ऐतिहासिक पृष्ठ

(22/Jul/2017)

पारस  पत्थर

महावीर प्रसाद द्विवेदी

रसायन-शास्त्र का इतिहास देखने से पता लगता है कि एक समय कुछ मनुष्य पारस नामक पत्थर की खोज में व्यस्त थे। उस समय आधुनिक रसायन-शास्त्र की नींव भी न पड़ी थी। इस प्रकार के मनुष्यों का यह दृढ़ विश्वास था कि पृथ्वी में अवश्य ही कोई ऐसी वस्तु है जिसके स्पर्श से लोहा आदि धातुएँ सुवर्ण हो जाती हैं। उन लोगों में इस प्रकार का विश्वास कैसे पैदा हुआ, इसका पता नहीं लगता। वे वर्तमान समय के वैज्ञानिकों की तरह बिजली की भट्टी तथा उष्णता और वायु मापने वाले यंत्रों का व्यवहार न करते थे। ये लोहे को सोना बनाने  के लिए अनेक प्रकार के वृक्षों के रस, तंत्र-मंत्र और पूजा-पाठ आदि का आश्रय लेते थे। सुनते हैं, इस प्रकार उन्होंने इस कार्य में सिद्धि भी प्राप्त कर ली थी। किन्तु इस श्रेणी के रसायन-शास्त्रवेत्ता अब संसार में नहीं; उनके पोथी-पत्रे भी नष्ट हो गए। इस दशा में यह जानने का अब कोई उपाय नहीं कि उन्होंने पारस पत्थर की खोज में किस मार्ग का अवलंबन किया था। उन लोगों का केवल नाम रह गया है। अंग्रेज़ी में वे अलकेमिस्ट कहलाते हैं।
वर्तमान समय के वैज्ञानिकों ने उन अलकेमिस्टों के अद्भुत विचारों और पागलपन की बातों का स्मरण करके उनकी कितनी हँसी उड़ाई है, इसकी सीमा ही नहीं। किन्तु गत दस वर्षों के भीतर रसायन-शास्त्र में कई एक अद्भुत-अद्भुत आविष्कार हुए हैं। उनसे इन हँसने वालों को पता लग गया है कि अलकेमिस्ट लोग पागल न थे। उन्होंने भी कई प्रकार की साधनाओं का अवलंबन किया था और उनके द्वारा उन्हें सफलता भी प्राप्त हुई थी। इंग्लैंड के प्रसिद्ध रसायन-शास्त्रवेत्ता रैमज़े साहब यह बात अब साफ़-साफ़ स्वीकार करने लगे हैं कि लोहे का सोना और राँगे की चाँदी बनाना असाध्य काम नहीं। इस दशा में कई शताब्दियों पहले जिस प्रकार अलकेमिस्ट लोग पारस की खोज में अतिव्यस्त थे उसी प्रकार वर्तमान समय के वैज्ञानिक भी उसकी खोज में दौड़-धूप करने लगे हैं।
रै़मज़े साहब के आविष्कार की बात जानने के लिए पहले एक भूमिका की आवश्यकता है। सृष्टि-तत्त्व की बात उठते ही बहुत पहले समय के पंडित लोग पंचतत्त्वों का नाम सुनाने लगते थे। उन लोगों का विश्वास था कि पृथ्वी, अप्, तेज, वायु और आकाश-इन पाँच तत्वों से ही इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है। ये पाँचों तत्त्व मूल पदार्थ हैं, अर्थात इनका और कोई रूपांतर नही हो सकता। ये वृक्ष और लताएँ पशु और पक्षी, स्त्री और पुरुष सब इन्हीं पाँच पदार्थों के ही विचित्र संयोग से पैदा हुए हैं। ये सब जब नष्ट होते हैं तब इन्हीं पांच पदार्थों में मिल जाते हैं। पुराने पंडितों का यह सिद्धांत वर्तमान समय के वैज्ञानिकों के सामने स्थिर न रह सका। गत उन्नीसवीं शताब्दीं में सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डाल्टन साहब ने यह प्रत्यक्ष दिखला दिया कि पृथ्वी, अप् आदि मूल पदार्थ नहीं हैं। इनमें से प्रत्येक का विश्लेषण किया जा सकता है और विश्लेषण करने पर प्रत्येक में एक से अधिक पदार्थ दृष्टिगोचर होते हैं। डाल्टन साहब ने सिद्ध किया कि यह ब्रह्मांड पंच-महाभूतों से नहीं बना। इसकी उत्पत्ति हाइड्ोजन, ऑक्सीजन आदि वायव, गंधक, अंगार आदि कठिन और स्वर्ण, रौप्य आदि धातव पदार्थों से हुई है। उन्होंने यह भी प्रत्यक्ष दिखला दिया कि वायु, जल आदि पदार्थ ऑक्सीजन, नाइट्रोजन और हाइड्ोजन आदि से ही बने हैं। इस दशा में प्राचीन समय के पंचमहाभूतों के स्थान पर और भी अनेक भूतों की कल्पना हुई। वैज्ञानिकों ने स्वीकार कर लिया है हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, गंधक, स्वर्ण और रौप्य आदि कोई नब्बे पदार्थों से इस विश्व की सृष्टि हुई है। ये नब्बे पदार्थ ही वास्तव में मूल पदार्थ हैं। इनका नाश अथवा रूपांतर नहीं होता।
डाल्टन साहब का यह सिद्धांत बहुत समय से वैज्ञानिकों में आदृत होता आ रहा था। किसी समय यह भी असत्य ठहराया जाएगा, इस बात की कभी किसी ने कल्पना तक न की थी। पर, अब इस सिद्धांत की जड़ पर भी धक्का लगा है। फ्रांस के विख्यात रसायन-शास्त्री क्यूरी साहब और उनकी सहधर्मिणी ने रेडियम नामक एक धातु की परीक्षा की। उन्होंने देखा कि यह धातु अपने आप विश्लिष्ट होकर परमाणु से भी अधिक छोटे-छोटे कणों में विभक्त हो जाती है। रेडियम धातु मूल पदार्थ मानी गई थी। मूूल पदार्थ का इस प्रकार विश्लिष्ट होना देख सारे संसार के विज्ञानवेत्ता चकित हो गए। क्यूरी साहब रेडियम का ही विश्लेष दिखला कर शांत न हुए। उन्होंने थोरियम, यूरेनियम आदि अनेक धातु संबंधी मूल पदार्थों का भी विश्लेषण कर दिखाया। ये सब पदार्थ विश्लिष्ट होकर एक अत्यंत सूक्ष्म पदार्थ में परिणत हो गए, यह भी विद्वानों ने प्रत्यक्ष देखा। परमाणु के इन अत्यंत सूक्ष्म टुकड़ों का नाम इलेक्ट्रॉन अथवा अति-परमाणु रखा गया।
क्यूरी साहब के पूर्वोक्त आविष्कार को हुए अभी थोड़ा ही समय हुआ। तथापि, इतने थोड़े समय में ही इस आविष्कार की बात सुनकर रदरफोर्ड, सदि, टाम्सन आदि वर्तमान समय के प्रसिद्ध वैज्ञानिकों ने इस विषय पर अलग-अलग विचार करना प्रारंभ कर दिया। उनके इस विचार का अंत आज तक नहीं हो सका। तथापि इस विचार की बदौलत विज्ञान की नई-नई बातें रोज ही मालूम हो रही हैं। इन वैज्ञानिकों को परीक्षा करने पर ज्ञात हुआ कि रेडियम विश्लष्ट होकर केवल इलेक्ट्रॉन, अर्थात अति-परमाणु, में ही परिणत नहीं हुआ, किन्तु साथ ही साथ वह नाइटन नामक एक और नवीन धातु में भी रूपांतरित हो गया। रेडियम से रूपांतरित होने पर यह नाइटन ;छपजवदद्ध नाम पदार्थ हेलियम तथा रेडियम जाति के एक और पदार्थ ;त्ंकपनउ ।द्ध में भी परिणत हो जाता है। इस प्रकार जो पदार्थ इस समय तक मूल पदार्थ माने गए थे उन्हीं को विश्लिष्ट और रूपांतरित होते देख इन वैज्ञानिकों के आश्चर्य की सीमा न रही। ऊपर के इन आविष्कारों से डाल्टन साहब का परमाणु संबंधी सिद्धांत एकदम डाँवाडोल हो गया। वैज्ञानिक लोग कहने लगे कि हाइड्रोजन, ऑक्सीजन आदि धातु और अधातु-संबंधी नब्बे ही पदार्थ जगत के मूल पदार्थ नहीं। जगत का मूल पदार्थ केवल इलेक्ट्रॉन अर्थात अति-परमाणु है। वह, अल्पाधिक संख्या में सम्मिलित होकर हमारे सुपरिचित ऑक्सीजन, हाइड्रोजन तथा सुवर्ण, लौहा आदि को उत्पन्न करता है। इन विज्ञानवेत्ताओं को यह भी निश्चय हो गया कि इस ब्रह्मांड में केवल रेडियम, अथवा उसी की जाति का कोई अन्य पदार्थ ही रूपांतर ग्रहण करके अति-परमाणू में परिणत नहीं होता, किन्तु सृष्टि की सभी अन्याय वस्तुएँ धीरे-धीरे नष्ट होकर अति-परमाणु हो जाती हैं। यह अति परमाणु ही पुनः इकट्ठा होकर संसार में एक नई वस्तु उत्पन्न करता है। ये लोग अब अपनी कल्पना-दृष्टि से देखने लगे कि संसार की यह सृष्टि इसी प्रकार के उथल-पुथल द्वारा अस्तित्व में आती हैं। इस उथल-पुथल का न आदि है, न अंत।
जिस समय संसार के अन्यान्य वैज्ञानिक पूर्वोक्त आविष्कारों की ओर आकृष्ट हो रहे थे उस समय इंग्लैंड के सुप्रसिद्ध रसायन-शास्त्री सर विलियम रैमज़े एक मात्र रेडियम के संबंध में ही शांतिपूर्वक मनन कर रहे थे। उन्होंने परीक्षा द्वारा देखा कि रेडियम रूपांतरित होकर नाइटन में परिणत हुआ और नाइटन अपनी बहुत कुछ उष्णता का परित्याग करके डेलियम हो गया। यह सब लीला रेडियम की ही अंतर्निहित शक्ति से हुई। उन्होंने हिसाब लगाकर देखा कि एक घन सेंटीमीटर स्थान में रखा हुआ नाइटन जब विश्लिष्ट होकर हेलियम आदि में परिणत होता है तब उस आयतन के चालीस लाख गुने हाइड्रोजन को जलाने से जितना ताप उत्पन्न होता है, उतना ही ताप उससे आप ही पैदा होता है। उन्होंने निश्चय समझ लिया कि यह अत्यधिक शक्ति रेडियम ही के भीतर छिपी रहती है। रेडियम विश्लिष्ट होकर जिस समय लघु पदार्थ में परिणत होता है, उस समय उसकी वह शक्ति ताप उत्पन्न करने लगती है। रैमज़े साहब को विश्वास हो गया कि ब्रह्मांड के सभी पदार्थों में इसी प्रकार अत्यधिक शक्ति संचित है। यत्नपूर्वक संचित उस शक्ति के खजाने का द्वार खोलकर ही प्रकृति देवी संसार में उथल-पुथल के नए-नए तमाशे दिखाती है। रेडियम जैसी गुरु वस्तु जब अपनी अंतर्निहित शक्ति को त्यागकर नाइटन और हेलियम आदि लघु वस्तुओं में परिणत हो जाती हैं तब लघु वस्तुओं पर अधिक शक्ति डालकर क्या वह उन्हें वैसी ही गुरुतर नहीं बना सकती? यह प्रश्न रैमज़े साहब के चित्त में उदित हुआ। यदि ऐसी रासायनिक प्रक्रिया का आविष्कार हो जाए तो लोहे से सोना बनाना सहज हो जाएगा। सभी विज्ञानवेत्ता रैमज़े साहब की इस बात से सहमत हो गए।
प्रकृति के कार्यों की प्रणाली का आविष्कार करना कठिन बात नहीं, किन्तु जिन उपकरणों और जिन अपरिमित शक्तियों के प्रयोग द्वारा प्रकृति संसार का कामल चलाती है उन सबका अनुकरण करना मनुष्य की शक्ति के बाहर की बात है। रैमज़े साहब इस कठिनाई से अनभिज्ञ न थे। तथापि वे किसी कृत्रिम उपाय से शक्ति-प्रयोग द्वारा लघु पदार्थ को एक स्वतंत्र गुरु पदार्थ में परिणत करने की चेष्टा करने लगे। पर उन्हें इस प्रकार के किसी भी कृत्रिम उपाय का पता न लगा। साथ ही, विश्लिष्ट होने के समय रेडियम अपने पिंड से जो विपुल शक्ति उत्पन्न करता है उसका भी अनुसंधान वे न कर सके। इसी समय रैमज़े साहब के मन में एक बात पैदा हुई। वे सोचने लगे कि विश्लिष्ट होते समय नाइटन अपने पिंड से जो शक्ति राशि बाहर निकालता है उसका यदि और किसी लघु पदार्थ पर प्रयोग किया जा सके तो शायद वह पदार्थ गुरु पदार्थ बन जाए। इस प्रकार का सोच-विचार करके ही वे शांत नह हुए। उन्होंने परीक्षा भी आरंभ कर दी। पहले वे विशुद्ध जल की कुछ बूँदों में नाइटन डालकर यह देखने लगे कि जल के हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में कुछ परिवर्तन होता है या नहीं। जल यथारीति विश्लिष्ट होकर हाइड्रोजन और ऑक्सीजन उत्पन्न करने लगा और नाइटन से हेलियम पैदा होने लागा। जल के पात्र से इन सब प्रकार की भापों को अलग करके रैमज़े साहब देखने लगे कि और कोई नया पदार्थ तो नहीं पैदा हो गया। अंत में उन्होंने देखा कि पूर्वोक्त भापों के अतिरिक्त नियन मानक एक मूल पदार्थ भी उत्पन्न हो गया है। यह देखकर रैमज़े साहब के आश्चर्य और आनंद का ठिकाना न रहा। उनको दृढ़ विश्वास हो गया कि जब हाइड्रोजन और नाइट्रोजन की गुरुता बढ़कर वे नियम में परिणत हो गए तब किसी न किसी दिन इसी उपाय से लोहा भी सोने में अवश्य परिणत हो जाएगा।
रैमज़े साहब के इस आविष्कार का प्रचार हुए अभी थोड़ा ही समय हुआ। इतने में ही उसका वृत्तंत सुनकर संसार के वैज्ञानिकों में एक अद्भुत हलचल मच गई। ऐसी हलचल और ऐसी आनंद-प्राप्ति वर्तमान समय के और किसी भी आविष्कार के कारण नहीं हुई। कुछ समय से विज्ञान-संबंधी सामयिक पत्रों तथा सभा-समितियों में इस आविष्कार पर वाद-विवाद हो रहा है। बड़े-बड़े विज्ञानवेत्ता इस आविष्कार पर बड़े ध्यान से विचार कर रह हैं। किन्तु सभी वैज्ञानिक रैमज़े साहब के आविष्कार को भ्रांतिहीन नहीं समझते। बेकेरेल साहब, जिन्होंने सबसे पहले रेडियम जाति के पदार्थों के गुणों की परीक्षा की थी, अब इस संसार में नहीं हैं। क्यूरी साहब भी परलोक सिधार गए। क्यूरी साहब की पत्नी, रदरफोर्ड, टामसन और यदि साहब ही इस समय इस आविष्कार पर अपने मतामत देने के अधिकारी हैं। रदरफोर्ड ने तो रैमज़े साहब के इस आविष्कार की बात सुनकर कहा है कि उनकी परीक्षा के समय संभवतः जल में वायु का प्रवेश हो गया होगा। वायु प्रवेश के कारण जल में वायु का ही नियम बन गया होगा। रैमज़े साहब ने इसी नियन को नवीन उत्पन्न नियम मानकर भूल की है। क्यूरी साहब की पत्नी भी इस आविष्कार पर अविश्वास करती हैं। किन्तु पहले कड़ी हुई परीक्षाओं के बाद रैमज़े साहब ने और कई परीक्षाएँ कीं। उनके द्वारा उन्होंने अनेक पदार्थों का रूपांतर प्रत्यक्ष दिखला दिया। इस कारण, मालूम होता है, वैज्ञानिकों का संदेह अब इस संबंध में दूर हो रहा है।
कुछ समय हुआ, रैमज़े साहब ने ताँबा, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन मिले हुए एक यौगिक पदार्थ में नाइटन डाला। यह यौगिक पदार्थ परिवर्तित हो गया। इससे आर्गन नामक एक मूल पदार्थ की उत्पत्ति हुई। इसके अतिरिक्त सिलिकन, टिटानिसम, थोरियम आदि पदार्थों से घटित और भी अनेक यौगिक पदार्थों पर इसकी परीक्षा हुई। फल यह हुआ कि ये सब पदार्थ परिवर्तित हो गए। इनमें से प्रत्येक से अंगार (कार्बन) नामक पदार्थ का जन्म हुआ। बिस्मिय घटित एक पदार्थ का रूपांतर भी अंगारक वाष्प में होता देखा गया है।
रैमज़े साहब की ये सब परीक्षाएँ लुक छिपकर नहीं हुई। उन्होंने कई अच्छे-अच्छे विज्ञान-वेत्ताओं के सामने ये परीक्षाएँ की हैं। कई परीक्षाएँ तो उन्होंने इंग्लैंड की केमिकल सोसायटी की सभा में ही की है। अतएव रैमज़े साहब की इन परीक्षाओं की सत्यता के विषय में संदेह करने का कोई कारण नहीं। साक्षर जन अब समझ जाएंगे कि प्रकृति की यह लीलना नब्बे मूल पदार्थों द्वारा नहीं हो रही। केवल एक ही पदार्थ उसका मुख्य आधार है। सोना, चाँदी, हीरा, लोहा और ताँबा आदि सभी पदार्थ एक ही पदार्थ के भिन्न-भिन्न रूप हें। अलकेमिस्ट लोगों ने लोहे को सोने में परिणत करने का जो प्रयत्न आरंभ किया था, वास्तव में वह दुस्साध्य न था। लोहे की सोना बनाने वाला पारस पत्थर इस भूमंडल में इस प्रकृति के ही भीतर विद्यमान जान पड़ता है।

(साभार : महावीरप्रसाद द्विवेदी रचना संचयन,
अगस्त १९१६ की सरस्वती में प्रकाशित)