्य वैज्ञानिकों का आह्वान किया कि वे भावी भारत के निर्माण में अपनी अग्रणी भूमिका निभायें। इस तरह एक ही मंच पर राजनयिकों और वैज्ञानिकों के साथ-साथ विचार-विमर्श के उपरांत पंडित नेहरू ने १९५८ में देश की संसद से भारत के लिए ‘विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति’ पारित की। सारी दुनिया के लिए यह सर्वप्रथम उदाहरण था, जब किसी देश की संसद ने विज्ञान नीति का प्रस्ताव पारित किया हो। पंडित नेहरू की दूर दृष्टि का ही यह सुखद परिणाम था कि देश में वैज्ञानिक अनुसंधान और वैज्ञानिक ज्ञान के प्रसार का माहौल बना। इतना ही नहीं, नेहरू ने विज्ञान नीति के कार्यान्वयन के लिए कई कदम उठाये थे :
  • वैज्ञानिकों के समक्ष उन्होंने सामाजिक समस्याओं को रखा तथा उनके हल ढूंढ़ने के लिए वैज्ञानिकों को प्रेरित किया 
  • विभिन्न समितियों में वैज्ञानिकों को सम्मिलित करके प्रशासकों को विज्ञान की उपयोगिता के बारे में सजग किया।
  • निर्णय लेने की प्रक्रिया में वैज्ञानिकों की सहभागिता की परम्परा उन्होंने ही आरम्भ की।
  • देश के सुधार कार्यों में वैज्ञानिक ज्ञान का उपयोग यथा-मीट्रिक प्रणाली का चलन, भारतीय कैलेन्डर (राष्ट्रीय पंचांग) का निर्माण आदि उन्होंने कराया।
  • विज्ञान और प्रौद्योगिकी को उन्होंने भरपूर समर्थन दिया। उद्योगपतियों, प्रशासकों और अपनी पार्टी के कई विरोधियों के बावजूद देश के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक आधार तैयार करने में खासा श्रम किया। प्रयोगशालाओं में खुद जा-जा कर वे शोध-कार्यों और वहाँ हो रही प्रगति का जायजा लेते रहते थे।
वस्तुतः नेहरू विश्व के उन थोड़े से राजनयिकों में से एक थे जिनकी विज्ञान में गहन आस्था थी। उनका मानना था कि राष्ट्रीय उत्थान में प्रौद्योगिकी अपनी महती भूमिका निभा सकती है। नेहरू अक्सर कहा करते थे - ‘भविष्य उन्हीं के साथ है, जो विज्ञान को बढ़ावा देते हैं और वैज्ञानिकों से मित्रता रखते हैं।’ नेहरू इस बात के भी कायल थे कि अंधविश्वासों से ग्रस्त समाज में केवल संस्थान स्थापित करने या शोध सुविधाएँ प्रदान कर देने मात्र से विज्ञान नहीं पनपेगा। उनका मानना था कि उसके लिए देश में वैज्ञानिक अभिरूचि जागृत करनी होगी और उन्होंने इसका प्रयास भी किया। बार-बार उन्होंने वैज्ञानिकों का ध्यान भी इस ओर आकर्षित किया। वस्तुतः नेहरू विज्ञान और प्रौद्योगिकी को भारतीय जन-जीवन और भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग बना देना चाहते थे और इस ज्ञान-यज्ञ में उन्होंने भरपूर हामी भी दी। उन्हीं के अथक प्रयासों की आधारशिला पर ही आज वैज्ञानिक भारत का शानदार भवन निर्मित हो सका है।
 

वैज्ञानिकों के प्रति मैत्री भावना

नेहरू राजनीति की दुनिया के जीव थे लेकिन उनकी विज्ञान के प्रति अनन्य अभिरूचि थी। नेहरू संसार की एक ऐसी राजनीतिक विरल विभूति थे जो अपनी व्यस्तताओं के बीच भी समय निकाल कर देश की प्रयोगशालाओं में जाते और वहाँ हो रही प्रगति का जायजा लेते रहते थे। इस मायने में नेहरू विश्व की राजनीतिक विभूतियों में दुर्लभ और विलक्षण व्यक्तित्व थे। प्रयोगशालाओं में देश के युवा प्रातिभ विज्ञानियों का काम देखकर आह््लादित हो जाते और उनकी हौसला अफजाई करके उन्हें भी रोमांच से लबरेज कर देते थे - ‘मैं जब अपने युवकों और युवतियों के चेहरों को देखता हूँ तो मुझे उनमें कल के भारत की झलक मिलती है। वे ही रिएक्टर और ऐसी ही अनेक चीजों को आगे चलकर बनाएंगे और भारत का नक्शा बदल देंगे, भारत की विचारधारा बदल देंगे। जब मुझे कभी ट्रांबे आने का अवसर मिला है, मुझे यहाँ काम करने वाले वैज्ञानिकों को देखकर खुशी हुई है, संतोष मिला है, क्योंकि मुझे अपनी दृष्टि में भारत का भविष्य नज़र आता है- उस भारत का जिसमें आत्मा के प्रति, विज्ञान में सत्य की खोज के प्रति, घिसी-पिटी लीकों और पुरानी रूढि़यों को छोड़कर आगे बढ़ने के प्रति आस्था होगी।’
नेहरू की इस विज्ञान-मैत्री भावना की पूर्ण अभिव्यक्ति उनके उस उद्बोधन में है जो उन्होंने जनवरी १९६१ में ट्रांबे स्थित परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों के उद्घाटन के अवसर पर व्यक्त किया था- ‘यह सत्य है कि हम वर्तमान के लिए काम कर रहे हैं क्योंकि हम वर्तमान में रहते हैं किंतु अपने इस कार्य द्वारा हम भविष्य पर भी काबू पा लेंगे और वह स्वयं ही खुलकर हमारे सामने स्पष्ट हो जायेगा। इसलिए जब मैं इस शानदार गुंबज को देखता हूँ तो मुझे आनंद मिलता है, उत्साह का अनुभव होता है। इस विशाल गुंबज के अतिरिक्त जिन्हें देखकर मुझे और भी अधिक आनंद और उत्साह का अनुभव होता है, वह हैं यहाँ पर काम करने वाले हजारों नौजवान वैज्ञानिक। जब मैं उनके श्रीपूर्ण दमकते चेहरों को देखता हूँ तो मुझे उनमें शक्ति के, उत्साह के और खोज के लिए इच्छुक दृष्टि के दर्शन होते हैं। ऐसी थी नेहरू की विज्ञान और विज्ञानियों के प्रति गहन आस्था। सच यही है कि अप्रतिम थी नेहरू की विज्ञान भावना और विज्ञान के प्रति उनका समर्पण भाव।’
 

हरित क्रांति के सपने

यह कहना तो गैर मुनासिब होगा कि नेहरू भारत में हरित क्रांति के अग्रदूत थे लेकिन यह जरूर सच है कि नेहरू ने स्वाधीन भारत में हरित क्रांति के सपने जरूर देखे थे। देश में हरित क्रांति के सपने को साकार करने में प्रेरक की भूमिका निभायी डॉ। नार्मन बोरलॉग ने और आगे चलकर एम। एस। स्वामीनाथन् और उनके सहयोगी कृषि विज्ञानियों ने। पर यहाँ इस बात का उल्लेख अवश्य किया जाना लाजिमी है कि नेहरू ने देश में हरित क्रांति के बीज का वपन किया था ताकि देश को भुखमरी के अभिशाप से मुक्त किया जा सके।
१८ जनवरी, १९४८ को आकाशवाणी से ‘अधिक अन्न उपजाओ’ कार्यक्रम की उद्घोषणा करते हुए नेहरू ने कहा था- ‘दरअसल एक भूखे इंसान के लिए या बहुत गरीब मुल्क के लिए आजादी का कोई मतलब नहीं है। इसलिए हमें उत्पादन बढ़ाना चाहिए।’ नेहरू का आह्वान था- ‘बाकी सब कुछ रुक सकता है पर खेती इंतजार नहीं कर सकती।’ दरअसल बंग विभाजन, दुर्भिक्ष-अकाल, भारत-पाक विभाजन से उपजे आर्थिक अधिभार से दम तोड़ते कोटि-कोटि भारतीयों के लिए उनके मन में गहन पीड़ा था। वह दरिद्र भारत को नवीन त्वरा देकर देश को आत्मनिर्भर बनाने के पक्षधर थे और इसके लिए उन्होंने प्रयास भी किए। परिणाम यह है कि जो भारत अपनी जनता को दो वक्त की रोटी देने को कभी मुंहताज था, आज वह अन्न निर्यातक राष्ट्र बन गया है। कदाचित यहाँ सुप्रसिद्ध कृषि विज्ञानी स्वामीनाथन् की टिप्पणी समीचीन होगी, ‘गरीबी-अमीरी के बीच की खाई को मिटाने के लिए नेहरू ने विज्ञान का मुँह गाँवों की ओर मोड़ा। आजादी के बाद ही सिंदरी में पहला उर्वरक कारखाना खुला, सिंचाई योजनाएँ शुरू हुईं और कृषि के लिए नए रास्ते खुले। उन्हीं की डाली बुनियाद का फल है कि हम खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता प्राप्त कर पाए हैं।’
देश का पहला कृषि विश्वविद्यालय उत्तर प्रदेश (अब उत्तराखण्ड) के पंतनगर (नैनीताल) में स्थापित किया गया था। १७ नवंबर, १९६० को इसके उद्घाटन के अवसर पर पूरे देश के किसानों को इसे समर्पित करते हुए पंडित नेहरू ने कहा था- ‘यह विश्वविद्यालय तो किसानों के घर जैसा होना चाहिए।’ निस्संदेह ‘लैब टू लैंड’ की संकल्पना के प्रथम खोजी नेहरू ही थे। विज्ञान की जन-जीवन में पैठ होनी चाहिए, तभी एक नव संस्कृति विकसित होगी, नेहरू की स्पष्ट धारणा थी। वह अक्सर कहा करते थे कि अंधविश्वासों से ग्रस्त समाज में केवल संस्थान स्थापित करने या कि शोध सुविधाएं प्रदान कर देने मात्र से विज्ञान नहीं पनपेगा। भारत वस्तुतः एक खेतिहर समाज है जहाँ कृषि ‘मानसून का जुआ’ है। इस चुनौती के लिए नेहरू ने समांतर प्रयास किए। एक तरफ उन्होंने कृषि में वैज्ञानिक निवेश की आवश्यकता पर बल दिया- ‘हमें अपनी खेती को वैज्ञानिक रूप देना है, विज्ञान से लाभ उठाना है। जैसी अन्य मुल्कों में कृषि में तरक्की हुई है, वैसा ही अपने देश में करना है।’ और दूसरी तरफ उन्होंने एक और सपना देखा - ‘हर खेत को पानी’। शनैः-शनैः भाखड़ा नांगल, गांधी सागर, गंडक, कोसी, नागार्जुन सागर, हीराकुंड, तुंगभद्रा, महा प्रभा और घट प्रभा बांध जैसी विशाल सिंचाई परियोजनाओं ने नेहरू के इस सपने को रूपाकार प्रदान किया और इसी का सुफल है कि आज भारत खाद्यान्न निर्यातक राष्ट्र बन गया है।
 

ग्रामीण भारत का पुनर्निर्माण

प्रथम पंच वर्षीय योजना में ही नेहरू ने गाँवों के पुनर्निमाण हेतु सामुदायिक योजनों का शुभारंभ किया क्योंकि उनका मानना था- ‘मेरे लिए सामुदायिक योजनाएँ बहुत अहमियत रखती हैं। सिर्फ इनसे होने वाले भौतिक लाभों की वजह से नहीं बल्कि बहुत कुछ इस वजह से कि इनका उद्देश्य इंसान और समुदाय का निर्माण करना है और इंसान को इस लायक बनाना है कि वह अपने गाँव और व्यापक अर्थ में समूचे भारत का निर्माण कर सके।’ उक्त संदर्भ में उनका दृढ़ विश्वास था कि ‘सामुदायिक योजनाएं यदि ठीक से लागू की जाएँ तो ये क्रांतिकारी सिद्ध होंगी। हमने पहले गाँवों की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और जब तक हम उनका विकास नहीं करेंगे, हम पिछड़े रह जायेंगे।’
नेहरू की तमाम कोशिशों के बावजूद ये चीजें मंथर गति से चलती रहीं। योजनागत विकास भी भारत के लिए नया-नया अनुभव था। आरंभ में खेती ने जोर नहीं पकड़ा तो उसे नेहरू ने तुरंत भांप लिया और पिछड़ती खेती को देखकर उनके धीरज का बांध टूट गया। तभी तो उन्होंने कहा था कि सब कुछ इंतजार कर सकता है पर खेती नहीं। नेहरू खेती में त्वरा लाने के लिए उसमें आधुनिकता का, वैज्ञानिकता का निवेश चाहते थे जिसका विरोध भी हुआ पर उन्होंने इसका दृढ़ प्रतिवाद करते हुए कहा- ‘मैं उन लोगों से सहमत नहीं हूँ जो यह कहते हैं कि भारतीय किसान आधुनिक तरीकों को नहीं अपना सकते। समस्या केवल यह है कि उन तक नए तौर-तरीकों को कैसे पहुंचाया जाए?’ नेहरू युग धर्म के कायल थे। खेती में नयी तकनीकों और उपकरणों के निवेश के बारे में किसानों को उनकी राय थी- ‘हर युग का अपना धर्म होता है। यदि आप युग धर्म का पालन नहीं करेंगे तो निर्बल हो जायेंगे, विफल हो जायेंगे।’ खेती हमारी मेरूदंड है और नेहरू उसकी आभा को और प्रखर बनाने के सदैव हिमायती थे। विज्ञान में उनकी प्रबल आस्था थी। खेती ही क्या, उनकी धारणा थी कि विज्ञान हमारी हर समस्याओं का समाधान कर सकता है। भले ही समस्या भूख, गरीबी, जड़ता या कि अंधविश्वास निवारण की ही क्यों न हो?
नेहरू की वैज्ञानिक अवधारणाओं, उनकी मनोवृत्ति और उनके मानस पर भारतीय परमाणु कार्यक्रम के पितामह डॉ। होमी जहांगीर भाभा की टिप्पणी सर्वथा समीचीन है- ‘जवाहर लाल नेहरू के लिए युग का सबसे बड़ा काम था, मनुष्य को युगों पुरानी गरीबी के जीवन से ऊपर उठाकर एक ऐसे सामाजिक जीवन के स्तर पर पहुँचा देना, जहाँ सुरक्षा, सुख, साधन और इन सबसे भी अधिक जीवन के उच्चादर्शों को पूरित करने का अवसर प्राप्त हो सके। वह जानते थे कि इन उद्देश्यों को केवल विज्ञान और उसके व्यावहारिक पक्षों से ही प्राप्त किया जा सकता है। उनका विश्वास था कि आधुनिक विज्ञान को’ आधार बना कर ही भारत फिर से एक महान राष्ट्र बन सकता है।’
 

परमाणु आयुध नहीं, वांछनीय है परमाणु ऊर्जा

स्वदेश आगमन के बाद डॉ। होमी जहांगीर भाभा ने टाटा ट्रस्ट के अनुदान से मुंबई में ‘टाटा आधारभूत अनुसंधान संस्थान’ की स्थापना की जो डॉ। भाभा के लिए एक निजी प्रयोगशाला थी जिसका निमित्त था- ‘अब से कुछ वर्षों बाद जब परमाणु ऊर्जा का बिजली उत्पन्न करने में सफलतापूर्वक उपयोग होने लगेगा तब मुझे विश्वास है कि भारत को अपने लिए विशेषज्ञ बाहर से नहीं बुलाने पड़ेंगे वरन् वे अपने देश को तैयार मिलेंगे।’
जब उक्त प्रयोगशाला की जानकारी नेहरू को हुई तो उन्होंने बड़ी शिद्दत से महसूस किया कि सार्वजनिक क्षेत्र में परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान खड़े किए जाने चाहिए। अतः उन्होंने डॉ। भाभा की अध्यक्षता में १९४८ में परमाणु ऊर्जा आयोग का गठन किया। आगे चलकर १९५४ में ‘परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान’ की ट्राम्बे में स्थापना की गई, (डॉ। भाभा के निधन के बाद १९६७ में इसका नाम भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र कर दिया गया) उसी वर्ष परमाणु ऊर्जा विभाग भी अस्तित्व में आया। साथ ही साथ ‘अप्सरा (१९५६), साइरस (१९६०), जरलीना (१९६१) जैसे परमाणु रिएक्टरों की स्थापना का भी काम चलता रहा। जब भारत में परमाणु ऊर्जा संबंधी प्रतिष्ठानों के निर्माण का काम जोर-शोर से चल रहा था तो इनकी आलोचनाएं भी की गईं। नेहरू ने इसका पुरजोर विरोध करते हुए १० मई १९५४ को लोकसभा में उद्घोषणा की- ‘मैं सदन को इस बात की याद दिलाना चाहता हूँ कि शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु शक्ति का उपयोग भारत जैसे देश के लिए, जहाँ कि ऊर्जा के स्रोत सीमित हैं, ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, बनिस्बत फ्रांस जैसे औद्योगिक दृष्टि से विकसित देश के लिए।’ नेहरू की दृष्टि में परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों का लक्ष्य शांतिमूलक होना चाहिए। वे परमाणु विद्युत तो चाहते थे पर परमाणु आयुध नहीं। कदाचित यही कारण है कि नेहरू के अवसान काल तक भारत ने परमाणु परीक्षण नहीं किया यद्यपि वह सक्षम था। विचारणीय है कि जो देश १९५६ में परमाणु रिएक्टर की स्थापना कर सकता है, वह परमाणु परीक्षण नहीं कर सकता था? दोनों युक्तियों की तकनीक तो एक ही है। अमेरिका (१९४५), सोवियत संघ (१९४९), ब्रिटेन (१९५२), फ्रांस (१९६०) परमाणु विस्फोट करके परमाणु शक्तियाँ बन बैठी थीं और यहां तक कि चीन भी १९६४ में इन्हीं की बिरादरी में शामिल हो गया। भाभा आरंभ से परमाणु परीक्षण के लिए नेहरू पर जोर देते रहे लेकिन उन्होंने हमेशा इसकी अनसुनी की लेकिन जब चीन परमाणु शक्ति बन गया तो भाभा से न रहा गया और उन्होंने नेहरू से कहा- अब तो आपकी अनुमति मिल ही जानी चाहिए। लेकिन नेहरू ने सदा की भाँति निर्विकार भाव से फिर उन्हें मना कर दिया।
नेहरू की परमाणु अवधारणा पर डॉ। भाभा ने टिप्पणी की है- ‘पंडित जी यह अनुभव करते थे कि विज्ञान का एकमात्र उपयोग मानव के हित के लिए होना चाहिए न कि युद्ध के लिए, अत्यधिक शक्तिशाली और विनाशकारी अस्त्र बनाने में। यद्यपि जवाहर लाल नेहरू पेशे से वैज्ञानिक नहीं थे किंतु उनके व्यक्तित्व से सदैव एक पूर्ण वैज्ञानिक के सभी अनिवार्य गुणों की आभा प्रस्फुटित होती रही। वह विज्ञान को बहुत बड़ा बौद्धिक अनुशासन मानते थे जो मनुष्य के व्यक्तित्व को प्रस्फुटित करता है और जिसके कारण प्रत्येक बात में उसके वास्तविक रूप को देखने की क्षमता उत्पन्न होती है।’
नेहरू में यह क्षमता अपनी संपूर्णता और सर्वांगता के साथ विद्यमान थी। वह वैज्ञानिक तो नहीं थे पर उन्हें विज्ञान की खासी समझ थी और विज्ञान तथा वैज्ञानिकों के सामाजिक सरोकारों तथा उत्तरदायित्वों का उन्हें पूरी तरह भान था, इसीलिए वे विज्ञान के विवेक सम्मत अनुप्रयोगों की ही अनुशंसा करते थे जो समूची मानव जाति के लिए कल्याणकारी हो। यही कारण है कि भारत और अन्य शक्ति राष्ट्रों की परमाणु आयोजनाओं में एक बुनियादी अंतर विद्यमान है। भारत ने जहां शांतिमूलक संधानों पर जोर दिया, वहीं दूसरी ओर इन राष्ट्रों ने परमाणु आयुधों के भंडारण में अपनी पूरी ताकत लगा दी और दुनिया को विश्वयुद्ध की आग में झोंक दिया। यह खतरा आज भी मंडरा रहा है। गौरतलब है कि जिस भारत ने १९५६ में परमाणु भट्टी बनायी, वह १९७४ में परमाणु परीक्षण करता है और जिस चीन ने १९६४ में परमाणु परीक्षण किया, वह १९९८ में परमाणु विद्युत जनन के लिए एक प्रोटोटाइप रिएक्टर की स्थापना करता है। यही बुनियादी अंतर है भारत और शेष विश्व के परमाणु कार्यक्रमों में। परमाणु संधान के शांतिमूलक प्रयोजनों की नीतिगत अवधारणा नेहरू की ही देन थी जिस पर भारत आज भी कायम है। आज भारत परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र है लेकिन ‘नो फर्स्ट यूज’ पर अपनी प्रतिबद्धता के लिए वह वचनबद्ध भी है।
अंतरिक्ष कार्यक्रमों को भी समर्थन
जिस प्रकार डॉ। भाभा के निजी प्रयासों से परमाणु क्षेत्र में संधान कार्यक्रम आरंभ हुए, उसी तरह डॉ। विक्रम अंबालाल साराभाई के निजी प्रयासों से देश में अतरिक्ष संधानों का शुभारंभ हुआ। १९४८ में महात्मा गांधी विज्ञान संस्थान, अहमदाबाद के तीन कमरों में साराभाई ने भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला की स्थापना के साथ अंतरिक्ष अनुसंधान की आधार पीठिका निर्मित की। नेहरू ने इसे सराहा ही नहीं अपितु इस कार्यक्रम को और व्यापक तथा भव्य रूप दिया। १९६२ में साराभाई की ही अध्यक्षता में परमाणु ऊर्जा विभाग की देख-रेख में बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग के लिए ‘अंतरिक्ष अनुसंधान की भारतीय राष्ट्रीय समिति (इनकोस्पार) गठित की। आगे चलकर इसी का पुनर्गठन किया गया और ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन’ (इसरो)’ १९६९ में अस्तित्व में आया जिसने नेहरू, भाभा और साराभाई के सपनों को संपूरित किया और भारत ने विश्वमंच पर अपनी एक प्रतिष्ठ राष्ट्र का छवि निर्मित की।
यद्यपि भारत के परमाणु और अंतरिक्ष कार्यक्रमों का बहुत विरोध किया गया लेकिन नेहरू टस से मस न हुए और वे इन दोनों कार्यक्रमों को अपना समर्थन और सहयोग देते रहे। इन कार्यक्रमों के प्रत्यक्षदर्शी प्रातिभ इंजीनियर और देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ। कलाम अपनी आत्मकथा में उन संशयपूर्ण लम्हों को याद करते हुए लिखते हैं- ‘भारत में राकेट विज्ञान के पुनर्जन्म का श्रेय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की नई प्रौद्योगिकी के विकास की दृष्टि को जाता है। उनके इस सपने को साकार करने की चुनौती प्रो। साराभाई ने ली थी। हालांकि कुछ संकीर्ण दृष्टि के लोगों ने उस समय यह सवाल उठाया कि हाल में स्वाधीन हुए जिस भारत में लोगों को खिलाने के लिए अन्न नहीं है, उस देश में अंतरिक्ष कार्यक्रमों की क्या प्रासंगिकता है? लेकिन न तो प्रधानमंत्री नेहरू और न ही प्रो। साराभाई में इस कार्यक्रम को लेकर कोई अस्पष्टता थी। उनकी दृष्टि अत्यंत स्पष्ट थी- ‘अगर भारत के लोगों को विश्व समुदाय में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है तो उन्हें नई से नई तकनीक का प्रयोग करना होगा, तभी जीवन में आने वाली समस्याएं हल होंगी।’ इसके माध्यम से उनका अपने शक्ति प्रदर्शन का कोई इरादा न था। यह नेहरू की वैज्ञानिक दृष्टि और दूरंदेशी थी और जब उसने रंग दिखाया तो दुनिया दंग रह गयी। आज यह सब जग जाहिर है।
इस विहंगावलोकन के उपरांत निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि आधुनिक भारत के वैज्ञानिक नवनिर्माण में नेहरू के अवदानों की अवहेलना की ही नहीं जा सकती है। वस्तुतः पंडित नेहरू आधुनिक भारत के विज्ञान शिल्पी थे। अस्तु!
 
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