ऐतिहासिक पृष्ठ

(20/Apr/2017)

विज्ञान शृंखला आलेख

भारतीय विज्ञान का पुनर्जागरण 

शुकदेव प्रसाद

अंग्रेजों ने साधारण व्यावसायिकों की हैसियत से भारत भूमि में अपने कदम रखे लेकिन अपनी कूटनीतिक चालों से वे यहाँ के सर्वेसर्वा बन बैठे। अपने साम्राज्य के विस्तार के बाद उन्होंेने हमारा दमन, उत्पीड़न और शोषण आरम्भ किया। चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो या राजनीति और विज्ञान का, सभी में हम भारतीयों के साथ भेद-भाव की नीति बरती जाती और अच्छे पदों पर भारतीयों को बैठने ही नहीं दिया जाता। यहाँ पर उन्होंने उन्हीं उद्योगों को पनपने दिया, जो इंग्लैंड में उद्योगों के लिए कच्चे माल की आपूर्ति कर सकें। अपनी आवश्यकताओं के लिए उन्होंने अनुसंधानों पर बल दिया और इस तरह भावी वैज्ञानिक परिदृश्य की आधारशिला निर्मित हुई। साहस के धनी कुछेक भारतीयों ने अपनी निजी अभिरुचि से विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में ठोस कार्य किए जिन्होंने भावी अनुसंधानों का मार्ग प्रशस्त किया और वैज्ञानिक भारत के निर्माण में ये सारे प्रयास सहायक हुए। आजादी के बाद इनका विस्तार किया गया और फलस्वरूप तेजी से भारतीय वैज्ञानिक विकास की ओर अभिमुख हुआ। इस कालखंड को हम अंधयुग के बाद ‘भारतीय विज्ञान का पुनर्जागरण काल’ भी कह सकते हैं।

एशियाटिक सोसायटी की स्थापना

२८ सितम्बर, १७४६ को लंदन में जन्में सर विलियम जोन्स १७८३ में कलकत्ते (अब कोलकाता) के उच्चतम न्यायालय के एक अवर न्यायाधीश के रूप में भारत आये। उन्होंने भारतीय संस्कृति के पुनरुद्धार के किए जितना कार्य किया, उतना किसी और अंग्रेज ने नहीं किया। उनकी प्राच्य विद्या में इतनी गहन अभिरुचि थी कि यहाँ के मूल ग्रंथों के अध्ययन और संस्कृति से गहन रूप से सम्पृक्तता के लिए उन्होंने संस्कृत सीखी। सर विलियम जोन्स की पहल पर १५ जनवरी, १७८४ को यूरोपीय समाज के ३० विशिष्ट व्यक्तियों ने एशियाटिक सोसायटी की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया। सर जोन्स की धारणा थी कि भारत को विश्व को विज्ञान तथा कला के क्षेत्र बहुत कुछ देना है। १७८४ में स्थापित एशियाटिक सोसायटी संसार भर की तमाम एशियाई और प्राच्य विद्या सोसायटियों की मातृ संस्था बन गई और इससे अभिप्रेरित होकर नाना संस्थाओं और विद्वानों ने भारत की महान परम्पराओं को प्रकाश में लाने का भगीरथ प्रयास किया, जिसके पीछे प्रेरक की भूमिका निस्संदेह सर विलियम जोन्स (१७४६-१७९४) की थी।
सर विलियम जोन्स सोसायटी के प्रथम अध्यक्ष थे। आपके ही प्रयास से १७६६ में इंडियन म्यूजियम ऑफ कलकत्ता की स्थापना हुई। सोसायटी ने १७८८ में ‘एशियाटिक रिसर्चेज’ नामक जरनल का प्रकाशन आरम्भ किया और इसमें भौतिकी, रसायन, भू-विज्ञान और चिकित्सा विषयक शोध पत्र प्रकाशित किए जाते थे। आगे चल कर और भी संस्थाओं ने ऐसे जरनलों का प्रकाशन आरम्भ किया और इस तरह भारतीय शोधें देशी पीरियाडिकल्स में छपने लगीं तथा भारत में वैज्ञानिक अनुसंधान का वातावरण शनैः शनैः बनने लगा। भारत में वानस्पतिक सर्वेक्षण का कार्य सर जोन्स ने ही आरंभ किया। उन्होंने ष्ठवजंदपबंस व्इेमतअंजपवदे वद ैमसमबज च्संदजेष् शीर्षक से एक ग्रंथ प्रस्तुत किया तथा आगे चलकर (१८७४) काक्स वर्ग ने ‘फ्लोरा इंडिका’ जैसा विस्तृत ग्रंथ रचा, जिससे भारतीय वनस्पति जातों ;थ्सवतंद्ध का सम्पूर्ण विवरण प्राप्त किया जा सकता है। वनस्पति विज्ञान ही नहीं, दर्शन, खगोल और जीव विज्ञान के विविध पक्षों पर जोन्स ने अपनी लेखनी चलायी और हमारे ज्ञान भंडार में अभिवृद्धि की।

वैज्ञानिक समितियाँ

१९वीं शती के पूर्वार्द्ध में नाना वैज्ञानिक समितियाँ गठित की गईं; जिसमें अनुसंधान कार्य आरम्भ हुए। आज ये समितियाँ देश की शीर्ष वैज्ञानिक संस्थाएँ बन चुकी हैं। १८२१ में ‘एग्रीकल्चरल सोसायटी ऑफ इंडिया’ की स्थापना हुई, जिसे बाद में ‘एग्रीकल्चरल एंड हार्टीकल्चरल सोसायटी’ तथा अंततः ‘रॉयल एग्री-हार्टीकल्चरल सोसायटी’ कहा जाने लगा। १८३३ में ‘मद्रास लिटरेरी सोसायटी’ अस्तित्व में आयी, जिसने ‘मद्रास जरनल ऑफ लिटरेचर एंड साइंस’ का प्रकाशन आरंभ किया। १८७६ में कलकत्ते में डॉ। महेन्द्र लाल सरकार ने ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर दि कल्टीवेशन ऑफ साइंस’ नामक संस्था गठित की। इसमें वैज्ञानिक शोध का खासा माहौल था तथा सुव्यवस्थित प्रयोगशाला की भी स्थापना इसमें की गई थी। शीघ्र ही वह संस्थान वैज्ञानिक अनुसंधान का प्रमुख केन्द्र बन गया और देश के कार्यरत वैज्ञानिकों को इसने अपनी ओर आकर्षित किया। सर सी.वी.रामन्, जब वे कलकत्ते में एकाउंटेंट जनरल के पद पर आसीन थे, ने भी इस प्रयोगशाला में कार्य किया था और कलकत्ते में रहने के लिए बो बाजार स्ट्रीट स्थित उक्त प्रयोगशाला उनके लिए आकर्षण का केंद्र थी। यहाँ पर रामन् ने जो प्रयोग आरम्भ किए, उन्हीं पर आगे चलकर (१९३०) उन्हें नोबेल पारितोषिक भी मिला। १८३३ में बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी गठित हुई। देश की प्रकृति विज्ञान की यह शीर्ष संस्था आज भी समूचे विश्व में अपना महत्व रखती है, जिससे सम्बद्ध होकर और अन्वेषण कार्य करके डॉ। सालिम अली ने अन्तर्राष्ट्रीय यशस्विता अर्जित की। तब देश में किसी भी विश्वविद्यालय में प्रकृति विज्ञान का न तो कोई पाठ्यक्रम था और न ही जीव विज्ञान का कोई संग्रहालय ही। बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी ने जैव सर्वेक्षण का कार्य आरम्भ किया जो कि देश में ऐेसे अध्ययनों की परिपाटी के शुभारम्भ का मूल बन गया और आज ऐसी कई संस्थाएँ कार्यरत हैं।
१९०७ में वी.रंगास्वामी अय्यर, के प्रयत्न से इंडियन मैथेमेटिकल सोसायटी स्थापित हुई। इसका मुख्यालय फर्ग्युसन कालेज, पुणे में था। शीघ्र ही इसने अपना नाम बदल कर इंडियन मैथेमेटिकल क्लब कर लिया लेकिन १९११ में इसने पुनः अपना नाम बदलकर इंडियन मैथेमेटिकल सोसायटी कर लिया। इसने ‘जरनल ऑफ मैथेमेटिकल सोसायटी’ का प्रकाशन भी आरम्भ किया जिसमें गणित के क्षेत्र के मौलिक अभिपत्र प्रकाशित होते थे। कलकत्ता उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायाधीश और कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति सर आशुतोष मुखर्जी ने अपने गणित प्रेम के कारण १९०८ में कलकत्ता मैथेमेटिकल सोसायटी की स्थापना की। गणित की सभी शाखाओं में मौलिक शोधों को प्रोत्साहित करने, अनुसंधान की प्रवृत्ति को जगाने और मौलिक अभिपत्रों के प्रकाशन के लक्ष्य को सामने रखकर उक्त समिति की स्थापना सर आशुतोष ने की थी, जिसमें वह सफल भी रहे। प्रो.पी.एस.मैकमोहन और प्रो। साइमंसन के प्रयासों से १९१४ में इंडियन साइंस कांग्रेस एसोसिएशन की स्थापना हुई। भारतीय विज्ञान कांग्रेस देश का सबसे बड़ा एवं लोकप्रिय वैज्ञानिक संगठन है। कलकत्ता में पहली बार आयोजित वार्षिक सभा की अध्यक्षता सर आशुतोष मुखर्जी ने की थी। मात्र १३५ प्रतिभागियों से आरम्भ हुई यह संस्था अब वट वृक्ष का रूप ले चुकी है, जिनके वार्षिक अधिवेशनों में देश-विदेश के विज्ञान के विविध क्षेत्रों के चार-पांच हजार वैज्ञानिक भाग लेते हैं, शोध-पत्र प्रस्तुत करते हैं और ज्ञान का आदान-प्रदान तथा विचार-विमर्श करते हैं।
रॉयल सोसायटी ऑफ लंदन, एकेडमी ऑफ साइंसेज ऑफ फ्रांस, दि नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज इन यू.एस.ए. अथवा यू.एस.एस.आर। एकेडमी ऑफ साइंसेज के पैटर्न पर भारत में साइंस एकेडमी की स्थापना करने का विचार भारतीय विज्ञान कांग्रेस के बम्बई वाले अधिवेशन (१९३४) में सामने आया और इस तरह नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज ऑफ इंडिया की स्थापना १९३५ में हुई। फरवरी १९७० में इसका नाम बदल कर ‘इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी’ कर दिया गया। इसी एकेडमी की परिपाटी पर इलाहाबाद में ‘दि नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ इंडिया (१९३०) तथा बंगलौर में ‘इंडियन एकेडमी ऑफ साइंस’ (१९३४) की स्थापना हुई। इन विज्ञान अकादमियों ने देश की वैज्ञानिक प्रतिभाओं को स्थापित करने, सामने लाने में अपना योगदान तो दिया ही, साथ ही भारतीय विज्ञान में हो रही मौलिक गवेषणाओं को भी उजागर करने का श्रेयस्कर कार्य किया। इनकी स्थापना से देश में वैज्ञानिक संस्कृति पनपी, एक नई चेतना का भान हुआ। देश भर के वैज्ञानिक एक मंच पर एकत्र होते थे सो वैज्ञानिक अनुसंधान को और बल प्रदान करने हेतु सरकार पर दबाव डालने मे भी ये संस्थाएँ सहायक सिद्ध हुईं और राजनयिक भी इनकी उपेक्षा न कर सके।

सर्वेक्षण कार्य

सर्वेक्षण कार्यों के लिए भू-वैज्ञानिकों की सेवाएँ १८१८ से ही ली जाती रही हैं। डब्लिन में भू-विज्ञान के तत्कालीन प्राध्यापक थामस ओल्डहम के भारत आगमन पर १८५७ में भारतीय भू-विज्ञान सर्वेक्षण की स्थापना हुई।

भारतीय सर्वेक्षण विभाग

१८०० में भारतीय प्रायद्वीप त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण की स्थापना की गई और १८१८ मे उसे भारत के विशद त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण के रूप में विस्तारित किया गया। स्थलाकृतिक और राजस्व सर्वेक्षण विभागों को (१८१७) मिलाकर उसे सर्वेयर जनरल ऑफ इंडिया के अधीन कर दिया गया और मद्रास में एक सर्वेक्षण स्कूल की स्थापना की गई। पूर्व रूपान्तरणों के बाद ये सारी संस्थाएं त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण में मिला दी गईं (१८७८) और उसका नाम भारतीय सर्वेक्षण विभाग कर दिया गया।

भारतीय जंतु सर्वेक्षण

१८७६ में एडिनबरा में जन्मे टी। एन। अननडेल १९०४ में भारत आये। यहाँ पर भारतीय संग्रहालय (इंडियन म्यूजियम) के प्राकृतिक इतिहास विभाग में उनकी नियुक्ति हुई। यहाँ पर उन्होंने कठोर श्रम करके अपने कौशल का ऐसा सदुपयोग किया कि उक्त विभाग के अधीक्षक कर्नल ए.अलकुक उनसे प्रभावित हुए बिना न रह सके। अलकुक के अवकाश के बाद डॉ। अननडेल उस विभाग के अधीक्षक बना दिये गये। शीघ्र ही उन्हें ‘इंडियन म्यूजियम’ कलकत्ता के जन्तु विज्ञान और भू-विज्ञान विभागों का कार्यभार सौंप दिया गया। इन विभागों के कार्य क्षेत्र का वह निरन्तर विस्तार करते रहे। कुछ ही वर्षों में यह विभाग इतना महत्वपूर्ण हो उठा कि इसने सहज ही भारत सरकार का ध्यान अपनी ओर खींचा। १९१६ में डॉ.अननडेल ने भारत सरकार को इस बात के लिए राजी कर लिया कि उक्त विभाग को प्रोन्नत किया जाय और इसका नाम ‘भारतीय जन्तु सर्वेक्षण’ ;र्ववसवहपबंस ैनतअमल वि प्दकपंद्ध रखा जाय। भारत सरकार ने डॉ। अननडेल का परामर्श माना ही नहीं, अपितु उसे कार्य रूप में परिणत भी कर दिखाया और इस तरह १९१६ में कलकत्ते में ‘भारतीय जन्तु सर्वेक्षण’ की स्थापना हुई। निस्संदेह डॉ। अननडेल इसके प्रथम निदेशक थे।
वस्तुतः भारत में प्राणि विज्ञानीय अनुसंधान १८४१ से आरम्भ हुए, जब एशियाटिक सोसायटी म्यूजियम के क्यूरेटर के पद पर एडवर्थ ब्लिथ की नियुक्ति हुई। इनके बाद ब्लिथ के उत्तराधिकारी जॉन एंडरसन को १८६६ में इंडियन म्यूजियम का अधीक्षक बनाया गया और प्राणि विज्ञान तथा नृ-विज्ञानी ;।दजीवचवसवहपबंसद्ध संग्रह एंडरसन के अधीन कर दिये गये।
क्रमशः जे। वुडमैसन, ए डब्ल्यू अलकुक और अननडेल के मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण अनुसंधान कार्य किये गये। आगे चलकर वहाँ से ‘रिकार्ड्स’ और ‘मेमायर्स ऑफ इंडियन म्यूजियम’ नामक प्रकाशन भी आरम्भ किये गये। इन शोध पत्रिकाओं से देश में प्राणि विज्ञान संबंधी अनुसंधान को बहुत प्रोत्साहन और बल मिला। डॉ.अननडेल के ही प्रयासों का यह सुफल था कि १९१६ में म्यूजियम के प्राणि विज्ञान और नृ-विज्ञान खंडों को भारतीय जन्तु सर्वेक्षण के रूप में प्रोन्नत किया गया, जो कि आज देश की सर्वोच्च वैज्ञानिक संस्था है।

भारतीय वानस्पतिक सर्वेक्षण

१७८८ में बोटेनिकल गार्डेन्स (कलकत्ता) की स्थापना के बाद से ही भारत में व्यवस्थित रूप से वानस्पतिक अनुसंधान कार्य आरम्भ हो सके, यद्यपि अरसा पूर्व सर जोन्स, जान फ्लेमिंग ;ब्ंजंसवहनम वि प्दकपंद डमकपबपदंस च्संदजे ंदक क्तनहेए१८१०द्धए नस्लीज ;डंजमतपं डमकपबंद्ध तथा राक्स बर्ग (फ्लोरा इंडिका) आदि ने वानस्पतिक सर्वेक्षण का कार्य आरम्भ कर दिया था।
१८९० में भारतीय वानस्पतिक सर्वेक्षण ;ठवजंदपबंस ैनतअमल वि प्दकपंद्ध की स्थापना हुई। सर जार्ज किंग इसके प्रथम निदेशक थे। सर्वेक्षण ने अपना कार्य दो एककों में आरम्भ किया। औद्योगिक खंड में इंडियन म्यूजियम और वर्गिकी विभाग ;ैलेजमउंजपबेद्ध तथा दूसरे एकक में बोटेनिकल गार्डेन्स था। आजकल दोनों सर्वेक्षणों को पर्यावरण विभाग से सम्बद्ध कर दिया गया है। दोनों सर्वेक्षण पर्यावरणीय जन शिक्षा और संरक्षण के प्रयास में संलग्न हैं।

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